जड़ी-बूटी की पहचान: असली-नकली परखने की 6 घरेलू जाँच

Last Updated on नवम्बर 2, 2026 by admin
कुछ वर्ष पहले बेंगलुरु के वैज्ञानिकों ने दक्षिण भारत के 34 बाज़ारों से जड़ी-बूटियों के 203 नमूने खरीदे और उनकी DNA जाँच की। नतीजा चौंकाने वाला था। कुछ जड़ी-बूटियों के एक भी नमूने में वह पौधा नहीं निकला, जिसका नाम थैली पर लिखा था। अब ज़रा अपनी रसोई की अलमारी पर नज़र डालिए। वहाँ रखा अश्वगंधा चूर्ण, गिलोय के टुकड़े या केसर की डिबिया, क्या आप पक्के तौर पर कह सकते हैं कि वे वही हैं जो होने का दावा करते हैं?
अच्छी खबर यह है कि जड़ी-बूटी की पहचान के लिए हर बार प्रयोगशाला की ज़रूरत नहीं पड़ती। आयुर्वेद के आचार्य छह आधारों पर द्रव्य को परखते थे: रूप (रंग, आकार, बनावट), रस (स्वाद), गंध, स्पर्श, मिलावट (धूल, मिट्टी, दूसरी वनस्पति) और गुणवत्ता (पैकिंग, लेबल, स्रोत)। घर की ये जाँच शुरुआती संकेत देती हैं, पक्की शुद्धता प्रयोगशाला या अनुभवी वैद्य ही बता सकते हैं। चलिए, इन छह कसौटियों को एक-एक करके हाथ में लेकर परखते हैं।
जड़ी-बूटी की पहचान आयुर्वेद में चिकित्सा की पहली सीढ़ी क्यों है?
आयुर्वेद चिकित्सा को चार पैरों पर खड़ा मानता है: वैद्य, द्रव्य (औषधि), परिचारक और रोगी। सोचिए, अगर इनमें से एक पैर ही खोखला हो तो क्या होगा? वैद्य ने रोग सही पकड़ा, योग भी शास्त्र के अनुसार चुना, रोगी ने पथ्य का पूरा पालन किया, पर जो चूर्ण दवा बनकर पेट में गया वह असली ही नहीं था। सारी मेहनत वहीं बेकार हो जाती है, और दोष बेचारे आयुर्वेद पर आता है कि “दवा ने असर नहीं किया”।
आचार्य चरक ने सूत्रस्थान के पहले ही अध्याय में इस बात को बहुत सुंदर ढंग से रखा है:
ओषधीर्नामरूपाभ्यां जानते ह्यजपा वने।
अविपाश्चैव गोपाश्च ये चान्ये वनवासिनः॥
अर्थ: वन में बकरी चराने वाले, भेड़ पालने वाले, ग्वाले और दूसरे वनवासी भी औषधियों को उनके नाम और रूप से पहचानते हैं।
आगे वे कहते हैं कि केवल नाम या रूप जान लेने से कोई औषधि का पूरा ज्ञाता नहीं बन जाता:
योगविन्नामरूपज्ञस्तासां तत्त्वविदुच्यते।
अर्थ: जो औषधियों का नाम, रूप और उनका प्रयोग (योग), तीनों जानता है, वही उनका तत्त्व जानने वाला कहलाता है।
यानी पहचान, ज्ञान की पहली सीढ़ी है। जो सीढ़ी पर ही फिसल गया, वह ऊपर कैसे पहुँचेगा?
प्रतिनिधि द्रव्य और मिलावट में बड़ा अंतर है
एक बात अक्सर लोग नहीं जानते। शास्त्र में प्रतिनिधि द्रव्य की भी परंपरा है। भावप्रकाश जैसे ग्रंथों में बताया गया है कि कोई द्रव्य न मिले तो उसकी जगह कौन-सा समान गुण वाला द्रव्य लिया जा सकता है। यह वैद्य का सोचा-समझा, खुला निर्णय है, जिसमें रोगी के हित को देखकर द्रव्य बदला जाता है।
बाज़ार में जो होता है, वह इसका ठीक उलटा है। वहाँ महँगी जड़ी की जगह सस्ती वनस्पति चुपचाप मिला दी जाती है, न खरीदार को बताया जाता है, न गुण-कर्म का ध्यान रखा जाता है। एक में ज्ञान है, दूसरे में लालच।
यह चिंता केवल हमारी नहीं है। जनवरी 2026 में IIT दिल्ली में राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड (NMPB) की संगोष्ठी में खेत से ही जड़ी-बूटी की गुणवत्ता जाँचने के उपकरणों पर चर्चा हुई, और 1 से 3 नवंबर 2026 तक काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में हो रहे सम्मेलन ने औषधीय पौधों की प्रामाणिकता के प्रश्न को फिर से सामने रखा है।
रूप, रस और गंध से असली जड़ी-बूटी की पहचान कैसे करें?
