टॉन्सिल (टॉन्सिलाइटिस) के कारण, लक्षण, इलाज, दवा और परहेज – Tonsillitis ke Karan, Lakshan, ilaj, Dawa aur Bachav ke Upay in Hindi

टॉन्सिल्स क्या है ? (What are Tonsils in Hindi)

tonsils kya hoti hai –

टान्सील एक प्रकार की ग्रन्थि है जो कि गले में कण्ठ के दोनों ओर बादाम के आकार की होती है, यह हमारे गले में जहां पर नाक का छिद्र तथा मुख का छिद्र मिलता है, ठीक वहीं पर जीभ के पिछले भाग से जुड़ा हुआ स्थित पाया जाता है। आयुर्वेद में इसे गिलायु ग्रन्थि कहते है।

टॉन्सिलाइटिस क्या है? (What is Tonsillitis in Hindi)

tonsillitis kya hota hai –

शरीर में टान्सील का कार्य पहरेदार जैसा होता है अर्थात् गले के अन्दर आहार, जल व वायु के द्वारा सूक्ष्म विषाणु, धूल कण, हानिकारक रासायनिक कणों को अन्दर न जाने देना तथा उन्हें वहीं नष्ट करना। अतः टान्सील हमारे शरीर का महत्वपूर्ण अंग है क्योंकि इसी के द्वारा हमारा पूर्ण पाचन संस्थान संक्रमित होने से बच जाता है। इस टान्सील की सूजन ही टॉन्सिलाइटिस है, यह प्रायः बच्चों को होता है।

टॉन्सिलाइटिस (टॉन्सिल) के कारण (Tonsillitis Causes in Hindi)

tonsillitis kyu hota hai –

टॉन्सिलाइटिस उन्हीं को होता है, जिनके खान-पान व रहन-सहन में बदपरहेजी होती है। आजकल आम आदमी का जीवन अति व्यस्तताओं से जुड़ गया है, इस वजह से अनियमितताएं स्वाभाविक है, यही रोग का कारण है।

  • अनियमित खान-पान,
  • रात में देर से सोना,
  • सुबह देर से उठना,
  • बच्चों का चाकलेट खाना,
  • आइस्क्रीम,
  • अति उष्ण, शीत, तीक्ष्ण, अम्ल पदार्थों का सेवन,
  • विकृत तैल से बने व्यंजन का सेवन,
  • बार-बार सर्दी जुकाम से पीड़ित रहना,
  • गले पर तेज सर्दी का असर,
  • मुंह व गले की स्वच्छता न रखना,
  • बांसी खाना,
  • फ्रिज में रखे पदार्थों, मिठाई का सेवन,
  • पान-मसाला, गुटका खाना

इत्यादि ऐसे अनेक कारण है जो टॉन्सिलाइटिस के लिए जिम्मेदार है। किसी तरह के वायरस या बैक्टेरिया के कारण गले में संक्रमण होने से टॉन्सिलाइटिस होता है।

टॉन्सिल (टॉन्सिलाइटिस) के लक्षण (Tonsillitis Symptoms in Hindi)

tonsils ke lakshan kya hai –

सामान्य अवस्था में टॉन्सिल से किसी भी तरह की परेशानी नहीं होती है। परंतु अगर किसी कारण इसमें संक्रमण हो जाए या इसमें सूजन आ जाये तो इससे काफी दर्द होता है। दर्द के कारण कभी-कभी खाना खाने एवं मुंह को खुलने में काफी तकलीफ होने लगती है।

टॉन्सिलाइटिस के लक्षणों में मुख्यतः

  • गले में सूजन व दर्द,
  • बुखार,
  • बदनदर्द,
  • सुखी खांसी,
  • गले में कुछ अटके जैसा लगना,
  • उल्टी आना,
  • निगलने में कष्ट होना,
  • आवाज में भारीपन,
  • थूक निगलने में तकलीफ,
  • गले में खराश,
  • जुकाम,
  • कान के निचले भाग में दर्द व कमजोरी इत्यादि लक्षण होते हैं।

प्रारंभ में उपचार न किया गया तो इनमें पूय (पस) निर्मित हो जाता है। रोग पुराना होने पर इससे रक्त व पुयस्राव होने लगता है जिसके कारण गले में कई गठानें होकर रोगी को बोलने, निगलने व सांस लेने में कष्ट होता है। मुख से दुर्गध आना, आवाज धीमी होना इत्यादि लक्षण उत्तरोत्तर अवस्था में होते हैं।

टॉन्सिलाइटिस का समय पर इलाज करना जरुरी है वरना अनेक दुष्परिणाम हो सकते हैं जैसे कान की तकलीफ, गले में पस, हड्डी बुखार, विकास न होना, पेरीटॉन्सीलाइटीस, फोड़ा होना इत्यादि।

