तेजबल के फायदे और नुकसान – Tejbal in Hindi

तेजबल क्या है ? (What is Tejbal in Hindi)

तेजबल जम्बीरकुल (रुटेसी-Rutaceae) की वनस्पति है। भावप्रकाश निघण्टु के हरीतक्यादि वर्ग में तुम्बरु (तेजबल का फल) एवं तेजबल दोनों का ही पृथक-पृथक वर्णन मिलता है।

दातों को स्वस्छ चमकीला बनाये रखने के लिए उनका नियमित सम्यक शोधन आवश्यक है। इनके शोधन के लिए दांतुन एवं दंत मंजनों को उपयोग में लाया जाता है। दंत मंजन के लिए बहुत से द्रव्यों में से एक द्रव्य है तेजबल । तेजबल की ताजी पतली शाखा दांतुन के लिए भी लाभप्रद है।

तेजबल का विभिन्न भाषाओं में नाम (Name of Tejbal in Different Languages)

Tejbal in –

  • संस्कृत (Sanskrit) : वृक्ष तेजोवती, तेजोहा, तेजनी (फल – तुम्बुरु,सौरभ, वनज)
  • हिन्दी (Hindi) : वृक्ष – तेजबल, (फल – तुम्बुल, नेपाली धनियां)
  • बंगाली (Bangali) : फल – नेपाली धने।
  • अरबी (Arbi) : फागिरा कबाबा खंदा ।
  • फ़ारसी (Farsi) : कबाबा दहन कुशादा ।
  • अंग्रेजी (English) : टूथेक ट्री (Toothache Tree)।
  • लैटिन (Latin) : जन्थोक्सिलम एजाटम (Zanthoxylum Alatum)।

तेजबल का पेड़ कहां पाया या उगाया जाता है ? :

तेजबल हिमालय की उष्ण तराइयों में जम्बू से भूटान तक, नागाखासिया के पर्वत पर 2 से 6 हजार फीट की उंचाई पर होता है। यह टेहरी-गढ़वाल में विशेष होता है, सड़के के किनारे इसके छोटे-छोटे पेड़ मिलते हैं।
तुम्बुरु (तेजबल का फल) का सूडान, जेरबाद से आयात विशेष होता है। आयात नेपाल से होने के कारण इसे नेपाली धनियां कहा जाता है। भारत में इसका आयात नेपाल से तथा विदेशों में सूडान आदि से होता है।

तेजबल का पेड़ कैसा होता है ? :

  • तेजबल का पेड़ – तेजबल का गुल्माकृति छोटा वृक्ष होता है। वृक्ष सघन पत्तों से आच्छादित लगभग 20 फुट या इससे अधिक ऊंचा होता है। इसके काण्ड और शाखाओं पर कांटे होते हैं। वे कांटे तीक्ष्ण, चपटे लगभग 1 इंच लम्बे होते हैं। इसकी छाल हल्की भूरी फटी हुई सी होती है। पत्रकों और पत्रनालों पर भी ये कांटे होते हैं।
  • तेजबल के पत्ते – तेजबल के पत्र 1.5 इंच से 6 इंच तक लम्बे विषमपक्षवत् दो उपपत्रीय कण्टकों से युक्त होते हैं।
  • तेजबल के फूल – तेजबल के पुष्प अत्यन्त छोटे, लगभग 1/8 से 1/4 इंच लम्बे, 2 से 3 इंच सघन मंजरियों में हरित या पीतवर्ण होते हैं।
  • तेजबल के फल – तेजबल के फल बड़े धनिये के समान दिखलाई देता है। ये 1/6 से 1/5 इंच व्यास के होते हैं यह अर्धगोलाकर या रक्ताभ भूरे रंग का होता है। फलों के साथ प्रायः एक छोटा वृन्त लगा रहता है। फल शीर्ष की ओर से आकार आधे हिस्से तक फटा हुआ होता है। बाह्य पृष्ठ दानेदार होता है। ये दाने तेलीय रालीय सूक्ष्म-सूक्ष्म ग्रन्थियों के कारण होते हैं। फल अन्दर से प्रायः खोखले होते हैं। कभी-कभी इनमें गोल काले चमकदार बीज फल के अन्दर स्थित एक पतली श्वेत झिल्ली से आवृत रहते हैं। बीजों के निकल जाने से यह झिल्ली संकुचित हो जाती है। फल (तुम्बुरु) में एक तीक्ष्ण मनोरम गंध आती है। फल को हाथ से मसलने पर गन्ध अधिक उग्र हो जाती है।

