क्षारसूत्र चिकित्सा से भगन्दर का आयुर्वेदिक इलाज | Bhagandar ka Ayurvedic Ilaj in Hindi

भगन्दर रोग क्या है ? : Bhagandar in Hindi

आधुनिक चिकित्सा शास्त्र की अभूतपूर्व प्रगति के बावजूद भगन्दर रोग मरीज़ों के लिए समस्या बना हुआ है । भगन्दर गुदामार्ग में होने वाला एक कठिन साध्य रोग है जो अपनी स्थिति और पुनः उत्पन्न होने के कारण चिकित्सकों को अपयश एवं मरीज़ों को अवसाद की स्थिति प्रदान करता है । यह गुदा मार्ग एवं उसके आसपास में मांसपेशियों में उत्पन्न होने वाला रोग है। आइये जाने bhagandar kaise hota hai .

भगन्दर रोग किन कारणों से होता है ? : Bhagandar Hone ke Karan Kya Hai

भगन्दर के मुख्य कारण है –

  • लम्बे समय तक कब्ज़ का बना रहना ।
  • वक्त बेवक्त भोजन करना ।
  • देर रात तक जागने की आदत ।
  • ज्यादातर तेज़ मसालेदार, चिकनाई युक्त और भारी भोज्य पदार्थों का सेवन करना ।
  • रूखासूखा भोजन करना ।
  • अनियमित आहार विहार करना ।
  • मानसिक चिन्ता व तनाव से ग्रस्त होना ।
  • अति भोग विलास करना ।
  • अपच होना ।
  • अत्यधिक चुस्त कपड़े पहनना ।
  • कृतिम रेशों से बने अंत: वस्त्रों का प्रयोग ।
  • गर्भवती स्त्री में गुदा मुख पर पड़ने वाला गर्भ का दबाव आदि कारणों से उत्पन्न होता है ।

भगन्दर के लक्षण व पहचान : Bhagandar ke Kya Lakshan Hai in Hindi

  1. उपर बताये कारणों से मनुष्यों के गुदामार्ग में व आसपास एक या दो इंच परिधि के स्थान में स्थित मांस एवं रक्त दूषित होकर वहां पर लाल रंग की पीड़िका उत्पन्न होती है । यह पीड़िका सुई चुभने जैसी वेदना करती है ।
  2. चिकित्सा न करने पर यह पीड़िका पक जाती है अर्थात् उसमें मवाद भर जाता है जिससे मरीज़ को बहुत कष्ट होता है ।
  3. योग्य चिकित्सा न होने पर फोड़ा फूट कर रिसता रहता है । इसमें से बार बार मवाद व रक्त आना, दूषित मल, वायु इत्यादि आते हैं।
  4. कभी-कभी फोड़े का मुंह बन्द हो जाता है जिससे पुनः इस फोड़े के अन्दर मवाद, मल इत्यादि भरने लगता है । जब यह मात्रा अपने चरम सीमा पर पहुंच जाती है तो यह फूट कर रिसने लगता है ।
  5. भगन्दर कई बार त्वचा पर अनेक छिद्र लेकर उभरता है तथा इन छिद्रों में से सतत् स्वच्छ नाव या मिश्रित स्राव बहता रहता है ।
  6. भगन्दर के फोड़े में डण्डे से पीटने के समान, किसी धारदार हथियार से काटने जैसी हज़ारों सुइयां एक साथ चुभने जैसी वेदना होती है तथा गुदा मार्ग के फटने का आभास होता है ।
  7. यह प्रमुख रूप से द्विमार्गी होता है । इसका एक छिद्र बाहर गुदामार्ग के नजदीक त्वचा में व अन्दर का छिद्र मलाशय में होता है।
  8. भगन्दर का निदान करते समय भगन्दर बाहरी छिद्र गुदा के मध्य रेखा से ऊपर या नीचे है यह देखना अत्यन्त महत्वपूर्ण है ।
  9. दोनों प्रकार के भगन्दर की चिकित्सा पद्धति अलग अलग है । चिकित्सक को अन्दरूनी व अन्य भगन्दर मार्गों को ज्ञात करना पड़ता है ।
  10. भगन्दर में मलमार्ग संकोचिनी पेशी (Internal &External sphinctor muscules) का सीधा सम्बन्ध भगन्दर के मार्ग से रहता है । दरअसल भगन्दर का निर्माण मुख्यतः गुदा मार्ग के आसपास हुए संक्रमण का गुदा ग्रन्थि में पहुंचने पर होता है ।
  11. अन्य कारणों में गुदा एवं गुदा मार्ग की अव्यवस्थित सफ़ाई अत्यधिक पसीना आना, वृहदआन्त्र शोथ, बवासीर, फिशर, कैन्सर, एड्स आदि रोग प्रमुख हैं ।

