पेचिश (आंव) के कारण, लक्षण, इलाज, दवा, उपचार – Pechish ke Karan, Lakshan, Dawa aur Ilaj in Hindi

पेचिश (डीसेंट्री या आंव) रोग क्या होता है? (What is Dysentery in Hindi)

pechis rog kya hota hai –

अतिसार से मिलता जुलता एक और रोग है जिसे प्रवाहिका कहते हैं । बोलचाल की भाषा में पेचिश और अंग्रेज़ी में Dysentery कहते हैं । “अतिशयेन सारयति रेचयति इति अतिसारः” के अनुसार जिस रोग में मल का अधिक मात्रा में निस्सरण (निकलना) हो उसे अतिसार कहते हैं। इसी प्रकार “प्रवाहतोऽल्पं बहुशोमलाक्तं प्रवाहिकां तां प्रवदन्ति तज्ज्ञाः” के अनुसार गुदा द्वार से मल और कफ को, बार बार थोड़ी थोड़ी या कभी ज्यादा मात्रा में भी, कुपित वायु बाहर निकालती है वैद्यजन उसे’ पेचिश’ कहते हैं।

पेचिश अथवा डीसेन्ट्री का प्रमुख लक्षण है मरोड़ के साथ दस्त होना । मरीज़ द्वारा मल विसर्जन करते समय कांखना और कराहना ज़रूरी है। आयुर्वेद शास्त्रों में जितने विस्तार से अतिसार रोग के विषय में विवरण मिलता है उतना पेचिश के विषय मे नहीं मिलता । कुछ ग्रन्थों में तो इसकी चर्चा तक नहीं की गई है इससे यह विचार पैदा होता है कि उस ज़माने में पेचिश होती ही न होगी या बहुत कम मात्रा होती होगी। आज पेचिश हो जाना मामूली बात हो गई है।

अन्य किसी क्षेत्र में हम उन्नति करें या न करें पर बीमारियों के विस्तार और नाना प्रकार के रोग उत्पन्न करने में हमने अवश्य उन्नति की है सो इन दिनों उस रोग का बढ़ा हआ रूप देख रहे हैं । जो किसी ज़माने में इतना मामूली था कि ज़िक्र के काबिल न था। ऐसा क्यों कर हुआ या आगे भी किस कारण से हो सकता है, आप यह सवाल पूछ सकते हैं या ऐसा सवाल आपके दिमाग में उठ सकता है। आपके इस प्रश्न के उत्तर में यह सूत्र प्रस्तुत है, वायु प्रवृद्धोनिचितं बलासं नुदत्यधस्तादहिताशनस्य । योग रत्नाकर -23 के अनुसार’ अहितकारी पदार्थों का सेवन करने से बढ़ी हुई (कुपित) वायुसंचित हुए कफ़ को नीचे (गुदा की ओर) ले जाती है और कभी थोड़ा थोड़ा व कभी ज़्यादा मल बाहर निकलता रहता है।

यद्यपि यह व्याधि अतिसार रोग से मिलती जुलती है पर उससे भी ज्यादा खतरनाक और कष्टदायक है अतः इस के विषय में भूल कर भी कोई भूल या लापरवाही करना, मुसीबतों के जाल में फंसना साबित होगा। आयुर्वेद मे इसका निदान और चिकित्सा विवरण बहुत कम दिया है अतः हम आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार इस रोग के विषय मे संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं ।

पेचिश रोग के प्रकार और लक्षण (Types and Symptoms of Dysentery in Hindi)

pechis rog kitne prakar ka hota hai –

आधुनिक चिकित्सा पद्धति के अन्तर्गत पेचिश (डीसेन्ट्री / आंव ) दो प्रकार की होती है ।

  1. बैसीलरी डीसेन्ट्री (Bacillary Dysentery)
  1. एमीबिक डीसेन्ट्री (Amoebic Dysentery)

