अभयादि मोदक: विरेचन की शास्त्रीय औषधि, घटक और उपयोग

Last Updated on अक्टूबर 21, 2026 by admin
अभयादि मोदक शार्ङ्गधर संहिता में वर्णित एक विरेचक (दस्त लाकर कोष्ठ शुद्ध करने वाला) योग है। इसमें हरीतकी, त्रिवृत, दंती, त्रिकटु और अन्य द्रव्य होते हैं। यह पुरानी कब्ज, मंदाग्नि, गुल्म और उदर रोग में कोष्ठ-शुद्धि के लिए वैद्य की देखरेख में दिया जाता है।
अगर आपने इसे सामान्य “पेट साफ़ करने की गोली” समझकर देखा है, तो थोड़ा ठहरिए। यह कोई हल्का रेचक नहीं, शुद्ध विरेचन का योग है, और इसके साथ कुछ नियम जुड़े हैं जिन्हें जाने बिना लेना ठीक नहीं।
अभयादि मोदक क्या है और इसका शास्त्रीय आधार क्या है?
“अभया” हरीतकी का ही एक नाम है, यानी वह जो रोग के भय से मुक्त करे। “मोदक” का अर्थ है गोली के आकार का लड्डू, जिसे औषधि-चूर्ण को शहद या शर्करा से बाँधकर बनाया जाता है।
यह योग शार्ङ्गधर संहिता के मध्यम खंड के गुटिका (वटी) प्रकरण में आता है। शास्त्रकार ने इसे उन रोगों में बताया है जिनकी जड़ में कोष्ठ में रुका हुआ मल और दोष है, जैसे विषमज्वर, मंदाग्नि, पांडु, गुल्म, अर्श और उदर रोग।
अभयादि मोदक के घटक
इस योग की खासियत इसका अनुपात है। अधिकांश द्रव्य समान भाग में होते हैं, पर विरेचक द्रव्य कई गुना अधिक।
| घटक | सरल परिचय | अनुपात |
|---|---|---|
| हरीतकी, आमलकी | अनुलोमन और रसायन | 1-1 भाग |
| शुंठी, मरिच, पिप्पली | त्रिकटु, अग्नि दीपक | 1-1 भाग |
| पिप्पलीमूल, विडंग, मुस्ता | पाचन, कृमिघ्न | 1-1 भाग |
| त्वक्, तेजपत्र | सुगंध, वात-कफ शमन | 1-1 भाग |
| दंती | तीव्र विरेचक | 3 भाग |
| त्रिवृत (निशोथ) | सुखविरेचक | 8 भाग |
| शर्करा | मधुर, पित्तशामक | 6 भाग |
| मधु | बाँधने के लिए | आवश्यकतानुसार |
अक्सर लोग यह नहीं जानते कि त्रिवृत को आयुर्वेद में “सुखविरेचन” का श्रेष्ठ द्रव्य माना गया है। दंती अकेले तीक्ष्ण होती है, पर त्रिवृत, शर्करा और हरीतकी उसकी तीक्ष्णता को संतुलित करते हैं।
इस योग में हरीतकी की मात्रा अन्य कई द्रव्यों के बराबर रहती है, पर इसका प्रभाव अकेले सेवन से भिन्न होता है, क्योंकि यहाँ वह त्रिवृत और दंती के साथ मिलकर काम करती है।
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आयुर्वेद की दृष्टि से अभयादि मोदक कैसे काम करता है?
जब अग्नि मंद होती है, तो भोजन पूरा नहीं पचता और आम (अधपचा, चिपचिपा अंश) बनता है। यह आम पुरीषवह और अन्नवह स्रोतस् में जमकर दोषों को रोक देता है। पित्त और कफ का संचय बढ़ता है और वात का स्वाभाविक अधोगमन रुक जाता है।
अभयादि मोदक दो काम एक साथ करता है। त्रिकटु और पिप्पलीमूल अग्नि को जगाते हैं, और त्रिवृत-दंती रुके हुए दोष को नीचे के मार्ग से बाहर निकालते हैं।
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यह साधारण रेचक से कैसे भिन्न है?
त्रिफला या हरीतकी चूर्ण “अनुलोमन” करते हैं, यानी मल को धीरे से आगे बढ़ाते हैं। अभयादि मोदक “विरेचन” है, यानी दोष को पिघलाकर बाहर करना। इसीलिए इसे रोज़ की आदत की तरह नहीं, बल्कि आवश्यकता के अनुसार कुछ समय के लिए दिया जाता है।
अभयादि मोदक के फायदे: किन रोगों में दिया जाता है?
