Paan ke Patte ke Fayde aur Nuksan | पान के पत्ते के फायदे ,गुण ,उपयोग और दुष्प्रभाव

पान क्या है ? : Betel Leaf in Hindi

ताम्बूल या नागरबेल का पान सारे भारतवर्ष में भोजन के पश्चात् खाने के काम में लिया जाता है । इसको सब कोई जानते हैं । इसलिये इसके विशेष वर्णन की आवश्यकता नहीं। इसकी खेती मद्रास, बङ्गाल, बनारस, महोबा, साँची, लङ्का और मालवा के रामपुरा, भानपुरा जिले में बहुत होती है। इन सब पानों में बनारस का पान सर्वोत्तम माना जाता है ।

पान का विभिन्न भाषाओं में नाम : Name of Betel Leaf in Different Languages

Betel Leaf in –

संस्कृत (Sanskrit) – नागवल्ली, नागिनी, नागवल्लिका, पर्णलता, तांबूली, तांबूलवल्ली, सप्तशिरा, मुखभूषण
हिन्दी (Hindi) – नागरबेल का पान, ताम्बूल, बंगलापान
मराठी (Marathi) – नागबेल
गुजराती (Gujarati) – नागरबेल, पान
कन्नड़ (Kannada) – नागरबल्लि, पर्ण
तेलगु (Telugu) – तामलपाक्, नागबल्ली
तामिल (Tamil) – बेटिली
फ़ारसी (Farsi) – वर्ग तम्बोल
अरबी (Arbi) – तम्बोल
उर्दू (Urdu) – पान
इंगलिश (English) – Betel leaf बेटल लीफ
लैटिन (Latin) – Piper Betel पायपर बीटल।

पान के पत्ते के औषधीय गुण : Paan ke Aushadhi Gun in Hindi

श्लोक-ताम्बूलं कटु तिक्तमुष्णमधुरं क्षारं कषायान्वितं ।
वातघ्नं कृमिनाशनं कफह दुःखस्य विच्छेदनम् ।।
स्त्री-सम्भाषण-भूषणं धृतिकरं कामाग्निसन्दीपनम् ।
ताम्बूले निहितास्त्रयोदशगुणः स्वर्गऽपि ते दुर्लभाः ।।

अर्थात्-पान चरपरा, कड़वा, गरम, मधुर, क्षारगुण युक्त, कसैला तथा वात, कृमि, कफ और दुःख को हरने वाला है । स्त्री सम्भाषण के विषय में यह अलङ्कार के समान है तथा धारणा शक्ति और काम शक्ति को यह बढ़ाता है । पान में यह जो तेरह गुण विद्यमान हैं वह स्वर्ग में भी दुर्लभ हैं ।

  • राजनिघण्टु के मतानुसार पान चरपरा, तीक्ष्ण, कड़वा और पीनस, वात, कफ तथा खाँसी में लाभदायक है।
  • यह रुचिकारक, दाहजनक और अग्निदीपक है।
  • भावप्रकाश के मतानुसार पान विषघ्न, रुचिकारी, तीक्ष्ण, गरम, कसैला, सारक, वशीकरण, चरपरा, रक्तपितकारक, हलका, बाजीकरण तथा कफ, मुँह की दुर्गन्ध, मल, व त और श्रम को दूर करता है।
  • पुराना पान- पुराना पान अत्यन्त रसभरा, रुचिकारक, सुगन्धित, तीक्ष्ण, मधुर, हृदय को हितकारी, जठराग्नि को दीप्त करने वाला, कामोद्दीपक, बलकारक, दस्तावर और मुख को शुद्ध करने वाला है।
  • नवीन पान- नवीन पान त्रिदोषकारक, दाहजनक, अरुचिकारक, रक्त को दूषित करने वाला, विरेचक और वमनकारक है । वही पान अगर बहुत दिनों तक जल से सींचा हुआ हो तो श्रेष्ठ होता है । रुचि को उत्पन्न करता है । शरीर के वर्ण को सुन्दर करता है और त्रिदोषनाशक है ।
  • मालवे का पान- मालवे का पान पाचक, तीक्ष्ण, मधुर, रुचिकारक, दाहनाशक, पित्तनाशक, अग्निदीपक, मादक, काम शक्ति को बढ़ाने वाला, मुख में सुगन्ध पैदा करने वाला, स्त्रियों के सौभाग्य को बढ़ाने वाला और उदर शूल को नष्ट करने वाला होता है ।

