Shri Yogavasishtha Maharamayan -1- Hindi
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यह पुस्तक श्री योगवाशिष्ठ महारामायण नाम से प्रकाशित हुई है। मूल ग्रन्थ के रचयिता आदिकवि श्रीमद्भलभी को दिखाया गया है और इसकी व्याख्या परमहंस श्रीमद् आनंद लोधेन्द्र सरस्वती ने प्रणीत की है। उपशीर्षक में बताया गया है कि यह वासिष्ठ महारामायण, जिसका अर्थ तत्पर्यंप्रकाशाश्लेष्यास्त्यासाहित है, का हिन्दी अनुवाद है। इस खण्ड का शीर्षक वैराग्य प्रकरण है और आरंभ में पहला राग से प्रस्तुति होती है। पैमाना लगभग 690 पृष्ठ का है।
आरंभ का प्राक्कथन सम्प्रदाय की विशुद्धि के लिए ऋषि-देव संवाद और उपोद्घाट के लिए श्रीरामचन्द्रजी के अज्ञान के निर्मित का वर्णन करता है। इसमें बताया गया है कि अनादि महामोहरूपी निशशा में सोये हुए जगत को दुःखरूपी भ्रमों से रचा गया है, जन्म, जरा, व्याधि, मृत्यु, हर्ष, शोक और क्रोध आदि अन्थों से यह व्याप्त है, और आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक तीन तापरूपी दावानल से चारों ओर घिरे हुए संसाररूपी महारण्य में मोहित विवेकशक्ति और प्रबोध के उपाय के न मिलने के कारण देवर्षि दुःखी हैं।
यह हिन्दी अनुवाद योग-वेदान्त की शास्त्रीय परंपरा का ग्रन्थ है, जिसमें तत्त्व-ज्ञान, अहंकार-विचार और साधना-विधि का वर्णन मिलता है। योग और आध्यात्मिक साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह पुस्तक उपयोगी है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- योगवासिष्ठ का मूल पाठ (भाग 1)
- वैराग्य तथा आत्म-ज्ञान
- कथाएँ तथा उपदेश
- सरल अर्थ सहित
पुस्तक की मुख्य बातें
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