Shri Yogavasishtha Maharamayan- 4 -Hindi
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यह पुस्तक श्री योगवाशिष्ठ महारमायण नाम से प्रकाशित हुई है और यह योगवाशिष्ठ के तृतीय भाग का वीर-प्रकरण उत्तरार्ध है, जिसमें पहला रग अंकित है। शीर्षक-पृष्ठ पर आचार्य रामचन्द्र आनन्द बोधिष्ठ तथा भूषिका ऋषि के नाम अंकित हैं। पैमाना लगभग 866 पृष्ठ का है।
आवरण-पृष्ठ पर गुरु के श्रीमुख के दर्शन का वर्णन है और साथ में यह भी दर्ज है कि मन, अहंकार एवं संकल्प से ही पापों की उत्पत्ति होती है, इसलिए बन्धनमूलक कर्मों से मुक्ति पाने के लिए इस उत्तरार्ध का अवध्ययन किया गया है। प्राक्कथन में बताया गया है कि मन की शुद्धि के बिना, संकल्प-शक्ति के अभाव में, वैराग्य के बिना तथा चेतना के अभाव में कोई भी साधक ब्रह्मलब्ध को प्राप्त नहीं कर सकता।
पृष्ठ पर यह भी अंकित है कि वेद-विवेचक योगीश्वराचार्य ने इस वीर-प्रकरण के अनुवाद का कार्य किया है, और पृष्ठ पर यह भी दर्ज है कि सिद्धि की प्राप्ति में यह प्रकरण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना गया है। यह पुस्तक वेदान्त और योग के शोध-पाठकों के लिए अत्यंत उपयोगी है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
कैसे पढ़ें — फ़ाइल पूरी PDF में है, जिसे मोबाइल, कंप्यूटर या किसी भी PDF ऐप में बिना इंटरनेट के पढ़ा जा सकता है। नीचे दिए बटन से इसे तुरंत और मुफ़्त डाउनलोड करें — कोई साइन-अप, सदस्यता या शुल्क नहीं।
- योगवासिष्ठ का मूल पाठ (भाग 4)
- वैराग्य तथा आत्म-ज्ञान
- कथाएँ तथा उपदेश
- सरल अर्थ सहित
पुस्तक की मुख्य बातें
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