भगंदर कितना खतरनाक है ? :

भगन्दर रोग की गंभीरता –

भगन्दर एक सामान्य बीमारी है परन्तु अपनी विकट स्थिति, पुनः उत्पत्ति एवं अत्यधिक पीड़ा के कारण मरीज़ को विकट स्थिति में ला देती है । जीर्ण होने पर या बार-बार ऑपरेशन होने पर इसकी कैन्सर जैसी गम्भीर बीमारी में परिवर्तित होने की सम्भावना बनी रहती है । सामान्यतः भगन्दर उत्पन्न होने पर मरीज़ इस रोग की चिकित्सा करवा कर मुक्ति पाना पसन्द करता है परन्तु बहुधा यही प्रक्रिया बीमारी को जटिल बना देती है तथा रोगी पांच या अधिक बार भी ऑपरेशन कराने के पश्चात भी ठीक नहीं हो पाता है । अन्त में इसे देवीय नियति मान कर पीड़ा को सहन करता रहता है । व्याधि का पुनः उत्पन्न होना, मलमार्ग का छोटा होना, अधिक चौड़ा होना, गुदामार्ग के अन्य रोग जैसे बवासीर, फिशर, जख्म, छाला, हमेशा हाजत होना, मलमार्ग पर नियन्त्रण न होना आदि इस रोग के उपद्रव है।

भगन्दर के दुबारा होने के प्रमुख कारण क्या है ? :

सामान्यतः भगन्दर की पुन: उत्पत्ति के कई कारण हैं । जैसे –

  • इस बीमारी का मुख्य कारण जीर्ण ग्रेनुलेटिंग एपीथेलियल नलिका (Chronic Grannulating apithelial track) बनना है ।
  • गुदामार्ग के ऊपर मलाशय में अन्दरूनी छिद्र के खुलने से भगन्दर के घाव की ड्रेसिंग पूरी नलिका में नहीं हो पाती तथा उसका पुनः निर्माण होता है ।
  • आपरेशन या अन्य चिकित्सा के पश्चात भगन्दर कहीं पर भी आगे बढ़ सकता है । जैसे – त्वचा की ओर, श्रेणीगत अन्य अंग, जैसे मलाशय, मूत्राशय, बड़ी आंत, मांसपेशियां या गर्भाशय (स्त्रियों में ) की ओर ।
  • अत्यधिक मात्रा में संक्रमण का फैलना जिससे मरीज़ का सतत बुखार व अन्य रोग से ग्रस्त रहना ।’
  • भगन्दर में अन्य प्रकार की बीमारी भी छुपी रहती है । जैसे – टी.बी. के कीटाणु, गुप्त रोग (सिफलिस, गनोरिया) कृमि, कैन्सर इत्यादि रोगों का संक्रमण होने पर सामान्यतः इलाज अधूरा रहता है जो रोगों को पुनः उत्पन्न करता है ।
  • भगन्दर रोग ऊपर से गुदामार्ग के बाजू से एक या अनेक छिद्रों वाला या बिना छिद्र का हो सकता है।

इन परिस्थितियों में भगन्दर की पूर्ण शाखाओं (नलिकाओं) का इलाज नहीं हो पाता फलस्वरूप भगन्दर का पुनः उद्भव होता है ।

क्षारसूत्र चिकित्सा क्या है ? : Kshar Sutra Treatment in Hindi

आज आधुनिक चिकित्सा में जब लगभग सभी बीमारियों की सफल शल्य चिकित्सा उपलब्ध है पर भगन्दर लगभग लाइलाज व्याधि मानी जाती है । आयुर्वेदिक क्षारसूत्र चिकित्सा भगन्दर के लिए अत्यन्त उपयुक्त सरल व सस्ती चिकित्सा है । आयुर्वोदक क्षारसूत्र चिकित्सा का प्राचीन समय से ही सुश्रुत संहिता में उल्लेख है । इसी ग्रन्थ के आधार पर इसका सफल एवं परिष्कृत रूप आयुर्वेदिक क्षारसूत्र चिकित्सा है जो भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद (IMRC) द्वारा परिष्कृत एवं पोषित चिकित्सा पद्धति है ।

