दिव्य औषधि कूठ के अनोखे फायदे – Kuth ke Fayde in Hindi

कूठ या कुष्ठ क्या है ? (What is Kuth in Hindi)

आयुर्वेदीय चिकित्सा में कूठ अति प्राचीनकाल से एक उपयोगी औषधि के रूप में प्रयुक्त होता आ रहा है। अथर्ववेद में कूठ विषयक सामग्री बहुतायत से उपलब्ध होती है। इसमें कूठ की उत्पत्ति प्रयोगादि का विस्तृत वर्णन हुआ है। हिमालय स्थित अमृत सरोवर इसका उत्पत्ति स्थान कहा गया है।

शरीरस्थ सप्तधातुओं में अन्तिम तथा मुख्य धातु शुक्र है। यह शुक्रवहस्रोतस में शुक्राग्नि की क्रिया से उत्पन्न होता है। शुक्रवहस्रोतसों का मूल उत्पत्ति स्थान वृषण है और प्रकाशस्थान शिश्न है। शुक्र का प्रमुख कार्य प्रजोत्पादन है। वातदोष, पित्तदोष, कफदोष आदि के संसर्ग से इसमें विकृति सम्भव है। इन विकृतियों के कारण शुक्र से प्रजोत्पादन का कार्य नहीं हो पाता है। भगवान चरक ने इन विकृतियों को नष्ट करने में कूठ नामक औषधि द्रव्य की उपादेयता प्रकट की है। कूठ शुक्रशोधन द्रव्य होने से अशुद्ध शुक्र का शोधन कर उसे प्रजोत्पादन में समर्थ बनाता है।

यह वातकफ शामक होने से मुख्यतया वात कफजन्य विकृति को दूर करता है। यह शुक्रल (शुक्रवर्धक) होने से अल्पशुक्र को भी बढ़ाता है। शुक्रशोधन के अतिरिक्त भगवान् चरक ने इसे लेखनीय तथा आस्थापनोपग भी कहा है।

महर्षि सुश्रुत ने इसे एलादिगण में लिखा है। ऐसा ही वर्णन आचार्य वाग्भट ने भी किया है। प्राकृतिक वर्गीकरण के अनुसर यह भृंगराज कुल (कम्पोजिटी Compositae) की औषधि है।

कूठ का विभिन्न भाषाओं में नाम (Name of Kuth in Different Languages)

Kuth in –

  • हिन्दी (Hindi) – कूठ।
  • गुजराती (Gujarati) – कुडु, उपलेट, कूठ।
  • मराठी (Marathi) – कुष्ठ।
  • बंगाली (Bangali) – कूड़।
  • पंजाबी (Punjabi) – कूठ।
  • राजस्थानी (Rajasthani) – कूठ।
  • तामिल (Tamil) – कोष्टम्।
  • तेलगु (Telugu) – कुष्ठम्।
  • मलयालम (Malayalam) – सेयुड्डी।
  • कन्नड़ (kannada) – कोष्ठ।
  • फ़ारसी (Farsi) – कुस्त-इ-तल्ख।
  • अरबी (Arbi) – कुस्ते
  • अंग्रेजी (English) – कॉस्टस (Costus)
  • लैटिन (Latin) – सासुरिया लैप्पा (Saussurea Lappa)

कूठ का पौधा कहां पाया या उगाया जाता है ? :

कूठ आठ से बारह हजार फीट की ऊंचाई पर हिमालय पर पाया जाता है । कश्मीर इसका मुख्य उत्पत्ति स्थन होने से ही इसका पर्याय काश्मीर कहा गया है।

कूठ का पौधा कैसा होता है :

