Omkar Upasana
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यह पुस्तक ओंकार उपासना नाम से प्रकाशित हुई है और इसमें उस ध्यान का विधान बताया गया है जो केवल ओंकार के चिंतन पर केन्द्रित है। पृष्ठ पर बताया गया है कि यह सिद्धि वर्ष 2000, मार्च 1992 के आस-पास प्रकाशित हुई। लेखक-सम्पादक के रूप में आचार्य पुरुषोत्तम चरनस्वामी आत्मार्क दिए गए हैं, जिनका परिचय ज्योतिष और वैदवंत के रूप में मिलता है। प्रकाशक राजपाल मैनेजर के रूप में साहित्य आश्रम से जुड़ा बताया गया है, और पुस्तक का मुद्रण भी लाहौर में हुआ है।
पुस्तक का आरम्भ एक महत्वपूर्ण प्रश्न से होता है — क्या ओंकार के उच्चारण के बिना या उसका ध्यान न रखकर केवल देवता का नाम लेने से भक्ति हो सकती है या नहीं। लेखक इसका सीधा उत्तर देते हैं और बताते हैं कि उपासना का वास्तविक स्वरूप मौखिक उच्चारण नहीं बल्कि अन्तरात्मा में ओंकार का सतत साक्षात्कार है। पहले अध्याय में यह भी स्पष्ट किया गया है कि बाहर की उपासना साधक के लिए साधन मात्र है और उसका असली स्वरूप उसके भीतर होता है।
ओंकार-उपासना या मंत्र-जाप में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह पुस्तक छोटा पर सघन है, और ओंकार के रहस्य को सरल भाषा में समझाने की कोशिश करता है। इसमें ऐसा कुछ नहीं है जिसे बिना तैयारी के अपना आचरण बनाने की आवश्यकता हो, क्योंकि विषय केवल चिंतन और साधना का है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- ओंकार (ॐ) की उपासना
- जप तथा ध्यान की विधि
- ॐ का महत्व तथा स्वरूप
- नियम तथा अनुभव
पुस्तक की मुख्य बातें
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