Mainfal ke Fayde | मैनफल के फायदे ,गुण ,उपयोग और नुकसान

मैनफल क्या है ? : What is Emetic Nut (Mainfal) in Hindi

आयुर्वेद के प्रकाण्ड पंडित श्रीयुत शिवचरण जी ध्यानी ने अपने द्रव्यगुण सिद्धान्त नामक कृति के आमुख में एक बहुत महत्वपूर्ण बात लिखी है कि-“भेषज की सफलता का मापदण्ड मात्र आशुकारित्व नहीं निरूपद्रुत्व भी है मात्र लक्षणोपशमन नहीं, अपितु व्याधि का समूलोच्छेदन भी है और इस दृष्टि से द्रव्यगुण शास्त्र को और आयुर्वेदीय भेषज को जीवित रहने का अधिकार है। व्याधि के समूलोच्छेदन के लिए आयुर्वेदोक्त पंचकर्म का विशेष महत्व है। आधुनिक काल में पंचकर्म को पुनः विशेष महत्व दिया जाने लगा है जो बहुत काल तक उपेक्षित सा रहा। बहुत से शिक्षण संस्थानों में, चिकित्सा केन्द्रों में इस पर व्यापाक विचार विमर्श हुआ है और इस पर प्रायोगिक कार्य हुआ है जिसके परिणाम सुखद एवं उत्साहवर्धक रहे हैं।

इस पंचकर्म का प्रथम कर्म वमन है। ऊर्ध्वभाग (मुख) से दोषों को बाहर निकालने की प्रक्रिया वमन नाम से जानी जाती है। इस हेतु बहुत से उपयोगी द्रव्यों में मैनफल (मदनफल) की विशेष महत्ता प्रदर्शित की गई है। श्लेष्महरण उपायों में वमन को श्रेष्ठ कहा गया है। “वमन श्लेष्महराणां श्रेष्ठम् (च०सू० 25)। श्लेष्मा को ही नहीं अपितु अपक्व पित्त एवं दूषित अन्न को भी बाहर निकालने के लिए वमन को अपनाया जाता रहा है। आचार्य शार्ङ्गधर कहते हैं-

अपक्वपित्तश्लेष्मान्नचयमूर्ध्वं नयेत्तु यत्।
वमनं तद्धि विज्ञेयं मदनस्य फलं यथा।।

भगवान् चरक ने सू० स्वा० अ० प्रथम में फलिनी द्रव्यों में से वमन एवं आस्थापन हेतु प्रयुक्त होने वाले द्रव्यों में मैनफल (मदनफल) का उल्लेख किया है। द्वितीय अध्याय
में वमनार्थ मैनफल की प्राथमिकता व्यक्त की है। महर्षि सुश्रुत ने उर्ध्वभगहर, आरग्वधादि एवं मुष्कादि गण के अन्तर्गत मैनफल की गणना की है। अष्टांग हृदयकार ने भी मैनफल को वमन एवं निरूहण द्रव्यों में प्राथमिकता दी है। प्राकृतिक वर्गीकरण के अनुसार मैनफल मंजिष्टाकुल (रूबिएसी) की वनौषधि है। भावप्रकाश निघन्टु के हरीतक्यादि वर्ग में इसका वर्णन मिलता है।

मैनफल का विभिन्न भाषाओं में नाम : Name of Emetic Nut (Mainfal) in Different Languages

Emetic Nut (Mainfal) in –

  • संस्कृत (Sanskrit) – मदन, छर्दन, राठ, शल्यक, पिंडीतक, विष पुष्पक, गोलफल आदि।
  • हिन्दी (Hindi) – मैनफल, मदनफल
  • गुजराती (Gujarati) – मींढल, ढोल, ढील
  • मराठी (Marathi) – गेलफल
  • तामिल (Tamil) – मरूक्कालम्
  • तेलगु (Telugu) – मंगरी, मंगचेटू
  • बंगाली (Bangali) – मयनफल, मथना
  • मलयालम (Malayalam) – कर
  • उडिया (Udiya) – पोटबाफल, पातर
  • अरबी (Arbi) – जोजुलकै
  • फ़ारसी (Farsi) – जोजुलकै
  • अंग्रेजी (English) – इमेटिक नट (Emetic Nut) बुशी गार्डेनिया (Bushy Gardenia)
  • लैटिन (Latin) – रैण्डिया डुमेटोरियम् (Randia Dumetorium)

मैनफल का पेड़ कहां पाया या उगाया जाता है ? : Where is Mainfal Tree Found or Grown?