बैसीलरी डीसेन्ट्री (पेचिश) –

यह रोग बहुत भयानक और घातक रूप में परिवर्तित हो सकता है और लापरवाही की जाए तो हो भी जाता है। मल में पीड़ा के साथ रक्त तथा आंव आने को पेचिश कहते हैं और यह आंव खून के दस्त मरोड़ के साथ होते हैं । मरोड़ के इस दर्द के कारण मरीज कांखता (आह ध्वनि निकलना) है कराहता है यह पेचिश का प्रमुख लक्षण है। इसका प्रकोप प्रायः अकस्मात होता है और ज्वर के साथ होता है। जांच करने पर इसके कीटाणु (दण्डाणु) तीन प्रकार के मिलते हैं।

  1. शिगा वर्ग (B. Shiga)
  2. फ्लेक्सनर वर्ग (B. Flexner) और
  3. सोन वर्ग (B. Sonne)।

बैसीलरी डीसेन्ट्री (पेचिश) के कारण (Bacillary Dysentery Causes in Hindi) –

bacillary pechis rog kyu hota hai –

यह एक संक्रामक रोग है जो मक्खियों और कीटाणुओं द्वारा फैलता है और परिवार के एक से अधिक व्यक्तियों को हो सकता है किसी को भी हो सकता है। इस के दण्डाणु ही रोग को फैलाते हैं । मुख मार्ग से ये शरीर में प्रवेश करते हैं और आंतों में पहुंचकर बड़ी अंतड़ी में अपना अड्डा बना लेते हैं ।
इस का प्रकोप यूं तो अस्वच्छता और संक्रमण के कारण कभी भी हो सकता है पर ग्रीष्म काल के प्रारम्भ से लेकर वर्षाकाल के अन्त तक की अवधि में इसका प्रकोप विशेष रूप से होता है। आंतों में इन दण्डाणुओं की वृध्दि होती जाती है और ये अन्तर्विष Endotoxin और बहिर्विष Exotoxin उत्पन्न करते हैं जिससे विषाक्त प्रभाव उत्पन्न होता है।

बैसीलरी डीसेन्ट्री (पेचिश) के लक्षण (Bacillary Dysentery Symptoms in Hindi) –

bacillary pechis rog ke lakshan kya hai –

  • इस का प्रभाव आकस्मिक रूप से ज्वर के साथ होता है।
  • उदर में तीव्र शूल ।
  • बार – बार दस्त की हाजत होना याने दिन में 20-25 बार मल त्याग की प्रवृत्ति ।
  • मल के साथ रक्त आना या कभी कभी सिर्फ रक्त निकलना ।
  • तीव्र मरोड़ के साथ दस्त होना ।
  • बार बार हाजत होने से रोगी का परेशान हो जाना आदि लक्षण प्रकट होते हैं।
  • इसके प्रभाव से, शरीर में जल की कमी (Dehydration) होना।
  • प्यास लगना ।
  • जीभ सूखना उल्टी होना आदि लक्षण प्रकट होते हैं ।
  • तेज़ सिर दर्द ।
  • अत्यधिक अवसाद (Depression) ।
  • कमर – दर्द ।
  • बेहद कमज़ोरी और भूख का नाश आदि व्याधियां उत्पन्न होती हैं ।

कभी कभी मरीज में विसूचिका, अतिसार और पेचिश के मिले जुले लक्षण प्रकट होने से सही उपचार करना कठिन हो जाता है। यह रोग दो दिन से सात दिन तक की अवधि में उग्र रूप धारण कर लेता है। अतः इसके लक्षण प्रकट होते ही तुरन्त चिकित्सा कराना बहुत ज़रूरी हो जाता है। एक दिन की लापरवाही भी भारी और घातक सिध्द हो सकती है क्योंकि शीघ्र ही इस व्याधि से मुक्ति न मिले तो संग्रहणी नामक अति कठिन साध्य रोग होने का खतरा पैदा हो जाता है।

एमीबिक डीसेन्ट्री (पेचिश) :

एमीबिक डीसेन्ट्री (पेचिश) के कारण (Amoebic Dysentery Causes in Hindi) –

amoebic pechis rog kyu hota hai –

आधुनिक चिकित्सा पद्धति की मान्यता के अनुसार, ‘एन्टमीबा हिस्टोलिटिका’ Entamoeba Hystolytica नामक’अमीबा’ बृहदन्त्र (Colon) याने बड़ी आंत में पहंच कर वहां घाव पैदा करते रहते हैं जिनसे रक्त निकलता है जो आम के साथ मल मार्ग से मरोड़ के साथ निकलता है ।

