प्रकृति का वरदान देवदार के फायदे और नुकसान – Deodar in Hindi

Last Updated on January 3, 2021 by admin

देवदार क्या है ? (What is Deodar in Hindi)

वृक्षसम्पदा में देवदार (देवदारू) को बहूमूल्य माना गया है। यह वृक्ष बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ है। उत्तराखण्ड की ओर के प्रायः सारे मकान देवदार की लकड़ी के ही बने हुए रहते हैं। यह लकड़ी आजकल रेल के स्लीपर, मकानों और मन्दिरों की छतों तथा समुद्री जहाजों-स्टीमरों आदि अनेक कामों में आती है। भारतीय लकड़ियों में इसकी लकड़ी सर्वाधिक मजबूत मानी गई है। पेंसिल एवं पेन होल्डर आदि का निर्माण मुख्यरूप से देवदार टैक्सस वैकाप जूनिपिरस विर्जिनिएना आदि के काष्ठों द्वारा ही होता है।

देवदार का वृक्ष बहुमूल्य होने के साथ-साथ सुन्दर भी अधिक होता है। हमारा मत है कि प्रकृति ने देवदार के वृक्ष को वनस्पति जगत में सबसे अधिक सौन्दर्य दिया है और सौन्दर्य की इस सर्वश्रेष्ठता के कारण इसे “वृक्षराज” कहना अनुपयुक्त न होगा।”

प्राकृतिक वर्गीकरण के अनुसार यह सरल कुल (पाइनेसी) की वनौषधि है। कटुक स्कन्ध की इस वनौषधि को भगवान चरक ने स्तन्यशोधन एवं अनुवासनोपग कहा है। महर्षि सुश्रुत ने वातसंशमन गण के अन्तर्गत इसकी गणना की है। तब ही तो आचार्य प्रियव्रत जी ने इसका वर्णन वेदनास्थापन औषधियों के अन्तर्गत किया है। जो द्रव्य वेदना (पीड़ा) को नष्ट कर दे वे द्रव्य वेदनास्थापन कहे जाते हैं।

देवदार पेड़ का विभिन्न भाषाओं में नाम (Name of Deodar Tree in Different Languages)

Deodar Tree in –

  • संस्कृत (Sanskrit) – देवदारू, सुरवृक्ष, भद्रदारू, दारू आदि
  • हिन्दी (Hindi) – देवदार
  • पंजाबी (Punjabi) – दियार
  • मराठी (Marathi) – देवदार
  • गुजराती (Gujarati) – देवदार
  • बंगाली (Bangali) – देवदारू
  • तामिल (Tamil) – देवदारू
  • तेलगु (Telugu) – देवदारी
  • कन्नड़ (kannada) – दीवदार
  • अंग्रेजी (English) – देवदार (Deodar)
  • लैटिन (Latin) – सेड्रस देवदारू (Cadrus Deodara)

देवदार का पेड़ कहां पाया या उगाया जाता है ? :

देवदार का वृक्ष पश्चिमोत्तर हिमालय प्रदेश में 3500 से 12 हजार फीट की ऊँचाई तक होता हैं।

देवदार का पेड़ कैसा होता है ? :