मैनफल का पेड़ हिमालय के नीचे की पहाड़ियों में जम्मु से लेकर सिक्किम तक और सिंध, कूच विहार, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में पाया जाता है। सहारनपुर व दून के जंगलों में भी यह पाया जाता है।

मैनफल का पौधा (पेड़) कैसा होता है ? :

  • मैनफल का वृक्ष – मैनफल का छोटा वृक्ष या गुल्म (मध्यम आकार का) झाडीदार और कंटकयुक्त होता है। इसकी ऊँचाई लगभग 15 फुट से 30 फुट तक रहती है। तने की मोटाई 22 फुट होती है। शाखायें छोटी, श्वेत और कांटेदार होती हैं। ये बहुत सरलता से टूट जाती हैं।
  • मैनफल के पत्ते – पत्र अंडाकार, अपामार्ग के पत्तों के समान गोल होते हैं। इन पर अक्षदेश में दोनों और लंबे और तीक्ष्ण कांटे होते है। एक से दो इंच लंबे रहते हैं। एक शाखा में 6 से 10 जोड़ पत्ते के निकलते हैं।
  • मैनफल का फूल – पुष्प श्वेत या पीताभ रहते हैं, एक या कभी-कभी दो लगते हैं। पुष्प सुगंधी,चमेली के आकार के होते हैं।
  • मैनफल का फल – फल एक-डेढ़ इंच लम्बा गोल या अण्डाकार, प्रायः धारयुक्त और पकने पर पीला होता है। ये धारियां लंबाई में रहती हैं। इसके भीतर दूसरा आवरण रहता है और बड़ी इलायची के जैसे सैकड़ों वीज अन्दर भरे रहते हैं। फलमज्जा मधुर और तिक्त होती है। जिसके अन्दर अखरोट जैसा गोला रहता है। इसको तोड़ने पर कृष्णवर्ण बीज के चार खंड निकलते हैं। जिन्हें मदनफल पिप्पली कहते हैं। इस पर ग्रीष्म ऋतु में पुष्प आते हैं और शीतकाल में फल आते हैं।

मैनफल का रासायनिक विश्लेषण : Mainfal Chemical Constituents

  • मैनफल में सेपोनिन (Saponin) नामक तत्व होता है जो ताजे फल में 2-3 प्रतिशत और सूखे फल में दस प्रतिशत तक होता है।
  • इसके अतिरिक्त एक ट्राइटपीन, अम्लराल और हलका पीला सुगन्धित तैल होता है।
  • फल की आभ्यन्तर मज्जा में टैनिन 5 प्रतिशत होता है इस टैनिक के कारण फल का स्वाद कषाय होता है। फलमज्जा में प्रोटीन, शर्करा, अन्य कार्बोहाइड्रेट और अम्ल होते हैं।
  • बीजों में तैल, प्रोटीन, म्युसिलेज, राल और एक क्षाराभ होता है। सैपोनिन प्रायः नहीं होता।
  • तैल (Randia Oil) मक्खन के समान, पीताभ हरित होता है।
  • पुष्पों में भी एक सुगन्धित तैल पाया जाता है।

मैनफल के औषधीय गुण : Mainfal ke Gun in Hindi

  • रस – कषाय, मधुर, तिक्त, कटु
  • गुण – लघु, रूक्ष
  • वीर्य – उष्ण
  • विपाक – कटु
  • प्रभाव – वमन
  • दोषकर्म – कफवात शामक (उष्णवीर्य होने से) कफपित्त शोधन (वामक होने से कफपित्त का संशोधन भी करता है।)

मैनफल वृक्ष का उपयोगी भाग : Beneficial Part of Mainfal Tree in Hindi

  • फल (कुछ अर्वाचीन विद्वान इसके केवल गूदे को ही वामक मानते हैं बीज एवं फल की छाल को नहीं, वस्तुतः इसका पूरा फल वामक होता है।)
  • चरक के मत से पक्व मैनफल एवं सुश्रुत के मत से इसके फूल, शलाटु व बीज वांतिकर हैं। इसका प्रतिनिधि राई और नूरये अरमनी है।

सेवन की मात्रा :

सामान्यतः – 1 से 2 ग्राम
वमन हेतु – 3 से 6 ग्राम

अनुपान :

विविध त्रिदोषज विकारों में मैनफल के साथ यथावश्यक इन अनुपानों को उपयोग में लावें

  1. वातविकार – सुरा, सौवीरक, फलाम्ल, दध्यम्ल आदि।
  2. पित्त विकार – अंगुर, आँवला, मधु, यष्टीमधु, फालसा, दूध आदि।
  3. कफविकार – मधु, गोमूत्र एवं अन्य कफघ्न कषाय।

संग्रह विधि:

चरक संहिता के कल्पस्थान अध्याय एक में इसकी विशेष संग्रह विधि का वर्णन इस प्रकार किया गया है-वसन्त और ग्रीष्म ऋतु के मध्य में पुष्य,अश्विनी या मृगशिरा नक्षत्र में मदनफल के पके हुए पीताभ, मध्यम प्रमाण के तथा जन्तुओं से रहित फल ग्रहण करें।

