वर्षा ऋतु में क्या खाएँ क्या नहीं | What To Eat & Don’t Eat In Rainy Season

वर्षा ऋतु (बारिश के मौसम) कैसे रखें अपनी सेहत का ध्यान… :

आयुर्वेद एक ऐसी चिकित्सा पद्धति है जिसमें “त्रिदोष सिद्धान्त’ की विस्तृत व्याख्या है, वात-पित्त या कफ दोषों का बढ़ने यानी प्रकुपित हो जाने पर उनको शान्त करने के उपायों का विस्तृत विवरण है, आहार में सेवन किये जाने वाले प्रत्येक द्रव्य के गुण-दोष का सूक्ष्म विश्लेषण है, ऋतुचर्या, दिनचर्या आदि के माध्यम से स्वास्थ-रक्षक उपायों का सुन्दर विवेचन है तथा रोगों से बचने एवं रोगों की चिरस्थायी चिकित्सा के लिए पथ्य-अपथ्य पालन करने हेतु उचित मार्गदर्शन है।

आयुर्वेद में वर्णित पथ्य-अपथ्य पालन यानी परहेज के महत्व को आज की आधुनिक चिकित्सा पद्धति ने भी स्वीकार कर लिया है इसीलिए शहरों के लगभग सभी अच्छे आधुनिक अस्पतालों में आहार विशेषज्ञ (Dieticians) की नियुक्ति हो गई है। आयुर्वेद के त्रिदोष सिद्धान्त की हमारे दैनिक जीवन, खान-पान तथा रहन-सहन पर आज भी गहरी छाप दिखाई देती है। आयुर्वेद की यह अद्भुत खोज-त्रिदोष सिद्धान्त एक पूर्ण वैज्ञानिक सिद्धान्त है और इसका सहारा लिये बिना कोई भी चिकित्सा पूर्ण नहीं हो सकती है। इस सिद्धान्त के माध्मय से न केवल रोगों के निदान और उपचार शीघ्रता से होते हैं बल्कि रोगी की प्रकृति को समझने में भी सहायता मिलती है। आयुर्वेद का मूलाधार है- त्रिदोष सिद्धान्त यानी वात-पित्त और कफ।

त्रिदोष अर्थात् वात-पित्त और कफ की दो अवस्थाएं होती हैं-

(1) सम – अवस्था (न कम, न अधिक, न प्रकुपित यानी सन्तुलित, स्वाभाविक, प्राकृत) और
(2) विषम -अवस्था (हीन, अति, प्रकुपित यानी दूषित, असन्तुलित, विकृत)।

वास्तव में वात-पित्त और कफ सम-अवस्था में दोष नहीं धातु कहलाते हैं क्योंकि यह शरीर को धारण करते हैं लेकिन जब यही धातुएं दूषित या विषम होकर रोग उत्पन्न करती हैं तब ये दोष कहलाती हैं। इस प्रकार “रोगस्तु दोष वैषम्यम्” के अनुसार दोषों का विषम या प्रकुपित होना ही रोगोत्पत्ति का कारण होता है। अतः रोग हो जाने पर अस्वस्थ शरीर को पुनः स्वस्थ बनाने के लिए त्रिदोष को सन्तुलन अथवा सम-अवस्था में लाना पड़ता है। जब शरीर में हमेशा रहने वाले ये वात पित्त कफ तीनों, उचित आहार-विहार के परिणाम स्वरूप शरीर में आवश्यक अंश में रहकर सम-अवस्था में रहते हैं और शरीर का परिचालन, संरक्षण तथा संवर्धन करते हैं तथा इनके द्वारा शारीरिक क्रियाएं स्वाभाविक और नियमित रूप से होती हैं जिससे व्यक्ति स्वस्थ एवं दीर्घायु बनता है तब आरोग्यता की स्थिति रहती है। इसके विपरीत स्वास्थ्य के नियमों का पालन न करने, अनुचित और विरुद्ध आहारविहार करने, ऋतुचर्या-दिनचर्या, व्यायाम आदि का ध्यान न रखने तथा विभिन्न प्रकार के भोग-विलास और आधुनिक सुख-सुविधाओं में अपने मन और इन्द्रियों को आलिप्त कर देने के परिणाम स्वरूप ये वात-पित्त-कफ प्रकुपित होकर जब विषम अवस्था में आ जाते हैं तब अस्वस्थता की स्थिति रहती है। प्रकुपित वातादि दोष रस रक्तादि धातुओं को दूषित करते हैं, यकृत, फेफड़े व गुर्दे आदि अवयवों को विकृत करते हैं, उनकी क्रियाओं को अनियमित करते हैं तथा कई प्रकार के रोगों को उत्पन्न करते हैं। समझदारी तो यही है कि कोई रोग हो ही नहीं। इलाज से बचाव सदा ही उत्तम होता है इसलिए यथासम्भव रोग से बचने का प्रयत्न करना चाहिए और इसके लिए आयुर्वेद द्वारा बताया गया ऐसा आहार-विहार अपनाना चाहिए जिससे त्रिदोष की विषमावस्था अर्थात् वात प्रकोप, पित्त-प्रकोप और कफ प्रकोप से बचा जा सके। ऋतुओं के लक्षण जानकर उसके अनुसार आचरण करने से व्यक्ति स्वस्थ, सुखी और दीर्घायु रह सकता है।
इस संक्षिप्त चर्चा के उपरान्त आइए अब वर्षा ऋतु में पालन योग्य आहार-विहार पर बात शुरु करते हैं।