पुष्प वर्षा ऋतु में तथा फल शरद ऋतु में आते है। फल ही क्या वृक्ष के सारे अवयव सुगन्धित होते हैं किन्तु फलों में विशेष सुगन्ध आती है। सुगन्ध के अतिरिक्त वृक्ष के सभी अवयक कटु होते हैं। इसकी छाल तो लालमिरच के जैसी चरपरी होती होती है। अतएवं टेहरी गढ़वाल की ओर के गांव के वासी इसे लाल मिरच के समान ही प्रयोग में लाते हैं।

इसकी लकड़ी भी बहुत मजबूत होती है। हरिद्वार के बाजार में इसके छोटे बड़े, गोल चिकने डंडे मिलते हैं, बद्री नाथ केदार नाथ की पद यात्रा करने वाले इन डंडों को लेकर यात्रा करते हैं। औषधि घोटने के खरल के मूलक भी इसके बनते हैं।वृक्ष से एक प्रकार का निर्यास गोंद भी निकलता है।

तेजबल के प्रकार :

इसकी विविध जातियां होती हैं, जिनमें मुख्य हैं –

(a) z.Rhetsa – तिरफल या चिरफल।
(b) z.Oxyphyllum |
(c) Z. Hamlltonianum |

(a) तिरफल या चिरफल – तिरफल या चिरफल का प्रयोग दक्षिण भारत में किया जाता है। इसका फल असली तुम्बुरु (तेजबल का फल) से बड़ा (मटर के समान) किन्तु झुर्रीदार होता है तथा इसमें असली तुम्बुरु के समान बाह्य पृष्ठ पर तेलीय रालीय ग्रन्थियां तथा अन्दर श्वेत झिल्ली नहीं होती है। स्वाद में यह हल्के अम्लतिक्त (नींबू के फल के बाहरी फलावरण के समान) बाद में असली तुम्बुरु के समान तीक्ष्ण होता है।

(b) और (c) दोनों जातियों के फल असली तुम्बुरु के समान होते हैं। किन्तु इनके फल अधिकतर फलवृन्त रहित होते हैं तथा स्वाद में कटुतिक्त न होकर अम्लतिक्त रस युक्त होते हैं।

तेजबल का उपयोगी भाग (Beneficial Part of Tejbal Tree in Hindi)

प्रयोज्य अंग – त्वचा (मूल छाल), फल।

तेजबल सेवन की मात्रा :

त्वचा, फल चूर्ण – 1 से 2 ग्राम
त्वचा फाण्ट (सर्बत) – 10 से 20 ग्राम।

तेजबल का रासायनिक संघटन :

  • तेजबल वृक्ष की त्वचा में बर्बेरिक, डिक्टेम्निन, मैग्नोफ्लुओरिन, जेन्थोप्लेनिन, स्किमियानिन नामक क्षाराभ, उड़नशील तेल तथा राल होते हैं।
  • फल में उड़नशील तेल पीताभ, कटु सन्धि 2-3 % होता है। जिसका मुख्य घटक लाइनामूल होता है।
  • पत्तियों में एक सुगन्धित तेल होता है।

तेजबल के औषधीय गुण (Tejbal ke Gun in Hindi)