  • देवदार का पेड़ – देवदार के वृक्ष बहुत ऊँचे (76 मीटर तक) और बहुत सुन्दर होते हैं। इन वृक्षों की शाखायें चारों ओर फैली हुई रहती हैं किन्तु शाखा का अग्रभाग कोमल तथा नीचे की ओर झुके हुए होते हैं। इसका प्रकाण्ड स्कन्ध (तना) काफी मोटा लगभग ग्यारह मीटर मोटा एवं सीधा होता है। तने की छाल खाकस्तरी रंग से लालिमा लिये भूरे रंग की होती है। इस पर अनुलम्ब दिशा में तथा तिरछे अनेक दरारें पड़ी रहती हैं। ऊपर की ओर शाखाएँ शिखर शंक्वाकार सा मालूम होता है जब कि पुराने वृक्षों पर यही शिखर स्तूपाकार होता है।
  • देवदार के पत्ते – देवदार वृक्ष के पत्र 2.5 सेमी0 से 3.75 सेमी0 लम्बे,सूच्याकार तथा त्रिकोणाकार, चिकने, चमकदार एवं रंग में हरे रंग के होते हैं, ये पत्र प्रायः लम्बी शाखाओं पर एकाकी और पेचदार क्रम से परन्तु छोटी शाखाओं पर सघनगुच्छों में निकलते हैं। देखने में ये पत्रगुच्छक चँवर की तरह मालूम होते हैं।
  • देवदार के फूल – नर पुष्य शाखाओं पर 0.8 सेमी0 से 1 सेंटीमीटर लम्बे, एकाकी, नम्य व लम्बगोल, अवृन्त काण्डज मज्जरियों में निकले होते हैं।
  • देवदार का फल – शंकु फल 20 सेमी0 से 12.5 सेमी0 लम्बे, 7.5 सेमी0 से 10 सेमी0 मोटे होते हैं, जो शाखाओं पर एकाकी स्थित होते हैं। शल्क पत्र पंखे के आकार के होते हैं, जो शंकुफलों पर अनुप्रस्थ दिशा में खूब बहुतायत से लगे रहते हैं।
  • देवदार के बीज – बीज 0.17 सेमी0 से 1.2 सेमी0 लम्बे त्रिकोणाकार या अर्धचन्द्राकार और पंखयुक्त होते हैं उक्त पंख त्रिकोणाकार लम्बे होते हैं। बीज पत्र लगभग दस होते हैं।

फूल सितंबर-अक्टूबर में लगते हैं और फल लम्बे अप्रैल में लगते हैं जो अगले अक्टूबर नवम्बर तक पकते हैं। देवदारू की एक किलो लकड़ी में 150 ग्राम लगभग तेल प्राप्त होता है। इसके वृक्ष की आयु 600 वर्षो तक की होती है।

देवदार पेड़ का उपयोगी भाग (Beneficial Part of Deodar Tree in Hindi)

प्रयोज्य अंग – काण्डसार (तने का सार भाग) । लकड़ी व बुरादा उपलब्ध होता है।

देवदार के औषधीय गुण (Deodar ke Gun in Hindi)

  • रस – तिक्त
  • गुण – लघु, स्निग्ध
  • वीर्य – उष्ण
  • विपाक – कटु
  • दोषकर्म – यह तिक्त एवं उष्ण वीर्य होने से कफ का तथा स्निग्ध एवं उष्ण होने से वात का शमन करता है।

सेवन की मात्रा :

मात्रा – 3 से 6 ग्राम

देवदार का रासायनिक संघटन :

देवदार की लकड़ी से एक रक्ताभ भूरे रंग का गन्ध युक्त तेल निकलता है जिसका मुख्य घटक एक सस्क्वीटर्पिन होता हैं।

देवदार का औषधीय उपयोग (Medicinal Uses of Deodar in Hindi)

