प्राणायाम के नियम, महत्व, तरीका और लाभ – Pranayam Karne ke Niyam, Tarika aur Labh in Hindi

प्राणायाम के लाभ और महत्व (Pranayama Benefits in Hindi)

pranayam ke labh hindi me –

प्राणायाम से प्राप्त होने वाले कुछ प्रमुख लाभ इस प्रकार हैं –

1) प्राणायाम चूंकि प्राणों के संयम व नियंत्रण पर आधारित क्रियाएं हैं, अतः इसका प्रथम लाभ तो यही है कि जो प्राण हमारे जीवन का आधार हैं, उनके वश में होने पर जीवन अपने वश में हो जाता है।

2) प्राणायाम हमारी आयु-वृद्धि करता है । प्राणायाम का अभ्यासी साधक गहरी और गिनती में कम सांसे लेता है। इसलिए वह अपनी उम्र अधिक दिनों तक स्थिर रख सकता है। जो लोग हांफते हैं या अनियमित व जल्दी-जल्दी सांस लेते हैं, वे कम जीते हैं।

3) प्राणायाम हमारी जीवन शक्ति को बढाता है । प्राणायाम के द्वारा हम प्राण वायु को अधिक-से-अधिक खींचने का अभ्यास करते हैं जिससे हमारे शरीर में जीवन शक्ति बढ़ती है।

4) शरीर के अनेक रोग प्राणायाम के अभ्यास से दूर हो सकते हैं।

5) प्राणायाम के अभ्यास से बिमारियों से बचा भी जा सकता है। जो प्राणायाम के अभ्यासी हैं उन्हें कोई रोग होतें ही नहीं है।

6) अष्टांग योगों में प्राणायाम आवश्यक क्रिया है। बिना इसके प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि कठिन है।

7) प्राणायाम के अभ्यास से बुद्धि तीव्र और सूक्ष्म होती है। यह हमारे विवेक को जागृत करता है। इसका अभ्यास प्राण के साथ मन को भी अपने वश में करता है।

8) प्राणायाम से सर्दी और गर्मी को सहने की ताकत आ जाती है। योगी प्राणायाम के द्वारा जमा देने वाली सर्दी और तन को जला देने वाली गर्मी से भी शरीर की रक्षा कर सकते हैं।

9) योग दर्शन के अनुसार प्राणायाम के अभ्यास से मन को अन्दर-बाहर, किसी भी स्थान विशेष पर ठहराने की शक्ति प्राप्त हो जाती है। इससे प्रत्याहार सिद्धि में भी सहायता मिलती है।

10) प्राणायाम का अभ्यास शरीर को क्रियाशील व लचीला बनाता है । शरीर में फुर्ती-चुस्ती और कांति आ जाती है।

11) प्राणायाम का अभ्यास शरीर, मन व प्राण के समस्त विकारों को दूर करता है । इसके अभ्यास से इन्द्रियों के दोष दूर हो जाते हैं।
दह्यन्ते ध्याय मानानां धातनां हियथा मलाः।
तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात।।

अर्थात – जैसे आग में तपाये जाने पर स्वर्ण आदि धातुओं का मल नष्ट हो जाता हैं, वैसे ही प्राणायाम के अनुष्ठान से इन्द्रियों में आ गए दोष विकार आदि नष्ट हो जाते हैं।

12) प्राणायाम से शरीर के त्रिदोष (कफ, पित्त और वायु) के प्रकोप को शांत करता हैं जिस्से शरीर स्वस्थ और दीर्घायु हो जाता है।

13) प्राणायाम के अभ्यास से मानसिक शक्तियों को बढ़ाकर बहुत से असाधारण कार्य किए जा सकते हैं। इच्छा शक्ति उन्हीं में से एक शक्ति है। इच्छा शक्ति मस्तिष्क को गति प्रदान करती है। इच्छा शक्ति के सुव्यवस्थित अभ्यास के द्वारा इच्छित मनुष्य या मनुष्यों में इस विद्युत की मात्रा को बढ़ाया जा सकता है, व इसके द्वारा अनेक रोगों का उपचार किया जा सकता है।

