ब्रह्मसूत्र वेदांत दर्शन (नंदलाल दशोरा) – Brahma Sutra Vedanta Darshan
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यह पुस्तक ब्रह्मसूत्र का हिन्दी अनुवाद और व्याख्या है। आवरण-पृष्ठ पर बड़े अक्षरों में ब्रह्मसूत्र वेदांत दर्शन लिखा है और नीचे नंदलाल दशोरा का नाम अंकित है; आवरण पर कमल पर बैठे ध्यानस्थ पुरुष का चित्र है। शीर्षक-पृष्ठ पर इसे महर्षि वेदव्यास प्रणीत ब्रह्मसूत्र : वेदान्त दर्शन कहा गया है और उपशीर्षक में उत्तर मीमांसा, शारीरिक दर्शन तथा पूर्ण ब्रह्म-दर्शन दिया गया है। अनुवाद और व्याख्या श्री नंदलाल दशोरा की है। प्रकाशक रणधीर बुक सेल्स (प्रकाशन), रेलवे रोड, हरिद्वार है; प्रथम संस्करण १९९१ का और मूल्य चालीस रुपये रखा गया है। मुद्रक सुरेन्द्र प्रिंटर्स, विश्वास नगर, शाहदरा, दिल्ली है। पुस्तक में लगभग तीन सौ चौदह पृष्ठ हैं।
पुस्तक चार अध्यायों — समन्वयाध्याय, अविरोधाध्याय, साधनाध्याय और फलाध्याय — में विभाजित है, और हर अध्याय चार पादों में है। विषय-सूची में सूत्रों की संख्या और उनके विषय पृष्ठ-संख्या सहित दिए गए हैं। पहले अध्याय में ब्रह्म जिज्ञासा, ब्रह्म का जगत का निमित्त और उपादान कारण होना तथा आनन्दमय ब्रह्म जैसे प्रकरण हैं। दूसरे अध्याय में सांख्य, वैशेषिक, बौद्ध, जैन और पाशुपत मतों का खण्डन और जगत की विद्यमानता पर विचार है। तीसरे अध्याय में देहान्तर-गमन, स्वप्न और सुषुप्ति, ब्रह्मविद्या का अधिकार, देवयान मार्ग तथा ब्रह्मलोक की गति का वर्णन है। चौथे अध्याय में ब्रह्मविद्या के निरन्तर अभ्यास, प्रारब्ध-क्षय और मुक्ति की स्थिति पर सूत्रों की व्याख्या है।
संस्कृत न आने वाले पाठक भी ब्रह्मसूत्र को क्रम से समझ सकते हैं, क्योंकि हर सूत्र का अर्थ हिन्दी में दिया गया है और विषय-सूची से किसी भी प्रकरण तक सीधे पहुँचा जा सकता है। वेदान्त के विद्यार्थियों, दर्शन-शोधार्थियों और तुलनात्मक दर्शन में रुचि रखने वालों के लिए यह उपयोगी संदर्भ है। यह ग्रंथ अध्ययन और मनन के लिए है; इसमें दी गई बातें दार्शनिक परंपरा की हैं, इसलिए इसे जीवन-निर्णय का एकमात्र आधार न बनाएँ।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- आत्मा तथा ब्रह्म का स्वरूप
- जगत् की उत्पत्ति, माया तथा अद्वैत
- साधना, ध्यान तथा आत्मज्ञान के सोपान
- उपनिषद् तथा गीता का सार
पुस्तक की मुख्य बातें
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