योग निद्रा की विधि और फायदे – Yoga Nidra in Hindi

योग-निद्रा शरीर तथा मन को शांत व स्वस्थ करने की बड़ी प्रभावशाली मनोवैज्ञानिक क्रिया है। आज की दुनिया बड़ी तेजी से भाग रही है, जीवन चक्र बहुत तेजी से घूम रहा है कहीं भी ठहराव नहीं। परिवारों में वह सुख-शांती भी नहीं रही। फलत:, व्यक्ति में हर समय शारीरिक व मानसिक थकान बनी रहती है। खाया हुआ भोजन पचता नहीं, वायु का प्रकोप हो जाता है। लोग नाना प्रकार के रोगों से ग्रसित होते जा रहे हैं। सचमुच, यदि रोगों से बचे रहना चाहते हैं या अपने रोग का सही उपचार करके स्वस्थ जीवन जीना चाहते है, तो योग निद्रा (स्वयं को शिथिल करना) सीखिए।

योग निद्रा की विधि (Yoga Nidra ki Vidhi in Hindi)

योग निद्रा कैसे करें ?

1). सर्वप्रथम आप शवासन में लेट जाएं, पांव खुले हए और हथेली आसमान की ओर, आंखें बंद, शरीर ढीला, ध्यान श्वास-क्रिया की ओर। जहां कहीं भी तनाव अनुभव कर रहे हों, थोड़ा-सा हिलाकर शिथिल करें। आपका श्वास स्वाभाविक हो, श्वास लेने तथा छोड़ने में कोई प्रयास नहीं करना है। जब श्वास अंदर लें, तो सोचें कि शुद्ध वायु फेफड़ों में जाकर आपको निरोगता दे रही है। शरीर में शिथिलता ला रही है। जब श्वास बाहर निकालें, तो सोचें कि गंदी वायु द्वारा आपके शरीर से विकार तथा बीमारियां बाहर निकल रही हैं और आप पूरी तरह स्वस्थ हो रहे हैं। श्वास जितना अधिक सूक्ष्म होगा, उतना अधिक आप शिथिल होंगे। श्वास की आवाज भी नहीं आनी चाहिए।

दिनभर काम करने के लिए आवश्यक शक्ति शरीर तथा मन को शिथिल करने से मिलती है। हर रात छह-आठ घंटे सोने से दूसरे दिन काम करने की शक्ति प्राप्त करते हैं। जब तक हम सोते हैं, हमारे अंदर का शरीर अपनी टूट-फुट की मरम्मत कर लेता है नए कोष बन जाते हैं और पुराने शरीर से बाहर हो जाते हैं। इस प्रकार प्रतिदिन हम नई शक्ति प्राप्त करते हैं।

2). कुछ समय इसी प्रकार शांति व शिथिलता से लेटे रहने के बाद अपने ध्यान को बाएं पांव के अंगूठे पर ले जाएं, उसे हिलाएं और शिथिल करें। दुसरी, तीसरी चौथी और पाचवीं, पांचों उंगलियों को हिलाकर ढीला छोड़ें। पाव का तलवा, टखना, एड़ी, पिंडली, घुटना, जांघ और कमर-सबको हिलाकर शिथिल करे।

3). अपनी बाईं टांग को पूरी तरह शिथिल छोड़ दें। उसमें रक्त का संचार हो रहा है और वह स्वस्थ हो रही है। कुछ देर शांत पड़े रहकर अपनी बाईं टांग को देखें। उसके बाद अपने ध्यान को दाई टांग पर ले जाएं और उसे भी पांव के अंगूठे से लेकर कमर तक शिथिल करें। फिर उसे भी शिथिल होने दें। इस प्रकार आपकी दोनों टांगें शिथिल हो जाएंगी।

4). अब बाएं हाथ के अंगूठे पर ध्यान ले जाएं। उसे हिलाकर शिथिल करें। दुसरी, तीसरी, चौथी और पांचवी, पांचों उंगलियों और हथेली को हिलाकर ढीला छोडें, कलाई को हिलाए, भुजा, कुहनी, बाजू और कंधे को हिलाकर शिथिल करें। इसी प्रकार अपने दूसरे बाजू को भी शिथिल व शांत करें।