वर्ष की छः ऋतुओं में से दो ऋतुएं ऐसी हैं जिनका तन पर ही नहीं बल्कि मन पर भी विशेष प्रभाव पड़ता है। ये दो ऋतुएं हैं- वसन्त ऋतु और वर्षा ऋतु। वर्षा ऋतु का आगमन उस समय होता है जब संसार के सभी प्राणी और वनस्पति जगत नदी, कुए तालाब आदि ग्रीष्म ऋतु की प्रचण्ड गर्म से तप्त, त्रस्त और विकल अवस्था में होते हैं। ऐसी स्थिति में वर्षा की शीतल फुहारों, ठण्डी सुगन्धित हवा और नई हरियाली से बड़ी राहत का अनुभव होता है। इस ऋतु से आदानकाल का अन्त और विसर्ग काल का आरम्भ होता है। “आदत्ते पृथिव्याः सौम्यांशं प्राणिनां बलं चेत्यादानम्’ के अनुसार आदान काल में सूर्य अपनी प्रखर किरणों से पृथ्वी के सौम्य अंश और प्राणियों के बल को खींच लेता है और “विसृजति ददाति पृथिव्याः सौम्यांशं प्राणिनां बलं चेति विसर्गः’ के अनुसार विसर्ग काल में पृथ्वी के सौम्यांश और प्राणियों के बल की वृद्धि होती है। वर्षा ऋतु से विसर्ग काल का आरम्भ होता है जो हेमन्त ऋतु में समाप्त होता है और शिशिर ऋतु में आदान काल शुरू होता है जो ग्रीष्म ऋतु में समाप्त होता है। वर्षा ऋतु की स्थिति वैसी ही होती है जैसी किसी थके हारे, भूखे प्यासे व्यक्ति को भोजन और विश्राम की सुविधा प्रदान कर देने वाले व्यक्ति की होती है क्योंकि वर्षा ऋतु, गर्म से व्याकुल, कमजोर तथा सूखे हुए जगत को, फिर से पोषण और बल प्रदान करती है लेकिन इसके साथ ही इस ऋतु के प्रभाव से कुछ व्याधियां भी उत्पन्न होती हैं जिनको हमें ख्याल में रखना होगा।

आइए देखते हैं कि आयुर्वेद के शास्त्र इस विषय में क्या कहते हैं। वर्षा ऋतु में आकाश और दिशाएं बादलों से युक्त होते हैं। वातावरण में हरियाली के साथ-साथ नमी और रूक्षता भरी होती है। वातावरण की नमी का प्रभाव शरीर पर भी पड़ता है जिसके विषय में चरक संहिता के सूत्रस्थान में कहा गया है-
आदानदुर्बले देहे पक्ता भवति दुर्बलः।
स वर्षास्वनिलादीनां दूषवैर्बाध्यते पुनः।।

अर्थात् आदानकाल (र्गीष्म ऋतु) में मनुष्यों का शरीर दुर्बल रहता है और दुर्बल देह में जठराग्नि तो दुर्बल रहती है। वर्षा ऋतु में नमी से वात दोष कुपित होने से वह और भी दुर्बल हो जाती है। सुश्रुत संहिता के अनुसार-

“नभसि मेघावतते जलप्रक्लिन्नायां भूमौ मिलन्न देहानां प्राणिनां शीतवात विष्टम्भिताग्नीनां विदहन्ते, विदाहत् पित्त संच य मापादयन्ति”

अर्थात् वर्षा की बौछारों से पृथ्वी से निकलने वाली गैस, अम्लता की अधिकता, धूल और धुएं से युक्त वायु का प्रभाव भी पाचन-शक्ति पर पड़ता है। बीच- बीच में बारिश न होने से सूर्य की गर्म बढ़ जाती है इससे शरीर में पित्त दोष जमा होने लगता है।

अपचित धातु वाले शरीरों में पहले से ही मन्द हो चुकी अग्नि, आदान काल के प्रभाव से और भी मन्द हो जाती है, गर्म वातावरण में एकदम से शीतल नम हवा चलने से, पृथ्वी से उठने वाली भाप से, अम्लपाक वाले और मैले पानी से, काल के प्रभाव के कारण कफ के दूषित होने से वातादि दोष एक दूसरे को दूषित करने लगते हैं अतः इस समय अपने अनुकूल और जठराग्नि को प्रदीप्त रखने वाले आहारविहार का ही पालन करना चाहिए।