14) प्राणायाम के अभ्यास से अपनी शक्ति व सामर्थ्य से अधिक कार्य किए जा सकते हैं। जैसे अपनी सामर्थ्य से दो गुना वजन उठाना, वाहन रोकना, सीने पर भार या भारी पशु को खड़ा करना, लोहे की जंजीर तोड़ना आदि। यह सब प्राणायाम की शक्तियां हैं।

15) मानस-चिकित्सा के लिए भी प्राणायाम का अभ्यास होना चाहिए।

प्राणायाम करने के नियम (Rules of Pranayama in Hindi)

pranayam karne ke niyam in hindi –

1). प्राणायाम शुद्ध सात्त्विक निर्मल स्थान पर करना चाहिए। यदि सम्भव हो तो जल के समीप बैठकर अभ्यास करें।

2). शहरों में जहाँ प्रदूषण का अधिक प्रभाव होता है, उस स्थान को प्राणायाम से पहले घृत एवं गुग्गुलु द्वारा सुगन्धित कर लें या घृत का दीपक जलायें।

3). प्राणायाम के लिए सिद्धासन/सुखासन या पद्मासन में मेरुदण्ड को सीधा रखकर बैठें। बैठने के लिए जिस आसन का प्रयोग करते हैं, वह विद्युत् का कुचालक होना चाहिए, जैसे कम्बल या कुशासन आदि। जो लोग जमीन पर नहीं बैठ सकते वे कुर्सी पर बैठकर भी प्राणायाम कर सकते हैं।

4). श्वास सदा नासिका से ही लेना चाहिए। इससे श्वास फिल्टर होकर अन्दर जाता है। दिन में भी श्वास नासिका से ही लेना चाहिए। इससे शरीर का तापमान भी इडा (चन्द्र), पिंगला (सूर्य) नाड़ी के द्वारा सुव्यवस्थित रहता है और विजातीय तत्त्व नासा-छिद्रों में ही रुक जाता है।

5). प्राणायाम करते समय मन शान्त एवं प्रसन्न होना चाहिए। वैसे प्राणायाम से भी मन स्वतः शान्त, प्रसन्न तथा एकाग्र हो जाता है।

6). प्राणायाम करते हुए थकान अनुभव हो तो बीच-बीच में थोड़ा सूक्ष्म व्यायाम या विश्राम कर लेना चाहिए।

7). प्राणायाम के दीर्घ अभ्यास के लिए संयत व सदाचार का पालन करें। भोजन सात्त्विक एवं चिकनाई-युक्त हो, दूध,घृत, बादाम एवं फलों का उचित मात्रा में प्रयोग हितकर है।

8). प्राणायाम में श्वास को हठपूर्वक नहीं रोकना चाहिए। प्राणायाम करने के लिए श्वास अन्दर लेना ‘पूरक’, श्वास को अन्दर रोककर रखना ‘कुम्भक’, श्वास को बाहर निकालना ‘रेचक’ और श्वास को बाहर ही रोकना ‘बाह्यकुम्भक’ कहलाता है।

9). प्राणायाम का अर्थ सिफ पूरक, कुम्भक एवं रेचक ही नहीं, वरन् श्वास और प्राणों की गति को नियन्त्रित और सन्तुलित करते हुए मन को भी स्थिर एवं एकाग्र करने का अभ्यास करना है।

10). प्राणायाम से पूर्व कम से कम तीन बार “ओ३म” का लम्बा उच्चारण करना, प्राणायाम का अभ्यास करने के लिए गायत्री, महामृत्युंजय या अन्य वैदिक मन्त्रों का विधिपूर्वक उच्चारण या जाप आध्यात्मिक दृष्टि से लाभप्रद है।