इन फलों को कुशपुट में बांधकर, गोबर से लीप आठ दिनों तक यव, उड़द, मूंग, कुलथी, धान आदि के भुसे या पुआल में रख दें। तदन्तर जब ये मृदु एवं मधु गन्धि हो जायें तब निकालकर सुखा दें और सुख जाने पर बीज पिण्डों को निकाल लें। फिर इन्हें घी, दही, मधु और तिल कल्क में घोटकर पुनः सुखा लें। इस प्रकार प्रस्तुत चूर्ण को नये शुद्ध पात्र में सुरक्षित रखें। आवश्यकता पड़ने पर इसे उपयोग में लावें।

मैनफल का उपयोग : Uses of Mainfal in Hindi

वमन पंचकर्म का प्रथम प्रधान कर्म है। आमाशय के दोषों को मुखमार्ग से निकालने की क्रिया को वमन कहते हैं। वमनार्थ प्रयुक्त होने वाले द्रव्यों में मैनफल को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है “वमनद्रव्याणां मदनफलानि श्रेष्ठतमान्याचक्षते, – अनपायित्वात्“।

वमन हेतु मैनफल के कई योग कहे गये हैं। सामान्यतया यह योग बहुत लाभदायक है-

मदनफल चार भाग, वचा दो भाग, सैन्धव एक भाग एकत्र मिलाकर अच्छी तरह मर्दन कर रखें। इस चूर्ण को 6 ग्राम से 12 ग्राम में पर्याप्त मधु के साथ संमिश्रित कर रखें और आवश्यकता पड़ने पर उपयोग में लावें।

चरक सुश्रुत वाग्भट संहिताओं के आधर से निम्नांकित रोगो में वमन उपयोगी है –
पीनस, कुष्ठ, नवज्वर, राजयक्ष्मा, कास (खाँसी), श्वास, गलग्रह, श्लीपद, गलगंड, प्रमेह, मन्दाग्नि, विरुद्धजीर्ण, विषूचिका, अलसक, विषपीत, विषदष्ट, अधोगरक्तपित्त, अर्श, अरुचि, अपची, अपस्मार, उन्माद, अतिसार, शोथ, पाण्डु, मुखपाक, स्तन्यदुष्टि, मेदोरोग (मोटापा), हृद्रोग, विसर्पः, विद्रधि एवं अन्य कफ जन्य व्याधियाँ। इनमें प्रायः सभी में मैनफल उपयोगी हो सकता है। भगवान् चरक ने इन रोगों में मैनफल का नाम निर्देशित किया है ।

वमनार्थ प्रयोग विधि :

स्नेहपान के पश्चात् जब रोगी सम्यक् स्निग्ध हो जाय तब एक दिन के अन्तराल के पश्चात अभ्यंग स्वेदन कराकर रोगी को वमन कराना चाहिए। वमन कराने से पूर्व यह आवश्यक है कि रोगी में दोषोत्क्लेश की स्थिति हो। इसके लिए दो से तीन लिटर तक या अधिक गन्ने का रस या दूध पिलाना अच्छा है। यह इतना पिलावें कि व्यक्ति पूर्ण तृप्त हो जाय। ये वमनोपगद्रव पदार्थ आकण्ठ पिलाने के आधा घन्टे बाद रोगी को मदनफल योग (मैनफल चार भाग, वचा दो भाग व सेंधानमक एक भाग) आवश्यकतानुसार 6 ग्राम या 12 ग्राम लेकर मधु मिलाकर शीघ्र ही चटवाते हैं।

औषध सेवन काल में मन्त्रोचार किया जाता है। दवा लेने के 50-50 मिनट बाद रोगी के माथे पर प्रस्वेद, शरीर में रोमहर्ष, उदर में आध्मान तथा मुख से लालाश्राव होने लगता है। तब रोगी वमन करता है। वमन वेग न हो तो रोगी अंगुली डालकर या चिकित्सक रबर की नली से गले का स्पर्श कर या गले व तालु पर समधु मदनयोग चुपड़ने से वमन चालु हो जाता है। परिचारक रोगी की पीठ व माथा सहलाता है। वमन काल में रोगी के स्वास्थ्य की परीक्षा करना, नाड़ी देखना, हृदय का स्पंदन सुनना, रक्तचाप का ज्ञान करना बहुत जरूरी है। वमन के समय आवाज, वमित पदार्थ का वर्ण, गन्ध, वसनकाल में रोगी के मुख का स्वाद आदि की जानकारी चिकित्सक को दोषों के निर्हरण का पर्याप्त ज्ञान हो जा है। वमन के 8-10 वेग आने पर उत्तम वमन, 5-7 वेग आने पर . मध्यम वमन तथा 3-4 ही वेग आने पर हीन वमन समझा जाता है। रोगी ने जितना द्रव पिया है उससे अधिक मात्रा में वमित द्रव निकलना चाहिए। वमन के वेगों में पहले कफ फिर पित्त और फिर वात का उत्सर्ग होता है। परन्तु वमन कर्म का पित्तान्त तक होना ही उचित माना जाता है।