  • कूठ का पौधा – कूठ का बहुवर्षायु क्षुप 6 से 7 फुट ऊँचा होता है। इसका तना (काण्ड) सीधा एवं मूल की ओर प्राय: कनिष्टिका अंगुलि के समान स्थूल, दृढ़ एवं सूत्रमय होता है।
  • कूठ के पत्ते – कूठ के पत्र दण्ड 2-3 फीट लम्बा तथा पत्र खण्डित, त्रिकोणाकार, दंतुर, ऊर्ध्व पृष्ठ में खुरदरे, निम्न पृष्ठ कुछ स्निग्ध, तीक्ष्ण नोंकदार 7 इंच लम्बे और 8 इंच चौड़े होतेहै।
  • कूठ के फूल – कूठ पुष्प मुण्डक प्रायः गोलाकार 1-2 इंच व्यास के दंडरहित, बहुत कठोर होते हैं, जिसमें गहरे नीले, बैंगनी या कृष्णाभ, पुष्प होते हैं।
  • कूठ के फल – कूठ के फल लम्बे, चपटे और मुड़े हुए होते हैं।
  • कूठ जी जड़ – कूठ मूल-स्थूल और बहुवर्षायु होता है। प्रतिवर्ष शीतकाल में वायव्य भाग नष्ट हो जाता है और बसन्त में जब बर्फ पिघल जाती है, तब नया पौधा उगता है। शरदऋतु में पुष्प और फल आते हैं, उसी समय इसके मूल का संग्रह करते हैं। मूल मोटे एवं विशिष्ट गन्ध युक्त होते हैं।

कूठ के प्रकार :

यद्यपि आयुर्वेद में इसके किसी प्रकार के भेदों का वर्णन उपलबध नहीं होता किन्तु यूनानी ग्रन्थों में इसके भेदों का वर्णन मिलता है। आयुर्वेदीय विश्वकोषकार हकीम श्री दलजीतसिंह के एक लेख में “कुस्ते अरबी”, “कुस्ते रूमी”, कुस्ते शामी” और “कुस्ते हिन्दी” नाम से कूठ के चार भेदों का वर्णन मिलता है। कुस्ते अरबी को कुस्ते बहरी भी कहा गया है।

आयुर्वेदाचार्यों के मत में कूठ के दो प्रकार बताए गये हैं – मधुर और तिक्त।

कूठ का उपयोगी भाग (Beneficial Part of Kuth Plant in Hindi)

प्रयोज्य अङ्ग – मूल।

संग्रह विधि – तीन से पांच वर्ष के पौधों के मूल का संग्रह अक्टूबर में करते हैं। उसको सुखाकर चार इंच लम्बे टुकड़े काट कर पुनः धूप में सुखाते हैं। सूख जाने पर संग्रह कर रख लिया जाता है। इनका संग्रह पुष्प पक जाने पर कर लिया जाता है । सूखे हुये टुकड़ों को बोरियों में बांध कर रगड़ने से जड़ें टूट जाती हैं ओर मिट्टी भी – पृथक् हो जाती है। इसके बाद इसे धान्य राशि में दबा देते हैं। 3-4 महीनों के बाद इसमें मनभावन सुगन्ध निकलने लगती है।

कूठ के औषधीय गुण (Kuth ke Gun in Hindi)

  • रस – तिक्त, कटु, मधुर।
  • गुण – लघु, रूक्ष, तीक्ष्ण।
  • वीर्य – उष्ण।
  • विपाक – कटु।
  • दोषकर्म – यह कफ वात व शामक है।
  • व्याधि – मानसविकार नाशक।
  • पाचक – अपक्वव्रण पाचक।

सेवन की मात्रा :

250 मि.ग्रा. से 1 गाम।

रासायनिक संघठन :

  • कूठ के मूल में रेजिनाइड 6 प्रतिशत, तीक्ष्ण सुगन्धित तैल 1.5 प्रतिशत, सासुरिन (Saussurine) नामक क्षाराभ 0.05 प्रतिशत, टेनिन, इन्युलिन 18 प्रतिशत, एक स्थिर तैल एवं शर्करा आदि होते हैं।
  • इसके पत्र में किंचित् क्षाराभ तथा टैरेक्सोस्टिराल होता है।

कूठ का औषधीय उपयोग (Medicinal Uses of Kuth in Hindi)

