Shri Yogavasishtha Maharamayan- 3 -Hindi
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यह पुस्तक श्री योगवाशिष्ठ महारमायण नाम से प्रकाशित हुई है और यह इस ग्रन्थ का चतुर्थः प्रकरण है, जिसका पूर्वार्ध है। शीर्षक-पृष्ठ पर ब्रह्म-यस्वर, विवरण-प्रकरण उत्तरार्ध और आचार्य रामचन्द्र आनन्द बोधिष्ठ तथा भूषिका ऋषि के नाम अंकित हैं। पैमाना लगभग 500 पृष्ठ का है।
आवरण-पृष्ठ पर गुरु के श्रीमुख के दर्शन का वर्णन है, और साथ में यह भी अंकित है कि जिस प्रकार मन, अहंकार एवं संकल्प से ही पापों की उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार मन, अहंकार एवं अन्य का नाश करने के लिए इस उत्तरार्ध का अवध्ययन किया गया है। पृष्ठ पर यह भी दर्ज है कि वैदिक सोर व वेदान्त दर्शन इस पुस्तक में दिए गए हैं।
पृष्ठ पर यह भी बताया गया है कि श्री अरविन्द ने अपने जीवन के बारे में लिखा है, जिसमें वह बताते हैं कि उनके विचार और उनकी कार्य-शैली दोनों ही अत्यन्त व्यक्तिगत हैं, और उनका जीवन-यापन तीन भागों में बँटा है, तथा उनकी कृति का एक संकलन भी प्रकाशित किया गया है। यह पुस्तक वेदान्त और योग के शोध-पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- योगवासिष्ठ का मूल पाठ (भाग 3)
- वैराग्य तथा आत्म-ज्ञान
- कथाएँ तथा उपदेश
- सरल अर्थ सहित
पुस्तक की मुख्य बातें
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