पुराने वैद्य के पास न microscope था, न DNA मशीन। फिर भी वे पंसारी की दुकान पर खड़े-खड़े द्रव्य को परख लेते थे। उनका औज़ार थीं पाँचों इंद्रियाँ। पहली तीन कसौटियाँ आँख, जीभ और नाक की हैं।
1. रूप: आँखें जितना बताती हैं, उतना कोई नहीं बताता
असली जड़ी-बूटी का रंग प्रायः प्राकृतिक और थोड़ा मटमैला होता है। प्रकृति किसी भी जड़ या छाल को एकदम एक-सा, चमकदार रंग नहीं देती। इसलिए जो चूर्ण बहुत चटक, एक समान और “सुंदर” दिखे, उस पर पहले शक कीजिए।
साबुत द्रव्य हाथ में लें तो इन बातों पर ध्यान दें:
- जड़ (मूल): तोड़कर देखें कि अंदर का भाग रेशेदार है या मंड (starch) वाला, और उसका रंग कैसा है।
- छाल: कितनी मोटी है, एक परत की है या कई परतें लिपटी हैं।
- बीज और फल: सबका आकार एक-सा है या बीच में अलग आकार और रंग के दाने मिले हैं।
- पत्ते: आकार, किनारे की कटाव और नसों का जाल कैसा है।
गिलोय इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। असली गिलोय के तने पर पतली, कागज़ जैसी छाल होती है जो आसानी से उतर जाती है। तने को आड़ा काटें तो बीच में बैलगाड़ी के पहिये की तीलियों जैसी चक्राकार रचना दिखती है। एक बार यह रचना पहचान ली, तो फिर गिलोय के नाम पर बिकने वाली दूसरी बेलें आपको धोखा नहीं दे पाएँगी।
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2. रस: जीभ आयुर्वेद की सबसे पुरानी प्रयोगशाला है
आयुर्वेद में द्रव्य के गुण-कर्म का पहला अनुमान रस से ही लगाया जाता है। छह रस हैं: मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय। हर द्रव्य का अपना रस है, और वही उसके असर की पहली झलक देता है।
रसोई के द्रव्यों से इसे समझिए। हल्दी में हल्की कड़वाहट और तीखापन, काली मिर्च में चुभने वाला तीखापन, मुलेठी में साफ मिठास और आँवले में खटास के साथ कसैलापन। अब अगर मुलेठी चबाने पर मिठास ही न आए, या आँवला चूर्ण में खटास न के बराबर हो, तो समझ लीजिए कि वह या तो बहुत पुराना है या उसमें कुछ और मिला है।
यहाँ एक कड़ी चेतावनी भी ज़रूरी है। अनजान वनस्पति, जंगल या सड़क किनारे से तोड़ी पत्ती, और भस्म या रस-औषधि को कभी न चखें। वत्सनाभ, कुचला, धतूरा और गुंजा जैसे विष-द्रव्य दिखने में बहुत साधारण लग सकते हैं। स्वाद की परख केवल उन्हीं चीज़ों से करें जो पहले से रसोई में खाई जाती हैं, और वह भी ज़रा-सी मात्रा में।
3. गंध: नाक जल्दी झूठ नहीं बोलती
हर जड़ी-बूटी की अपनी पहचान वाली गंध होती है। अश्वगंधा का तो नाम ही उसकी जड़ की विशिष्ट गंध से पड़ा है। दालचीनी, इलायची, जटामांसी और सुगंधबाला की खुशबू गहरी पर कोमल होती है, और हथेली पर रगड़ते ही खुलने लगती है।
गंध से ये तीन संकेत पकड़ें:
- बहुत तेज़, तुरंत नाक में चढ़ने वाली गंध: बाहर से मिलाई गई खुशबू या तेल का संकेत।
- सीलन या फफूंद जैसी गंध: माल नमी में रखा गया है या सड़ने लगा है।
- गंध बिल्कुल न आना: द्रव्य बहुत पुराना है, जिसका वीर्य (शक्ति) घट चुका है।
एक सूक्ष्म बात और। कई बार व्यापारी जिस द्रव्य से तेल या सत्त्व पहले ही निकाल चुके होते हैं, उसी बचे हुए फीके माल को सुखाकर फिर बेच देते हैं। ऐसा द्रव्य रूप में तो असली दिखता है, पर उसकी गंध और स्वाद बहुत हल्के होते हैं। यहाँ आपकी नाक ही सबसे बड़ी गवाह है।
स्पर्श से नमी, कठोरता और पुरानापन कैसे परखें?