आइए अब वर्षा ऋतु में किये जाने योग्य और न किये जाने योग्य आहार-विहार के विषय में बात करते हैं। वर्षा ऋतु के समय को प्रारम्भिक काल और अन्तिम काल – इन दो भागों में बांटना उचित होगा क्योंकि वर्षा काल के प्रारम्भिक और अन्तिम समय में ऋतु-प्रभाव अलग-अलग होता है।

पहले प्रारम्भिक काल के आहार-विहार के विषय में चर्चा करते हैं।

वर्षा ऋतु के प्रारम्भिक काल में आहार-विहार :

इस ऋतु में जिन दो बातों का खासतौर पर ख्याल रखना चाहिए, वे हैं-

  1.  अपच और कब्ज न होने पाए क्योंकि “वर्षा स्वग्निबले क्षीणे कुण्यन्ति पवनादयः ‘ के अनुसार ऋतु के प्रभाव से इस समय जठराग्नि दुर्बल रहती है और वात कुपित रहता है अतः पाचनक्रिया और मल विसर्जन क्रिया पर ध्यान बनाये रखना चाहिए।
  2. दूसरी बात है शुद्धि की जिसमें वातावरण की शुद्धता, जल की शुद्धता,वस्त्रों की शुद्धता और शरीर की शुद्धता आदि सभी प्रकार की शुद्धियां शामिल हैं। अशुद्धता से वैसे तो किसी भी ऋतु में रोग उत्पन्न हो सकते हैं पर वर्षा ऋतु में इसकी सम्भावना ज्यादा रहती है। इस ऋतु में शरीर पर आक्रमण करने वाले कुछ रोग हैं- मलेरिया, जुकाम, आंवयुक्त दस्त, पेचिश, हैजा, आन्त्रशोथ (कोलाइटिस), अलसक, गठिया, सन्धियों में सूजन, उच्च रक्तचाप, फुंसियां, दाद-खुजली आदि।

वर्षा ऋतु में क्या खाना चाहिए / आहार : barsaat ke mausam mein kya khaye

  • इस ऋतु में हल्का और शीघ्र पच जाने वाला आहार ग्रहण करना चाहिए वह भी खूब चबा चबा कर और शान्तिपूर्वक करना चाहिए। इस ऋतु में भोजन का ठीक से पचना बहुत जरूरी होता है।
  • वर्षा के आरम्भ में नई- नई और कच्ची घास उगती है। गाय-भैंस इसी कच्ची घास को खाते हैं इसलिए श्रावण मास में दूध का सेवन वर्जित किया गया है। एक लोकोक्ति के अनुसार श्रावण मास में दूध, भाद्रपद में छाछ, क्वांर मास में करेला और कार्तिक मासमें दही का सेवन बिलकुल नहीं करना चाहिए। हरी पत्ती वाली शाक भाजी का सेवन भी वर्षा काल में वर्जित किया गया है।
  • प्रतिदिन छिलके वाली मूंग की दाल का सेवन करने से इस ऋतु में पेट ठीक रहता है।
  • शाक भाजी को हमेशा बहते हुए पानी के अन्दर खूब अच्छी तरह से धोकर ही प्रयोग में लेना चाहिए।
  • मौसमी फलों की बात करें तो दो फल इस ऋतु में बहुत खास होते हैं- पहला आम और दूसरा जामुन। खट्टे आम कभी न खाएं। आम को चूस कर खाना ही सबसे उत्तम ढंग होता है। मीठे रसीले आम को चूस कर ऊपर से 1 कप मीठा दूध पीने से शरीर सुडौल बनता है और बलवीर्य की वृद्धि होती है। यदि 40 दिन तक सुबह सिर्फ आम भर पेट चूस कर ऊपर से दूध पिया जाए तो शरीर बहुत हृष्टपुष्ट, शक्तिशाली और कान्तिपूर्ण हो जाता है।
    कलमी आमों का रस निकालकर दूध मिलाकर ‘आमरस’ बनाया जाता है। यह पचने में भारी होता है अतः कम मात्रा में कभी कभार ही इसका सेवन करना पाचन दृष्टि से सही रहता है।
  • जामुन दाग़रहित, बड़े और पके हुए नमक के साथ खाना चाहिए। दोपहर में भोजन के उपरान्त थोड़े जामुन रोज ही खाना चाहिए। जामुन में ऐसा लौह तत्व होता है जो सुपाच्य और सौम्य होता है अतः जामुन खाने से शरीर में लौह तत्व की पूर्ति होती है जिससे रक्त बनता है और हीमोग्लोबिन (Hemoglobin) बढ़ता है। अतः जामुन अवश्य खाना चाहिए।
  • जामुन का शर्बत पीने से जी मचलाना, उलटी, खूनी दस्त और बवासीर में लाभ होता है।
  • जामुन और आम की सुखाई हुई गुठलियों को पीसकर बनाये गए चूर्ण की आधा चम्मच मात्रा सुबह-शाम पानी के साथ लेने से आमातिसार यानी आंवयुक्त दस्तहोना बन्द होता है। मधुमेह के रोगी के लिए जामुन और इसकी गुठली बहुत लाभप्रद होती हैं।
  • मक्के के भुट्टे भी इन दिनों में खूब आते हैं। भुट्टों को सेंक कर खाएं तो अन्त में एक कप छाछ ज़रूर पी लें।
  • आहार में ऐसे पदार्थों का सेवन अवश्य करना चाहिए जो मधुर, खट्टे और खारे रस वाले हों तथा स्निग्ध यानी चिकनाई युक्त हों।
  • अम्ल, नमकीन और चिकनाई वाले पदार्थों का सेवन करने से वायु दोष के शमन में सहायता मिलती है।
  • इनके अलावा छिलके वाली मूंग की दाल, मीठी खीर, ताज़ा दही, गिलकी,तोरई, लौकी (गढ़ली) बथुआ आदि का सेवन करना चाहिए।