वैद्य सामान्यतः इसका उपयोग इन स्थितियों में सहायक उपाय के रूप में करते हैं:
- पुरानी कब्ज, जहाँ मल सूखा और कठिनाई से आता हो
- पेट में भारीपन, अफारा (आध्मान) और गैस का ऊपर चढ़ना
- गुल्म और उदर रोग में कोष्ठ-शुद्धि
- अर्श (बवासीर) में मल को सुगम बनाना
- पित्त के संचय से जुड़ी समस्याओं में, वैद्य के निर्णय पर
- पंचकर्म से पहले या बाद में हल्के कोष्ठ-शोधन के लिए
परिणाम व्यक्ति की प्रकृति, कोष्ठ (क्रूर, मध्य या मृदु) और रोग की अवस्था पर निर्भर करते हैं। एक ही गोली किसी को एक बार में शुद्ध कर देती है, तो क्रूर कोष्ठ वाले पर असर कम दिखता है। अर्श में जब मल त्याग कठिन हो, तब वैद्य कभी-कभी इसके साथ अन्य सहायक योग भी देते हैं।
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अभयादि मोदक कैसे और कब लें?
शास्त्रीय सेवन-विधि
शार्ङ्गधर ने एक सूक्ष्म बात बताई है जो आजकल के ब्लॉगों में शायद ही मिले। मोदक लेने के बाद ठंडा पानी पिया जाता है, और जब तक ठंडा पानी लेते रहते हैं, विरेचन चलता रहता है। गर्म पानी पीने पर विरेचन रुक जाता है।
यानी विरेचन की “चाबी” आपके हाथ में रहती है, पर यह बात वैद्य की देखरेख में ही व्यवहार में लानी चाहिए। औषधि सामान्यतः प्रातःकाल खाली पेट दी जाती है, जब पिछली रात का भोजन पच चुका हो। मात्रा और दिनों की संख्या वैद्य के मार्गदर्शन में ही तय करें।
विरेचन के बाद का आहार (संसर्जन क्रम)
यहाँ सबसे आम गलती होती है। लोग दस्त होने के बाद सीधे भारी भोजन कर लेते हैं, जिससे अग्नि फिर बिगड़ जाती है।
- पहले पतली पेया (चावल का पतला मांड)
- फिर विलेपी (गाढ़ी खिचड़ी जैसी)
- फिर मूंग का यूष और पुराने चावल का भात
- धीरे-धीरे सामान्य भोजन
पथ्य और अपथ्य
| पथ्य (क्या लें) | क्यों |
|---|---|
| मूंग, पुराना चावल, लौकी, परवल | लघु गुण, सरलता से पचते हैं |
| गुनगुना पानी (विरेचन रुकने के बाद) | अग्नि को सहारा |
| थोड़ा घी | मधुर विपाक, आंतों की रूक्षता घटाता है |
| अपथ्य (क्या न लें) | क्यों |
|---|---|
| उड़द, राजमा, छोले | गुरु और विष्टंभी, वात बढ़ाते हैं |
| दही, विशेषकर रात में | अभिष्यंदी, स्रोतस् रोकता है |
| बासी, तला और मैदे का भोजन | आम बढ़ाता है |
| दूध के साथ खट्टे फल या नमक | विरुद्ध आहार |
भूख लगने पर ही खाएँ, पेट का एक भाग खाली छोड़ें, और रात का भोजन जल्दी करें। वात-प्रधान अफारा या कब्ज में वैद्य कभी-कभी गन्धर्वहस्तादि एरण्ड तैल जैसे स्नेहन योगों को भी साथ देने पर विचार करते हैं।
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दिनचर्या, ऋतु और योग
विरेचन के दिन धूप, लंबी यात्रा, रात्रि जागरण और भारी परिश्रम से बचें। शरद ऋतु पित्त-शोधन के लिए स्वाभाविक रूप से उपयुक्त मानी जाती है। विरेचन वाले दिन योगासन न करें; बाद के दिनों में पवनमुक्तासन और मंद गति से अनुलोम-विलोम सहायक हैं। कपालभाति और तीव्र आसन कुछ दिन बाद ही शुरू करें।
किन्हें अभयादि मोदक से सावधान रहना चाहिए?
- गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाएँ, मासिक धर्म के दिनों में
- शिशु, छोटे बच्चे और दुर्बल वृद्ध
- जिन्हें पहले से दस्त, आंतों में घाव, गुदभ्रंश या कमज़ोरी हो
- मधुमेह वाले, क्योंकि इसमें शर्करा का बड़ा भाग है
- रक्तचाप, मूत्रवर्धक या हृदय की दवा लेने वाले, क्योंकि दस्त से शरीर में जल और लवण घट सकते हैं
- सर्जरी से पहले के दिनों में
अपनी चल रही दवा स्वयं बंद न करें। यदि दस्त में खून आए, तेज़ पेट दर्द हो, चक्कर या अत्यधिक कमज़ोरी लगे, तो तुरंत डॉक्टर से मिलें।
अगर समस्या केवल सामान्य कब्ज और पेट की हल्की गड़बड़ी तक सीमित है, तो विरेचन से पहले सरल घरेलू उपायों से भी राहत मिल सकती है।
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विरेचन और कब्ज में बाज़ार में कौन सी आयुर्वेदिक औषधियाँ मिलती हैं?
अभयादि मोदक के अलावा कोष्ठ-शुद्धि और कब्ज में ये शास्त्रीय योग भी सामान्यतः उपलब्ध हैं। इन्हें प्रकृति, रोग की अवस्था और वैद्य की सलाह के अनुसार ही लें, स्वयं चुनकर नहीं।
| औषधि | रूप | मुख्य घटक | किसमें सहायक | सावधानी |
|---|---|---|---|---|
| अभयादि मोदक | वटी | हरीतकी, त्रिवृत, दंती | दोष-संचय, पुरानी कब्ज | शर्करा युक्त, तीव्र |
| इच्छाभेदी रस | रस औषधि | शुद्ध जयपाल, त्रिकटु | तीव्र विरेचन | केवल वैद्य की देखरेख में |
| अविपत्तिकर चूर्ण | चूर्ण | त्रिवृत, त्रिकटु, लवंग | अम्लपित्त के साथ कब्ज | मृदु विरेचक |
| त्रिफला चूर्ण | चूर्ण | हरीतकी, बिभीतकी, आमलकी | नियमित अनुलोमन | दीर्घ प्रयोग में भी सौम्य |
| अभयारिष्ट | अरिष्ट | हरीतकी, द्राक्षा, विडंग | अर्श और कब्ज | मधुमेह में सावधानी |
| गन्धर्वहस्तादि एरण्ड तैल | तैल | एरण्ड तैल, एरण्ड मूल | वात-प्रधान कब्ज | गर्भावस्था में नहीं |
ये औषधियाँ सहायक उपाय हैं। मात्रा और अवधि वैद्य के मार्गदर्शन में ही तय करें, इन्हें किसी रोग का स्थायी या अकेला इलाज न मानें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नीचे इस विषय से जुड़े कुछ सामान्य प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं।
Q1. क्या अभयादि मोदक रोज़ लिया जा सकता है?
A: सामान्यतः नहीं। यह विरेचक योग है, अनुलोमक नहीं। रोज़ की आदत के लिए वैद्य त्रिफला जैसा सौम्य योग अधिक उपयुक्त मानते हैं।
Q2. अभयादि मोदक कितने दिन लें?
A: यह रोग, कोष्ठ और शरीर-बल पर निर्भर है। कई बार इसे एक-दो बार ही शोधन के लिए दिया जाता है, इसलिए अवधि वैद्य ही तय करें।
Q3. अभयादि मोदक के side effects क्या हो सकते हैं?
A: अधिक मात्रा या गलत व्यक्ति में अधिक दस्त, कमज़ोरी, पेट में मरोड़ और जल की कमी हो सकती है। इसीलिए मात्रा और अनुपान का ध्यान ज़रूरी है।
Q4. क्या यह वज़न घटाने की दवा है?
A: नहीं। दस्त से घटा वज़न केवल जल और मल का होता है। मेद-रोग के लिए आयुर्वेद में अलग योग और जीवनशैली है।
Q5. इसके बाद क्या खाना चाहिए?
A: पहले पतली पेया, फिर विलेपी, फिर मूंग का यूष और भात। सीधे भारी भोजन करने से अग्नि फिर कमज़ोर होती है।
अभयादि मोदक तभी अपना पूरा लाभ देता है जब उसके आगे-पीछे का आहार भी सधा हो। अगर आप कब्ज या पेट के भारीपन से परेशान हैं, तो पहले एक सप्ताह तक अपना भोजन-समय और रात्रि-भोजन सुधारकर देखें, फिर वैद्य से अपने कोष्ठ की जाँच करवाकर ही विरेचन का निर्णय लें।
किसी भी औषधि के सेवन से पहले योग्य वैद्य की सलाह अवश्य लें।





