Chay ke Fayde aur Nuksan | चाय के फायदे व नुकसान

चाय क्या है ? : Tea in Hindi

आजकल गरीब की झोंपड़ी से लेकर धनाढ्यों के महलों तक चाय का सेवन किया जाता है। चारों ओर इस चाय चतुरा का चरम प्रचार है। प्रतिदिन घर-घर में, साधुओं की पर्णशालाओं में यत्र-तत्र सर्वत्र गर्म गर्म चाय से भरी प्यालियों के दर्शन होते हैं। बिना चाय के अतिथि सत्कार फीका है। बिना चाय के समारोह अधूरा है। किसी का चाय के बिना उत्साह नहीं जागता। किसी का चाय के बिना आलस्य नहीं भागता । कोई चाय के बिना निष्क्रिय कहलाता है। कोई चाय के बिना शौच नहीं जा पाता है। यह महती असभ्यता आज सभ्यता कहलाने लगी है ।

यह चाय-पान चीन से प्रारम्भ हुआ। पहले तालाबों, पोखरों के प्रदूषित पानी को बिना उबाले नहीं पीते थे। उबालने से पानी का स्वाद बिगड़ जाता था, अत: पानी को कुछ स्वादिष्ट बनाने के लिये उसमें चाय की कुछ पत्तियां डाली जाने लगी। इस तरह के पेय को चीन के निवासी पानी के स्थान पर चाव से पीने लगे। इसके बाद सन् 850 में चाय अरब पहुंची 1551 में अंग्रेजों ने चाय का स्वाद चखा। सन् 1600 में डच ईस्ट इंडिया कम्पनी ने यूरोप में चाय पहुंचाई किन्तु उस समय चाय का मूल्य अघिक होने से इसे पेय के रूप में मान्यता नहीं मिल सकी।

चाय के बारे में पहली पुस्तक चीन के लू यू नामक लेखक ने सन् 780 में लिखी थी। भारत में चाय की खेती सन् 1834 में लार्ड विलियम बेटिक के शासनकाल में प्रारम्भ हुई। इसके बाद चाय का प्रचलन हमारे देश में हुआ और धीरे-धीरे आम आदमी इसे पीने लगा। आज भारत, चाय का विश्व में सबसे बड़ा निर्यातक देश है। चीन, जापान के अतिरिक्त ब्रह्मा, मलाया, लंका आदि भी चाय के मुख्य उत्पादक देश हैं। भारत में असम, दार्जिलिंग, देहरादून नीलगिरि आदि स्थानों पर चाय की खेती होती है।

चाय का पौधा कैसा होता है ? :

थीआसे फैमिली की चाय के 5-6 फुट के लगभग ऊँचाई के पौधे होते हैं। यदि इन – पौधों को बढ़ने दिया जाय तो ये 40-50 फुट के बड़े वृक्ष तक बन सकते हैं किन्तु चाय के पौधे को काट कर लगभग 5-6 फुट तक ही रखा जाता है।

  • चाय की पत्ती – चाय की पत्तिया दर्भ के पत्र के समान बड़ी एवं गहरी हरी होती हैं। उसे हरी चाय कहते हैं।
  • चाय का फूल – चाय का पुष्प श्वेत वर्ण के सुगन्धित होते हैं।
  • चाय का फल – चाय का फल बेर के समान छोटे होते हैं। फलों से जो बीज निकलते हैं उन्हें पहले तो नर्सरी में उगाते हैं और बाद में बगीचे में बोया जाता है।

चाय का पौधा कहां पाया या उगाया जाता है ? :

चाय अधिकाशत: पवतों के ढलानों पर ही हाता है। अधिक ऊँचाई पर उगी हुई चाय भार में कम उतरती है, परन्तु उसमें सुगन्ध अधिक होती है तथा उसका मूल्य भी अधिक मिलता है। जैसे-जैसे सतह नीची होती जाती है, वैसे-वैसे चाय हल्की मानी जाती है। चाय का मूल्य उसकी सुगन्ध पर अबलम्बित है। एक अच्छा विकसित पौधा एक किलोग्राम के लगभग चाय पत्ती देता है। चाय के पौधे की आयु लगभग 100-160 वर्ष तक होती है।

