रजः प्रवर्तनी वटी के फायदे और नुकसान – Rajah Pravartini Vati in Hindi

रजः प्रवर्तनी वटी क्या है ? (What is Rajah Pravartini Vati in Hindi)

रजः प्रवर्तनी वटी टेबलेट के रूप में उपलब्ध एक आयुर्वेदिक दवा है। इस आयुर्वेदिक औषधि का विशेष उपयोग मासिक धर्म के विकार जैसे –
मासिक धर्म में दर्द, मासिक धर्म में ज्यादा ब्लीडिंग, मासिक धर्म का न आना जैसी बीमारियों के उपचार में किया जाता है। रजः प्रवर्तनी वटी के सेवन से गर्भाशय के दोष दूर होकर मासिक धर्म (पीरियड्स) नियमित समय पर और सामान्य मात्रा में होने लगता है।

घटक द्रव्य एवं उनकी मात्रा :

  • एलुआ – 100 ग्राम,
  • काशीस भस्म – 100 ग्राम,
  • हींग – 100 ग्राम,
  • शुद्ध टंकण – 100 ग्राम,

भावनार्थ

घृत कुमारी स्वरस – आवश्यकतानुसार।

प्रमुख घटकों के विशेष गुण :

  1. एलुआ : रजः प्रवर्तक, सारक (निकालने वाला), मलवायु निःसारक।
  2. काशीस भस्म : रक्तवर्धक (खून बढ़ानेवाला), रजः प्रवर्तक।
  3. हींग : दीपक, पाचक, रजः प्रवर्तक, शूल प्रशामक, अनुलोमक।
  4. टंकण : आर्तव जनक, मूत्रजनक, सारक, मलवातानुलोमक।
  5. घृतकुमारी : शोथहर (सूजन दूर करे), वेदनास्थापक (दर्द दूर करने वाली), आर्तव जनक, अनुलोमक।

रजः प्रवर्तनी वटी बनाने की विधि :

हींग को भूरा होने तक घृत में भून कर बारीक पीस लें, एलुआ भी पीस लें यदि गीला हो तो उसको एक बर्तन में रखकर इतना खौलता हुआ पानी डाले जिसमें एलुआ के टुकड़े डूब जाए, एक घण्टे के बाद जल समेत खरल में डालकर इतना खरल करे कि एलुए के कण दिखाई न दें। फिर कासीस भस्म और टंकण मिलाकर खरल करें सूख जाने पर घृतकुमारी स्वरस में एक दिन खरल करके 250 मि.ग्रा. की वटिकाएँ (गोली) बनवा कर छाया में सुखा लें।

रजः प्रवर्तनी वटी की खुराक (Dosage of Rajah Pravartini Vati)

एक से दो गोली दिन में दो तीन बार भोजन से पूर्व, अथवा भोजनोत्तर ।

अनुपान : सोया क्वाथ, उष्णोदक (गुनगुना पानी), कुमार्यासव, कुमार्यासव के अनुपान से सेवन
करवाना हो तो सदैव भोजनोपरान्त करवाना चाहिए।

रजः प्रवर्तनी वटी के फायदे और उपयोग (Benefits & Uses of Rajah Pravartini Vati in Hindi)

रजः प्रवर्तनी वटी के कुछ स्वास्थ्य लाभ –

1). रज:रोध (मासिक धर्म का न आना) में रजः प्रवर्तनी वटी का उपयोग लाभप्रद

स्त्रीयों को ग्याहर-बारह वर्ष की आयु से प्रतिमास तीन से पाँच दिन के लिए रजःस्राव (महावारी) होता है। प्राकृतिक रूप से गर्भधारण काल, स्तन्य पान और रजो निवृति काल (50 वर्ष के लगभग आयु) में रज:स्राव नहीं होता। उपरोक्त अवस्थाओं के अतिरिक्त यदि स्त्री को मासिक रजः स्राव नहीं हो तो उसे रजः रोध कहते हैं। रज:स्राव (महावारी) के पूर्व या रजःस्राव काल में वेदना हो तो उसे कृच्छ्रार्तव कहते हैं।