आयुर्वेदिक मतानुसार देवदार के गुण और उपयोग –

  • देवदार प्रमुखतया वातशामक एवं वेदना स्थापक होने से वात रोगों की प्रशस्त औषधि कही गई है।
  • जीर्ण, संधिवात, आमवात, गृध्रसी, शिरःशूल आदि वायुरोगों में यह हितकारी है।
  • सन्धिवात में शोथ एवं वेदना को दूर करने के लिए इसका बाह्य प्रयोग भी किया जाता है।
  • इसका तैल उत्तम वात शामक है।
  • संधिवात में लाभ पहुँचाने के लिए देवदार, कचूर, गुडूची, रास्ना और सोंठ के क्वाथ में गुग्गुलू मिला कर देना चाहिए
  • इसी प्रकार सिराओं में जब वायु प्रबल होकर विकार उत्पन्न करे तो यह देवदर्वादि कषाय लाभ पहुंचाता है।
  • उष्ण होने से देवदार गर्भाशय का शोधन करता है तथा तिक्त होने से स्तन्य (दूध) का भी शोधन करता है अतः सूतिकारोगों की प्रशस्त औषधि है। सूतिकारोगोक्त देवदादि क्वाथ को कौन वैद्य नहीं जानता।
  • योनि में उत्पन्न शूल को भी यह समाप्त करने में श्रेष्ठ है।
  • आमदोषपाचक होने से वात कफ ज्वरों में तथा निराम में शामक एवं जीर्णज्वरों में अनुलोमन होने से देवदार लाभप्रद है।
  • स्वेद जनन (पसीना लानेवाला) एवं पाचन गुण होने से साम कफज्वर एवं साम वातज्वर में इसे उपयोग में लाया जाता है।
  • सामवात ज्वर में देवदार, सोंठ, छोटी कटेरी, बड़ी कटेरी और धनियां को समभाग लेकर कुचलकर मिट्टी के पात्र में सायंकाल भिगो दें प्रातः काल अग्नि पर पकाकर क्वाथ विधि से तैयार कर पीवें।
  • स्निग्ध, तिक्त एवं सुगन्धित देवदार कफनिःसारक एवं श्लेष्म्पूतिहर होने से जीर्ण कास, श्वास पीनसादि श्वसन संस्थान के रोगों में कफ को बाहर निकालता है तथा कफ की दुर्गन्ध को मिटाता है।
  • देवदार कफ वात शामक होने से हिक्कारोग में भी हितकारक कहा गया है।
  • यह उत्तेजक होने से हृदय दौर्बल्य में तथा रक्त प्रसादन होने से रक्त विकारों में लाभप्रद है।
  • चर्मरोगों में देवदार का लेप तथा तेल को लगाया जाता है। तेल से व्रणों का शोधन एवं रोपण भी होता है। इसीलिए उपदंश में भी यह तेल हितावह है।
  • देवदार गलगण्ड, श्लीपद (हाथीपाँव) आदि शोथ (सूजन) प्रधान रोगों में भी बाह्याभ्यन्तर रूप में उपयोगी है।
  • उदररोगों की यह प्रशस्त औषधि है।
  • दीपन-पाचन, कृमिध्न (कृमि नष्ट करनेवाला) एवं अनुलोमन (ऐसी औषधि जिससे पेट का मल बाहर निकले) होने से देवदार पाचन संस्थान के रोगों में हितकारी है।
  • देवदार आमदोष पाचनार्थ परमोपयोगी होने के साथ आध्मान (वायु से पेट फूलना), विबन्ध (कब्ज), कृमि रोगों में भी यह लाभप्रद कहा गया है।
  • मूत्रजनन (उष्ण स्निग्ध होने से) एव प्रमेहघ्न (तिक्त होने से) होने से मूत्रकृच्छ्र, पूयमेह प्रमेह में प्रयुक्त होता है।
  • शार्ङ्गधर संहिता में वर्णित देवदार्वाद्यरिष्ट प्रमेह, वातव्याधि, ग्रहणी, अर्श (बवासीर), मूत्रकृच्छ्र, कृष्ठ आदि रोगों में लाभदायक कहा गया है।
  • शिरः शूल (सरदर्द) में देवदार लेप हेतु यह प्रशस्त है।
  • शिर, कंठ, नासा, कर्ण, नेत्र आदि शालाक्य रोगों (सिर, मुख, नाक कान गला आदि अंगो के रोगों की चिकित्सा शालाक्य कहलाती है।) में भी देवदार हितकर हैं।

