दन्ती के फायदे और नुकसान – Danti ke Fayde aur Nuksan in Hindi

दन्ती क्या है ? (What is Danti in Hindi)

दन्ती (Danti) एरण्डकुल (यूफर्बिएसी) की वनौषधि हैं। भावप्रकाश निघण्टु के गुडच्यादि वर्ग में इनका वर्णन किया गया है। आयुर्वेदाचार्यों ने तीक्ष्ण विरेचन द्रव्यों के अन्तर्गत इसका सर्वप्रथम विशद वर्णन किया है।

दन्ती का विभिन्न भाषाओं में नाम (Name of Danti in Different Languages)

Danti in –

  • संस्कृत (Sanskrit) – दन्ती, निकुम्भा, प्रत्यक् श्रेणी, उदुम्बरपर्णी, एरण्डफला।
  • हिन्दी (Hindi) – दन्ती।
  • गुजराती (Gujarati) – दाती।
  • मराठी (Marathi) – दांती, दांतरा।
  • बंगाली (Bangali) – दन्तीगाछ, हाकुन।
  • तेलगु (Telugu) – आमादाम्।
  • लैटिन (Latin) – बैलि ओस्पर्मस मोण्टेनम (Baliosp – ermum Montanum)।

दन्ती का पौधा कहां पाया या उगाया जाता है ? :

दन्ती के जंगली क्षुप (छोटा पौधा) विशेषतः भूटान, आसाम, बंगाल, बिहार, एवं दक्षिण भारत में ट्रावनकोर तक पाये जाते हैं।

दन्ती का पौधा कैसा होता है ? :

  • दन्ती का पौधा – दन्ती का गुल्मवत् (झाड़ीनुमा) क्षुप 3 से 6 फुट तक ऊंचा होता है। मूलस्तम्भ से अनेक कोमल काण्ड निकलते रहते हैं। ये काण्ड शाखाएं रोमश रक्ताभ होती है।
  • दन्ती के पत्ते – दन्ती पत्रों के आकार और कद में प्रायः बड़ी भिन्नता होती है। ऊपर की ओर के पत्र प्रायः छोटे, भालाकार या पक्षाकार सिराजाल से युक्त रहते हैं और नीचे के बहुत बड़े (6 से12 इंच) करतलाकार 3-5 भागों में खण्डित होते हैं।
  • दन्ती के फूल – दन्ती के पुष्प एकलिंगी, हरिताभ, अक्षीय और गुच्छों में होते हैं।
  • दन्ती के फल – दन्ती के फल त्रिकोष्ठीय (तीन खण्ड का) किंचित् रोमश होते हैं । फल सूखने पर अपने आप तड़क जाते हैं और उनके तीन विभाग होकर उनमें से छोटे एरण्ड के समान तीन बीज निकलते हैं । दन्ती में प्रायः वर्षभर फूल फल लगते हैं।

दन्ती के प्रकार :

दन्ती के दो प्रकार है – दन्ती तथा द्रवन्ती (बड़ी दन्ती) ।
चरकसंहिता में प्रायः दन्ती-द्रवन्ती का एक साथ वर्णन हुआ है। आगे के निघण्टुकारों ने इन दोनों को दन्तीद्वय के नाम से भी लिखा है। आयुर्वेदाचार्यों ने द्रवन्ती के फल को ही जयपाल कहा है। बहुत से आचार्य द्रवन्ती को बड़ी दन्ती भी कहते हैं।

संग्रह एवं संरक्षण विधि :

दन्ती और द्रवन्ती के हाथी दांत के सदृश कठिन, स्थूल और श्याम ताम्रवर्ण के मूल होकर उस पर पिप्पली चूर्ण व मधु का लेप करें और तदनन्तर कुश के बीच में रख मिट्टी से लेप कर पुटपाक करें। फिर धूप में सुखावें। इस प्रकार अग्नि और धूप से इसकी विकारिता दूर हो जाती है – ऐसा चरक संहिता में वर्णित है।