  • रस – कटु, तिक्त।
  • गुण – लघु, रूक्ष, तीक्ष्ण ।
  • वीर्य – उष्ण।
  • विपाक – कटु।
  • प्रभाव – मुखशोधन और हृद्य (हृदय के लिए हितकारी)।
  • वीर्यकालावधि – एक वर्ष।
  • दोषकर्म – कफ-वात शामक तथा पित्तवर्धक।
  • उत्सर्ग – इसका उत्सर्ग त्वचा से होता है।
  • गुण प्रकाशक संज्ञा – तेजोहा (तीक्ष्ण होने से)
  • प्रतिनिधि – (तुम्बुरु) कबाब चीनी।

तेजबल का औषधीय उपयोग (Medicinal Uses of Tejbal in Hindi)

आयुर्वेदिक मतानुसार तेजबल के गुण और उपयोग –

बालकों के प्रथम दांत लगभग 6 मास की अवस्था में निकलने प्रारम्भ हो जाते हैं, परन्तु बीज रूप से मसूड़ों के अन्दर इनका विवेक गर्भ के अन्दर चतुर्थ मास में ही हो जाता है। – नृणां तु चतुर्थादिषु मासेषु दन्ता निषिच्यन्ते (काश्यपसंहिता)। रक्त ही परिवर्तित होकर दांतों का रूप धारण करता है। धीरे-धीरे उन बीज रूप से विद्यमान दांतों में अस्थिनिर्माण प्रारम्भ होता है। तथा दांत आकृति धारण करते हैं। 2.5 वर्ष की अवस्था तक में दूध के दांत पूरे निकल आते हैं। ये दांत शिशु की 5-6 वर्ष की अवस्था तक स्वयेमव गिर जाते हैं तथा उसके बाद स्थायी दांत धीरे-धीरे निकलने प्रारम्भ होते हैं, जो कि 20-26 वर्ष की अवस्था तक पूर्ण होते हैं। शारीरिक स्वास्थ्य के लिए दोनों प्रकार के दांतों की स्वच्छता अत्यावश्यक है। दन्तशोधन के लिए तेजोवती के चूर्ण का मंजन करने का भी निर्देश है।

  • तेजबल जन्तुघ्न (जंतु नाशक), पूतिहर (दुर्गंध नाशक), कोथ प्रशमन (अंग गलने जैसे रोगों से बचाव) और उत्तेजित होने से दांतों को रोगों से बचाता है।
  • दन्तरोगों का यदि प्रादुर्भाव हो गया हो तो तेजबल के उपयोग से उनका भी शमन होता है। इसलिये प्रायः दन्त रोग नाशक प्रयोगों में इसकी योजना की गई है ।
  • तेजबल के पेड़ की छाल का चूर्ण पेड़ की टहनी (तेजोवती) एवं फल तुम्बूरु का मंजन एवं दातून के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
  • दन्तरोगों में ही नहीं प्रायः समस्त मुखरोगों में तेजबल की उपादेयता प्रसिद्ध है।
  • मुख दन्त तथा गले के रोगों में तेजबल के स्वरस या क्वाथ से गण्डूष (कुल्ला) करना भी हितकारी है। इस प्रकार दन्त शोधन की प्रमुख औषधि होते हुए भी समस्त मुख रोगों में ही उपयोगी है।
  • दीपन पाचन एवं रोचन होने से आहार संस्कारार्थ तेजबल का फल काम में लिया जाता है।
  • तेजबल अग्निमांद्य, अजीर्ण, अरुचि, अर्श आदि रोगों में हितावह है ।
  • यकृदुत्तेजक होने से यकृतप्लीह वृद्धि एवं कृमिघ्न होने से कृमिरोग को भी तेजबल नष्ट करता है।
  • गुल्म एवं शूलरोग में तेजबल उपयोगी कहा है।
  • यह तीक्ष्ण होने से हृदयोत्तेजक है इसलिये हृदयदौर्बल्य की स्थिति में इसका (फल का) उपयोग निरन्तर करते रहना चाहिए।
  • भोजन के साथ तेजबल के फल तुम्बुरु की सुगन्धित चटनी बनाकर उपयोग में लाई जाती है। इसमें सेंधा नमक और भुना हुआ जीरा मिलाकर इसे अधिक उपयोगी बनाया जा सकता है।
  • वातहर एवं नाड़ियों के लिए उत्तेजिक होने से वातव्याधि में भी तेजबल का उपयोग किया जाता है।
  • पक्षाघात, आमवात, अपतन्त्रक आदि में तेजबल पथ्य के रूप में सेवन करना चाहिए।
  • तेजोवत्यादि घृत कास-श्वास आदि रोगों में उपयोगी है।
  • मूत्रजनन होने से मूत्रकृच्छ में एवं स्वेदजनन होने से त्वचा के रोगों को नष्ट करने में तेजबल श्रेष्ठ है।
  • मधुमेह में तेजबल की छाल हितावह है। एवं मधुमेहजन्य तथा कुष्ठ जन्य व्रणों में महर्षि सुश्रुत ने इसकी उपायदेयता प्रगट की है ।
  • इसके अतिरिक्त नाड़ीव्रण के शोधन व रोपण (घाव भरने) हेतु भी तेजबल उपयुक्त है।
  • ज्वरघन्न एवं कटुपोष्टिक होने से सामान्य ज्वरों में तथा सामान्य दौर्बल्य में भी तेजबल का प्रयोग किया जा सकता है।
  • वातशामक होने से मूढ़ गर्म के निःसरण के पश्चात् इसको क्वाथ के रूप में प्रयुक्त करने का विधान है।