आर्तव (महावारी) यदि थोड़ा-थोड़ा रुक-रुक कर आए या तीन दिन के भीतर ही रजःकाल समाप्त हो जाए तो उसे अल्पार्तव और यदि किसी कन्या को सोलह वर्ष की आयु तक रजोदर्शन न हो तो रजादर्श कहते हैं । मासिक धर्म से सम्बन्धित उपरोक्त चारों अवस्थाओं में रजः प्रवर्तिनि वटी एक महत्त्वपूर्ण औषधि है।

रज:रोध के कारणों में रक्ताल्पता (खून की कमी) एक महत्त्वपूर्ण कारण है रजः प्रवर्तिनी वटी के घटकों में कासीस भस्म उत्तम रक्त वर्धक औषधि है । इसके सेवन से रक्ताल्पता दूर होकर रक्तस्राव समय पर होने लगता है, अन्य तीनों घटक रजः प्रर्वतक, मलवातानुलोमक, वातकफ शामक, होने के कारण रजःस्राव में सहायक होते हैं। फिर भी ऐसी रुग्णाओं को पुनर्नवादि मण्डूर दो गोली 500 मि.ग्रा. प्रात: सायं भोजन के बाद अवश्य देनी चाहिए।

शोथ (सूजन) नाशक होने के कारण यदि जननाङ्गों में शोथ, रजः रोध का कारण हो तो वह भी ठीक हो जाता है । चिकित्सा दो से तीन मास।

औषधि योजना : इस औषधि का प्रयोग रजःस्राव समाप्ति के तीन दिन बाद करना चाहिए। परन्तु यदि रजः स्राव अधिक दिनों से बन्द हो और मासिक धर्म की तिथि (डेट) याद नहीं हो औषधि किसी भी दिन प्रारम्भ की जा सकती है। दो गोलियाँ 500 मि.ग्रा. प्रातः सायं भोजन से पर्व उष्णोदक (गुनगुना पानी) अथवा दूध से दें, भोजन के उपरान्त पुनर्नवादि मण्डूर दो गोली 500 मि.ग्रा. शीतल जल से दें। सम्भावित रजः स्राव तिथि या तीन सप्ताह के उपरान्त रजः प्रवर्तिनी की दो गोलियां दिन में तीन बार कर दें, रज: स्राव होने पर औषधि एक सप्ताह के लिए स्थगित कर दें। यदि रज: स्राव तीन सप्ताह के पूर्व हो जाए तो उसी दिन से औषधि एक सप्ताह के लिए स्थगित कर दें और अगामी मासों में उसी तिथि को सम्भावित रजः स्राव तिथि मान लें। इस प्रकार की दो या तीन आवृतियों के उपरान्त मासिक धर्म सामान्य हो जाता है।

रुग्णा को मलावरोध हो तो आरोग्य वर्धिनी वटी, कुमार्यासव या गुलकन्द का प्रयोग करवा सकते हैं।

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2). रजः कृच्छ्र (मासिक धर्म में दर्द) में रजः प्रवर्तनी वटी के सेवन से लाभ

रजः कृच्छ्र के कारणों में वात अथवा कफ दोषों की वृद्धि एवं प्रजननागों के शोथ (सूजन) मुख्य कारण होते हैं। अतः रजः कृच्छ्र की अवस्था में रजः प्रवर्तिनी वटी के साथ प्रजनाङ्गों के शोथ के लिए आरोग्य वर्धिनी वटी और पुनर्नवादि मण्डूर की योजना करनी चाहिए, और उपरोक्त योजना की तरह सम्भावित रजः स्राव तिथि के एक सप्ताह पूर्व योगराज गुग्गुलु दो गोली प्रातः सायं दशमूल क्वाथ अथवा दशमूलारिष्ट के साथ देना प्रारम्भ कर दें। यदि वेदना हो तो गर्म पानी की थैली से श्रोणी प्रदेश (कटि प्रदेश) पर सेक करें।