चरक टीकाकार चक्रपाणि ने वमन शुद्धि के आन्तिकी, वेगिकी, मानिकी और लैंगिकी ये चार प्रकार बतलाये हैं। आन्तिकी में वमन वेग के अन्त के दोषानुसार शुद्धि का निर्णय किया जाता है। वैगिकी में वेगों की गणना से, मानिकी में वमित द्रव्य के मान के आधार पर तथा लैंगिकी में रोगी लक्षणों से शुद्धि का निर्णय किया जाता है। इनमें इन तीन को स्वीकार न कर लैंगिकी को ही महत्व दिया गया है। सुश्रुत टीकाकार डल्हण ने भी लैंगिकी शुद्धि को ही सर्वोपरि माना है। सम्यक्वान्तलक्षण, असम्यक्वान्त लक्षण और अतिवान्त लक्षणों के आधार पर ही वमनकर्म की सफलता-असफलता का निर्णय किया जाता है।

सम्यक्वान्त के लक्षण :

  1. समय पर वेगों की उत्पत्ति होती है।
  2. वेगकाल में रोगी को बहुत कष्ट नहीं होता है।
  3. यथाक्रम दोषों का निर्हरण होता है। अर्थात् पहले कफ, फिर पित्त और तत्पश्चात् वायुदोष का निर्हरण होता है।
  4. वेग स्वतः चालू होकर स्वयं ठीक समय पर बन्द हो जाते हैं।
  5. हृदय, कंठ, पार्श्व, शिर, इन्द्रिय, एवं स्रोतों की शुद्धि हो जाती है।
  6. कफ का स्राव हो जाता है।
  7. शरीर हल्का, दुर्बल तथा कृश हो जाता है। असम्यकवान्त के लक्षण :
  8. वेग की प्रवृत्ति न होना।
  9. केवल पी गई औषध का बाहर निकलना।
  10. वेग का विबन्धित हो जाना।
  11. बार-बार कफ प्रसेक होना परन्तु वमन वेग का न होना।
  12. शरीर का भारी होना।
  13. ज्वर, दाह होना।
  14. हृदय तथा स्रोतों का भरा हुआ सा एवं अशुद्ध रहना।
  15. शरीर पर स्फोट-कोठ (चकत्ते) उत्पन्न होना।
  16. शरीर पर खुजली का होना।

अतिवान्त के लक्षण :

  1. फेनिल रक्तचन्द्रिकाओं का निकलना।
  2. इसके बाद शरीर का कृश होना।
  3. स्वरक्षय, दाह, कण्ठशोष होना।
  4. भ्रम, मोह, उन्माद, मूर्छा होना।
  5. शिरः शून्यता, हृद्धमायन।
  6. गात्रशूल, गात्रसुप्ति।
  7. तृष्णा, हृदव्यथा, कण्ठपीड़ा एवं दाह।
  8. उर्ध्व वातकोप।
  9. कर्णशूल, अर्दित, वाक्संग, हनुसंहनन।
  10. जिह्वा का अन्दर प्रवेश या बाहर निकल आना।
  11. संज्ञाहीनता, बलक्षय/जठराग्नि की हानि।
  12. जीवरक्त की प्रवृत्ति
  13. आँखों के आगे अन्धेरा आना, भ्रम एवं निद्रानाश।

असम्यग् वान्ति किंवा अयोग तथा अतियोग के उपचार हेतु निर्देश दिया गया है-

अतियोग की निम्नानुसार चिकित्सा करें :

  1. यथावश्यक शीतोपचार करें।
  2. नींबू या अनार का शर्बत पिलावें।
  3. हेमगर्भ पोट्टली रस 60 मि0ग्रा0 मयूरपिच्छ भास्म 125 मिग्राम सूतशेखर रस 250 मि0ग्रा0 शंखभस्म 500 मि0ग्रा0 इन औषधियों का मिश्रण कर रोगी को 15-20 मिनट के अंतर से चटावें।
  4. संजीवनी वटी 250 मि0ग्रा0 तीन-चार बार दें।
  5. अन्य लक्षणों के अनुसार उपयुक्त उपचार कर रोगी के प्राणों की रक्षा करें।

मैनफल के अन्य उपयोग :

वमन के अतिरिक्त यह अन्य रोगों में भी है। मदन फल वातानुलोमन एवं कृमिघ्न भी है। यह वाह्याभ्यन्तर प्रयोगों में व्यवहृत होता है।