आयुर्वेदिक मतानुसार कूठ के गुण और उपयोग –

  • वात रोगों की कूठ श्रेष्ठ औषधि है। महर्षि सुश्रुत ने चिकित्सा स्थान अध्याय चार में वात रोगों की जो संक्षिप्त चिकित्सा कही है उसमें कूठ को भी उपयोगी कहा है। वायु के साथ कफ का संसर्ग होने पर यह विशेष उपयोगी है।
  • ऊरुस्तम्भ में चिकित्सा जनित रूक्षता को दूर करने के लिए कूठ, श्रीवेष्टकादि द्रव्यों से सिद्ध तैल को मधु के साथ पीने का निर्देश दिया गया है।
  • कूठ ज्वरघ्न होने से ज्वर में भी उपयोगी कहा है। ज्वर विनाशार्थ धूम्रयोगों में इसकी उपादेयता प्रकट की गई है।
  • रक्त शोधक होने से कूठ, उपदंश, वातरक्त आदि रक्तविकारों में भी यह लाभप्रद कहा गया है।
  • व्रणशोधनार्थ उपयोगी प्रयोगों में कूठ की योजना की गई है।
  • स्थौल्य रोग (मोटापा) में शैलेयादि उद्वर्त्तन (भै. र.) कहा गया है उसमें भी कूठ है।
  • शुक्रशोधन के अतिरिक्त वृष्य (जिससे वीर्य और बल बढ़ता है) प्रयोगों में भी कूठ की संयोजना की गई है।
  • कूठ गर्भाशयोत्तेजक व आर्त्तवजनन होने से स्त्रियों की रजः कृच्छ्रता का निवारण करता है। स्तन्य शुद्धि हेतु भी इसकी उपादेयता है।
  • कूठ बल्य रसायन होने से दौर्बल्य को भी दूर करने में सहायक सिद्ध हुआ है।
  • मुख की दुर्गन्ध को दूर करने के लिए श्री भोजराज ने कुष्ठादिवटी कही है।
  • सूर्यावर्त और अर्धावभेदक में शिरोलेप जो कहा है, इसमें कुष्ठ भी है।
  • स्तनों को स्थूल बनाने हेतु भी कूठ उपयोगी कहा गया है।
  • आचार्य शाङ्गधर ने जो मरिचादि लेप कहा है, उसमें भी कुष्ठ का उल्लेख किया है।
  • बाल रोगों में भी कूठ अतीव उपयोगी है।

यूनानी मतानुसार कूठ के गुण और उपयोग –

  • यूनानी मत से कूठ तीसरे दर्जे में गरम और खुश्क है।
  • यह तिक्त, उष्ण है। इसके अभ्यङ्ग से पक्षवध और कम्पवात का नाश होता है। यह सान्द्र और पिच्छिल दोषों का छेदन करता है। अपनी उष्णता एवं तीक्ष्णता तथा आकर्षणकारी शक्ति से गृध्रसी के समान प्रत्येक ऐसे रोग में कूठ लाभप्रद है जिसमें शरीर के गम्भीर तथा आन्तरिक भागों से बाहर की ओर दोषों के आकर्षण की आवश्यकता होती है।
  • कूठ मूत्र और आर्तव का बलात् प्रवर्तन करता है।
  • तिक्त होने से कूठ स्फीत कृमियों को भी नष्ट करता है।
  • यह कामोद्दीपक है।
  • कूठ मांसपेशी शूल को नष्ट करता है।
  • आमवात, स्रावरोध एवं संक्रामक रोगों में कूठ की धूनी लाभप्रद है।
  • व्यंग, नीलिका आदि त्वचा रोगों में कूठ का अभ्यङ्ग (मालिश) लाभप्रद है।
  • यह संग्राही और मनोल्लासकारी वातनुलोमक है।
  • कूठ आमाशय और हृदय को शक्ति प्रदान करता है।
  • यह उत्तमांगों को बलप्रद है।