आयुर्वेदिक क्षारसूत्र विभिन्न वनस्पतियों से निर्मित धागा है । यह धागा एक विशेष प्रक्रिया के अन्तर्गत आयुर्वेदिक वनस्पतियां हल्दी, स्नूही, पपीता, वराटिका, शंख भस्म आदि से निर्मित किया जाता है । यह सूत्र क्षारीय प्रकृति का होता है तथा इसका पी.एच. मान लगभग 10 होता है।

उपरोक्त औषधियां भगन्दर की जीर्ण ग्रेनुलेटिंग एपीथेलियल नलिका को काटना, नष्ट करना एवं जख्म भरना आदि प्रक्रिया सम्पन्न करती है । आइये जाने Kshar Sutra Treatment for Fistula in Hindi

क्षारसूत्र चिकित्सा से भगन्दर का आयुर्वेदिक इलाज : Bhagandar ka Ayurvedic Ilaj in Hindi

आयुर्वोदक क्षारसूत्र एक विशेष प्रक्रिया द्वारा भगन्दर के छिद्र में अन्दर डाल कर गुदा मार्ग से बाहर निकाला जाता है तथा इसको यहां पर बांध दिया जाता है। इसको बांधने के पश्चात यह तुरन्त ही क्रियाशील हो जाता है तथा उसमें लगे द्रव, भगन्दर के जख्म को उपरोक्त प्रक्रिया से भरने लगते हैं । सात दिन में इसके द्रव का प्रभाव कम होने लगता है । इसके लिए सातवें दिन पुनः एक नया क्षारसूत्र पुराने क्षारसूत्र के सिरे से बांध कर बदल दिया जाता है जिससे उपरोक्त प्रभाव भगन्दर समाप्त होने तक बना रहे । इस प्रकार की प्रक्रिया भगन्दर की लम्बाई के अनुसार 5-6 बार अपनाई जाती है ।

प्रत्येक बार क्षारसूत्र भगन्दर का लगभग 1 से.मी. घाव भरता है । धागा बदलने के लिए रोगी को न तो अस्पताल में भर्ती रहना पड़ता है न ही रोज़ रोज़ डेसिंग करवाने की ज़रूरत रहती है।

आयर्वेदिक क्षारसूत्र का उपयोग किसी भी बीमारी में जैसे – मधुमेह, हृदय रोगी, टी.बी. आदि की शरीर में उपस्थिति (कैन्सर होने पर सामान्यतः नहीं की जाती) होने पर भी किया जा सकता है ।

इलाज के दौरान मरीज़ अपना सामान्य कामकाज कर सकता है । आयुर्वेदिक क्षारसूत्र से सभी भगन्दरों का एक साथ इलाज किया जाता है जिससे भगन्दर प्रायः पनः उत्पन्न नहीं हो पाता ।

भगन्दर की चिकित्सा में भगन्दर का मार्ग ज्ञात करना महत्वपूर्ण होता है । भगन्दर कभी स्वतः ठीक होने वाला रोग नही है अतः इसका इलाज ही व्याधि से मुक्ति पाने का मार्ग है ।

आयुर्वेदिक क्षारसूत्र चिकित्सा से मल मार्ग प्राकृतिक स्थिति में रह कर पूर्ण रूप से भगन्दर को ठीक करता है । समय इसमें अवश्य अधिक लगता है परन्तु समय अधिक लगना इस व्याधि को नष्ट करने की प्रक्रिया का एक अंग है।

इस बीमारी से ग्रसित मरीज़ों को चिकित्सा न करवाने तक करने योग्य उपाय प्रस्तुत हैं।

भगन्दर के घरेलू उपाय और सावधानियाँ : Bhagandar ke Gharelu Upay

1). नित्य करें मवाद की सफाई

भगन्दर का त्वचा मार्ग की ओर खुला छिद्र एवं मल मार्ग के मध्य भाग को अपने अंगूठे से दबा कर मवाद प्रतिदिन, नहाने से पहले एवं रात को सोने से पहले निकालना चाहिए ।

