गर्ग संहिता – Garg Sanhita
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पुस्तक का नाम गर्ग संहिता अंकित है और पृष्ठ पर बताया गया है कि इसे महात्मा श्रीमान् गर्गजी ने रचा है। पाठ के आरंभ में गर्ग संहिता-माहात्म्य का प्रसंग शौनक जी और पारबत्ती के संवाद के रूप में दिया गया है, जिसमें श्रीकृष्ण को ही देवता मानने वाली वैष्णव शिकाओं का और महात्मा गर्गजी का बखान मिलता है। प्रकाशन गीताप्रेस, गोरखपुर का है और पृष्ठ पर यह भी अंकित है कि यह गीताप्रेस की क्षेत्रीय ग्रन्थावली का भाग है।
अनुक्रमणिका में ग्रन्थ के अनेक खण्ड दिए गए हैं, जिनमें निर्गुण खण्ड, माधुर्यलभ खण्ड, दाम्भलभ खण्ड, प्राकृतलभ खण्ड, अप्राकृतलभ खण्ड, सिद्धिखण्ड, अनन्यभक्ति खण्ड, वैकुण्ठलभ खण्ड और कल्युग खण्ड जैसे नाम आते हैं। प्रत्येक खण्ड में अनेक अध्याय हैं और अन्त में अध्यायों की संख्या भी दी गई है। पाठ में गद्य और पद्य दोनों ढंग से सामग्री दी गई है और कई स्थानों पर अन्य ग्रन्थों से उद्धरण भी लाए गए हैं। ग्रन्थ का स्वरूप वैष्णव भक्ति और कृष्ण-लीला-वर्णन के इर्द-गिर्द घूमता है।
गर्ग संहिता वैष्णव साहित्य की प्राचीन रचनाओं में गिनी जाती है और इसमें कवि-कला, लोक-भाषा और धार्मिक चर्चा का अद्भुत मेल देखने को मिलता है। इसका पाठक के लिए महत्व यह है कि यह बताता है कि भक्ति-साहित्य में किस प्रकार अनेक परंपराएँ एक साथ बहती हैं।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- गर्ग संहिता का परिचय
- ज्योतिष तथा शकुन
- राजाओं तथा वंश का वर्णन
- श्लोक तथा अर्थ
पुस्तक की मुख्य बातें
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