Sri Vidyarnava Tantra Purvardha Part Two
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यह पुस्तक श्रीविद्यार्णवतन्त्रम् नाम से प्रकाशित हुई है और इसमें आठारह वर्ष का ग्रन्थ बताया गया है। शीर्षक-पृष्ठ पर यह लिखा है कि यह भाषाभाष्योपेतम् है और इसका पूर्वार्ध भाग यहाँ छपा है, जबकि यह शृंखला का द्वितीय भाग है। ग्रन्थ को श्री विद्यार्णव यती ने रचा है और उसकी रचना का भाष्य श्री कपिलदेव नारायण स्वरूपवारिश्त ने किया है।
यह पुस्तक चौखम्बा सूक्ष्मार्ती ग्रन्थमाला की सूची 496 के अंतर्गत प्रकाशित हुई है। प्रकाशक चौखम्बा सूक्ष्मार्ती प्रकाशन, वाराणसी है। पैमाना लगभग 456 पृष्ठ का है, जिसमें संस्कृत मूल पाठ के साथ हिन्दी में अर्थ और व्याख्या दी गई है, इसलिए पाठक जटिल श्लोकों का अर्थ सरल भाषा में समझ सकते हैं।
तत्त्व-शास्त्र और भारतीय धर्म-दर्शन के इतिहास में रुचि रखने वाले विद्वानों के लिए यह पुस्तक उपयोगी है, क्योंकि यहाँ मूल पाठ के साथ भाष्य मिलकर अध्ययन को सहज बनाता है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- श्री विद्यार्णव तंत्र (पूर्वार्ध भाग 2)
- श्रीविद्या साधना तथा मंत्र
- पूजा-विधि तथा नियम
- सावधानियाँ
पुस्तक की मुख्य बातें
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