यूनानी मतानुसार देवदार के गुण और उपयोग –

  • यूनानी मत से इसके पत्ते सूजन पर और क्षय जनित गलग्रन्थियों पर लेप करने के काम आता है।
  • इसकी लकड़ी कड़वी, मूत्रल, शान्तिदायक, पेट के अफारे को मिटाने वाली और कफ निस्सारक है।
  • यह गठिया, सन्धिवात, बवासीर, गुर्दे व मसाने (मूत्राशय) की पथरी, पक्षाघात, गुदभ्रंश रोगों में उपयोगी है।
  • इसका तेल वेदना को दूर करने वाला और ज्वर नाशक हैं यह चोट, रगड़ जोड़ों के दर्द, क्षय जनित ग्रन्थियाँ और चर्मरोगों में उपयोगी है।

देवदार तेल के लाभ :

  • देवदार का तेल वेदनानाशक, व्रणशोधन रोपण है।
  • इसका विशेष प्रयोग कुष्ठ कफ कास (खांसी) तथा चर्मविकारों में किया जाता है।
  • अधिक मात्रा में देने से यह कुष्ठ में लाभ पहुंचाता है।
  • जीर्ण त्वचा विकारों में इसका बाह्याभ्यन्तर प्रयोग किया जाता है।
  • इसके प्रयोग से जीर्ण दुर्गन्धयुक्त व्रण ठीक हो जाते हैं। यह उत्तम कृमिघ्न है।
  • कर्णशूल में यह अधिक लाभदायक है।
  • कफज कास में इसे त्रिकटु एवं यवक्षार के साथ दिया जाता है।
  • पशुओं की खुजली पर भी इसे लगाते हैं।

रोगोपचार में देवदार के फायदे (Benefits of Deodar in Hindi)

1). हाथी पाँव (श्लीपद) में लाभकारी है देवदार का प्रयोग

  • देवदार, चित्रक को गोमूत्र में पीसकर लेप करें।
  • देवदार काष्ठ सार चूर्ण को सरसों के तेल या गोमूत्र के अनुपान से पिलावें।

( और पढ़े – हाथीपाँव रोग के कारण, लक्षण और उपचार )

2). उरूस्तम्भ (जांघ का सुन्न हो जाना) में फायदेमंद देवदार के औषधीय गुण

देवदार को पानी के साथ पीसकर गरमकर पीड़ित स्थान पर लेप करें।

3). सूजन (शोथ) में लाभकारी देवदार

देवदार, हल्दी और गूगल को पानी के साथ पीसकर गरम कर लेप करने से शोथ का शमन होता है।

( और पढ़े – मोच एवं सूजन के घरेलू उपाय )

4). गलगण्ड रोग में देवदार से फायदा

देवदार और इन्द्रायण की जड़ को गरम पानी में पीसकर लेप करने से कफज गलगण्ड में लाभ होता है।

5). पाषाण गर्दभ (दाढ़ सूजने का रोग) रोग दूर करे देवदार

पहले बफारा देकर देवदार, मैनसिल और कूठ को एकत्र मिला जल में पीसकर गरमकर लेप करें।

6). सर दर्द (शिरःशूल) मिटाता है देवदार

देवदार की लकड़ी को पानी के साथ घिसकर कनपटियों पर लेप करने से सिरदर्द में आराम मिलता है। तगर, विल्व, खस, सोंठ को छाछ में देवदार के साथ पीसकर लेप करना भी हितकारी है।

( और पढ़े – सिर दर्द के 41 घरेलू नुस्खे )

7). सन्धिवात में लाभकारी है देवदार का प्रयोग

देवदार, पुनर्नवा और प्रसारिणी को पीस कल्क (चटनी) बना सुखोष्ण लेप करने से सन्धि वात की
पीड़ा मिटती है।

( और पढ़े – गठिया का आयुर्वेदिक उपचार )

8). ग्रन्थि शोथ मिटाता है देवदार

  • क्षय जन्य गलग्रन्थियों पर एवं अन्य शोथ युक्त ग्रथियों पर दोनों हल्दियों के साथ देवदारू को पीसकर थोड़ा गरम कर लेप करें।
  • देवदार वृक्ष के पत्तों को पीसकर गरम कर लेप करना भी इस व्याधि में हितकारी है।

