धर्म और दर्शन – Dharm Aur Darshan
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धर्म और दर्शन पुस्तक भारतीय परम्परा एवं दर्शन के सिद्धान्तों का सामानिक वर्णन प्रस्तुत करती है। शीर्ष पृष्ठ पर इसे इसी उपशीर्षक के साथ अंकित किया गया है। लेखक ब्रह्मदेव उपाध्याय हैं, जिन्होंने एम० ए० और साहित्याचार्य की उपाधियाँ प्राप्त की हैं और जो गोरखपुर से संबंधित हैं। प्रकाशन भारत साहित्य मंडल, कानपुर से हुआ है। शीर्ष पृष्ठ पर पुस्तक दाखिल करने की तिथि ग्यारह फरवरी उन्नासीस और पृष्ठ-विवरण दस (पाँच और पाँच) अंकित है। पुस्तक लगभग दो सौ बत्तीस पृष्ठ की है।
पुस्तक में विभिन्न धर्मों और दर्शनों के सिद्धान्तों की क्रमबद्ध समीक्षा की गई है। किसी एक पंथ को श्रेष्ठ मानकर नहीं, बल्कि विभिन्न मतों की तुलनात्मक दृष्टि से वर्णन किया गया है। पृष्ठ-विवरण केवल दस पृष्ठ बताया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि प्रत्येक प्रकरण संक्षिप्त ढंग से लिखा गया है। शीर्ष पृष्ठ पर स्व. विक्रमादित्य जी महावीर की प्रीतिवाणी पर खण्ड-शीर्षक भी दिया गया है, जो पुस्तक के आदर्श-वादी और सहिष्युद्ध ढंग को दर्शाता है। शीर्ष पृष्ठ के नीचे इन्द्र गुप्त, श्रीकृष्णपीठ वैष्णव धर्म, वाराणसी का नाम भी उल्लेखित है।
यह पुस्तक उन पाठकों के लिए उपयोगी है जो भारतीय धर्म और दर्शन की एकसाथ, तुलनात्मक समझ चाहते हैं। किसी एक धर्म की पक्ष-विरोधी सीमा से आगे बढ़कर पाठक सामान्य सिद्धान्त तक पहुँच सकता है। धार्मिक सहिष्यता और अध्ययन के दृष्टिकोण को यह पुस्तक पुष्ट करती है। संक्षिप्त आकार के बावजूद विषय-वस्तु सघन है, इसलिए इसे प्रारंभिक परिचय के रूप में पढ़ा जा सकता है। धर्म-अध्ययन में रुचि रखने वाले सामान्य पाठक भी इसे आसानी से समझ सकते हैं।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- आत्मा तथा ब्रह्म का स्वरूप
- जगत् की उत्पत्ति, माया तथा अद्वैत
- साधना, ध्यान तथा आत्मज्ञान के सोपान
- उपनिषद् तथा गीता का सार
पुस्तक की मुख्य बातें
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