अन्तर्ज्वाला – Anterjwala
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अन्तर्ज्वाला नामक पुस्तक का संबंध स्वातन्त्र्यवीर श्री सावरकर जी से है, जिनका नाम शीर्षक-पृष्ठ पर "लेखक" की सूची में सबसे ऊपर अंकित है। उसी सूची में श्री पं० चन्द्रमूल जी और स्व० लाला हरदयाल जी के नाम भी मुद्रित हैं, और प्राक्कथन में लेखक ने स्पष्ट कहा है कि चन्द्रमूल जी के सहयोग के बिना इस पुस्तक का प्रकाशन सम्भव नहीं हो पाता। प्रकाशन-पृष्ठ पर कलकत्ता का उल्लेख मिलता है और पुस्तक पर "Modern Book Depot, 4, Taj Road, Agra Cantt." की मुहर लगी हुई है। पहले पृष्ठ पर नैनीताल की नगरपालिका पुस्तकालय का बुक-प्लेट भी चिपका है। पीडीएफ़ में सौ चौंसठ पृष्ठ हैं।
पुस्तक की विषय-सूची में आठ विषय दिए गए हैं। इनमें "बन्धुआ भारत", "अन्तर्ज्वाला", "हिन्दी ही क्यों?", "चेन्नई" और "हिन्दुस्तानों का राजनैतिक आख्यान" जैसे अध्याय हैं, जिनमें से कई के सामने सीधे श्री सावरकर का नाम लिखा है। इनके अलावा "खरी-खरी बातें" अध्याय स्व० लाला हरदयाल जी के नाम से और "स्वरूप की सीधी राह" जैसा अध्याय श्री सावरकर के नाम से दिया गया है। पाठ में सावरकर जी के विद्रोही जीवन, उनकी राजनीतिक सोच और उनके बारे में लेखक के अपने अनुभव, दोनों साथ-साथ मिलते हैं।
ऐतिहास-अध्ययन और राजनीतिक स्मृति के लिए यह पुस्तक उपयोगी है, क्योंकि यहाँ सूत्रों के साथ-साथ उनके पीछे की ज़िंदगी भी सामने आती है। जहाँ लेखक ने सीधे सावरकर के नाम से अध्याय दिए हैं, वहाँ पाठ मूल रूप से उनके ही विचारों और अनुभवों का है। यह पुस्तक केवल पढ़ने और समझने के उद्देश्य से उपलब्ध कराई गई है; इसे किसी भी पक्ष या सिद्धांत का समर्थन-पत्र न मानें और इसके आधार पर किसी का चरित्र-चित्रण या आकलन न करें।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- सावरकर का जीवन तथा संघर्ष
- राष्ट्र-सेवा तथा बलिदान
- प्रेरक प्रसंग
- राष्ट्र-भक्ति की प्रेरणा
पुस्तक की मुख्य बातें
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