रज: स्राव हो जाने पर रजः प्रवर्तिनी वटी का प्रयोग स्थगित कर दें। योग राज गुग्गुलु का प्रयोग वेदना शमन होने तक करवाते रहें। चकित्सावधि दो से तीन आर्तव चक्र।

( और पढ़े – मासिक धर्म के दर्द का घरेलू उपचार )

3). रजाल्पता मिटाए रजः प्रवर्तनी वटी का उपयोग

रजाल्पता की रुग्णायें प्रायशः रक्ताल्पता (खून की कमि) युक्त होती है। इन रुग्णाओं में नवायस चूर्ण, पुनर्नवादि मण्डूर, मण्डूरवज्र वटक, ताप्यादि लोह, बिन्धवासी योग इत्यादि में से एक का प्रयोग एक मास तक करवाएं। रक्ताल्पता दूर हो जाने पर मासिक रजाम्राव होने लगता है। यदि फिर भी रजः स्राव न हो तो रजः प्रवर्तिनी वटी या कन्यालोहादि वटी का प्रयोग करवाने से मासिक धर्म सामान्य हो जाता है।

4). रजःदर्श या रजोलोप में फायदेमंद रजः प्रवर्तनी वटी के औषधीय गुण

सामान्यतः धावक (दौड़नेवाला) एवं अन्य खेलों में भाग लेने वाली युवतियों में मासिक धर्म विलम्ब से होता है। कारण उनका रज उनकी शारीरिक शक्ति में परिवर्तित होकर व्यय हो जाता है, यही कारण है की ऐसी युवतियाँ लम्बी छरहरी होती है उनके स्तन स्फिन भी अन्य युवतियों की तुलना में कम विकसित होते हैं। और उनमें यौनेच्छा भी प्रायः कम होती है। ऐसी युवतियों को एक मास तक पुष्प धन्वारस, और फल घृत का प्रयोग करवा कर दूसरे मास में उपरोक्त प्रकार से रजः प्रवर्तिनी वटी की योजना करें, परन्तु पुष्प धन्वा रस का प्रयोग बन्द नहीं करें ।

सहायक औषधियों में अशोकारिष्ट, वलारिष्ट, कन्यालोहादिवटी, ताप्यादि लोह, नवायस चूर्ण प्रभृति औषधियों में से किसी एक या दो का प्रयोग अवश्य करवाए।

रजःदर्श का एक अन्य कारण भी है, चुल्लिका ग्रंथि (थायरायड) स्राव हीनता, रक्त की थायरायड प्रोफाइल (T3T4 TSH) जाँच करवा कर रोग का निश्चय हो जाए तो काँचनार गुग्गुलु, कांचनाराभ्र, गण्डमाला कण्डण रस, व्योषाद्य वटी में से किसी दो का प्रथम मास सेवन करवाने के उपरान्त, रजः प्रवर्तिनी वटी दो गोली, आरोग्यवर्धिनी वटी दो गोली, गोमूत्र 25 मि.लि. शुद्ध जल 25 मि.लि. के अनुपान से दें। उपरोक्त कांचनार गुग्गुलु प्रभृति औषधियाँ निरन्तर देते रहे, तीन से छ: मास से रजः स्राव सामान्य रूप से होने लगता है।

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5). श्वास रोग में रजः प्रवर्तनी वटी के इस्तेमाल से फायदा

श्वास एक आमाशयोत्थ व्याधि है, आक्रमण काल में कफ का श्वास नली में चिपक जाना एक समस्या होती है। कफ निकल जाने पर रोगी शान्ति का अनुभव करता है। रजः प्रवर्तिनी वटी दो गोलियाँ उष्णोदक से देने से कफ तरल होकर निकलने लगता है तथा रेचन होने से श्वास की मूलभूत चिकित्सां ‘तमकस्तु विरेचने’ हो जाती है। विराम काल में भी रजः प्रवर्तिनी दो गोलियाँ प्रात: सायं देने से आमोत्पत्ती रुक जाती है मल वायु का अनुलोमन होकर श्वास में लाभ होता है।

