जो शिलाएं तोड़ते हैं | JO SHILAYEN TODTE HAIN
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जो शिलाएं तोड़ते हैं हिन्दी कविता-संग्रह है। शीर्ष पृष्ठ पर इसे इसी नाम से अंकित किया गया है और उप-शीर्षक में "केदारनाथ अग्रवाल की कविताएँ" लिखा है। इसका सम्पादन डॉ. अशोक बैजन्ती ने किया है। प्रकाशन साहित्य भंडार, चालकदास, इलाहाबाद से हुआ है और मुद्रण सूर्य प्रकाशन, गोविन्द नगर, इलाहाबाद में हुआ है। प्रथम संस्करण वर्ष दो हजार नौ का है और मूल्य दो सौ पचास रुपये रखा गया है। पुस्तक का ISBN ९७८-८१-७७७९-१९५-१ अंकित है और यह लगभग दो सौ एक पृष्ठ की है।
पुस्तक में केदारनाथ अग्रवाल की कविताएँ संकलित हैं। प्रथम पृष्ठ पर जो रेखा-चित्र दिया गया है, वह बाँस की दो लाठियों को बंधते हुए दिखाता है, जो शीर्षक का प्रतीक है और कवि के अनुभव को भी व्यक्त करता है। प्रथम संस्करण के साथ ही पहली बार छपी यह संग्रह काव्य-पाठकों के लिए सार्थक है।
यह पुस्तक हिन्दी कविता में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए उपयोगी है। साहित्य भंडार जैसी प्रतिष्ठित संस्था का प्रकाशन और संपादक का विद्वान-परिचय इसकी गुणवत्ता का संकेत है। रेखा-चित्र और शैली सुंदर होने के कारण पुस्तक पठन-योग्य और सुखद दोनों है। काव्य-अध्ययन में रुचि रखने वाले पाठक इस संग्रह का आनंद ले सकते हैं।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- कहानी तथा प्रेरक प्रसंग
- संघर्ष तथा साहस
- जीवन-मूल्य
- शिक्षाप्रद
पुस्तक की मुख्य बातें
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