यह लंबी अवधी का जीर्ण रोग है। यह रोग धीरे-धीरे पनपता है और युवावस्था में ज्यादातर होता है । इसका आक्रमण अचानक नहीं, बल्कि धीरे – धीरे होता रहता है । इसमें प्रायः ज्वर नहीं होता। इसमें विषाक्तता और घातकता नहीं होती। इसके लक्षण बार बार प्रकट होते रहते हैं और यह रोग महीनों या वर्षों तक पीछा नहीं छोड़ता। यह बच्चों, वृध्दों और स्त्रियों की अपेक्षा युवा पुरुषों को ज्यादा होता है।

एमीबिक डीसेन्ट्री (पेचिश) के लक्षण (Amoebic Dysentery Symptoms in Hindi) –

amoebic pechis rog ke lakshan kya hai –

  • इस रोग का प्रारम्भ धीरे – धीरे, बिना ज्वर के और विषमयता विहीन होने से रोगी चलता फिरता बना रहता है, उसे खाट पर लेटना नहीं पड़ता इससे रोग धीरे धीरे जड़ जमाता रहता है और पुराना होता जाता है।
  • इसमें अतिसार की अपेक्षा कोष्ठबध्दता के लक्षण ज्यादा होते हैं । यदा कदा पतले दस्त भी होते हैं, दस्तों की संख्या घटती बढ़ती रहती है ।
  • दस्तों में आंव और खून आता रहता है ।
  • पेट के दाहिने भाग में स्पर्श करने या दबाने से कष्ट होता है ।
  • शरीर में आलस्य रहता है व शरीर दुबला होने लगता है ।
  • मल में एन्टमीबा हिस्टोलिटिका का मिलना तथा यकृत में विकार होते रहना इसके लक्षण हैं ।
  • रोग का तीव्रता से आक्रमण नहीं होता और दीर्घकाल तक रोग जाता भी नहीं ।
  • मानसिक व शारीरिक रूप से थकावट होने के कारण काम के प्रति अनिच्छा और उत्साह हीनता बनी रहती है।
  • चाहे जब अजीर्ण, आध्मान और अपच की स्थिति बन जाया करती है।

जीवाणु की अवस्थाएं :

इसके जीवाणुओं की दो मुख्य अवस्थाएं होती हैं जिनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है –

1). औद्भिदावस्था Vegetative Stage – इस अवस्था में जीवाणु रुधिरकायाणु से पांच गुणा बड़ा तथा अपने कूटपादों (Pseudo podia) के सहारे गतिशील होता है । प्रायः इसके अन्तर्कायाणरस (Protoplasm) में रुधिर कायाणु (Monocytes) मिलते हैं। व्याधि की तीव्रावस्था जीवाणु के इसी रूप के कारण होती है।

2). कोष्ठावस्था CysticStage – अनुकूल वातावरण न होने पर यह जीवाणु कोष्ठावस्था में अपने को बदल लेता है। इस अवस्था में वृत्ताकार कोष्ठ के भीतर बहुत वर्षों तक अपने को सुरक्षित रख सकता है और अनुकूल स्थिति आने पर पुनः औद्भिदावस्था में आ जाता है। कोष्ठावस्था में बड़ी आन्त्र के गूढ़े स्थानों में ही छिपा रहता है किन्तु क्रियाशील औद्भिदावस्था में यकृत या दूसरे स्थानों में भी मिल सकता है।

इस जीवाणु का संक्रमण मुख द्वारा ही होता है। खाने – पीने के माध्यम से दूसरे विकारों के साथ इस जीवाणु को पेट में पहुंचाने में मक्खियां प्रमुख संवाहक का काम करती हैं । कोष्ठ (Cyst) द्वारा दूषित भोजन या जल के द्वारा इसका प्रवेश आमाशय मार्ग से आंतों में हो जाता है।