चाय का विभिन्न भाषाओं में नाम : Name of Tea in Different Languages

Tea in–

  • हिन्दी (Hindi) – चाय, चाह, चा
  • बंगाली (Bangali) – चा
  • गुजराती (Gujarati) – चा
  • मराठी (Marathi) – चहा
  • अरबी (Arbi) – शाय
  • फ़ारसी (Farsi) – चाय
  • अंग्रेजी (English) – टी (Tea)
  • लैटिन (Latin) – कामेलिया थीफेरा (Camellia Theifera Griff)

इटली के धर्माध्यक्ष केमिली जापान से चाय का नाम लाये थे। अत: उनके नाम पर इसका नाम केमिलिया हो गया।

चाय के प्रकार : Types of Tea in Hindi

चाय की विभिन्न किश्में होती हैं परन्तु इनका मूल एक ही उक्त पौधा है। मुख्य प्रकार-

१) काली चाय –

यह पूरी दुनिया में पी जाती है। पत्तियां पूरी तरह से किञ्चित (फर्मेटेड) और आक्सीकृत होती हैं। देर से शुष्क किये जाने से ये पत्तियां श्यामवर्ण की हो जाती हैं।

२) हरी चाय –

पूरब में लोकप्रिय इस प्रकार की पत्तियों का किण्वन नहीं किया जाता है। यह कांगड़ा घाटी में उगाई जाती है और कश्मीर में बहुत पसन्द की जाती है। जो पत्तियां शीघ्र ही सुखा ली जाती हैं वे कुछ हरी रहने से हरी चाय’ के नाम से जानी जाती हैं। बाजारों मे हरी चाय के इम्पीरियल, हायसिन एवं गन पाउडर आदि भेद पाये जाते हैं इनमें इम्पीरियल चाय सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। यह शीतकाल में होती है, इसकी पत्तियां कोमल होती हैं। किन्तु जो पत्तियां बसन्त के बाद ग्रीष्म में तोड़ी जाती हैं, वे कुछ कड़ी हो जाती हैं। इन सब पत्तियों को सुखाकर विधिपूर्वक वाष्पीकरण विधि से सेककर मोटी पत्तियां, छोटी पत्तियां, मोटा चूर्ण, बारीक चूर्ण, अति बारीक चूर्ण आदि को पृथक् पृथक् कर विक्रियार्थ भेजते हैं।

३) श्वेत चाय –

यह एक दुर्लभ प्रकार की चीनी चाय है। इसमें पौधे की कुछ विशेष पत्तियों को चुनकर आक्सीकरण को निष्क्रिय करने के लिये भाप दी जाती है या फिर भूना जाता है और इसके बाद सुखाया जाता है। पकाये जाने के अन्त में श्वेत चाय की पत्तियां खड़ी रहती हैं। इन अपरिपक्व चाय की पत्तियों को चाय के पौधे की कलियों के खिलने से पहले ही तोड़ लिया जाता है। आजकल इस ह्वाइट चाय (श्वेतचाय) को स्वास्थ्य की दृष्टि से सबसे अधिक पसन्द किया जा रहा है।

४) उलांग चाय –

यह सेमी आक्सीडाइज्ड या फर्मटेड होती है जिसमें काली और हरी चाय के मिले जुले गुण होते हैं। इसे उलांग इसलिए कहा जाता है, क्यों कि इसकी पत्तियां उस छोटे काले ड्रेगन की तरह दिखती हैं जो गर्म पानी पड़ते ही जाग जाता है।

