मेरे गुरुदेव -स्वामी विवेकानंद | Mere Gurudev -Swami Vivekananda
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मेरे गुरुदेव स्वामी विवेकानन्द पर लिखी एक छोटी पुस्तिका है। पुस्तक के आरंभ में उस्मानिया विश्वविद्यालय की पुस्तकालय-पर्ची लगी है, जिसमें लेखक के रूप में "विवेकानन्द, स्वामी" और शीर्षक के रूप में "मेरे गुरुदेव १९४९" दर्ज है। प्रकाशन-पृष्ठ पर बताया गया है कि पुस्तक कल्याण ने स्वामी भारतकट भरातन्द, अध्यक्ष, श्रीरामकृष्ण आश्रम, नागपुर, सी. पी. के माध्यम से प्रकाशित हुई। यह श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द स्मृति-समारोह के लिए निर्धारित पुस्तक थी। मुद्रक मेहराज कृपा, ब्लैक नगर, बम्बई रहा है। पुस्तक लगभग बत्तीस पृष्ठ की है।
पुस्तक में स्वामी विवेकानन्द जी के जीवन से जुड़े अनुभव और स्मृतियाँ सरल हिन्दी में सजाई गई हैं। पाठ में उनके गुरु के रूप में श्रीरामकृष्ण परमहंस का उल्लेख मिलता है। गुरु के प्रति उनकी श्रद्धा, कठिन परिश्रम और साधना-दीर्घता जैसे विषय पाठकों को सीधे प्रेरित करते हैं। पृष्ठभूमि में उस दौर की सामाजिक परिस्थितियों का भी संकेत मिलता है। छोटी पृष्ठ-संख्या के बावजूद पुस्तक में अपनेपन की भावना पूरी तरह भरी हुई है।
यह पुस्तक उन पाठकों के लिए उपयोगी है जो स्वामी विवेकानन्द को केवल किताबों से नहीं बल्कि उनके जीवन-संदर्भ से समझना चाहते हैं। कल्याण जैसी प्रसिद्ध पत्रिका द्वारा प्रकाशित होने के कारण पाठ की प्रामाणिकता पर विश्वास किया जा सकता है। श्रीरामकृष्ण-विवेकानन्द परंपरा से जुड़े पाठकों के लिए यह स्मृतियों की किताब है। अध्ययन काल में यह पाठ पढ़ने से कर्म-ठ्यवहार और साधना के प्रति दृष्टिकोण स्पष्ट होता है। आत्मकथा जैसी सरल शैली में होने के कारण इसे कोई भी पढ़ सकता है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- स्वामी जी तथा उनके गुरु रामकृष्ण
- गुरु-शिष्य संबंध
- प्रेरक प्रसंग
- भक्ति तथा श्रद्धा
पुस्तक की मुख्य बातें
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