यूनानी मत में पान के लाभ : Paan ke Labh Hindi Mein

  1. यूनानी मत से पान गरम, काविज और शान्तिदायक है ।
  2. यह दिल, जिगर, मेदा, दिमाग और स्मरण शक्ति को ताकत देता है ।
  3. शरीर में उत्तम रक्त पैदा करता है।
  4. दोषों को छांट देता है, शरीर के रोम छिद्रों को खोल देता है।
  5. इसके खाने से दाँत और मसूड़े मजबूत होते हैं और मसूड़े की सूजन मिट जाती है ।
  6. कफ की वजह से पैदा हुआ दमा और खांसी इसके सेवन से मिट जाते हैं ।
  7. गला और आवाज साफ होती है ।
  8. यह त्रिदोषनाशक और कामशक्तिवर्धक है।
  9. पान का लेप ताजा जख्मों को भर देता है।
  10. अगर किसी के अण्डकोष में पानी उतर आवे तो 5 से 6 बंगला पान गरम कर बांध देने से नवीन बीमारी में बहुत फायदा होता है । 2 से 3 दिन में पानी बिखर जाता है। अगर ज्यादा गरमी मालूम पड़े तो पांच-छः की जगह एक, दो पान बाँधना चाहिए और एक-दो रोज का फासला देकर बाँधना चाहिये ।

पान का रासायनिक विश्लेषण : Betel Leaf Chemical Constituents

  • पान में स्टार्च, शक्कर, टेनिन और डिप्रास्टोसिस 8 से 18 प्रतिशत तक रहता है।
  • इसमें उड़नशील तेल भी रहता है । जो कुछ पानों में 4.2 प्रतिशत तक पाया जाता है ।
  • इसमें पाया जानेवाला उड़नशील तेल एक पीले रंग का द्रव पदार्थ होता है । यह गन्ध में उत्तम और स्वाद में तेज होता है ।
  • जावा और मनिला में पैदा हुए पानों में फेनोल नाम की वस्तु 55 प्रतिशत तक पाई जाती है ।
  • इसमें रहने वाला उड़नशील तेल शरीर में गर्मी का श्रावेश बतलाता है। मुँह में और पेट में अच्छा मालूम पड़ता है। इससे केन्द्रीय स्नायुमण्डल के ऊपर कुछ उत्तेजना मालूम पड़ती है। अगर इसे अधिक खुराक में लिया जाय तो कुछ नशे का अनुभव भी होता है ।