पेचिश रोग की तीन अवस्थाएं (Three Stages of Dysentery) :

व्यावहारिक दृष्टि से आम पेचिश की तीन अवस्थाएं होती हैं।

1). तीव्र प्रवाहिका (पेचिश) – इसमें तेज मरोड़ के साथ दिन में 15-20 बार आंव -खून के दस्त होते हैं। शौच से पहले और बाद में देर तक मरोड़ का दर्द होना, पेट के दोनों तरफ़ दबाने से दर्द होना और अग्निमान्द्य होना आदि लक्षण होते हैं।

2). जीर्णावस्था – इस अवस्था में लम्बे समय तक यह व्याधि बनी रहे, दिन में 4-5 बार मलत्याग करने पर भी पेट साफ़ न होना, मल चिकना, ढीला, बदबूदार तथा थोड़ी मात्रा में होना, शरीर दुबला होना, आलस्य , निराशा व अरुचि की भावना का बना रहना, दूध व चिकने पदार्थ हज़म न होना, थकावट और शिथिलता बनी रहना आदि लक्षण होते हैं।

3). सुप्तावस्था – इस अवस्था में, चिकित्सा में लाभ होने से या व्याधि के लक्षणों का खुद ही शमन हो जाने से रोगी अपेक्षाकृत स्वस्थ अनुभव करता है किन्तु उदर में आध्मान, अग्निमान्द्य और कब्ज़ की स्थिति बनी ही रहती है।

पेचिश रोग से बचने के उपाय (Prevention of Dysentery in Hindi) :

pechis rog se bachav kya hai –

पेचिश से बचाव के लिए निम्नलिखित उपाय किये जाने चाहिये ।

  1. पीने के पानी की शुद्धता का ध्यान रखें । इसके लिए समय-समय पर कुँओं, बोरवेल तथा तालाब के जल में ब्लीचिंग पाउडर अथवा पोटैशियम परमैंगनेट डालना चाहिये।
  2. रोगी के मल, मूत्र, थूक आदि को विसंक्रमण करके उनका निष्कासन किया जाये या जला देना चाहिये ।
  3. रोगी को अलग कमरे में सबसे पृथक रखना चाहिये।
  4. पानी को सदा उबालकर ही पीना चाहिये।
  5. खाने पीने की चीजों को मक्खियों से पूर्ण सुरक्षित रखना चाहिये।
  6. शरीर, वस्त्र, मकान, मोहल्ला आदि की साफ सफाई का विशेष ध्यान देना चाहिये।
  7. मक्खियों के फैलाव को रोकने के उपाय करने चाहिये।

दोनों प्रकार की पेचिश के उत्पन्न होने में दूषित भोजन और जल का सेवन, संक्रमण का प्रभाव, अनुचित ढंग से और अनियमित रूप से वक्त – बेवक्त भोजन करना, अपच- मन्दाग्नि और अजीर्ण बना रहना, अभक्ष्य पदार्थों का आहार करना आदि मुख्य कारण होते हैं अतः इनसे बचना चाहिये ।

दोनों प्रकार की पेचिश से आप भली भांति परिचित हो सकें और इनसे बचाव करने के लिए उचित आहार विहार का पालन कर सकें इस उद्देश्य से अति संक्षेप में आवश्यक एवं उपयोगी विवरण सरल शैली में प्रस्तुत कर दिया है। अब इसकी घरेलू चिकित्सा के कुछ गुणकारी उपाय प्रस्तुत किये जा रहे हैं।

पेचिश रोग का घरेलू इलाज (Dysentery Treatment in Hindi)

pechis rog ka gharelu upchar –

इसकी चिकित्सा बहुत सावधानी से करना चाहिए। यदि घरेलू उपायों से लाभ न होता दिखे तो व्यर्थ समय व्यतीत न करके तुरन्त कुशल चिकित्सक से चिकित्सा कराना चाहिए। सबसे पहली बात ध्यान में रखने की यह है कि दस्त बन्द करने की दवा भूल कर भी नहीं देना चाहिए । आंव का असर विषाक्त होता है अतः इसका बाहर निकल जाना ही अच्छा होता है। दस्त बन्द कर देने से आंव पेट में ही रुक जाएगी और अन्य व्याधियां उत्पन्न करेंगी जैसा कि आयुर्वेद ने कहा है –
सर्वेषामेव रोगाणां निदानं कुपिता मलाः । अष्टांग हृदय निदान.1/12