5). अब आपकी दोनों टांगें तथा दोनों बाजू शिथिल व शांत हो गए है। उनमें रक्त का संचार हो रहा है और उनका विकार ह्रदय तथा फेंफड़ों में आकर शुद्ध हो रहा है। कुछ देर बाजुओं तथा टांगों को निहारें।

6). अब अपने ध्यान को पेट पर ले आएं। अपने आमाशय, लिवर, क्लोम संधि, तिल्ली पक्काशय, छोटी आंतों, बड़ी आंतों तथा पुरे पाचन-संस्थान को शिथिल व शांत रहने का आदेश दें। कुछ देर उसे देखें। आपके ह्रदय को 24 घंटे काम करना पड़ता है। पूरे शरीर का रक्तसंचालन करना, विकारयुक्त रक्त को वापस लेना और उसे शुद्ध करने के लिए फेफड़ों में भेजना, शुद्ध रक्त को वापस हृदय में लेना और फिर पूरे शरीर में रक्त को पंप करना। 15 सेकंड का यह चक्र 24 घंटे चलता रहता है।अपने ध्यान को ले जाए छाती पर,हदय को शिथिल व शांत होने का आदेश दें। अत: अब अपने फेफड़ों को शिथिल करें। दो-तीन लंबे व गहरे श्वास लें, ताकि शुद्ध वायु फेफड़ों को मिले। रक्त नलिकाओं, धमनियों और शिराओं को भी शिथिल व शांत करें। इस अवस्था में कुछ देर बंद आंखों से देखें।

7). अब आप अपना ध्यान अपने गर्दो, जो नाभि के पीछे रीढ़ के दोनों तरफ हैं, की ओर ले जाएं तथा अपने मूत्र-संस्थान को तथा अपनी त्वचा, जो रक्त को शुद्ध करने का तीसरा अंग है, को शिथिल करें। त्वचा की ग्रंथियां रक्त को वहीं शुद्ध कर, विकार को पसीने के रास्ते बाहर करती हैं। सर्दियों में पसीना नहीं आता। तब भी विकार त्वचा से बाहर आता रहता है, जिससे अंदर के कपड़े गंदे तथा बदबूदार हो जाते है।

8). अब अपने गले पर ध्यान ले जाएं तथा थायरड पैराथायरड ग्रंथियों व टॉन्सिल को शिथिल करें। अपनी ठोड़ी, दांत, जिह्वा, चेहरा, आंख, नाक, कान-सबको शिथिल करें और ऐसा माने कि आपकी सभी ज्ञानेंद्रिया सक्रिय हो गई हैं। पूरा शरीर शांत, शिथिल व स्वस्थ हो रहा है।

9). अब अपने ध्यान को मेरुदंड तथा सषम्ना नाड़ी पर ले जाएं और उन्हें शिथिल करें। फिर अपने मस्तिष्क स्नायुमंडल, नाड़ी-सूत्रों तथा तंतुओं पर ध्यान ले जाएं और उन्हें ढीला छोड़ें। और माने कि पूरा नाड़ी-संस्थान शिथिल हो गया है, मस्तिष्क शांत हो गया है और पूरे शरीर के कार्य का नियंत्रण सुचारु रूप से कर रहा है। शरीर के सारे अंग सक्रिय हैं और अपना काम कर रहे हैं। शरीर के विकार बाहर निकल रहे हैं, शरीर शुद्ध, शांत व निरोग हो रहा है। अब वह पूरी तरह शांत, शिथिल और स्वस्थ हो गया है। ऐसा सोचतेसोचते कुछ देर तक पड़े रहें।

ऐसा अभ्यास कुछ दिन करने से शरीर सध जाएगा। आप शवासन में लेटे, शिथिल हुए और योग-निद्रा में चले जाएंगे। जो रोग जहां है, उसका ध्यान करें और सोचें कि रोग शरीर से जा रहा है आप स्वस्थ हो रहे हैं। इसके साथ पेट को साफ रखे। भोजन का उचित परहेज करें, तो आपको

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