पान के पत्ते के औषधीय उपयोग : Paan ke Upyog in Hindi

  1. पान के पत्तों से प्राप्त किया हुआ यह तेल नजले में उपयोगी है तथा कृमिनाशक वस्तु की बतौर काम में लिया जा चुका है । यह मस्तिष्क के विकारों को दूर करता है ।
  2. कम्बोडिया में इसके पिसे हुए पत्तों का पानी माता और ज्वर के बिमारों को स्नान कराने के काम में लिया जाता है।
  3. सन्याल और घोष के मतानुसार पान सुगन्धित होता है । इसमें उड़नशील तेल पाया जाता है । इस तेल में से कास्टिक पोटास की मदद से चेबीपोल नाम का फेनाल प्राप्त किया जाता है । जो कि कारबोलिक एसिड से पाँच गुना और यूबेनाल से दो गुना अधिक तेज होता है । इस वेटल फिनाल ही के कारण इसमें इतनी सुगन्ध पाई जाती है । इसके पत्तों का डंठल तेल में तर करके गुदा में रखने से बच्चों को साफ दस्त हो जाता है और उनके पेट का फुलाव मिट जाता है।
  4. डाक्टर वलेइनस्टक का कहना है कि इसका उड़नलीश तेल जुकाम, गले का प्रदाह, स्वरनाली का भंग, रोहिणी रोग [ डिप्थीरिया ] और खांसी में लाभदायक है । यह कृमिनाशक होता है। डिप्थीरिया में इस तेल की एक बूंद, सौ ग्रेन पानी में डालकर उससे कुल्ले करने से और इसका धुआँ सूंघने से लाभ होता है । भारतवर्ष में ४ पानों का रस १ बूंद तेल की बजाय काम में लिया जा सकता है ।
  5. खन के जमाव, यकृत के रोग और बच्चों के फेफड़ों की तकलीफ में पान को गरम कर के उन पर तेल लगाकर बाँधने से लाभ होता है।
  6. मिस्टर जे० बुड का कथन है कि इसके पत्तों को अगर श्राग पर गरम करके स्तनों पर बाँधे जाँय तो दूध का बहाव अवश्य बंद हो जाता है और ग्रंथियों की सूजन मिट जाती है।
  7. डाक्टर थामसन वाट्स डिक्शनरी में लिखते हैं कि इसके पत्तों का रस आँखों की बीमारी में, आँखों में डालने से फायदा पहुँचता है।
  8. इससे मस्तिष्क के अन्दर होने वाले खून के जमाव पर भी लाभ पहुँचता है।
  9. बी० डी० बसु के मतानुसार इसके पत्तों का रस आँख में डालने से रतौंधी की बीमारी में लाभ होता है ।
  10. बंगसेन के मतानुसार टांगों के श्लीपद में इसके ७ पानी को लेकर उनमें सेंधा निमक डालकर गरम पानी के साथ छान कर प्रातःकाल पीने से कुछ दिनों में अच्छा लाभ होता है।
  11. कर्नल चोपरा के मतानुसार पान सुगन्धित, पेट के श्राफरे को दूर करने वाला, उत्तेजक और संकोचक होता है ।
  12. सर्प विष में इसे अन्तःप्रयोग के काम में लेते हैं। इसमें उड़नशील तेल और चेवी कोल रहता है ।
  13. पुराने हिन्दू लेखकों का लिखना है कि पान को सुबह खाना खाने के बाद और सोते समय खाना चाहिये ।
  14. सुश्रुत के मतानुसार यह सुगन्धित, शान्तिदायक, पेट के श्राफरे को दूर करने वाला, उत्तेजक और संकोचक होता है। यह श्वास में मधुरता लाता है, स्वर को सुधारता है । मुँह की दुर्गन्ध को मिटाता है ।
  15. अन्य लेखकों के मतामुसार यह कामोद्दीपक है ।
  16. कफ की खराबी से जो बीमारियां पैदा होती हैं उनमें इसे काम में लेते हैं।
  17. इसका रस इन बीमारियों में दी जानेवाली औषधियों में विशेष लाभदायक है ।
  18. कोंकण में इसके फल को शहद के साथ खांसी की बीमारी में देते हैं ।
  19. उड़ीसा में गर्भ न रहने देने के लिये इसकी जड़ को उपयोग में लेते हैं ।
  20. यह वनस्पति इण्डियन फर्मा कोपिया के अन्दर भी सम्मत मानी गई है। मगर इसकी उपचारिक उपयोगिता के विषय में कुछ भी नहीं लिखा गया है।

पान के पत्ते के फायदे : Paan ke Patte ke Fayde Hindi me

कफ प्रधान रोगों में पान के पत्ते के प्रयोग से लाभ

पान के पत्ते का उपयोग कफ प्रधान रोगों में विशेष रूप से होता है । खास करके दमा, फुफ्फुसनलिका की सूजन और श्वास मार्ग की सूजन में इसका रस पिलाया जाता है और इसके पत्ते को गरम करके छाती पर बाँधते हैं।

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सर्दी का जोर मिटायें पान के पत्ते का उपयोग

बच्चों की सर्दी में भी पान के ऊपर अरंडी का तेल लगाकर, उनको जरा गरम करके छाती पर बाँध देते हैं । जिससे बच्चों की घबराहट कम हो जाती है और सर्दी का जोर मिट जाता है।