टॉन्सिल (टॉन्सिलाइटिस) का आयुर्वेदिक इलाज (Tonsillitis Treatment in Hindi)

tonsillitis ka ayurvedic treatment –

टॉन्सिलाइटिस की चिकित्सा करते समय कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए जैसे मुंह को नित्य स्वच्छ रखना, चाकलेट, आइस्क्रीम जैसे पदार्थों से पूर्णतः परहेज रखना।

सामान्यतः टॉन्सिलाइटिस होने पर निम्नलिखित औषधियां ली जा सकती है – Tonsillitis ki dawa

1). आरोग्यवर्धिनी वटी, गंडमालाकंडन रस, कांचनार गुग्गुल या त्रिफलागुग्गुल 1-1 वटी सुबह-शाम पुनर्नवासव 1 चम्मच के साथ रोज 3 से 4 माह तक लें।

2). गले में दर्द होने पर खदिरादि वटी बार-बार चूसना चाहिए। इसके अलावा चूसने के लिए एलादि वटी, लवंगादिवटी का प्रयोग करें।

3). टॉन्सिलाइटिस में रोग प्रतिबंधक शक्ति बढ़ाने के लिए उक्त औषधियों के साथ च्यवनप्राश 1-1 चम्मच सुबह-रात दूध के साथ लीजिए।

4). यवक्षार जल/ लवण/ हरिद्रा जल/ फिटकरी जल या त्रिफला जल से दिन में 3 बार गंडूष (गरारे) धारण करना चाहिए।

5). कंकोल, यष्टिमधु चूर्ण शहद के साथ मिलाकर उसका प्रतिसारण करना चाहिए या हरिद्रा एवं फिटकरी चूर्ण 2:1 प्रमाण में लेकर उनके मिश्रण का प्रतिसारण कर सकते हैं।

6). बुखार कम करने के लिए त्रिभुवन कीर्ति रस, महासुदर्शन काढ़ा, लघुमालिनीवसंत, अमृतारिष्ट आदि का प्रयोग करें।

7). यष्टिमधु, वचा, कुलंजन का समभाग चूर्ण शहद के साथ चटाए।

8). संक्रमण होने पर गंधक रसायन व सूक्ष्म त्रिफला की 1-1 गोली सुबह-शाम लें।

9). यदि नासा रोगों के उपद्रवस्वरूप टान्सील (गिलायु) वृद्धि हुई है, तो चित्रक हरीतकी अवलेह का प्रयोग करें।

10). इस व्याधि में कुमारीआसव, अभयारिष्ट, दशमूलारिष्ट या द्राक्षासव अनुपान स्वरूप में प्रयोग किया जा सकता

11). शरीर की प्रतिकार शक्ति बढ़ाने के लिए स्वर्ण मालिनी, कुमारकल्याण रस, अभ्रक भस्म और मधुमालिनी वसंत आदि का प्रयोग च्यवनप्राश के साथ करें।

टॉन्सिल (टॉन्सिलाइटिस) का घरेलू उपचार (Tonsillitis Home Remedies in Hindi)

tonsillitis ka gharelu upay –

  1. स्थानिक चिकित्सा हेतु दिन में दो बार टांसिल, हलक, गला, गर्दन पर 10-15 मिनट तक भाप देना उसके पश्चात गरम पानी में कागजी नींबू का रस मिलाकर उससे गरारा करें।
  2. एक गिलास गर्म दूध में आधा चम्मच हल्दी का पावडर मिलाकर घोल दें। रोजाना रात में सोने से पहले उस दूध को पियें। इससे बुखार, गले का दर्द और सूजन कम होने लगती है।
  3. एक ग्लास गर्म पानी में एक नींबू को काट कर उसके आधे भाग से रस को गर्म पानी में निचोड़ दें। फिर उस गर्म पानी में 2 से 3 चम्मच शहद को मिला दें। रोजाना दिन में 3 बार उस घोल को एक सप्ताह तक सेवन करें।
  4. गाजर या बीट का रस प्रतिदिन पीएं, इससे टान्सीलाइटिस में लाभ मिलता है क्योंकि गाजर व बीट में Anti toxic agent पाए जाते है। जो वायरस तथा बेक्टीरिया से होनेवाले संक्रमण से बचाता है। गाजर या बीट का इस्तेमाल जूस बनाकर किया जाता है।
  5. रोजाना सुबह उठ कर एक ग्लास हलके गर्म पानी में एक चम्मच नमक मिला कर कुल्ला करने से भी टॉन्सिल की सूजन कम होने लगता है।