सहायक औषधियों में श्वास कास चिन्तामणि रस, श्वास कुठाररस, भार्गीगुड़, कण्टकार्यावलेह, कनकासव इत्यादि का प्रयोग करवाए।

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6). जीर्ण मलावरोध (पुरानी कब्ज) में रजः प्रवर्तनी वटी के इस्तेमाल से लाभ

रजः प्रवर्तिनि वटी की दो गोलियाँ प्रातः सायं उष्णोदक के साथ प्रयोग करवाने पर जीर्ण मलावरोध दूर होता है। एक सप्ताह के भीतर ही औषधि अपना प्रभाव दिखाती है। पूर्ण लाभ के लिए चालीस दिनों तक प्रयोग करवाऐं सहायक औषधियों में कुमार्यास व अभयारिष्ट, रोहीतिकारिष्ट, गुलकन्द इत्यादि कल्पों का प्रयोग करवाऐं।

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7). गृध्रसी (सायटिका) में आराम दिलाए रजः प्रवर्तनी वटी का सेवन

योगराज गुग्गुलु दो गोली, रजः प्रवर्तिनी वटी दो गोली, दशमूल, निर्गुण्डी या हरसिंगार के पत्र क्वाथ के साथ देने से तीन दिन में ही वेदना का शमन होने लगता है। पूर्ण लाभ के लिए दो सप्ताह प्रयोग करवाऐं, सहायक औषधियों में खंजनकारी रस, वृ. वात चिन्तामणि रस, महावात विध्वंसन रस इत्यादि का प्रयोग प्रशस्त है।

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आयुर्वेद ग्रंथ में रजः प्रवर्तनी वटी के बारे में उल्लेख (Rajah Pravartini Vati in Ayurveda Book)

कन्या सारं च काशीसं रामठं टंकणं तथा।
समादाय समं सर्वं पेषयेत् कन्यका द्रवैः॥
निर्वापये द्भिषग्वयों रक्तिद्वयमिता वटी।
शीलितेयं तु वटिका विनहन्ति सुदारुणम्॥
रजो रोधव्यथां कष्टरजः स्राव व्यथां तथा।
रजः प्रवर्तिनीह्येषा नीलकण्ठेन भाषिता॥

भैषज्यरत्नावली (स्त्री रोगाधिकार 233-235)

रजः प्रवर्तनी वटी के दुष्प्रभाव और सावधानीयाँ (Rajah Pravartini Vati Side Effects in Hindi)

  1. रजः प्रवर्तनी वटी लेने से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श करें ।
  2. रजः प्रवर्तनी वटी को डॉक्टर की सलाह अनुसार ,सटीक खुराक के रूप में समय की सीमित अवधि के लिए लें।
  3. रजः प्रर्वतिनी वटी के सभी घटक मलवातानुलोमक होने से यह औषधि मल को तरल कर देती है अत: अतिसार, ग्रहणी इत्यादि रोगों की रुग्णाओं को इस औषधि का प्रयोग नहीं करवाना चाहिए।
  4. औषधि सेवन काल में उष्णत्व (गर्मी) की अनुभूती हो तो गुलाब के फूलों से निर्मित ‘गुलकन्द’ का प्रयोग करवाऐं।
  5. यदि मलोत्सर्ग के समय उदर शूल हो तो लशनादिवटी दो-दो गोलियां उष्णोदक (गुनगुना पानी) से दें, इनके अतिरिक्त रजः प्रवर्तिनी वटी के सेवन काल में कोई प्रतिक्रिया नहीं होती।
  6. इसका एक घटक कासीस भस्म धातु की भस्म है। अतः भस्म सेवन काल की सावधानियाँ यहाँ भी अपेक्षित हैं।

(अस्वीकरण : दवा ,उपाय व नुस्खों को वैद्यकीय सलाहनुसार उपयोग करें)

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