  • विबन्ध, गुल्म एवं कृमिरोग में फल चूर्ण एक-दो ग्राम तथा प्रवाहिका में त्वचा का क्वाथ दिया जाता है।
  • मैनफल कि त्वचा का क्वाथ वातरोगों में भी उपयोगी है।
  • आमवात आदि शोथ वेदना युक्त विकारों में मैनफल का लेप उपयोगी है।
  • शोथहर होने से श्लीपद (हाथीपाँव रोग) में भी मैनफल लाभप्रद है ।
  • मैनफल त्रिशती (व्रण शोधक, वेदना स्थापन तथा शोथहर) होने से व्रण, नाड़ी व्रण, कुष्ठ आदि में हितावह कहा गया है ।
  • इसकी छाल में कामोत्तेजनाशामक एवं वेदना शामक का विशेष गुण है।
  • कुष्ठघ्न शोथहर एवं रक्त शोधक होने से यह उक्त रोगों में अन्तः प्रयोगार्थ भी उपयुक्त है।
  • ज्वरन स्वेदजनन तथा दोष संशोधन होने से यह ज्वरों में उपयोगी है जिसका उल्लेख पूर्व में किया जा चुका है।
  • मैनफल लेखन होने से मेदोरोग में तथा विषघ्न होने से विषों में भी हितकारक है।
  • मैनफल आर्तवजनन होने से कष्टार्तव तथा कष्टप्रसव में प्रयुक्त होता है।
  • योनि शैथिल्य में यह लेप हेतु उपयोगी कहा गया है।
  • मैनफल कफनिःसारक होने से प्रतिश्याय (सर्दी जुकाम ), खाँसी, श्वास आदि प्राणवहस्रोतस् के विकारों में भी लाभदायक सिद्ध हुआ है।
  • श्वास के बलवान रोगियों में वमन विरेचन और दुर्बलों के लिये शमन करने वाली चिकित्सा का विधान है। लीन दोषों के निर्हरणार्थ धूम्रपान का भी निर्देश दिया गया है। आचार्य वाग्भट लिखते हैं कि-
    श्वास में धूम्रपान का आवस्थिक काल वात कफ की न्यूनाधिकता पर अवलम्वित है। धूम के तीन भेद हैं-मृदु, मध्य और तीक्ष्ण। वाताधिकश्वास में मृदु (स्नेह), वातकफााधिक में मध्य (शमन) और कफाधिक में तीक्ष्ण (विरेचन) धूम्रपान का प्रयोग परम श्रेयस्कर होता है ।
    मैनफल, मुस्तक, शैलेय (छाड; छरीला), जटामांसी आदि द्रव्यों का उपयोग मृदु धूम्रपान हेतु किया जाता है। इन द्रव्यों को घृत में मिश्रित कर वर्तिका बनाकर धूम्रपान किया जाता है।
  • दोषाधिक्य तथा बलवान रोगी को वमनार्थ मैनफल देवें। प्रथम सैन्धवलवण युक्त तैल स्निग्ध कर बालुका से स्वेदन करें। विधिपूर्वक स्वेदन हो जाने पर रोगी को स्निग्ध भोजन करावें इसके पश्चात् मैनफल 6 ग्राम , सैंधव नमक 6 ग्राम, छोटी पीपल 3 ग्राम ,शहद 12 ग्राम मिला, पीस कर पिलाने से थोड़ी देर बाद वमन प्रारम्भ हो जायेगा। क्षीण रोगी को उक्त औषधि की मात्रा कम दें ।
  • रोगी को स्निग्ध भोजन करावें इसके पश्चात मैनफल 6 ग्राम , सैंधव नमक 6 ग्राम, छोटी पीपल 3 ग्राम ,शहद 12 ग्राम मिला, पीस कर पिलाने से थोड़ी देर बाद वमन प्रारम्भ हो जायेगा। क्षीण रोगी को उक्त औषधि की मात्रा कम दें ।

चूनानीमत में मैनफल के लाभ –

  • यूनानी मत से मैनफल कडवा खराब स्वाद वाला होता है। पुरानी खांसी, मांसपेशियों का दर्द, लकवा, सूजन, कुष्ठ, व्रण, फोड़े-फुन्सी, मस्तिष्क सम्बन्धी रोग, दमा, खांसी और श्वेत कुष्ठ में यह उपयोग में लाया जाता है।
  • यूनानीमत से यह दूसरे दर्जे में उष्ण व रूक्ष है।

नव्य मतानुसार-

  • डाक्टर नाडकरनी लिखते हैं कि एक पके हुये फल का गर्भ वमन के लिए काफी होता है। फल में से गर्भ को निकालकर, उसे सुखाकर, बारीक पीसकर वमन लाने के लिए 10 से 20 रत्ती तक की मात्रा में और पसीना लाने के लिए अथवा कफ निकालने के लिए ढाई से 5 रत्ती तक की मात्रा में देना चाहिये। अगर दो फलों का गर्भ एक साथ दिया जाय तो तत्काल अर्थात् 10 मिनिट में उल्टी हो जाती है। एक बार उल्टी हो जाने पर अगर फिर गरमपानी पिलाया जाय तो फिर से उल्टी होती है। इस प्रकार ज्यों-ज्यों गरम पानी पिलाते जायेगें त्यों त्यों उलटियों की संख्या बढ़ती जायेगी।
  • डाक्टर मुडीन शरीफ के मतानुसार रक्तातिसार को रोकने के लिए यह वनस्पति इपिकेकोना की उत्तम प्रतिनिधि है। इसके गर्भ का चूर्ण इस काम के लिए बहुत उत्तम होता है। अतिसार के लिए इसका चूर्ण 15 से 30 ग्रेन तक की मात्रा में और वमन के लिए 40 ग्रेन की मात्रा में दिया जाता है।
  • राबर्टस के मतानुसार सांप के काटे हुये व्यक्ति को मैनफल के गर्भ का चूर्ण खिलाया जाता है और इसकी जड़ को बैल के मूत्र में पीसकर सर्पदंश के रोगी की आंखों में उनकी मूर्छा-बेहोशी और अवसन्नता को दूर करने के लिये आंजा जाता है।
  • दक्षिण में तंजोर पिल्स के नाम से एक प्रकार की गोलियां बनाई जाती हैं। सांप के विष को दूर करने के लिए इन गोलियों की बहुत ख्याति है। इन गोलियों में भी मैनफल का गर्भ एक प्रधान औषधि की तरह मिलाया जाता है। -वनौ० चन्द्रोदय