मल के कुपित होने से कई प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं । अतः दस्त बन्द करने वाली दवाओं का सेवन उचित नहीं। अफीम या पोस्ता आदि से युक्त या दस्त बन्द करने वाली कोई एलोपैथिक दवा न देकर पाचन शक्ति बढ़ाने और कब्ज व अपच दूर करने वाली दवाइयों का ही सेवन करना चाहिए ।

प्रकृति पेट में संचित मल और दूषित अंश को पेट से बाहर फेंकना चाहती है इसीलिए दस्त लगते हैं। हमें प्रकृति के कार्य में रुकावट न डाल कर उसके साथ सहयोग करना चाहिए। इसकी श्रेष्ठ विधि तो यह है कि पहले तो हम अपना आहार – विहार सुधारें, पथ्य अपथ्य का पूरा पालन करें और ऐसी कोई गलती न करें जिससे पाचन क्रिया पर ज़ोर पड़े या उसमें और खराबी हो।

दूसरे, कोई हल्का दस्तावर नुस्खा सेवन करके जो दूषित मल या आंव शेष बची हो उसे भी निकाल डालें । भीतर का मल निकलने मात्र से ही रोगी को बड़ा चैन पड़ने लगता है।

1). मृदु विरेचन – इसे हल्का जुलाब भी कहते हैं। एक गिलास दूध में आधा चम्मच लगभग 3 ग्राम) सोंठ चूर्ण डालकर दूध उबालें। उतार कर ठण्डा कर लें। इसमें 2-3 चम्मच शुद्ध अरण्डी तेल (Castor Oil) डालकर रात सोते समय पी लें। आंव और खून के दस्त होने पर यह उपाय अच्छा है। इससे आंव बाहर निकल जाती है और कष्टों से राहत मिलती है। आवश्यकता के अनुसार यह उपाय 23 दिन तक सोते समय प्रयोग करना चाहिए। आंव गिरना बन्द हो जाए तब बन्द कर दें।

2). गुलकन्द – कुछ दिन तक, दिन में 1-2 बार 10 से 15 ग्राम मात्रा में या अपने अनुकूल मात्रा में गुलकन्द खाना चाहिए |

3). मुनक्का – 10-10 मुनक्का, काली मिर्च और सेन्धा नमक लगाकर प्रतिदिन खाना चाहिए। 15 से 20 दिन तक यह प्रयोग करने से पेचिश (आंव) रोग का शमन होता है।

4). अरण्ड – पेट दर्द करता हो तो बड़ या अरण्ड के पत्तों को ज़रा सा गरम करके इन पर हल्का सा तेल या शुद्ध घी चुपड़ कर पेट पर रखें और कपड़ा लपेटकर इस पर थोड़ी देर तक सेक करना चाहिए। इससे पेट दर्द में बड़ी जल्दी आराम होता है।

5). बेल का शर्बत – बेल (बिल्व) फल यद्यपि पूरे वर्ष भर और हर वक्त उपलब्ध नहीं होता तथापि इसके पके फल के गूदे का शर्बत पुरानी आंव और कब्ज़ को दूर करने वाली बेजोड़ और अव्यर्थ औषधि है। यह शर्बत आंव, कब्ज, पेचिश और बवासीर के रोगी के लिए बहुत फायदेमन्द हैं। बेल का शर्बत बनाने की विधि भी वैसी ही है जैसे किसी भी द्रव्य का शर्बत बनाने की होती है। आधा किलो पके हुए फलों का गूदा 2 लिटर पानी में उबाल कर पकाएं। जब एक लिटर पानी बचे तब छान कर दो किलो चीनी (शकर) डालकर शर्बत बना लें व ठण्डा करके बोतलों में भर लें। इसे 20 से 40 मि.ली. (2 से 4 तोला) समभाग पानी में घोल कर दिन में 2-3 बार सेवन करना चाहिए।