चौथी कसौटी हाथ की है, और यह जितनी सरल है उतनी ही काम की भी। अच्छी तरह सूखी जड़ या छाल तोड़ने पर “कट” की आवाज़ के साथ टूटनी चाहिए। अगर वह मुड़ जाए, लचीली लगे या हाथ में चिपचिपी लगे, तो उसमें नमी बची है और फफूंद लगने में देर नहीं लगेगी।
चूर्ण को चुटकी में लेकर उँगलियों के बीच मलिए:
- किरकिराहट: रेत या मिट्टी मिली हो सकती है।
- बहुत चिकनापन और भारीपन: खड़िया या मंड मिलाने का संकेत।
- गुठलियाँ बनना: नमी सोख चुका चूर्ण, जिसमें कीड़े और फफूंद का डर है।
जड़ी-बूटी कितनी पुरानी है, यह क्यों मायने रखता है?
यहाँ शास्त्र की एक बहुत व्यावहारिक बात याद रखने लायक है। शार्ङ्गधर संहिता के अनुसार सामान्यतः सूखी औषधि एक वर्ष के बाद गुणहीन होने लगती है। पर कुछ द्रव्य इसके अपवाद हैं: विडंग, पिप्पली, गुड़, धनिया, घी और शहद जैसे द्रव्य पुराने होने पर अधिक गुणकारी माने गए हैं।
इसका सीधा अर्थ है कि दुकान पर पड़ी तीन साल पुरानी जड़ी, चाहे असली ही क्यों न हो, अपना काम पूरा नहीं कर पाएगी। इसलिए पैकेट पर बनाने की तिथि देखना आयुर्वेदिक दृष्टि से भी उतना ही ज़रूरी है जितना कानून की दृष्टि से।
खरीदने के बाद शुद्धता कैसे बचाएँ?
असली जड़ी घर ले आए, तो उसे सँभालना भी आना चाहिए, वरना असली भी कुछ महीनों में नकली जितनी बेअसर हो जाएगी।
- पात्र: काँच या स्टील का साफ, सूखा, कसकर बंद होने वाला डिब्बा।
- जगह: ठंडी, सूखी और सीधी धूप से दूर।
- मात्रा: चूर्ण एक साथ बहुत ज़्यादा न पिसवाएँ, एक-दो महीने जितना ही रखें।
- चम्मच: हमेशा सूखा चम्मच, गीले हाथ या गीली चम्मच से नमी अंदर जाती है।
मिलावटी जड़ी-बूटी की पहचान: घर पर की जाने वाली जाँच
पाँचवीं कसौटी सीधे मिलावट को पकड़ने की है। बाज़ार में मिलावट प्रायः पाँच तरह की होती है: दूसरी सस्ती वनस्पति, धूल-मिट्टी और कंकड़, बनावटी रंग, पहले से निचोड़ा हुआ फीका माल, और बहुत पुराना स्टॉक। इनमें से कई चीज़ें घर पर ही पकड़ी जा सकती हैं।
- फैलाकर देखना: एक चम्मच साबुत द्रव्य सफेद कागज़ पर फैलाएँ। तिनके, कंकड़, अलग रंग के दाने और कीड़े तुरंत आँखों के सामने आ जाएँगे।
- पानी में घोलना: थोड़ा चूर्ण पानी के गिलास में डालें। नीचे रेत या मिट्टी की परत बैठे तो विजातीय पदार्थ है। पानी तुरंत गहरा रंग पकड़ ले तो बनावटी रंग का संदेह है।
- हल्दी की जाँच: शुद्ध हल्दी पानी में धीरे-धीरे नीचे बैठती है और पानी हल्का पीला रहता है। पानी तुरंत गहरा पीला हो जाए, तो रंग मिलाया गया हो सकता है।