मैनफल के फायदे (बाह्य प्रयोग) : Benefits of Mainfal in Hindi

सरदर्द ठीक करे मैनफल का प्रयोग

मैनफल (मदनफल) को गाय के दूध में पीसकर सुंघने से आधाशीशी का दर्द मिटता है।

पेट दर्द (उदरशूल) में मैनफल का उपयोग फायदेमंद

मैनफल को सिरके में पीसकर नाभि पर लेप करें।

कील-मुंहासे (युवानपिडिका) में फायदेमंद मैनफल का लेप

मैनफल को गुलाब जल में पीसकर मुख पर लेप करने से कील-मुंहासे मिटते हैं।

जोड़ों का दर्द (सन्धिशूल) मिटाए मैनफल का उपयोग

गठिया की सूजन और दर्द को मिटाने के लिए मैनफल को गोमूत्र में पीसकर लेप करें।

योनि संकोचन में मैनफल के इस्तेमाल से फायदा

मैनफल, मुलेठी का चूर्ण बनाकर उसमें थोड़ा कपूर मिला इन्हें तिल तैल में मिश्रित कर योनि में लेप करने से वढीली तथा फैली हुई योनि सिकुड़ जाती है।

मैनफल के इस्तेमाल से सूजन में लाभ

मैनफल, बिजौरे की जड़, देवदारू, सोंठ, चित्रक, रास्ना, कचूर का लेप हितकारी है। यह लेप पानी के साथ पीसकर गरम कर करना हो चाहिए।

मूषक(चूहा) विष के उपचार में मैनफल का उपयोग लाभदायक

मैनफल एवं रसोईघर का धुंआ को पीसकर लेप करने से मूषकविष का प्रभाव कम होता है।

होठों का फटना (ओष्ठ स्फुटन) ठीक करे करे मैनफल

मैनफल, गुड़ का सीरा (फाणित), सोना गेरू, राल + सैन्धव के मिश्रण में घी,तैल मिलाकर होठों पर लेप करने से होठों का फटना एवं होठों पर हुये व्रण ठीक होते हैं।

नाडीव्रण मिटाता है मैनफल

मैनफल बीज तथा गूगल समान मात्रा में लेकर जल में घोटकर एक-एक ग्राम की गोलियां बनालें। इस गोली को शतधौत घृत के साथ घोटकर बत्ती बनाकर व्रण में भर देने से नाड़ीव्रण का शोधन-रोपण होता है।

उदावर्त में मैनफल के प्रयोग से लाभ

उदावर्त (गुदा का एक रोग जिसमें काँच निकल आती है ओर मलमृत्र रुक जाता है) के उपचार हेतू मैनफल, पिप्पली, कुठ, बच, सरसों सबका चूर्ण कर उसमें गुड़ एवं दूध मिलाकर बत्ती बनाकर गुदा में प्रविष्ट करें।

नाभिभ्रंस (नाभ टलना) में लाभकारी है मैनफल का प्रयोग

मैनफल को कुटकी एवं छाछ के साथ पीसकर नाभि पर लेप करने से नाभ टलने के कारण उत्पन्न शूल मिटाता है।

प्रसव कष्ट मिटाए मैनफल का उपयोग

मैनफल और सांप की केंचुली समान मात्रा में लेकर उसमें से 20 ग्राम को कंडे की निधूम अग्नि पर डाल योनि में धूनी देने से शीघ्र प्रसव होता है।

फोड़े के उपचार में मैनफल से फायदा

मैनफल और रेवन्द चीनी का लेप करने से विद्रधि (फोड़ा) जल्दी पक कर फूट जाती है।

विसर्प रोग में मैनफल फायदेमंद

मैनफल को नीम के रस में पीसकर लेप करें। यह गलगंड में भी हितकारी है।

अंडकोश की सूजन (मुष्कशोथ) मिटाता है मैनफल

मैनफल को को पानी में पीसकर लेप करने से अंडकोश की सूजन और दर्द मिटता है।

दन्तोदभेद रोग में मैनफल करता है मदद

बालक के दांत निकलने के समय के रोग तथा ज्वर में इसके मोटे चूर्ण को तालु पर लगाते हैं।