9). चर्म रोग में देवदार से फायदा

देवदार को नीमपत्र में पीसकर लेप करें।

( और पढ़े – चर्म रोग (त्वचा विकार) के कारण और इलाज )

10). ज्वर में देवदार का उपयोग फायदेमंद

  • सामान्य ज्वर – कफ की अधिकता से हुये सामान्य ज्वर में देवदार का क्वाथ लाभप्रद कहा गया है। इससे आम का पाचन होता है। प्रस्वेद (पसीना) आता है, मूत्र का प्रमाण बढ़ता है, कफ कम होता है एवं कफ की दुर्गन्ध मिटती है, ज्वर धीरे-धीरे शान्त होने लगता है।
  • संतत ज्वर – देवदार, कचूर, रास्ना और सोंठ 1-1 भाग और गिलोय दो भाग लेकर यथाविधि क्वाथ तैयार कर उसमें शुद्ध गूगल 2 ग्राम डालकर सेवन करने से संधि गत संतत ज्वर मिटता है।
  • जीर्णज्वर – देवदार, गिलोय और पिप्पली का क्वाथ जीर्णज्वर को मिटाने में श्रेष्ठ कहा गया है।
  • वातज्वर – देवदार, धनियां, कटेरी, सोंठ का क्वाथ बनाकर देवें। या देवदार, गिलोय, एरण्ड, रास्ना, अमलतास, पुनर्नवा समभाग लेकर क्वाथ बना सोंठ मिलाकर सेवन करें।
  • वातकफज ज्वर – देवदार, बड़ी कटेली, चित्रकछाल, सोंठ तथा पुष्करमूल का क्वाथ पिलावें।
  • चातुर्थिक ज्वर – देवदार, हरड़, आंवला, शालपर्णि और सोंठ का क्वाथ मधु व मिश्री मिलाकर दें।
  • विषम ज्वर – देवदार, रास्ना, सोंठ, कुटकी, चिरायता, पित्तपापड़ा, क्वाथ में पिप्पली चूर्ण व शहद मिलाकर देवें।
  • गर्भिणी ज्वर – देवदार, पद्माख, लाल चन्दन, मंजीठ, गिलोय, एरण्ड मूल की छाल का क्वाथ उपयोगी

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11). हृदयरोग में लाभकारी है देवदार का सेवन

देवदार और सोंठ को पीसकर पिलाने से या क्वाथ बनाकर पिलाने से वातज हृदयरोग एवं कफज हृदयरोग मिटते हैं। धड़कन सामान्य होती है।

12). अण्डवृद्धि में देवदार के इस्तेमाल से लाभ

देवदार के क्वाथ में गोमूत्र मिलाकर पिलावें।

13). वक्ष पीड़ा (सीने का दर्द) में देवदार का उपयोग फायदेमंद

देवदार के 2 ग्राम चूर्ण में 5 ग्राम गुड़ मिलाकर घोटकर गोली बनाकर सेवन करें।

14). सूजन (शोथ रोग) मिटाए देवदार का उपयोग

देवदार, पुनर्नवा और सोंठ का चूर्ण दूध में डाल पानी मिला औटाकर दूध मात्र शेष रहने पर इस दूध के सेवन से शोथ मिटने लगता है। जीर्ण शोथ में इस दूध के साथ हरड़ का चूर्ण भी लेवें।

15). हिचकी (हिक्का) में लाभकारी है देवदार का प्रयोग

देवदार का क्वाथ या पिप्पली सोंठ मिलाकर क्वाथ बनाकर पीने से हिक्का में आराम होता है।

16). खांसी (कास) में देवदार का उपयोग लाभदायक

देवदार, कचूर, रास्ना, धमासा और काकड़ासिंगी का समभाग चूर्ण कर तिल तेल व शहद में मिलाकर चाटने से कफज कास मिटती है।

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17). श्वास रोग में देवदार के प्रयोग से लाभ