- काली मिर्च की जाँच: पानी में डालने पर असली काली मिर्च डूब जाती है, जबकि उसमें मिलाए गए पपीते के सूखे बीज प्रायः ऊपर तैरते रहते हैं।
- केसर की जाँच: असली केसर का धागा गुनगुने पानी में धीरे-धीरे सुनहरा-पीला रंग छोड़ता है और स्वयं लाल बना रहता है। नकली धागा तुरंत लाल रंग छोड़कर फीका या सफेद पड़ जाता है।
इन जाँचों को करते समय एक बात समझ लें। कोई जाँच “पास” हो जाए, तो इसका अर्थ इतना ही है कि मोटी मिलावट नहीं दिखी। मिलती-जुलती वनस्पति का चूर्ण पानी में बिल्कुल असली जैसा ही व्यवहार कर सकता है। इसलिए सबसे सुरक्षित आदत यही है कि जहाँ संभव हो, साबुत द्रव्य खरीदें और घर पर पीसें।
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औषधीय पौधों की पहचान: बगीचे या जंगल में जीवित पौधा कैसे पहचानें?
अब बात उन लोगों की, जो जड़ी-बूटी बाज़ार से नहीं, अपने आँगन, खेत या जंगल से लेते हैं। यहाँ खतरा अलग किस्म का है। सूखे चूर्ण में मिलावट होती है, जीवित पौधे में पहचान की भूल।
किसी भी औषधीय पौधे की पहचान केवल पत्ती देखकर न करें। पूरे पौधे को देखें:
- पत्ती: आकार, किनारे, आमने-सामने लगती हैं या एक-एक करके।
- फूल और फल: रंग, आकार और किस ऋतु में आते हैं। कई पौधे फूल आने पर ही ठीक से पहचान में आते हैं।
- तना और दूध: तना चौकोर है या गोल, तोड़ने पर दूध (latex) निकलता है या नहीं।
- मसलने पर गंध: तुलसी, पुदीना, निर्गुंडी जैसे पौधे पत्ती मसलते ही अपनी पहचान बता देते हैं।
एक नाम, कई पौधे: सबसे बड़ा भ्रम
भारत जैसे विशाल देश में एक ही नाम से अलग-अलग क्षेत्रों में अलग पौधे बिकते हैं। “ब्राह्मी” नाम से कहीं Bacopa monnieri मिलती है तो कहीं मण्डूकपर्णी (Centella asiatica)। “शंखपुष्पी” के नाम पर भी अलग-अलग क्षेत्रों में एक से अधिक पौधे प्रयोग होते हैं। “रास्ना” उत्तर और दक्षिण भारत में अलग वनस्पतियों के लिए बोला जाता है।
इसीलिए अच्छे वैद्य और अच्छे निर्माता हिंदी नाम के साथ वानस्पतिक (Latin) नाम भी लिखते हैं। जंगल से कोई पौधा लेना हो, तो पहली बार किसी जानकार के साथ जाएँ। केवल मोबाइल ऐप की फोटो पहचान के भरोसे किसी पौधे को खाने या दवा बनाने में प्रयोग न करें।
पैकिंग और लेबल से आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों की शुद्धता कैसे जाँचें?