2). भगन्दर का छिद्र हमेशा रहे खुला

भगन्दर का त्वचा मार्ग वाला छिद्र हमेशा खुला रहे, इसका ध्यान रखना चाहिए क्योंकि छिद्र बन्द होने की दशा में भगन्दर में अत्यधिक मवाद भरने व भगन्दर के अन्य अंगों की ओर फैलने की सम्भावना अधिक रहती है ।

3). रक्त निकलने पर तुरंत कराये जांच

तेज़ बुखार, पेशाब में जलन, गुदा या भगन्दर के छिद्र से रक्त निकलने पर तुरन्त ही चिकित्सक से जांच करवाना चाहिए ।

4). हरड के सेवन से भगन्दर में लाभ

भगन्दर का निदान होने पर पंचसकार चूर्ण, इसबगोल की भूसी,स्वादिष्ट विरेचन चूर्ण, गन्धर्व हरितकी के चूर्णों में से किसी एक चूर्ण का सेवन 2-3 चम्मच कुनकुने पानी के साथ रात में सोते समय करना चाहिए ।

( और पढ़े – हरड़ के फायदे और नुकसान )

5). जात्यादि तैल का उपयोग है फायदेमंद

जात्यादि तैल/ व्रणरोपण तैल को गुदामार्ग व भगन्दर के बाहरी छिद्र में 3-5 मि.लि अन्दर डालना चाहिए । इससे अन्दर के खराब तत्व नष्ट होकर बाहर निकल जाते हैं ।

6). भगन्दर में आरोग्य वर्द्धिनी का उपयोग है लाभदायक

त्रिफला गुग्गुल एवं आरोग्य वर्द्धिनी (सामान्य) वटी का प्रयोग 2-2 गोली दिन में दो बार करना चाहिए ।

( और पढ़े – आरोग्यवर्धिनी वटी के फायदे और उपयोग विधि )

7). लाभकारी है कुनकुने पानी का प्रयोग

हफ्ते में कम से कम तीन बार कुनकुने पानी में आधा घण्टे तक बैठना चाहिए ।

8). वेदना शान्त करने में हल्दी करता है मदद

अत्यधिक मवाद भर जाने पर उसे धारदार पदार्थ से फोड़ने का प्रयत्न न करें । किसी भी अनाज के आटे में थोड़ी हल्दी मिला कर उसका लेप वहां पर लगाने से भगन्दर का मुंह फूट जाता है व वेदना शान्त हो जाती है ।

( और पढ़े – हल्दी के 51 लाजवाब फायदे )

9). शौच के नियम

शौच के लिए दो मिनिट से ज्यादा नहीं बैठना चाहिए ।

10). बरतें सावधानी

मल त्यागते समय गुदामार्ग में ज़ोर नहीं लगाना चाहिए ।

11). भगन्दर में इनका सेवन न करें

बैंगन. भिण्डी, टमाटर, मैदा की चीज़, मांस, मटन, तला, तीखा,तेज़ मसालेदार पदार्थ, भूख से ज्यादा, दारू, गांजा, भांग आदि का सेवन नहीं करना चाहिए ।

( और पढ़े – भगन्दर के देसी उपाय और नुस्खे  )

12). भगन्दर में इनका सेवन करना चाहिये

कदू, तुरई, गिल्की, छोटा परवल, सूरण, मूली, ककड़ी, मूंग, चना (उबले), पानी व भाप से उबली चीजें, हरी सब्ज़ियां और भरपूर पानी लेना चाहिए ।

13). सीवन पर दबाव कम करता है दर्द एवं सूजन

गुदा मार्ग एवं मूत्र मार्ग के बीच की सीवन को दिन में कम से कम 4-5 बार एक से डेढ़ मिनिट दबा कर रखें इससे आपको दर्द एवं सूजन में राहत मिलेगी।

14). मलमार्ग की मांसपेशियों के लिए लाभकारी प्रयोग

मलमार्ग की मांसपेशियों को स्वतः फैलाना एवं सिकोड़ना दिन में चार या पांच बार 3 से 4 मिनिट तक करें । इससे मल मार्ग से मल निरसरण नियमित एवं सरल होगा ।

15). मनस्ताप से बचें

मानसिक शान्ति आपके स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है अतः यथा सम्भव मनस्ताप से बचें ।

16). भगन्दर में लाभकारी आसन

योगमुद्रा, पश्चिमोत्तानासन, मकरासन, हलासन, सर्वांगासन, अग्निसार क्रिया और मूलबन्ध से भगन्दर रोग में आराम मिलता है।