  • देवदार, बच, भारङ्गी, सोंठ, पोखर मूल और कायफल का क्वाथ सेवन करने से श्वास कास शीघ्र नष्ट होते हैं।
  • देवदार, खरेंटी और बालछड़ समभाग लेकर पानी के साथ घोट पीसकर धूम्रवर्तियां बना लें। इन बत्तियों को घी में भिगोकर धूम्रपान करने से श्वासरोगी को राहत मिलती है।

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18). अजीर्ण में आराम दिलाए देवदार का सेवन

देवदार, वच, नागरमोथा, सोंठ, अतीस और हरड़ का क्वाथ सेवन करने से सब प्रकार के अजीर्ण दूर होते हैं।

19). जलोदर ठीक करे देवदार का प्रयोग

देवदार, संहजने की छाल अथवा तालमखाने की जड़ की छाल और अपामार्ग 6-6 ग्राम लेकर सबको गोमूत्र में पीसकर पिलाने से मूत्र द्वारा दूषित जल निकल जाता है और जलोदर का रोगी आराम महसूस करता है।

20). आध्मान (पेट फूलना) रोग में देवदार के इस्तेमाल से लाभ

देवदार, नागरमोथा, मूर्वा, हल्दी व मुलेठी का चूर्ण 6 ग्राम की मात्रा में लेकर वर्षा जल, वाष्प जल या सामान्य जल पीवें इससे आध्मान मिटता है। उदावर्त जन्य उपद्रवों को भी यह योग शान्त करता है।

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21). मूत्राघात में फायदेमंद देवदार का सेवन

देवदार, नागरमोथा, मूर्वा, हरड़ व मुलेठी मिलाकर 3 से 4 ग्राम चूर्ण दूध या पानी से मूत्राघात में सेवन करें।

22). नेत्र रोग ठीक करे देवदार का प्रयोग

देवदार के चूर्ण को गाय के घी के साथ सेवन करना नेत्र रोगों में लाभदायक है।

23). मोटापा (मेदो रोग) में देवदार के इस्तेमाल से फायदा

मोटापा दूर करने में देवदार + अरणी क्वाथ हितकारी है।

( और पढ़े – मोटापा कम करने के उपाय )

24). मलेरिया में फायदेमंद देवदार का औषधीय गुण

देवदार चूर्ण, चिरायता चूर्ण और कुटकी चूर्ण को 2-2 ग्राम लेकर ऊपर से नीम पत्र स्वरस पीवें।

25). सन्निपात में लाभकारी देवदार

  • सन्धिक सन्निपात – देवदार, सोंठ, गिलोय, रास्ना, विधारा, शतावर व कचूर के क्वाथ में गूगल मिलाकर सेवन करें।
  • रूग्दाह सन्निपात – देवदार, चन्दन, वासा, जायफल, त्रिफला व कमल का क्वाथ पीवें।
  • जिह्वक सन्निपात – देवदार, हल्दी, नीम की छाल, बहेड़ा, हरड़े, सोंठ और गिलोय क्वाथ बनाकर पीवे।

26). स्तन्य दोष में देवदार के इस्तेमाल से लाभ

देवदार, पाठा, सारिवा, चिरायता, मूर्वा, कुटकी, गिलोय, सोंठ, मुस्तक और इन्द्र जौ का क्वाथ दें।

27). शुक्रमेह में लाभकारी है देवदार का प्रयोग

देवदार, कूठ, श्वेत चन्दन, तगर क्वाथ में शहद मिलाकर पिलाने से शुक्रमेह मिटता है।

28). पेट के रोग (उदर रोग) में देवदार के इस्तेमाल से फायदा

देवदार, सैन्धव और गन्धक की भस्म बनाकर 1-2 ग्राम सेवन करने से यकृद् वृद्धि एवं प्लीहा वृद्धि समाप्त होकर उदर रोगों में लाभ मिलता है।