पेचिश रोग की आयुर्वेदिक दवा (Ayurvedic Medicine for Dysentery in Hindi)

pechis rog ki dawa –

1). उत्तम योग – कुड़ा की छाल या इन्द्र जौ, अतीस, बेलगिरी, नेत्र वाला और नागर मोथा इन पांच दवाओं को 20-20 ग्राम वज़न में लेकर कूट पीस कर एक में मिला लें। इसका 10 ग्राम चूर्ण चार कप पानी में डाल कर उबालें। जब एक कप जल शेष बचे तब आधा सुबह और आधा शाम को पी लें। लाभ न होने तक यह प्रयोग निरन्तर रूप से से करते रहें।

2). कुटजारिष्ट – यह औषधि बॉटल पेकिंग में, आयुर्वेदिक औषधि विक्रेताओं की दूकान पर मिलती है। दिन में 3 या 4 बार 2-2 चम्मच (बड़ा) कुटजारिष्ट समभाग पानी में मिलाकर पूरा आराम होने तक सेवन करना चाहिए। इसे भोजन के बाद भी इसी विधि से सुबह शाम सेवन कर सकते हैं। यह अरिष्ट प्रवाहिका (पेचिश), अतिसार, रक्तातिसार, संग्रहणी, मन्दाग्नि, ज्वर आदि के लिए अत्यन्त गुणकारी योग है । यह बालकों के लिए भी हितकारी है। इन व्याधियों से शरीर पर जो दुष्प्रभाव पड़ते हैं उन्हें भी दूर कर रोगी को इन व्याधियों से मुक्त करती है अतः इसका सेवन विश्वास पूर्वक करना चाहिए।

पेचिश रोग में खान-पान और परहेज (Diet in Dysentery in Hindi) :

pechis me kya khaye kya na khaye –

पेचिश के रोगी के लिए परहेज़ औषधि से भी ज्यादा ज़रुरी और गुणकारी होता है क्योंकि यह
बीमारी बदपरहेज़ी से ही पैदा होती हैं और बढ़ती भी है। जो रोगी अपनी जीभ को वश में नहीं रख
पाते वे ही इस रोग के शिकार होते हैं और बीमार होकर भी वे खान पान पर नियन्त्रण नहीं रखेंगे तो स्वस्थ होने की सम्भावना ही नहीं रहेगी । ज्यादा दिन पेचिश बनी रहे तो संग्रहणी नामक भयानक व्याधि हो जाती है।

  • भोजन में, अगर रोग पुराना हो तो, कुछ दिनों के लिए अन्न का सेवन बिल्कुल बन्द कर देना चाहिए।
  • पुराने चावल का भात और ताजा घर का जमा हुआ दही सर्वश्रेष्ठ आहार है।
  • कठोर पदार्थों का सेवन न करके नरम व हल्के पदार्थ जैसे पुराने चावल का भात, धान की लाई (लावा), साबूदाना सिंघाड़े और आटे की लपसी, चावल मूंग की खिचड़ी, गेहूं का दलिया, गाय या बकरी का दूध, चावल या माण्ड आदि का सेवन करना चाहिए ।
  • केवल दही चावल और छाछ पर ही कुछ दिन रह सकें तो तबीअत बहुत जल्दी ठीक हो सकेगी।
  • पानी उबाल कर ठण्डा किया हुआ ही पीना चाहिए।
  • ऐसे रोगी को अधिक चलना फिरना नही चाहिए और शय्या पर विश्राम Bed Rest करना चाहिए।
  • ज्यादा कमज़ोरी हो तो पलंग पर लेटे लेटे ही मल मूत्र विसर्जन की व्यवस्था करना चाहिए ।
  • स्नान न करके गीले तौलिए से शरीर पोंछ लेना चाहिए। ऐसी कोई गतिविधि या कामकाज करना वर्जित है जिससे शरीर पर भार पड़े और थकावट हो क्योंकि इससे रोगी की स्थिति बिगड़ती है।

(अस्वीकरण : दवा ,उपाय व नुस्खों को वैद्यकीय सलाहनुसार उपयोग करें)

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