गुलाब, चमेली आदि के पुष्पों के संयोग से चाय को सुगन्धित करके बेचा जाता है। आजकल ऐसी चाय पत्तियों में अन्य वृक्ष पौधों की पत्तियां भी मिलाकर बेची जाती हैं। इन पत्तियों में कई कृत्रिम रंग मिला दिये जाते हैं, जिससे उस चाय का रंग एवं उसकी सुगन्ध लुभावनी होजाती है। इस कला में चीन के व्यवसायी अधिक कुशल हैं।

चाय का रासायनिक विश्लेषण : Tea Chemical Constituents

वैसे चाय की रासायनिक संरचना उसकी गुणवत्ता निर्माण की प्रक्रिया जलवायू आदि पर निर्भर करती है। फिर भी सामान्यतया इसकी रासायनिक संरचना इस प्रकार है-

  • पानी – 5 से 8 प्रतिशत
  • टैनिन -7 से 14 प्रतिशत
  • कैफीन – 2 से 5 प्रतिशत
  • नाइट्रोजन – 4.75 से 5.5 प्रतिशत
  • घुलनशील तत्व – 48 से 45 प्रतिशत
  • खनिज तत्व – 5 से 5.75 प्रतिशत
  • सुगन्धित तैल – 0.5 प्रतिशत

इनमें सर्वाधिक महत्व शाली तत्व है कैफीन, टैनिन और सुगन्धित तैल जिन पर चाय का अन्तिम स्वाद निर्धारित होता है। हरी चाय में काली चाय की अपेक्षा अधिक टेनिन होता है और मंहगी चाय में सस्ती चाय की तुलना में अधिक टैनिन और कैफीन होते हैं।

वैसे चाय की पत्तियों की संरचना उतनी महत्वपूर्ण नहीं है, जितनी कि चाय की पत्तियों को पानी में उबालना। टैनिन की अपेक्षा कैफीन कम उबाल पर जल्दी बाहर निकल जाता है। कैफीन की अधिक मात्रा से असमय में ही बालों का सफेद होना, सन्धियों में वेदना होना, नींद कम आना आदि विकार होते हैं। टैनिन के प्रभाव से एच,बी. हिमोग्लोबन की मात्रा कम होती है, गैस बनती है। तथा आमाशयिक व्रण आन्त्रिक व्रण होने की संभावना होती है। इसका तैल आंखों को नुकसान पहुंचाता है। यह रक्त चाप में भी वृद्धि करता है।

चाय के औषधीय गुण : Chay ke Gun in Hindi

  1. चाय के सेवन से पेशाब अधिक आता है जिससे मूत्राघात, मूत्रकृच्छ्र, कामला, जलोदर आदि में कुछ लाभ मिलता है।
  2. चाय में स्थित कैफीन गुर्दो को प्रभावित करता है। कुछ चिकित्सकों का मानना है कि इसके नियमित सेवन से गुर्दे इसके आदी हो जाते हैं ।
  3. इसके सेवन से श्वसन क्रिया तेज होती है जिससे फुफ्फुसों के वायुकोष्ठों में कार्बनडाइ आक्साइड की मात्रा कम होती है और शरीर में ताप उत्पादन 10-20 प्रतिशत बढ़ जाता है।
  4. कैफिन फफ्फसीय धमनियों को चौड़ा करता है जिससे रक्तप्रवाह -अधिक होता है। चाय श्वासरोग, स्वरभेद, कास,श्वसनक ज्वर, प्रतिश्याय, शिर :शूल,शीतज्वर आदि में लाभदायक है।
  5. अंगमर्द प्रशमन के लिये चाय एक सर्व सुलभ औषधि है।
  6. चाय मदकारी नहीं है यह श्रमहर तथा क्लमहारी है।
  7. परिश्रम करने के बाद एवं बौद्धिक कार्य करने के बाद चाय पीने से स्फूर्ति आती है।
  8. चाय हृदय के कोषाणु तथा ऊतकों की आक्सीकरण से होने वाली क्षति से सुरक्षा करती है।
  9. चाय का सेवन खून में थक्के बनने की प्रक्रिया को भी नियंत्रित करता है। अतः हार्ट अटैक के समय सहसा कोई दवा उपलब्ध न होने पर रोगी को एक कप चाय अवश्य पिलानी चाहिये। इस विषय में मणिपाल चिकित्सालय (बंगलोर) के जांच निदान निदेशक डा. पी. आर. कृष्ण स्वामी ने एक बार संवाददाताओं को बताया कि जो पुरुष तथा स्त्री प्रतिदिन एक-दो कम चाय पीते हैं उनके हृदय का दौरा पड़ने की 44 फीसदी कम संभावना रहती है। यह अध्ययन यू. एस. नेशनल हार्ट, लंग, एण्ड ब्लड इंस्टीट्यूट द्वारा मिले अनुसंधान से किया गया। डा. मोरियो लोरेंज ने भी अपने शोध पत्र में उल्लेख किया है कि चाय पीने से धमनियों के शिथिल होने की क्षमता काफी बढ़ जाती है और वे फैलकर ज्यादा खून प्रवाहित करने योग्य हो जाती है।