29). कब्ज (विबन्ध) दूर करने में देवदार फायदेमंद

देवदार और हरडे के क्वाथ में से नमक मिलाकर पीने से विबन्ध मिटता है।

30). सूतिका रोग में देवदार का उपयोग लाभदायक

देवदार, नागकेशर, सोंठ और जीरे के चूर्ण को अजवाइन के अर्क के साथ देवें। इससे सूतिका को होने वाले सभी विकारों में शान्ति मिलती है।
(सूतिका = वह स्त्री जिसने अभी हाल में बच्चे को जन्म दिया हो)

31). प्रमेह मिटाए देवदार का उपयोग

देवदारू, लोध्र, शतावरी का चूर्ण कुछ समय लेने से वातज प्रमेह मिटता है।

32). पूयमेह में लाभकारी है देवदार का सेवन

देवदार, चन्दन, शीतल चीनी के चूर्ण में मिश्री मिलाकर सेवन करने से पूयमेह में लाभ होता

33). सायटिका (गृध्रसी) रोग में देवदार से फायदा

  • देवदार और शोभांजन, रास्ना, एरण्डमूल क्वाथ गृध्रसी में उपयोगी कहा गया है।
  • एरण्डमूल क्वाथ गृध्रसी में उपयोगी कहा गया है।

34). साइनस (पीनस) मिटाए देवदार का उपयोग

साइनस में देवदारू और दशमूल का क्वाथ पीना चाहिए।

देवदार से निर्मित आयुर्वेदिक दवा (कल्प) :

क्वाथ –

देवदार, पित्तपापड़ा, भारंगी, नागरमोथा, बच, धनियां, जायफल, कूठ, सोंठ और चिरायता का क्वाथ हींग और मधु मिलाकर लेने से हिक्का, श्वास, गला बैठना, कास, मुख सूखना और मुख से पानी आना और उपद्रवों से युक्त कफ वातज्वर को उसी तरह दूर करता है जैसे वज्र के गिरने से वृक्ष नष्ट होता है। -चक्रदत्त

चूर्ण –

देवदार, खरैटी, रास्ना, त्रिकटु, त्रिफला, पद्माख और वायविडंग एक-एक भाग तथा शक्कर या मिश्री सबके बराबर लेकर चूर्ण बना लें। यह चूर्ण 3 से 4 ग्राम लेकर शहद मिलाकर चाटें इससे सब प्रकार की खांसी दूर होती है।

अरिष्ठ –

देवदार 2 किलो, अडूसे के पत्ते 800 ग्राम, मंजिष्ठा, दन्तीमूल, इन्द्र जौ, तगर, दारूहल्दी, हल्दी, रास्ना, बायविडंग, नागरमोथा, सिरस की छाल, खैर छाल, अर्जुन छाल प्रत्येक 400-400 ग्राम, गिलोय, चित्रक मूल, अजवाइन, रक्तचन्दन, कुटकी, कुटजछाल प्रत्येक 320-320 ग्राम लें। सबको जौकुट कर 82 लीटर जल मिला कर क्वाथ करें। अष्टमांश जल शेष रहने पर उतारकर छान लें। शीतल होने पर शहद 12 किलो, धाय के फूल 640 ग्राम, दाल चीनी, तेजपात, इलायची तीनों मिलाकर 960 ग्राम, सोंठ, मिर्च, पीपल तीनों मिलाकर 80 ग्राम, नागकेशर 80 ग्राम और फूल प्रियंगु 160 ग्राम लेकर मोटा मोटा चूर्ण बनाकर मिला बर्नी में भर मुखमुद्रा करके एक महीने तक संधान के लिए रखें और फिर छान लें।