वातपित्त ज्वर में मैनफल का उपयोग लाभदायक

मैनफल को पानी में चंदन की तरह घिसकर उसमें घी मिलाकर शरीर पर मालिस कर रोगी को वस्त्र औढ़ा दें। कुछ देर बाद पसीना आकर ज्वर उतर जायेगा।

कीड़ों से सुरक्षा हेतु मैनफल के इस्तेमाल से फायदा

गेहूं, चावल आदि में कीड़ों से सुरक्षा हेतु मैनफल का कच्चा फल (अभाव में पक्वफल) धान्यराशि में रख दें। अनाज सुरक्षित रहेगा।

मैनफल के फायदे (आभ्यन्तरीय प्रयोग) : Mainfal ke Fayde in Hindi

वामक प्रयोग

(क) दो-तीन मैनफल की गिरी और बीजों को 10-15 मिनट पानी में भिगोकर 100-125 मिलि0 जल में पीसकर मल छानकर पिला देने से 8-10 मिनट में हल्लास और वमन होने लगता है।

(ख) 12 ग्राम मैनफल (मदनफल) चूर्ण, 6 ग्राम सैन्धव नमक और 1.5 ग्राम पीपल के चूर्ण को गरम जल के साथ देवें। यह श्वास रोगी के लिए हितकर है।

(ग) 60 ग्राम मुलैठी को यवकुट कर दो लिटर जल में औटावें जब एक लीटर जल बचे तब मलकर छान लें और 6 ग्राम मैनफल की मींग के चूर्ण को फांककर वही मुलैठी क्वाथ 50-60 मिलि0 10 ग्राम मधु और 10 ग्राम सेंधा नमक डालकर पिलावें। इसी प्रकार दो-तीन बार पीने से खूब वमन होते हैं।

(घ) अच्छे मैनफल दो या तीन नग लेकर उनके ऊपर की त्वचा हटा दें और यवकुट कर 60 मिलि0 जल में रात को भिगो दें। सबेरे अच्छी तरह मसल छानकर पिला देवें। तत्काल वमन हो जायेगा। यह कफ एवं पित्त विकारों में लाभप्रद है।

(ङ) 125 मिलि0 जल में दो फलों का गर्भ घोल मसलकर इस पानी को छानकर रोगी को पिला देवें। दस-पन्द्रह मिनट में रोगी को उल्टी हो जायेगी। यदि उल्टी जल्दी और विशेष करानी हो तो ऊपर से गरम जल पिला देवें। यह विष से आक्रान्त रोगी के लिए वामक योग है।

(च) मैनफल, नीमछाल और पटोलपत्र का क्वाथ बनाकर उसमें सैंधानमक और मधु मिलाकर पिलाने से वमन होता है। यह वामक योग अम्लपित्त रोगी के लिए हितकारी है।

(छ) मैनफल चूर्ण 6 से 7 ग्राम दूध में मिला पीने से वमन द्वारा कफ निकल जाता है। यह कास रोगी के लिए लाभदायक है।

(ज) मैनफल चूर्ण, शु0 नीलाथोथा और फिटकरी का समभाग चूर्ण बनाकर रखलें। यह यथोचित मात्रा में गरम जल से देने से वमन होता है।

(झ) मैनफल और सैन्धव लवण को समान मात्रा में लेकर पीसकर शहद मिलाकर ऊपर से उष्ण जल या सोये की पत्तियों का क्वाथ पिलावें। यह कफज रोगों में लाभकारी वामक योग है।

(ञ) मैनफल और यष्टीमधु का चूर्ण नीम की छाल और पटोल पत्र के क्वाथ के साथ देने से वमन होता है। यह रोग विसर्परोग में हितावह है। यह कुष्ठ में भी लाभप्रद है।

(ट) मैनफल 6 ग्राम और पिप्पली चूर्ण 3 ग्राम को लवण जल के साथ देने से वमन होते हैं। यह कफ प्रधान ज्चर में दोष शमन हेतु वम्य रोगी के लिए उपयुक्त वामक योग है।

(ठ) मैनफल और कुटज चूर्ण को मधु या लवण जल से देकर वमन कराना अधोग रक्तपित्त के वलवान रोगी के लिए हितकारी है।

(ङ) मैनफल, गंभारी और यष्टीमधु के क्वाथ में घी मिलाकर पिलाना सकफ पैत्तिक खाँसी में लाभप्रद वमनार्थ योग है।

(ढ) मैनफल, वचा, प्रियंगु, यष्टीमधु, कुटज, सर्षप, निम, पटोल का क्वाथ स्तन्यदोष में वमनार्थ प्रयुक्त होता है।

(ण) पूर्वोक्त मैनफल योग (मदनफल चूर्ण 6 ग्रा ,वचा चूर्ण 3 ग्राम ,सैन्धव 1.5 ग्राम, मधु 12 ग्राम) प्रायः सभी वम्य रोगी के लिए दोष निर्हरणार्थ उपयोगी हैं।