11). प्राणायाम करते समय मुख, आँख, नाक आदि अंगों पर किसी प्रकार तनाव न लाकर सहजावस्था में रखना चाहिए। प्राणायाम के अभ्यास-काल में ग्रीवा, मेरुदण्ड, वक्ष, कटि को सदा सीधा रखकर बैठे, तभी अभ्यास यथाविधि तथा फलप्रद होगा।

12). प्राणायाम का अभ्यास धीरे-धीरे बिना किसी उतावली के, धैर्य के साथ, सावधानी से करना चाहिए।
यथा सिंहो गजो व्याघ्रो भवेद् वश्यः शनैः शनैः। तथैव वश्यते वायुरन्यथा हन्ति साधकम्॥
जैसे सिंह, हाथी या बाघ जैसे हिंसक जंगली प्राणियों को बहुत धीरे-धीरे अति सावधानी से वश में किया जाता है। उतावलापन करने से ये प्राणी हमला कर हानि भी पहुँचा सकते हैं इसी प्रकार प्राणायाम को धीरे-धीरे बढ़ाते हुए प्राण पर नियंत्रण करना चाहिए अन्यथा साधक को नुकसान हो सकता है।

13). सभी प्रकार के प्राणायामों के अभ्यास से पूर्ण लाभ उठाने के लिए गीता का निम्नांकित श्लोक कण्ठस्य करके स्मरण करते हुए व्यवहार में लायें-
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। युक्तास्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।
अर्थात्, जिस व्यक्ति का आहार-विहार ठीक है, जिस व्यक्ति की सांसारिक कार्यों के करने की निश्चित दिनचर्या है और जिस व्यक्ति के सोने-जागने का समय भी निश्चित है, ऐसा व्यक्ति ही योग का अधिकारी है , तथा उसका योगानुष्ठान दु:खों का नाशक बनता है, अन्यों का नहीं।

14). प्राणायाम शौचादि नित्यकर्म से निवृत्त होकर करना चाहिए। यदि किसी को कब्ज़ रहता हो तो रात्रि में भोजन के उपरांत आंवला एवं घृतकुमारी (ऐलोवेरा) का जूस पीना चाहिए। इससे कब्ज नहीं होगा।

15). प्राणायाम स्नान करके करते हैं तो अधिक आनन्द, प्रसन्नता व पवित्रता का अनुभव होता है। यदि प्राणायाम के बाद स्नान करना हो तो 10-15 मिनट बाद स्नान कर सकते हैं। साथ ही प्राणायाम करने के 10-15 मिनट बाद प्रातः, अंकुरित अन्न या अन्य खाद्य पदार्थ ले सकते हैं।

16). प्राणायाम के तुरंत बाद चाय, कॉपी या अन्य मादक, उत्तेजक या नशीले पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।

17). प्राणायाम के बाद दूध, छाछ, लस्सी, फलों का जूस, हरी सब्जियों का जूस, पपीता, सेब, अमरूद या चेरी आदि फलों का सेवन आरोग्यदायक है।

18). अंकुरित अन्न, दलिया या अन्य स्थानीय आहार जो पचने में भारी न हो, प्राणायाम के बाद लेना चाहिए। प्रथम बात तो परांठे, हलवा या अन्य नाश्ते से बचें तो ही श्रेष्ठ है और यदि परांठा आदि खाने का बहुत दिल करे तो स्वस्थ व्यक्ति सप्ताह में एक या अधिकतम दो बार ही भारी नाश्ता ले। रोगी व्यक्ति को भारी से परहेज करना चाहिए।

19). प्रतिदिन एक जैसा नाश्ता उचित नहीं। शरीर के सम्पूर्ण पोषण के लिये सप्ताह भर के क्रम में नाश्ते के लिये किसी दिन अंकुरित अन्न तो कभी दलिया, कभी दूध, कभी केवल फल, कभी केवल जूस या दही, छाछ आदि लेना चाहिए। इससे शरीर को सम्पूर्ण पोषण भी मिलेगा और आपको नाश्ते में बोरियत नहीं लगेगी। परिवर्तन जीवन का सिद्धान्त है और हमारी चाहत भी।