चाय के नुकसान : Chay ke Nuksan in Hindi

  • चाय के उक्त सभी गुणों की यथायोग्य प्राप्ति के लिये यह आवश्यक है कि असली चाय पत्तियों में अवस्थित कैफीन और टेटिन नामक घटकों की मात्रा अत्याधिक सेवन में न आने पावे।
  • चाय के अति एवं अनुचित प्रयोग से मलावरोध,अग्निमांद्य, अनिन्द्रा, अम्लपित्त, भ्रम, संग्रहणी, वृक्क विकार, नाड़ी दौर्बल्य, आध्मान, हस्तपाद, कंपन, अरुचि,विवर्णता आदि रोग उत्पन्न होते हैं।

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चाय पिने में निम्नलिखित बातों का रखें ध्यान :

  1. चाय दिन में एक या दो बार ही पियें किन्तु एक साथ एक कप से ज्यादा न पियें।
  2. भूख लगने पर चाय न पियें इससे पाचन संस्थान पर बुरा असर होता है। अधिक शारीरिक श्रम करने वालों को भूख मिटाने के लिये चाय पान करना वात रोगों को आमन्त्रण देना है।
  3. रात्रि में चाय का सेवन न करें क्योंकि रात में चाय पीने से बार बार मूत्र त्याग करना पड़ता है जिसने निद्रा भंग होती है। रात में जगने वालों को यदि चाय पीना आवश्यक ही हो तो एक-दो बार से अधिक न पियें तथा उसमें थोड़ा घृत मिलाले अन्यथा मलावरोध हो जाता है।
  4. कुछ खाये बिना चाय पीने से आमाशय में व्रण हो जाने की संभावना रहती है। इससे आंतों में खुश्की उत्पन्न होती है।
  5. छोटे बच्चों को चाय न पिलावें क्योंकि यह उनके नाड़ी संस्थान को उद्वेलित कर सकती है।
  6. नमक युक्त पदार्थों के खाने के बाद चाय नहीं पीनी चाहिये। चाय में दूध डाला जाता है और लवण दुग्ध संयोग विरुद्ध कहे गये हैं। चाय पीने से पहले पर्याप्त पानी पी लेना भी ठीक रहता है।
  7. अधिक समय तक उबाली गई अथवा टंडी होने पर पुन: गर्म की गई चाय में टैनिन की मात्रा अधिक होनेसे वह विषतुल्य होती है।
  8. पित्त प्रकृति वालों को तथा पित्तजन्य रोगों में चाय का सेवन हानिकारक है। ग्रीष्म ऋतु एवं शरद् ऋतु (पित्त प्रकोप का समय) में चाय अधिक सेवन बहुत हानि पहुंचाता है। धूप में चलकर आते ही चाय-पान करना भी – उचित नहीं है।
  9. आमतौर पर चाय बनाने का प्रचलित प्रकार ठीक नहीं है। पानी में चाय के अधिक देर तक उबलने से चाय का टेनिन पानी में अधिक आता है जो शरीर को नुकसान पहुंचाता है। चाय बनाने का सही तरीका है –
    पहले बर्तन में पानी को गर्म करें अच्छा उबाल आ जाने के बाद बर्तन को नीचे उतार कर तुरंत उपयुक्त चाय की पत्ती डाल कर बर्तन को ढंक दें। कुछ समय बाद उस चाय मिश्रत पानी को छानकर उसमें आवश्यकतानुसार गर्म किया हुआ दूध और शक्कर डालकर पियें। इस प्रकार चाय बनाकर पीने से चाय के दुष्प्रभावों से बचा जा सकता है।
  10. चाय में दूध डालने से टैनिन का असर कम हो जाता है। दूध में स्थित प्रोटीन चाय के टैनिन को अवक्षेपित करता है। इससे उसका प्रभाव पाचन पर कम होता हे। किन्तु यह दूध चाय में न कम हो और न ज्यादा। चाय में ज्यादा दूध एवं शक्कर के मिलाने से कफविकार एवं अग्निमांद्य हो जाता है। कफविकारों में दूध शक्कर बहुत कम डालकर चाय-पान करना चाहिये। कफविकारों में चाय के पानी को उबालते समय उसमें सोंठ (अदरक) या अजवायन अवश्य मिला देनी चाहिये।