यूनानी मतानुसार तेजबल के गुण और उपयोग –

  • यूनानी मत से तेजबल गरम है।
  • खांसी, बवासीर, जुकाम और दन्तशूल में तेजबल फायदा पहुंचाती है।
  • कफ और वायु के रोगों में यह उपयोगी है।
  • तेजबल के सेवन से अफीम का जहर उतर जाता है।
  • तेजबल की गोंद को पीसकर भुरभुराने से जखम भर जाते हैं।
  • दन्तशूल को नष्ट करने के लिए तेजबल की विशेष प्रशंसा की गई है।
  • यूनानी मत से इसके फल (तुम्बुरु) सुगन्धित, तीक्ष्ण और पौष्टिक होते हैं।
  • अपने संकोचक गुण की वजह से यह अतिसार में बहुत लाभ पहुंचाता है।
  • पेट का अफरा, छाती के रोग, मस्तिष्क के रोग, पागलपन और रक्तातिसार भी इसके प्रयोग से मिटते है।
  • इसके सेवन से यकृत बहुत मजबूत होता है।
  • इससे जठराग्नि प्रबल होती हैऔर मुख की सूजन मिटती है।

रोगोपचार में तेजबल के फायदे (Benefits of Tejbal in Hindi)

1). घाव (व्रण) के उपचार में तेजबल के इस्तेमाल से फायदा

  • तेजबल जड़ की छाल के क्वाथ से व्रण को थोना चाहिए । इससे व्रण का शोधन होता है।
  • तेजबल छाल के सूक्ष्म चूर्ण को या गोंद को पीसकर घाव पर बुरकने से व्रण का रोपण (घाव भरना) होता है।
  • तेजबल का फल खिलाना हितकारी है।

2). सरदर्द (शिरःशूल) मिटाए तेजबल का उपयोग

तेजबल की छाल को जल में पीसकर मस्तक पर लेप करें। ( और पढ़े – आधा सिर दर्द का घरेलू इलाज )

3). नाड़ीव्रण में तेजबल का उपयोग फायदेमंद

तेजबल की छाल, निशोथ, दन्तीमूल, नीम पत्र, मंजीठ, रसाञ्जन और दारु हल्दी का कल्क (चटनी) कर बांधना चाहिए।