20). योगाभ्यासी का भोजन सात्विक होना चाहिए। हरी सब्जियों का प्रयोग अधिक मात्रा में करें, अन्न कम लें, दालें छिलके सहित प्रयोग करें। ऋतभुक्, मितभुक् व हितभुक् बनें। शाकाहार ही श्रेष्ठ, सम्पूर्ण व वैज्ञानिक भोजन है।

21). सुबह उठकर पानी पीना, ठंडे पानी से आंखों को साफ करना, पेट व नेत्रों के लिये अत्यंत हितकर है।

22). नाश्ते व दोपहर के भोजन के बीच एक बार तथा दोपहर व सायंकाल के भोजन के बीच में थोड़ा-थोड़ा करके जल अवश्य ही पीना चाहिए। इससे हम पाचन तन्त्र, मूत्र संस्थान, मोटापा व कॉलेस्ट्रॉल आदि बहुत से रोगों से बच जाते हैं।

23). गर्भवती महिलाओं को कपालभाति, बाह्य प्राणायाम एवं अग्निसार क्रिया को छोड़कर शेष प्राणायाम व बटरफ्लाई आदि सूक्ष्म व्यायाम व कठिन आसन नहीं करने चाहिए।सूक्ष्म व्यायाम व बाह्य प्राणायाम को छोड़कर शेष सभी प्राणायाम माहवारी के समय भी नियमित रूप से अवश्य करें। गर्भवती महिलाओं को सर्वांगासन, हलासन आदि कठिन आसनों का अभ्यास नहीं करना चाहिए।

24). उच्च रक्तचाप व हृदयरोग से पीड़ित व्यक्ति को सभी प्राणायामों का अभ्यास धीरे-धीर अवश्य करना चाहिए। इनके लिए प्राणायाम ही एक मात्र उपचार है। बस सावधानी इतनी ही है कि भस्त्रिका, कपालभाति व अनुलोम-विलोम आदि प्राणायाम धीरे-धीरे करें, अधिक बल का प्रयोग न करें। कुछ लोग अज्ञानवश यह भ्रम फैलाते हैं कि उच्च रक्तचाप व हृदयरोग से पीड़ित व्यक्ति प्राणायाम न करें। यह नितान्त अज्ञान है। किसी भी ऑपरेशन के बाद कपालभाति प्राणायाम 4 से 6 माह बाद करना चाहिए। हृदयरोग में बाइपास या एञ्जियोप्लास्टी के एक सप्ताह बाद ही अनुलोम-विलोम, भ्रामरी व उद्गीथ प्राणायाम, सूक्ष्म व्यायाम व शवासन का अभ्यास अवश्य करना चाहिए। इससे उनको शीघ्र लाभ मिलेगा।

25). आयुर्वेद में मुख्यतया तीनों दोषों (वात, पित्त, कफ) का प्रकुपित होना या विषम होना रोगोत्पत्ति का कारण माना गया गया है, तीन दोषों का सम्बन्ध विविध शरीरगत तन्त्र व संस्थानों से है। इसलिए सही ढंग से नियमानुसार आसन, प्राणायाम व ध्यान का अभ्यास करने से तीनों दोषों को सम अवस्था में रखा जा सकता है।

प्राणायाम करने का तरीका (How to do Pranayam in Hindi)

pranayama karne ka tarika –

प्राणान् प्रपीड्येह संयुक्तचेष्ठः क्षीणे प्राणे नासिकयोच्छ्वसीत् ।
दुष्टाश्वयुक्तमिव वाहमेनं विद्वान्मनो धारयेताप्रमत्तः ॥
(श्वेताश्वेतरोपनिषत् २/9)