छठी कसौटी गुणवत्ता के प्रमाण की है। पैक की हुई जड़ी-बूटी या चूर्ण लेते समय लेबल को उतने ही ध्यान से पढ़ें, जितने ध्यान से दवा की पर्ची पढ़ते हैं:
- निर्माता: पूरा नाम और पता, केवल चमकदार ब्रांड-नाम नहीं।
- लाइसेंस नंबर: आयुर्वेदिक औषधि बनाने का लाइसेंस नंबर।
- बैच नंबर: शिकायत करनी हो तो इसी से माल की पहचान होती है।
- निर्माण और समाप्ति तिथि: ऊपर बताए शास्त्रीय मत के अनुसार ताज़ा माल ही लें।
- वानस्पतिक नाम: Latin नाम लिखा हो तो एक नाम वाली कई वनस्पतियों का भ्रम दूर होता है।
खुली जड़ी लेनी हो, तो उसी पंसारी से लें जो वर्षों से भरोसेमंद हो और बता सके कि माल कहाँ से आया। और एक सीधा नियम याद रखें: बाज़ार भाव से बहुत कम दाम पर मिल रहा केसर, अश्वगंधा या शतावरी प्रायः संदेह के घेरे में ही होता है। असली जड़ी उगाने, सुखाने और साफ करने में मेहनत लगती है, वह अचानक सस्ती नहीं हो जाती।
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घरेलू जाँच की सीमा: कब विशेषज्ञ या प्रयोगशाला ज़रूरी है?
अब तक की सारी कसौटियाँ आपको एक सजग खरीदार बना देंगी, पर इनकी एक सीमा भी है। ये जाँच प्रारंभिक संकेत देती हैं, हर जड़ी-बूटी की प्रामाणिकता या उसकी रासायनिक शुद्धता की पुष्टि नहीं करतीं। मिलती-जुलती प्रजाति, भारी धातु, कीटनाशक का अंश या घटा हुआ सक्रिय तत्त्व, इनमें से कुछ भी आँख, नाक या जीभ से नहीं पकड़ा जा सकता।
Ayurvedic Pharmacopoeia of India में हर द्रव्य के लिए बाहरी रूप, सूक्ष्म रचना, विजातीय पदार्थ और भस्म-मात्रा (ash value) जैसे मानक दिए गए हैं। ये वही कसौटियाँ हैं जिन्हें हमारे आचार्य इंद्रियों से परखते थे, बस अब इन्हें प्रयोगशाला में मापा जाता है। आधुनिक विज्ञान की HPTLC और DNA barcoding जैसी विधियाँ इसी परंपरागत पहचान की पुष्टि का काम करती हैं। ऊपर जिस अध्ययन की बात हुई, उसमें ATREE (बेंगलुरु) के वैज्ञानिकों ने DNA barcoding से 203 बाज़ारू नमूनों की जाँच की और कुछ प्रजातियों में दूसरी वनस्पति से प्रतिस्थापन 20% से लेकर 100% तक पाया।
इन स्थितियों में अनुभवी वैद्य या प्रमाणित प्रयोगशाला की मदद अवश्य लें:
- लंबा सेवन: जब जड़ी-बूटी लंबे समय तक या बड़ी मात्रा में औषधि के रूप में लेनी हो।
- व्यापार या निर्माण: जब आप उसे बेचने या औषधि बनाने के लिए खरीद रहे हों।
- विष-वर्ग: जब द्रव्य किसी विष-वर्ग का हो या उसकी कोई मिलती-जुलती विषैली प्रजाति हो।
- असामान्य प्रतिक्रिया: जब सेवन के बाद कोई अनपेक्षित असर दिखे।
बाज़ार की प्रमुख जड़ी-बूटियों में आम मिलावट और पहचान
अब इस पूरे ज्ञान को एक जगह समेट लेते हैं। नीचे वे जड़ी-बूटियाँ हैं जिनमें मिलावट या पहचान का भ्रम सबसे अधिक देखा जाता है।
| औषधि | असली की पहचान | आम मिलावट या भ्रम | विशेष सावधानी |
|---|---|---|---|
| गिलोय (Tinospora cordifolia) | पतली कागज़ जैसी छाल, कटे तने में चक्राकार रचना, तिक्त स्वाद | Tinospora crispa, जिसके तने पर उभरे हुए दाने होते हैं | साबुत कांड लेकर पहचानें |