रोगोपचार में कूठ के फायदे (Benefits of Kuth in Hindi)

1). देहदौर्गन्ध्य –

  • कूठ, धनियां, मुलहठी, एलुवा और नागरमोथा का चूर्ण सेवन करें।
  • कुष्ठ, इलायची का चूर्ण सेवन करें।

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2). शुक्रमेह (वीर्य क्षय होने का एक रोग) – कूठ, देवदारु, अगर और चन्दन का क्वाथ मधु के साथ सेवन करें।

3). तालुकंटक (बच्चों के तालु का एक रोग) – कूठ, हरीतकी और बच को माता के दूध में घिसकर मधु के साथ सेवन कराने से बालकों का तालुकंटक नष्ट होता है।

4). पेट दर्द (उदरशूल) – कूठ, चित्रक, हींग, यवक्षार और सेंधा नमक का चूर्ण बनाकर बिजौरे नीबू के रस में चाटें। ( और पढ़े – पेट दर्द का घरेलू उपचार )

5). कुचशैथिल्य – कूठ चूर्ण को घृत एवं मधु के साथ कुछ समय सेवन करें।

6). रजःकृच्छ्रता –

  • कूठ का क्वाथ बनाकर सेवन करें।
  • कूठ चूर्ण में कपूर 500 मि.ग्रा. मिलाकर मधु के साथ 10-15 दिन तक सेवन करें।

7). खांसी – कूठ चूर्ण को मधु के साथ दिन में 3-4 बार सेवन करें। ( और पढ़े – खांसी दूर करने के 191 घरेलू  नुस्खे )

8). श्वास – कूठ चूर्ण को घृत, मधु या नीम क्वाथ से सेवन करें।

9). प्लीहोदर (प्लीहा का बढ़ना) – कूठ, वच, अदरख, चित्रक, इन्द्रयव, पाठा, अजमोद तथा पीपल का समभाग चूर्ण उष्ण जल से सेवन करें।

10). अरुचि (अरोचक) – कूठ, सौवर्चल नमक, सफेद जीरा, शर्करा, कालीमिर्च, विडलवण का चूर्ण मुख में धारण कर चूसें।

11). थकान (तन्द्रा) – कूठ के छोटे टुकड़े कर पान में रखकर चबायें। ( और पढ़े – सुस्ती थकान दूर करने के आसान उपाय )

12). उदावर्त (आँत का एक रोग) – कूठ, बचा, अतीस, यवक्षार, हरीतकी, पिप्पली और अग्निमंथ का चूर्ण उष्ण जल से सेवन करें।

13). मिर्गी (अपस्मार) – कूठ और वचा चूर्ण मधु के साथ 4-5 माह तक सेवन करें।

14). कमजोरी (दौर्बल्य) – कूठ चूर्ण घृत, मधु से प्रातः सेवन करें। ( और पढ़े – शरीर की कमजोरी दूर कर बलवर्धक चमत्कारी नुस्खे )

15). अधीक प्यास लगना (तृष्णा) –

  • कूठ, धान का लावा, कमलगट्टा, बड़ की कोमल जटा और मुलहठी को शहद में मिलाकर गोली बनाकर चूसें।
  • कूठ, कास की जड़ और मुलहठी के चूर्ण को जल के साथ सेवन करें।

16). प्रमेह (थोड़ी थोडी देर पर पेशाब होना) – कूठ, सफेद जीरा और गुड़ 10-10 ग्राम लेकर कूट-पीसकर 1-1 ग्राम की गोलियां बनावें। दिन मे 1-1 गोली ठंडे जल से सेवन करें।

17). चूहे का जहर – कूठ, वचा, मैनफल, कड़वी तोरई का फल समभाग लेकर चूर्ण बनाकर गोमूत्र के साथ सेवन करें।

18). अतिसार – कूठ, पाठा, वच, नागरमोथा, चित्रक का समभाग चूर्ण बनाकर सेवन करें।

19). वात रोग – कूठ, इन्द्रजौ, पाठा, चित्रक, अतीस और हरिद्रा का चूर्ण उष्ण जल के साथ सेवन करें। ( और पढ़े – वात रोग का आयुर्वेदिक इलाज )