मैनफल के अनुभूत प्रयोग :

कर्णमूल शोथहर प्रयोग

मैनफल, कत्था,गूगल और रेवत चीनी सभी द्रव्य समान भाग लेकर (सभी 10-10 ग्राम) पानी के साथ सिल पर पीसकर गरम करें।
जब लेही जैसी हो जावे तब अग्नि से उतार लें। कर्णमूल शोथ के बराबर कपड़ा काटकर उस पर उक्त लेप लगाकर शोथ स्थान पर चिपका दें। पानी न पड़ने दें। यह प्रयोग कर्णमूल शोथ को शीघ्र ठीक करने वाला परीक्षित एवं उत्तम है। -श्री नारायण दास (अनुभूत प्रयोग रत्नाकर)

आध्मानहर फल वर्तिका

मैनफल, कालीमिर्च, कुठ, पीपरि, सरसों, सेंधानमक, सोंठ और घर का धुआं (घूमसा) इन सबको मधु में सानकर अग्नि पर पकावें। जब गाढ़ा हो जाय तब पतली बत्ती बनाकर सुखा लें। फिर गुदा और बत्ती पर घी चुपड़कर गुदा में रखने से तुरन्त दस्त आकर पेट फूलना, कोष्ठ बद्धता आदि दूर होते हैं। -श्री महावीर प्रसाद मालवीय (बालरोग चिकित्सा)

एक चिकित्सा अनुभव

बात सन् 1965 के नवम्बर मास की है। जब मैं राजकीय सेवा में आया ही था। मेरी नियुक्ति पादरड़ी बड़ी (डूंगरपुर) में हुई थी। सायंकाल हम तीनों कर्मचारी भोजन करने लगे हुये थे कि सहसा एक आदमी ने आकर कहा-मुझे मेरी औरत ने रोटी के साथ काच या लाख की चूड़ी को पीसकर खिला दिया है। मैं कुछ रोटी खा पाया था कि मुझे कुछ शक हो गया है अब आप मुझे शीघ्र कोई उल्टी हो जाने की दवा दें। “औरत ने कैसे जहर देने की सोची कम्पाउण्डर ने उससे पूछ लिया। आज दिन में किसी बात को लेकर हम दोनों में झगड़ा हो गया था। क्रोध में आकर मैंने उसे पीट भी दिया। इससे उसने मुझे मारने की सोची है। हम लोगों में व्यक्ति के जीवन का कोई महत्व नहीं है। पति के मर जाने से उसे कोई गम नहीं है। वह दूसरा घर बसा लेगी। अज्ञानता के कारण ऐसा ही कुछ होता है।

हमने उसे सांत्वना दी और औषधालय के बाहर बिठा दिया औषधालय में मैनफल का चूर्ण मौजूद था। उस चूर्ण में से 5-6 ग्राम चूर्ण उसे खिला दिया। पानी में थोड़ा सैंधानमक घोलकर उसमें एक-दो चम्मच शहद मिलाकर उसे पिला दिया। कुछ देर प्रतीक्षा करने लगे। थोड़ी देर बाद उसे उद्वेग सा हुआ किन्तु वमन नहीं हुआ। मैंने उसे पुनः सैन्धव एवं मधु मिश्रित जल पिलाया पिलाते ही उसे वमन होना प्रारम्भ हुआ। वमन से उसके द्वारा जो खाया गया भोजन था सारा बाहर आ गया। उसने सन्तोष की सांस ली। हम भी खुश हो गये कि मैनफल से उसे वमन हो गया। थोड़ी देर में उसे पुनः एक उद्वेग हुआ किन्तु वमन में द्रव के अतिरिक्त कुछ नहीं निकला। मैंने उसे एक खुराक हेमगर्भ पोट्टली’ की दी तथा थोड़ा एरण्ड स्नेह दूध में मिलाकर पी जाने की कहकर उसे विदा किया।

सुबह वह औषधालय में आया बड़ा प्रसन्न था। उसे किसी प्रकार की कोई शिकायत नहीं थी। उसे एक-दो दस्त भी लग गये थे। अब मैंने उसे “संजीवनी वटी” और दे दी। और भविष्य में स्त्री के साथ स्नेह भाव से रहने की हिदायत दी। -गोपीनाथ पारीक ‘गोपेश’

मैनफल के दुष्प्रभाव : Mainfal ke Nuksan in Hindi

उष्ण प्रकृति के व्यक्तियों को मैनफल का प्रयोग सावधानीपूर्वक करना चाहिए। इसका अधिक मात्रा में उपयोग गर्म प्रकृति के व्यक्तियों के लिए हानिकारक होता है।

दोषों को दूर करने के लिए : इसके दोषों को दूर करने के लिए कतीरा व शीतल पदार्थ लेना चाहिये

(उपाय व नुस्खों को वैद्यकीय सलाहनुसार उपयोग करें)

Leave a Comment