वर्षा ऋतु में क्या नहीं खाना चाहिए :

  • वात कुपित करने वाले पदार्थ जैसे रूखे, अधिक गर्म, कसैले, कड़वे, चटपटे स्वाद वाले, देर से पचने वाले गरिष्ठ पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • सूर्यास्त के बाद पहले से ही मन्द जठराग्नि थोड़ी और मन्द हो जाती है इसलिए जहां तक हो सके शाम का भोजन सूर्यास्त से पहले ही कर लेना चाहिए । यदि सम्भव न हो सके तो सोने से दो-ढाई घण्टे पहले तो कर ही लेना चाहिए।
  • इस ऋतु में पित्त का संचय होता रहता है, कफ शान्त रहता है और वात कुपित रहता है, यह ध्यान में रख कर उचित एवं पथ्य आहार का सेवन और अपथ्य पदार्थों का त्याग रखना चाहिए।

विहार :

  1.  इस ऋतु में तैल मालिश करके स्नान करना, उबटन लगाना, हल्का व्यायाम करना, हल्के व ढीले वस्त्र पहनना और साफ़सफ़ाई का ध्यान रखना चाहिए।
  2.  दिन में सोना, रात्रि जागरण करना, अति व्यायाम करना, अति आहार, अति श्रम और सहवास में अति करना, वर्षा के जल में भीगना, खुले आकाश में सोना आदि काम नहीं करना चाहिए।
  3. जब बादल छाये हुए हों तब जुलाब नहीं लेना चाहिए।
  4. नदी, नाले, तालाब में और जब नदी में बाढ़ हो तब उसमें उतर कर स्नान नहीं करना चाहिए। पानी गन्दा हो तो उबाल कर छान कर ही उपयोग में लेना चाहिए।

वर्षा ऋतु के अंतिम काल में आहार-विहार :

आहार :

जब वर्षा ऋतु समाप्त होने वाली होती है तब मच्छरों और छोटे-छोटे हरे कीड़ों की भरमार दिखाई देती हैं। बिजली के बल्ब और ट्यूब लाइट या लालटेन और गैस बत्ती के आसपास ढेरों कीड़े और पतंगे दिखाई देते हैं। क्वांर महिने में तेज़ धूप जब गड्डों, नालियों और पोखरों में भरे हुए पानी पर पड़ती है तब पानी सूखता है, सड़ता है तथा मच्छर पैदा करता है। वर्षा ऋतु में संचित होने वाला पित्त अगली ऋतु ‘शरद ऋतु में ही कुपित होता है। अतः वर्षा काल के अन्तिम दिनों में इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि पित्त कुपित करने वाला आहार-विहार न किया जाए।
तले हुए, खट्टे, नमकीन, तेज़ मिर्च मसालेदार, मांसाहारी, मादक पदार्थों का सेवन इन दिनों में नहीं करना चाहिए।

विहार :

इन दिनों मच्छरों से बचने के लिए, मच्छरदानी लगाकर सोना सबसे अच्छा उपाय है। धूप में अनावश्यक घूमना उचित नहीं। घर से निकलें तो पानी पीकर निकलें और सिर को धूप से बचा कर रखें, शरीर के अन्दरूनी अंगों के बाल साफ़ रखना चाहिए ।दिन में बार-बार पानी पीते रहना चाहिए। बाज़ार का दही और दही की लस्सी का सेवन नहीं करना चाहिए।

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