4). भ्रम में लाभकारी है तेजबल का लेप

तेजबल फल चूर्ण, कालीमिर्च के चूर्ण को नारियल के तेल में मिलाकर ललाट पर लेप करने से वातज भ्रम मिटता है।

5). गले में सूजन (कण्ठ शोथ) ठीक करे तेजबल का प्रयोग

तेजबल के ताजे पत्तों को पीसकर चावल के आटे के साथ गरम कर बांधने से गले की सूजन मिटती है। ( और पढ़े – गले की सूजन के 9 घरेलू उपचार )

6). दांत दर्द (दन्तशूल) में तेजबल के प्रयोग से लाभ

  • तेजबल की छाल के चूर्ण का मंजन या ताजी लकड़ी की दातुन करें।
  • तेजबल के फलों को चबा या फलों को धूप में सुखाकर सूक्ष्म चूर्णकर मंजन करें। थोड़े चूर्ण को दर्द वाले दांत के नीचे दबा कर रखें एवं लार टपकाते रहें।

( और पढ़े – दांतों में कीड़े का घरेलू इलाज )

7). भूख बढ़ाने में तेजबल का उपयोग फायदेमंद

  • तेजबल (छाल), लोध, हरीतकी, त्रिकटु एवं यवक्षार के चूर्ण को उष्ण जल में यां मधु, तेल में मिलाकर धारण करने से कफज अरुचि नष्ट होती है।
  • तेजबल का फल को मिश्री के साथ पीसकर सेवन करने से अग्निमांध दूर होता है।

( और पढ़े – अरुचि दूर कर भूख बढ़ाने के 32 अचूक उपाय )

8). अफ़ीम के विष दूर करने में तेजबल के औषधीय गुण फायदेमंद

तेजबल को पानी में घोटकर उस पानी को 250 मि.ली. तक बार-बार पिलावें।

9). अजीर्ण में लाभकारी तेजबल का उपयोग

  • तेजबल का फाण्ट (शर्बत) बनाकर सेवन करना हितकारी है।
  • तुम्बुरु (तेजबल का फल) चूर्ण को गुड़ में मिलाकर 125 मि.ग्रा. की गोलियां बनाकर घृत के साथ सेवन करें।

10). आमवात में तेजबल सेवन से लाभ

  • तेजबल का क्याथ या चूर्ण को मधु के साथ सेवन करना उपयोगी है।
  • तुम्बुरु चूर्ण को भी मधु के साथ सेवन किया जा सकता है।

( और पढ़े – आमवात का आयुर्वेदिक उपचार )

11). पित्तातिसार में लाभकारी है तेजबल का प्रयोग

तेजबल के फल चूर्ण को बिल्व के शर्बत में मिलाकर चाटने से पित्तातिसार मिटता है।

12). श्वास रोग मिटाता है तेजबल

तेजबल के फल या बीजों को हुक्के में रखकर धूम्रपान करना लाभदायक है। ( और पढ़े – श्वास रोग  में क्या खाएं और क्या न खाएं )

13). पक्षाघात में तेजबल के इस्तेमाल से लाभ

तेजबल (शल) को चबाते रहने से जिहा की क्रिया ठीक होती है।

14). हैजा (विशूचिका) में तेजबल का उपयोग फायदेमंद

तेजबल का क्वाथ हितवह है।

15). सर्दी-जुखाम (प्रतिश्याय) से आराम दिलाए तेजबल का सेवन

तेजबल, नागरमोथा, कटफल, पिप्पली, पिप्पलीमूल, चित्रक के क्वाथ में सेंधानमक मिलाकर सेवन करें।

16). कण्ठ रोग ठीक करे तेजबल का प्रयोग

तेजबल, यवक्षार, पाठा, रसाञ्जन, दारुहरिद्र, कालीमिर्च के चूर्ण में मधु मिलाकर गोली बनाकर मुख में धारण करना चाहिए।

तेजबल से निर्मित आयुर्वेदिक दवा (कल्प) :