डिप्थीरिया रोग में पान के पत्ते के इस्तेमाल से फायदा

इस रोग में गले के अन्दर एक विशिष्ट जन्तु का परदा पैदा होकर श्वासावरोध हो जाता है और अत्यन्त कष्ट के साथ रोगी की मृत्यु होती है । इसमें भी पान का रस सेवन करने से उस जन्तु का नाश हो जाता है, गले की सूजन कम हो जाती है और कफ छूटने लगता है । इस रोग में 2 से 5 पत्तों का रस थोड़े कुनकुने पानी में मिलाकर कुल्ले करने से भी फायदा होता है।

गाँठ सूजन में पान के पत्ते का उपयोग फायदेमंद

गठानों की सूजन पर पान को गरम करके बाँधने से सूजन और पीड़ा की कमी होकर गठान बैठ जाती है ।

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पान के पत्ते के इस्तेमाल से घाव में लाभ

व्रणों के ऊपर पान के पत्ते को बाँधने से व्रण सुधर जाते हैं और जल्दी भर जाते हैं। पान का रस एक प्रभावशाली पीबनाशक वस्तु है । कारबोलिक एसिड की अपेक्षा इसका रस पाँच गुना अधिक जन्तुनाशक है।

स्तनों की सूजन में लाभकारी पान के पत्ते

जिन स्त्रियों का बच्चा मर गया हो और स्तनों में दूध भरकर सूजन आ गई हो उन स्त्रियों के स्तनों पर पान को गरम करके बाँधने से सूजन कम हो जाती है और दूध उड़ जाता है।

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रतौंधी में फायदेमंद पान के पत्ते का औषधीय गुण

रतौंधी और नेत्राभिष्यन्द रोग में भी पान का रस आँख में डालने से लाभ होता है ।

सीने का दर्द दूर करे पान

पान पर तेल चुपड़कर भाग पर गरम करके सीने पर बाँधने से जुकाम और सीने का दर्द मिट जाता है । इसी प्रयोग से दिल और जिगर में जमा हुआ खून भी विखर जाता है। इसको पेट पर बाँधने से पेट की हवा निकल जाती है और पेट हलका हो जाता है।

पान के पत्ते के प्रयोग से दूर करे नेत्र रोग

पान के अर्क की बूँद आँखों में डालने से आँखों में होने वाला वादी का दर्द मिट जाता है ।

(और पढ़े –आंखों की रोशनी बढ़ाने के उपाय)

रतौंधी में पान के इस्तेमाल से फायदा

पान का रस आँखों में लगाने से रतौंधी जाती रहती है।

बच्चों की सूखी खांसी मिटाए पान का उपयोग

पान के रस को शहद के साथ चटाने से बच्चों की सूखी खांसी मिटती है ।

बच्चों की कब्ज में पान से फायदा

पान के डंठल पर तेल चुपड़कर बच्चों की गुदा में रखने से बच्चों की कब्ज और बादी के रोग मिटते हैं।

सूजन मिटाता है पान

पान पर तेल चुपड़ कर गरम करके बाँधने से सूजन का दर्द मिट जाता है।

बुखार में पान का उपयोग लाभदायक

2 से 3 ग्राम पान के अर्क को गरम करके दिन में 2 से 3 बार पिलाने से ज्वर आना बन्द हो जाता है।

पान खाने के दुष्प्रभाव : Paan Khane ke Nuksan in Hindi

  • पान के अधिक खाने से भूख कम हो जाती है । दिन – दिन पेट कमजोर होता जाता है । इसलिये इसको हमेशा नियमित मात्रा में खाना चाहिये ।
  • इसमें हेपिक्साइन नामक जहरीला पदार्थ रहता है।
  • पान के साथ सुपारी भी बहुत कम लेना चाहिये, क्योंकि सुपारी में अर्कोडाइन नामक विषैला पदार्थ रहता है और यह सीने में खुजली पैदा करता है ।
  • पान के अन्दर कत्था ज्यादा लगाने से फेफड़े में खराश पैदा हो जाती है।
  • चूने का अधिक उपयोग दाँतों को खराब कर देता है । इसलिये पान में कत्था, चूना और सुपारी नियमित मात्रा में डालना चाहिये ।

(दवा व नुस्खों को वैद्यकीय सलाहनुसार सेवन करें)