मात्रा – 10 से 20 मिलि0 बराबर पानी मिलाकर दिन में दो बार भोजन करने के पश्चात् दें।
इसके उपयोग से कठिन वातज प्रमेह, पूयमेह, उपदंश, मूत्रकृच्छ, कुष्ठ, वातव्याधि संग्रहणी, अर्श, प्रदर, गर्भाशय दोष आदि रोग मिटते हैं। यह रक्तशोधक और मूत्रदोष नाशक है। जीर्ण उपदंश और सुजाक के उपद्रवों को नष्ट करता है। यह मलशोधन कर पाचन क्रिया को व्यवस्थित करता है। स्त्रियों के प्रसवोपरान्त होने वाले उपद्रवों में लाभकारी है। -शा0 संहिता

आसव –

देवदार का बुरादा 5 किलो लेकर 52 लीटर जल में पकावें। जब 13 किलो जल शेष रह जाय तब छानकर पात्र में भरकर ठंडा हो जाने पर उसमें शहद 10 किलो शुद्ध गूगल 80 ग्राम, धाय के पुष्पों का चूर्ण 780 ग्राम तथा रास्ना, काकड़ासिंगी, धमासा, त्रिफला, त्रिकटु और बायविडंग प्रत्येक 40-40 ग्राम चूर्ण मिला एक मास तक अच्छी तरह संधान कर रखें। फिर छानकर बोतलों में भर लें।
मात्रा – 10 से 30 मिलि0 तक समभाग गरम जल मिला कर सेवन करने से सब प्रकार की खांसी, श्वास, संधिगत, वात संतत ज्वर आदि में लाभ होता है। -वृ0 आसवारिष्ठ संग्रह

घृत –

देवदार, हल्दी, नागरमोथा, कचूर, पोखरमूल, इन्द्रजौ, पिप्पली, कूठ, लोध्र चव्य और जवासा समभाग (किन्तु देवदार का प्रमाण कुछ अधिक लेना ठीक होता है) एकत्र जौकुट कर एक किलोग्राम लेकर 8 लीटर पानी में चतुर्थांश क्वाथ सिद्धकर छान लें। कल्कार्थ गूगल, सोंठ, सेंधानमक, त्रिफला समभाग 100 ग्राम में पीस उक्त क्वाथ में मिलावें और इसमें एक किलो मक्खन, एक किलो दूध तथा 2 किलो दही मिला पकावें घृत मात्र शेष रहने पर छान कर ठंडा कर उसमें 250 ग्राम खांड मिला लें।
इस घृत को नस्य लेने से सिर दर्द, सिर के अन्य विकार, भू, ललाट एवं शंख प्रदेश की पीड़ा अर्धाव भेदक तथा कर्ण रोग नष्ट होते हैं।

कल्क –

देवदार, गूगल और सोंठ का कल्क गोमूत्र के साथ पीने से सब प्रकार की सूजन दूर होकर रोगी आराम पाता है। -च0 दत्त

लेप –

देवदार, ढाक की छाल, आक की छाल, गजपीपल, सहिजना छाल और असगंध को गोमूत्र में पीसकर पेट पर लेप करने से उदर व्याधियों में लाभ होता है। – च0द0

अंजन –

देवदार के चूर्ण को 21 बार बकरी के मूत्र में घोटकर (21 भावनायें देकर) खूब महीन सुरमा के समान घोटकर सुरक्षित रखें। इसे सलाई से आंजते रहने से पटलगत विकार, रतौंधी आदि नेत्र विकार मिटते हैं। – रा० मार्तण्ड

तेल –

देवदार, वच, सांठ, सोया, कूठ, व सेंधानमक समभाग 50 ग्राम कल्क कर 500 ग्राम तेल व 2 लीटर बकरे का मूत्र मिलाकर पकावें। तेल सिद्ध हो जाने पर कान में डालें इससे कर्णशूल में आराम होता है। -च0सं0

देवदार के दुष्प्रभाव (Deodar ke Nuksan in Hindi)

  • देवदार के सेवन से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श करें ।
  • देवदार को डॉक्टर की सलाह अनुसार ,सटीक खुराक के रूप में समय की सीमित अवधि के लिए लें।

(अस्वीकरण : दवा ,उपाय व नुस्खों को वैद्यकीय सलाहनुसार उपयोग करें)

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