चमकी बुखार का कारण ,लक्षण और घरेलू इलाज | Encephalitis – Symptoms and causes

चमकी बुखार (मस्तिष्क ज्वर) क्या है ? : Encephalitis in Hindi

चमकी बुखार को एनसेफेलाइटिस लिथार्जिका, वायरल एनसेफेलाइटिस, जानपदिक मस्तिष्क शोथ, मस्तिष्क ज्वर एवं विचित्र रोग के नाम से भी पुकारते है। एनसेफेलाइटिस एक प्रकार का मस्तिष्क शोथ है, जो वायरल के संक्रमण से होता है।

चमकी बुखार में आकस्मिक ज्वर (तीव्र स्वरुप का), तन्द्रा, व्यवहार में अकस्मात परिवर्तन, मांस-पेशियों में स्फुरण, निद्रालुता, अंगघात और तेजी के साथ मूर्छा आदि लक्षण मिलते हैं।

चमकी बुखार एक अत्यन्त घातक रोग है और विशेष प्रकार के वायरस के संक्रमण से उत्पन्न होता है। मस्तिष्क में शोथ हो जाने के कारण रोगी बेहोश हो जाता है। यह मूर्छा में बेतुकी बातें करता है। रोगी के बच भी जाने पर उसका मस्तिष्क स्थाई रुप से विकृत हो सकता है। कुछ रोगी ठीक भी हो जाते हैं।

खसरा, फ्लू और मम्प्स रोग का सही ढंग से इलाज नहीं होने पर या उपद्रव स्वरुप यह रोग होता है। आइये विस्तार से जाने चमकी बुखार कैसे होता है ।

चमकी बुखार (मस्तिष्क ज्वर) के कारण : Encephalitis Causes in Hindi

इस रोग के ज्ञात कारण निम्नलिखित है –

☛ चमकी बुखार (मस्तिष्क ज्वर) का कारण एक विषाणु का उपसर्ग माना जाता है।
☛ एनसेफेलाइटिस का रोग इपिडेमिक, इण्डेमिक अथवा स्पोटेडिक होता है।
☛ प्रायः इसका आक्रमण इपिडेमिक रुप में विशेषकर शीत-ऋतु में बालकों तथा युवकों में अधिक होता है।
☛ इसमें १० वर्ष के ऊपर के बालक अधिक प्रभावित होते हैं।
☛ भोजन, आवास और वस्त्रादि आवश्यक जीवनोपयोगी साधनों से हीन व्यक्ति इसके अधिक शिकार होते देखे जाते हैं।
☛ इस रोग की वृद्धि विशेषकर खसरा; मम्प्स, चिकन पॉक्स तथा फ्लू की बीमारी के समय अधिक होते देखी जाती है।
☛ सिर, कपाल तथा ताल में आघात होने के बाद अथवा मस्तिष्क में शोथ होने पर इसका प्रकोप अधिक होता है।
☛ चमकी बुखार की सद्य:(इसी समय) मारकता तथा तीव्र संक्रामकता का कोई निश्चित कारण ज्ञात नहीं हो पाया है।
☛ इसका संक्रमण प्रारम्भ में वायरस का इन्फेक्शन ड्रॉपलेट के द्वारा श्वास मार्ग से और कभी-कभी रक्त के द्वारा मस्तिष्क में पहुंचता है। आइये जाने चमकी बुखार में क्या होता है ..