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चाय के फायदे और उपयोग : Benefits of Tea in Hindi

  1. आमवात में अजमोदादि चूर्ण खाकर चाय पीनी चाहिये।
  2. चाय में लवंग, अदरक, तुलसी, कालीमिर्च, दालचीनी को पकाकर पीने से कफजवर, शीतज्वर, न्यूमोनिया, आमवातिक ज्वर, प्रतिश्याय आदि में लाभ होता है।
  3. श्वास रोग में चाय के साथ काकड़ासिंगी, भारंगी का चूर्ण तथा हृदयरोग में अर्जुन चूर्ण पकाकर देना चाहिये।
  4. चाय में पीते समय थोड़ा घृत मिलाकर सेवन कराने से खांसी एवं न्यूमोनिया में लाभ होता है।
  5. चाय का चूर्ण मुख में रखकर चूसने से स्वरभंग मिटता है।
  6. शीत के कारण कंठ में भारीपन, प्रतिश्याय, ज्वर आदि लक्षण होने पर चायपान हितकर है।
  7. मुंह के भीतर छाले में चाय पत्र का क्वाथ बनाकर कूल्ला करने से लाभ होता हे।
  8. चायपत्र को पकाकर पीसकर लेप करने से ग्रन्थि सूजन मिटते हैं तथा अर्श (बवासीर) जन्य वेदना दूर होती है।
  9. वनौषधि विशेषाङ्क ( धन्वन्तरि ) के लेखक आचार्य श्री कृष्ण प्रसाद त्रिवेदी ने लिखा है कि आग से, अग्नि उष्ण जल से, गरम तैल आदि या तेजाब से शरीर का कोई स्थान झुलस गया हो तो चाय मिश्रित उबलते पानी या क्वाथ में, कपड़े की पट्टी भिगोकर उस स्थान पर रखने तथा बार-बार उस पर उसी क्वाथ को थोड़ा थोड़ा टपकाते रहने से । इसे 2 से 3 घन्टे तक इस क्रिया के सहनपूर्वक धीरज क साथ करते रहने से ) फफोले नहीं पड़ने पात तथा त्वचा में दाग आदि कोई विकार भी नहीं होने पाता।
  10. चाय में दूध के स्थान पर नींबू स्वरस मिलाकर पीने के पश्चात कुछ समय तक आरामपूर्वक सो जाने से सिरदर्द और पेट का दर्द दोनों दूर होते हैं।
  11. स्त्रियां मेंहदी लगाने के बाद चाय के क्वाथ में नीलगिरी का तैल मिलाकर लगाती हैं, इससे मेंहदी अच्छी रचती है।

(उपाय व नुस्खों को वैद्यकीय सलाहनुसार उपयोग करें)

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