चूर्ण –

  • तेजबल, हरड़, इलायची, मंजीठ, कुटकी, नागरमोथा, पाठा, मालकांगनी, लोध, दारुहरिद्रा और कूठ को समभाग लेकर सूक्ष्म चूर्ण बनालें। इस चूर्ण का मंजन करने से दांतों के रोग यथा-शूल, रक्तस्राव, कण्डू आदि नष्ट होकर दांत स्वच्छ व स्वस्थ होते हैं। – चरक संहिता
  • तेजबल का फल, हरड़, हींग (भुनी हुई), पोहकर मूल, सेंधानमक, काला नमक सब समान भाग लेकर चूर्ण बनालें। इसे 3 ग्राम की मात्रा में उष्ण जल से सेवन करने पर वातज उदरशूल, गुल्म और अपतन्त्रक आदि रोग नष्ट होते हैं। – मै. र.

वटक (गोलियां) –

तेजबल की छाल का चूर्ण 1 किलो लेकर उसे 8 किलो दूध में पकावें। जब खोया हो जाय तो उसमें त्रिकुट, हरड़, सोया, वायबिडंग, चित्रक, पीपलामूल, अजमोद, वच, कूठ, असगन्ध, देवदारु का चूर्ण 60-60 ग्राम एवं थोड़ा घृत मिलाकर वटक (गोलियां) बना लें। इसे 3 से 6 ग्राम तक सेवन करें। घृत एवं मधु का सहपान के रूप में प्रयोग करें। इससे वात रोगों में लाभ होता है। – भा. भै० र.

घृत –

तेजबल, बड़ी हरड़, कूठ, छोटी पीपल, कुटकी, अजवायन, पोहकरमूल, ढाक के बीज, चित्रक, कचूर, कालानमक, आंवला, सेंधानमक, बेल का गूदा, तालीसपत्र, जीवन्ती, वच 12 -12 ग्राम, हींग 3 ग्राम लेकर कल्क करें। 786 ग्राम घृत से चौगुना जल मिलाकर घृत सिद्ध करें। इसे बल के अनुसार 6 ग्राम से 12 ग्राम तक सेवन करने से हिक्का (हिचकी) , श्वास, शोथ (सूजन), वातजन्य अर्श (बवासीर), ग्रहणी, हृदय शूल तथा पार्श्वशूल(कमर दर्द) आदि रोग नष्ट होते हैं। यह तेजोवत्यादि घृत है। – चरक संहिता

तेल –

तेजबल, बड़ी इलायची, नरकचूर 125-125 ग्राम, लौंग, सफेद चन्दन, छरीला, छोटी इलायची, कपूर कचरी, नागरमोथा, बालछड़ 60-60 ग्राम कपूर 30 ग्राम, पिपरमेंट 12 ग्राम, तिल का तेल 2.5 किलो।
पहले तिल के तेल को कांच के वर्तन में डालें। फिर सब औषधियां अधकुट कर उस वर्तन में डाल दें। वर्तन का मुख बन्द कर दें। यह ध्यान रहे कि वर्तन से हवा नहीं निकलनी चाहिए। उस बर्तन को 10 दिन तक धूप में तथा रात में ओस में रखा रहने दें। दिन में 2-3 बार उसे हिला दिया करें। यह हिमसागर तेल सिर में लगाने से सिर के दर्द को हटाकर दिमाग को तर रखेगा एंव आंखों की रोशनी बढ़ायेगा।

तेजबल के दुष्प्रभाव (Tejbal ke Nuksan in Hindi)

  • अधिक मात्रा में तेजबल फल का सेवन सरदर्द उत्पन्न करता है।
  • तेजबल के सेवन से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श करें ।
  • तेजबल को डॉक्टर की सलाह अनुसार ,सटीक खुराक के रूप में समय की सीमित अवधि के लिए लें।

दोषों को दूर करने के लिए : इसके दोषों को दूर करने के लिए कपूर का उपयोग हितकर है।

Leave a Comment