बंदर की मूंछें | BANDAR KI MOOCHEN
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बंदर की मूंछें नामक पुस्तक के शीर्षक-पृष्ठ पर इसे 'ब्राज़ील की लोककथा' बताया गया है और हिन्दी अनुवाद का काम विद्युष ने किया है। शीर्षक-पृष्ठ पर किसी प्रकाशक अथवा मुद्रक का नाम दर्ज नहीं है। पुस्तक छोटी है और इसमें एक ही लंबी कथा प्रस्तुत की गई है, जो ब्राज़ील के जंगलों और नदी-तट के जीवन से ली गई है।
कथा एक शरताकार बंदर की है, जिसकी मूँछें नाई से कटवा ली गई थीं और वह नारयमर के ऊँचे पेड़ पर रहता था। कुछ देर बाद वह नीचे आता है और शहर में नाई की दुकान पर पहुँचकर अपनी मूँछें कटवाता है, फिर गुस्से में नाई से उसकी मूँछें माँगता है। इसके बाद कथा में बंदर क्रमशः ऊदबिलावों से मछली चुराता है और उन्हें नारयमर का रस या मीठा आटा खिलाकर धोखा देता है, तथा हर बार अपनी मूँछें वापस माँगता रहता है। अन्त में पता चलता है कि उसके मूँछें काटने वाला कोई और नहीं, स्वयं उसका पिता ही वही नाई था।
यह कथा जमाव वाली लोककथा की शैली में लिखी गई है, जिसमें एक ही चालाक बंदर के क्रमिक चालें पाठक को मुग्ध करती हैं और हर बार नया चक्कर जुड़ता जाता है। ब्राज़ील की लोक-परंपरा का यह हिन्दी रूप पाठकों को दूर देश की संस्कृति, जानवर-पात्रों की कहानियों और मौखिक साहित्य की परंपरा से परिचित कराता है। छोटे और बड़े दोनों पाठकों के लिए यह रोमांचक, मनोरंजक और सरल भाषा में लिखी कथा है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- बाल-कहानी
- हास्य तथा मनोरंजन
- नैतिक शिक्षा
- चित्र सहित
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