20). पसली का दर्द – कूठ चूर्ण को मधु के साथ सेवन करें।

21). कृमिरोग – कूठ चूर्ण को जल के साथ सेवन करें।

22). आमाशय शूल – कूठ क्वाथ में शर्करा मिलाकर सेवन करें।

23). हिचकी – कूठ और राल का धुंआ पीने से हिक्का दूर होती है।

24). आमवात – कूठ चूर्ण को एरण्ड तैल के साथ सेवन करें।

25). अतत्वाभिनवेश – कूठ, ब्राह्मी, बचा और शतावरी चूर्ण को मधु के साथ कुछ समय सेवन करें।

कूठ से निर्मित आयुर्वेदिक दवा (कल्प) :

कुष्ठादि क्वाथ-

कूठ, कशेरू, देवदारु, त्रिफला, हल्दी, दारू हल्दी, अर्जुन की छाल, सफेद चन्दन, शेवार, दूर्वा, अगर और वरियरा (बला) के मूल का क्वाथ मिश्री मिलाकर लेने से शुक्रमेह दूर होता है। यह चूर्ण ही सारस्वत चूर्ण के नाम से प्रसिद्ध है।

कुष्ठादि वटी –

कूठ, बबूला, कमल, जावित्री, जायफल इन सबको समभाग लेकर चूर्ण बना लें इसकी । जल के संग गोलियां बनाकर मुख में धारण करने से मुख की दुर्गन्ध नष्ट होती है। – राज मार्तण्ड

कुष्ठादि तैल-

कूठ, बेलगिरी, पिप्पली, सोंठ, मुनक्का प्रत्येक 12-12 ग्राम लेकर तिल तैल में पाक करें। परिपाक होने पर छानकर रख लें। इस तैल की नस्य लेने से अधिक छीकों का आना (क्षवथु रोग) दूर होता है। – शाङ्ग संहिता।

कुष्ठादि उद्वर्तन (उबटन) –

कूठ, हल्दी, दारुहल्दी, तुलसी, पटोलपत्र, नीम की छाल, असगन्ध, देवदारु, सहिजन की छाल, सरसों के बीज, धनियां, नेपाली धनियां, केवटी मोथा, चोरपुष्पी तथा दूब इनको सम मात्रा में ग्रहण कर छाछ के साथ पीस लेना चाहिये। कुष्ठ रोगी के शरीर पर पहले सरसों के तेल की मालिश कराकर फिर इस पिसे हुये कल्क का उद्वर्तन करना चाहिये। इससे खुजली, फुन्सियाँ, ददोड़े, कुष्ठ तथा शोथ आदि रोग दूर होते हैं। -चक्रदत्त

कुष्ठादि धूप –

कूठ, तालीसपत्र, खेरसार, सफेद चन्दन, देवदार धूल, बच, हींग, जंगली, कदम्ब का पुष्प, बड़ी इलायची, श्वेत सरसों, सम्भालू के बीज और घी इन सबको आग में छोड़कर धुवां शरीर पर लगाने से पूतनाग्रहजुष्ट बालक के कष्टों का निवारण होता है। – चिकित्सादर्श

कूठ के दुष्प्रभाव (Kuth ke Nuksan in Hindi)

  • कूठ के सेवन से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श करें ।
  • कूठ नाभि के नीचे का भाग (वस्ति) तथा फेफड़ों (फुफ्फुसों) के लिये कुछ हानिप्रद है।

दोषों को दूर करने के लिए : इसके दोषों को दूर करने के लिए गुलकन्द का उपयोग लाभप्रद है । खत्मी एवं खुरासानी अजवायन को भी दर्पघ्न कहा गया है।

(अस्वीकरण : दवा ,उपाय व नुस्खों को वैद्यकीय सलाहनुसार उपयोग करें)

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