भावार्थ:- चेष्टाओं को वश में करके प्राण को भीतर रोके, उसका पीडन करें । जब प्राण भीतर न रूके, वह क्षीण होने लगे, तब नासिका से उसे बाहर निकाल दें। दुष्ट घोड़ों वाले रथ में जैसे घोड़ों को वश में किया जाता है, वैसे अप्रमादी होकर प्राणायाम के साधन से मन रूपी घोड़े को वश में करें।

समे शचौ शर्करावह्निवालकाविवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभिः ।
मनोनुकूले न तु चक्षुपीडने गुहानिवाताश्रयणे प्रयोजयेत् ॥
(श्वेताश्वेतरोपनिषत् -2/10)

भावार्थ:- मन को वश में करने वाले प्राणायाम का यह प्रयोग ऐसे स्थान में करे जो सम हो, पवित्र हो, अग्नि, कंकड़-रेत से रहित हो, जो जल के कल-कल-रव तथा लतादि के आश्रय के कारण मनोनुकूल हो, जहां आंखों को कष्ट न हो, गुफा हो- जहां वायु के झोंके न चलें।

नीहारधूमार्कानिलानलानां खद्योतविद्युत्स्फटिकशशीनाम् ।
एतानि रूपाणि पुरःसराणि ब्रह्मण्यभिव्यक्तिकराणि योगे ॥
(श्वेताश्वेतरोपनिषत् -2/11)

भावार्थ:- जब योगी ब्रह्म का ध्यान करता है, तो उसे शुरू में भिन्न-भिन्न रूप दिखलाई पड़ता है। कुहरा सा, धुआँ सा, सूर्य, वायु, अग्नि, जुगनू, बिजली, स्फटिक, चन्द्र- इनकी ज्योतियाँ दिखलाई देती है । योग में ब्रह्म- दर्शन से पहले-पहल ये रूप ब्रह्म को अभिव्यक्त करने के लिये होते है । ब्रह्म का इतना भारी प्रकाश है कि उसे सहने के लिये पहले ये प्रकाश दिखायी देते है ताकि योगी उस प्रकाश को सह सके।

प्राणायाम करने में सावधानियां (Precautions for Pranayama Practice in Hindi)

Pranayam karne me savdhaniya –

प्राणायाम करने वाले निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें –

  1. प्राणायाम उस जगह पर न करें जहां – धूल, धुआं, सीलन और कोलाहल हो।
  2. प्राणायाम की विधि सही व शास्त्रोक्त अपनाई जायें।
  3. ठंड के मौसम में शीतली, सीत्कारी और चन्द्रभेदी प्राणायाम नहीं किये जाने चाहिए । लेकिन पित्त प्रकृति वाले इन प्राणायामों का अभ्यास ठंड के मौसम में भी कर सकते हैं, अन्य व्यक्ति नहीं।
  4. वात-प्रकृति वालों को शीतली, प्लावनी, शीतकारी, सीत्कारी,कंठवायु, केवली और उदर पूरक प्राणायाम नहीं करना चाहिये।
  5. कमजोर देह (body) के अभ्यासी को भस्रिका, नाड़ी अवरोध, वायवीय कुम्भक, मुख प्रसारण पूरक, अग्निप्रदीप्त हृदय स्तब्ध, एकांग स्तम्भ, सर्वांग स्तम्भ, प्राणायाम नहीं करना चाहिए।
  6. गर्मी के मौसम में भस्रिका, मुख प्रसारण, सूर्यभेदी, एकांग स्तम्भ, अग्नि प्रदीप्त, हृदय स्तम्भ, नाड़ी अवरोधक, सर्वांग स्तम्भ आदि प्राणायाम न करें। किन्तु कफ प्रकृति वाले इन्हें ठंडे प्रदेशों या पहाड़ी स्थानों पर गर्मी में भी कर सकते हैं।
  7. बुखार से पीड़ित मरीजों व गर्भवती स्त्रियों को प्राणायाम नहीं करना चाहिए।
  8. सर्वथा भूख से पीड़ित और भरे पेट भी प्राणायाम नहीं करना चाहिए।

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