| अश्वगंधा मूल (Withania somnifera) | बाहर हल्का भूरा, अंदर सफेद मंड वाला भाग, विशिष्ट गंध | जड़ के चूर्ण में तना और पत्ते मिलाना | साबुत जड़ लेकर पीसें |
| ब्राह्मी (Bacopa monnieri) | छोटे, मांसल, बिना डंठल वाले पत्ते | मण्डूकपर्णी (Centella asiatica), जिसके पत्ते गुर्दे जैसे और लंबे डंठल वाले होते हैं | दोनों का प्रयोग अलग है, नाम से भ्रमित न हों |
| दालचीनी (Cinnamomum verum) | पतली छाल, कई परतें लिपटी हुई, मीठी-सुगंधित | कैसिया (Cinnamomum cassia), मोटी, कठोर, एक परत वाली छाल | साबुत छाल लें |
| केसर (Crocus sativus) | लाल धागा, सिरा तुरही जैसा फैला, पानी में धीरे-धीरे सुनहरा रंग | कुसुम की पंखुड़ियाँ, रंगे हुए रेशे | बहुत सस्ते केसर से बचें |
| हल्दी चूर्ण (Curcuma longa) | हल्का मटमैला पीला, पानी में धीरे बैठना | बनावटी पीला रंग, मंड, खड़िया | साबुत गाँठ लेकर पीसें |
| काली मिर्च (Piper nigrum) | भारी, झुर्रीदार दाने, पानी में डूबते हैं, तेज़ तीखापन | पपीते के सूखे बीज, जो हल्के होते हैं और तैरते हैं | पानी वाली जाँच करें |
औषधि के रूप में कौन-सा द्रव्य कितना लेना है, यह प्रकृति, रोग की अवस्था और वैद्य की सलाह से ही तय करें, स्वयं चुनकर नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Q1. क्या घर पर जड़ी-बूटी की शुद्धता पूरी तरह जाँची जा सकती है?
A: नहीं, घर की जाँच केवल शुरुआती संकेत देती है। रेत, बनावटी रंग या दूसरी वनस्पति कई बार पकड़ में आ जाती है, पर मिलती-जुलती प्रजाति, भारी धातु या कीटनाशक का पता प्रयोगशाला जाँच से ही चलता है।
Q2. चूर्ण लेना ठीक है या साबुत जड़ी-बूटी?
A: जहाँ संभव हो, साबुत जड़ी-बूटी लेकर घर पर पीसना बेहतर है। साबुत द्रव्य का रूप, छाल और टूटन देखी जा सकती है, जबकि चूर्ण बन जाने के बाद मिलावट पहचानना बहुत कठिन हो जाता है।
Q3. नकली केसर की पहचान कैसे करें?
A: असली केसर का धागा गुनगुने पानी में धीरे-धीरे सुनहरा-पीला रंग छोड़ता है और खुद लाल बना रहता है। नकली केसर तुरंत गहरा रंग छोड़कर सफेद या फीका पड़ जाता है, और उसका दाम भी प्रायः बहुत कम होता है।
Q4. सूखी जड़ी-बूटी कितने समय तक असरदार रहती है?
A: शार्ङ्गधर संहिता के मत से सामान्यतः सूखी औषधि एक वर्ष बाद गुणहीन होने लगती है। विडंग, पिप्पली, गुड़, धनिया, घी और शहद जैसे कुछ द्रव्य इसके अपवाद हैं, जो पुराने होने पर अधिक गुणकारी माने गए हैं।
Q5. क्या अनजान पौधे को चखकर या ऐप से पहचानकर प्रयोग किया जा सकता है?
A: बिल्कुल नहीं। कई विषैली वनस्पतियाँ दिखने में साधारण लगती हैं और ऐप की पहचान भी गलत हो सकती है। स्वाद की परख केवल पहले से ज्ञात, रसोई में खाए जाने वाले द्रव्यों तक सीमित रखें और जंगली पौधे की पहचान किसी जानकार से ही कराएँ।
अगली बार पंसारी की दुकान पर जाएँ, तो आप वही पुराने ग्राहक नहीं रहेंगे। चूर्ण की जगह साबुत द्रव्य माँगिए, उसे तोड़कर देखिए, सूँघिए, सफेद कागज़ पर फैलाइए और लेबल की पाँचों बातें पढ़िए। हो सकता है दुकानदार थोड़ा चौंके, पर यही सजगता आपके घर तक असली औषधि पहुँचाएगी। औषधि के रूप में किसी भी जड़ी-बूटी के प्रयोग से पहले योग्य वैद्य की सलाह अवश्य लें।