चमकी बुखार (मस्तिष्क ज्वर) के लक्षण : Encephalitis Symptoms in Hindi

⚫ तीव्र शिरःशूल, गर्दन में जकड़न, अर्धविक्षिप्तता, मस्तिष्क की क्रियाओं में क्षोभ, नेत्रों में क्षोभ, अनिद्रा तथा शरीर में पीड़ा के साथ तीव्र ज्वर हो जाता है।
⚫ रोगी की शारीरिक शक्ति अचानक शक्ति क्षीण हो जाती है, उसे रह-रहकर आक्षेप(पेशी-स्फुरण के साथ बेहोशी और ऐंठन) आते हैं। पेशियों में जकड़न तथा प्रकम्प होता है।
⚫ रोगी में निद्रा तथा तन्द्रा की अधिकता रहती है। रात के समय रोगी को नींद नहीं आती है। इसके विपरीत दिन के समय नींद की अधिकता रहती है।
⚫ नेत्र संबंधी वातनाड़ियों में विकृति के कारण प्रकाश-संत्रास, द्विदृष्टि, वर्त्मघात, तिर्यग दृष्टि, नेत्र-प्रचलन, अर्ध-अन्धता अर्थात मद्धिम दिखलाई देना, कनीनिकाओं की विषमता एवं अनियमित संकोच आदि नेत्रगण लक्षण मिलते हैं। कभी-कभी Lack of accommodation प्रकाश-प्रतिक्षेप का नाश आदि विकार होते हैं।
⚫ रोग का आक्रमण तीव्र स्वरुप का होने पर मूर्छा, प्रलाप; अभियंत्रित मल-मूत्र का उत्सर्ग आदि लक्षण उत्पन्न होकर रोगी की मृत्यु हो जाती है।
चमकी बुखार का इलाज व उपचार संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी ।

चमकी बुखार का घरेलू इलाज और सावधानियां :

1- रोगी को अर्ध प्रकाशित स्वच्छ कमरे में शय्या पर पूर्ण विश्राम कराना चाहिए।
2- नासा(नाक), गला तथा मुख की सफाई करें।
3- कोष्ठबद्धता(कब्ज) को दूर करने के लिए किसी मृदुविरेचक का प्रयोग आवश्यक होता है।
4- मल की शुद्धि न होने पर ग्लिसरीन की बस्ति दें।
5- मूत्रावरोध (पेशाब रुक जाना) की स्थिति में तत्काल मूत्रशलका से मूत्र त्याग करायें।
6- दिन में कई बार गर्म जल से तौलिया भिगोकर शरीर को धीरे-धीरे पोंछना चाहिए।
7- तीन दिन तक रोगी को खाना न दें। तत्पश्चात् मधुर रस, ताजेफल, ग्लूकोज, दूध तथा अन्य पौष्टिक आहार की विशेष व्यवस्था होनी चाहिए।
8- इस रोग में रोगी को प्रकाश सहन नहीं होता है, अतः खिड़कियों पर पदै डाल देने चाहिए और कमरे में पूर्ण शांति रखनी चाहिए।
9- प्रति दो घण्टे पर रोगी का आसन बदलते रहना चाहिए।
10- ‘कोमा’ की स्थिति में ट्यूब द्वारा आहार पहुंचाना चाहिए। द्रव को इण्ट्रावीनस ड्रिप
द्वारा दें।
11- सक्सन द्वारा बार-बार वायुमार्ग को साफ करना चाहिए।
12- वायुमार्ग को व्यवस्थित रखें तथा आक्सीजन दें।

चमकी बुखार का आयुर्वेदिक इलाज :

✦ बृ० वात चिन्तामणि रस – १२५ मि० ग्राम
✦ सौभाग्य वटी – १२५ मि० ग्राम
✦ श्रृंग भस्म – १२५ मि० ग्राम
✦ लक्ष्मी नारायण रस – १२५ मि० ग्राम
✦ प्रवाल पिष्टी – १२५ मि० ग्राम
यह सभी एक खुराक की मात्रा है ।

ऐसी एक-एक मात्राओं को दिन में तीन बार तक मधु के साथ प्रयुक्त करावें।

नोट ऊपर बताये गए उपाय और नुस्खे आपकी जानकारी के लिए है। कोई भी उपाय और दवा प्रयोग करने से पहले आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह जरुर ले और उपचार का तरीका विस्तार में जाने।