टॉन्सिल (टांसिलाइटिस) में पथ्य (what to Eat in Tonsillitis in Hindi)

tonsillitis me kya khana chahiye –

टॉन्सिल (टांसिलाइटिस) में परहेज (What not to Eat in Tonsillitis in Hindi)

tonsillitis me kya nahi khana chahiye –

  • खान-पान में विशेष परहेज करें।
  • बच्चों को तले, भूने, मीठे, खट्टे, ठंडे पदार्थों से दूर रखें ।
  • दही, मलाई आदि का सेवन ना करें।
  • मसालेदार खाना, तली हुई चीजों को खाने से परहेज करें।
  • किसी भी प्रकार की ठंडी चीजें जैसे बर्फ पानी, कोल्ड ड्रिंक, आइस्क्रीम का सेवन करने से बचें।

टॉन्सिल (टांसिलाइटिस) से बचाव के उपाय (Prevention of Tonsillitis in Hindi)

tonsillitis se bachne ke upay –

  1. रोगी से निकट संपर्क न बनायें।
  2. घर की स्वच्छता पर विशेष ध्यान दें।
  3. बच्चों को खाना खाने से पहले एवं खाने के बाद हाथों की सफाई के लिए जोर दें।
  4. जिन बच्चों को बार-बार इनका प्रकोप होता है उन्हें आइस्क्रीम, केक, पेस्ट्रीज, खट्टे पदार्थ खाने से मना करें।

आधुनिक शास्त्र के अनुसार इस व्याधि को ग्रसनिका ग्रंथि शोथ कहा जाता है, जो 2 प्रकार का होता है –

1) तीव्र ग्रसनिका ग्रंथि शोथ (Acute Tonsilitis) – यह व्याधि अधिकतर 5 वर्ष की आयु के बालक से लेकर 26 वर्ष की आयु तक के युवा को हो सकती है। यह रोग Staphylococci, Streptococci, Pneumococci जैसे जंतुओं के संसर्ग या क्षोभक चीजों के सेवन के कारण भी होती है। इस व्याधि में बुखार, गले में खिचखिचाहट और वेदना, निगलने में कठिनाई आदि लक्षणों के साथ कभी-कभी श्वास में दुर्गध, मुंह खोलने में तकलीफ, सिरदर्द, पूरे बदन में दर्द, मलावरोध और पीत वर्ण पेशाब जैसे लक्षण पाये जाते हैं।

ग्रंथि में वृद्धि और स्पर्शासहत्व रहता है। यह दर्शन परीक्षण में रक्त वर्ण और शोथयुक्त होती है। उसपर पीत वर्ण के दाग रहते हैं, जहां से कफस्राव होता है। तीव्र स्थिति में गुडुची (250 -500 मि. ग्रा.), सूतशेखर रस (125 -250 मि. ग्रा) की टेबलेट दिन में तीन बार लें।

2) जीर्ण ग्रसनिका ग्रंथि शोथ (chronic Tonsilitis) – यह शोथ तीव्र ग्रसनिका ग्रंथि शोथ के बाद या रोमान्तिका, रोहिणी, ज्वर आदि रोगों के बाद होता है। यह ज्यादातर 4 से 15 वर्ष की आयु में पाया जाता है। इस व्याधि में गले में खराश, स्वर में परिवर्तन, सूखी खांसी, भोजन के समय या रात को गला भरा हुआ सा लगता है। आरक्त वर्ण की ग्रसनिका गत श्लेष्मल त्वचा होती है। गर्दन स्थान की रस ग्रंथि बढ़ी हुई लगती है।

आधुनिक चिकित्सा शास्त्र में कई बार टॉन्सील का ऑपरेशन करने की सलाह देते हैं, परंतु यह विचारणीय बात है कि टान्सील हमारे शरीर का आवश्यक अंग है, इसे निकाल देना कहां तक सही है? अतः आवश्यकता है योग्य खान-पान व परहेज के साथ आयुर्वेदिक चिकित्सा अपनायी जाए। यह चिकित्सा पद्धति अनेक रोगों को समूल नष्ट करने में सक्षम है। अतः टॉन्सिलाइटिस में ऑपरेशन को टालिए क्योंकि टान्सील बच्चों के शरीर के विकास में सहायक है। विभिन्न प्रकार के संक्रमण से मुक्त रखकर यह बच्चों के शरीर को रोगयुक्त होने से बचाता है। अतः हमें चाहिए आवश्यक परहेज कर आयुर्वेद चिकित्सा अपनाकर अपने बच्चों को तंदुरुस्त बनाएं।

(अस्वीकरण : दवा ,उपाय व नुस्खों को वैद्यकीय सलाहनुसार उपयोग करें)

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