दन्ती का उपयोगी भाग (Beneficial Part of Danti in Hindi)

प्रयोज्य अंग – मूल, बीज, पत्र।

दन्ती सेवन की मात्रा :

  • मात्रा – 1 से 3 ग्राम।
  • बीज – 125 से 250 मि.ग्रा.।
  • पत्र क्वाथ – 40 से 80 मि.ली.।

प्रयोग विधि – इससे पेट में मरोड़ होती है और मिचली आदि लक्षण भी होते हैं इसलिए इसके साथ सौंफ आदि सुगन्धित द्रव्यों का प्रयोग अपेक्षित है।

दन्ती के औषधीय गुण (Danti ke Gun in Hindi)

  • रस – कटु।
  • गुण – तीक्ष्ण, रूक्ष, गुरु।
  • वीर्य – उष्ण।
  • विपाक – कटु।
  • प्रभाव – विरेचन।
  • वीर्य कालावधि – मूल – 1 वर्ष , बीज – दीर्घकाल तक।

दन्ती का रासायनिक संघटन :

  • इसके मूल में राल (रजिन), एवं स्टार्च होता है।
  • बीजों में एक दन्ती तेल होता है।

दन्ती का औषधीय उपयोग (Medicinal Uses of Danti in Hindi)

आयुर्वेदिक मतानुसार दन्ती के गुण और उपयोग –

  • रेचक औषधियों में दन्ती – द्रवन्ती मुख्य है। इनके उष्ण तीक्ष्णादि कार्मुक तत्वों के द्वारा हृदय केन्द्र में उत्तेजना होती है। इस उत्तेजना के बाद ये अपने प्रभाव से विरेचन (दस्त) कराती है। चरकसंहिता में दन्ती, द्रवन्ती के 48 योग कहे गये है।
  • दन्ती रक्तशोधक होने से समस्त रक्तविकारों में भी यह प्रयुक्त होती है।
  • पित्त प्रधान कुष्ठ की सामान्य चिकित्सा में विरेचन का विशेष महत्व है। और विरेचन में दन्ती की उपादेयता प्रकट की गई है।
  • चिरविल्वादि लेप भी दारण (शल्य-चिकित्सा) हेतु प्रशस्त है, इसमें भी दन्ती मूल को समाविष्ट किया गया है।
  • निम्बपत्रादि शोधन रोपणं लेप में भी दन्ती को उपयोगी मानकर प्रयोग में लाया गया है।
  • दन्तीमूल, हल्दी एवं आंवला के लेप को भगन्दर में आयुर्वेदाचार्यों ने प्रशस्त कहा है।
  • दुष्ट व्रणों (फोड़ा) के लिए सुश्रुतसंहिता (चि. स्था. अ. २) में वर्णित द्रवन्त्यादि घृत या तेल को भी उपयोग में लाना प्रशस्त है।
  • शल्यतन्त्र में क्षारों का विशेष महत्व है। बाह्य परिमार्जन हेतु जो प्रतिसारणीय क्षार उपयोग में लाये जाते हैं उनमें दन्ती, द्रवन्ती तीक्ष्ण क्षार निर्माण में प्रमुखतया प्रयुक्त होती हैं। इन क्षारों का उपयोग पक्वव्रण शोथ दारणार्थ किया जाता है किन्तु इनके क्षार तीक्ष्णं होने से सुकुमार व्यक्तियों के लिए प्रशस्त नहीं है ।
  • शोथ वेदना (सूजन का दर्द) को नष्ट करने के लिए या व्रण शोथ दूर करने हेतू दन्ती को उपयोग में लाया जाता है।
  • विबन्ध (कब्ज) युक्त रोगों में दन्ती का आंतरिक उपयोग हितावह है।
  • सर्पविष में दन्ती के बीजों का अंजन किया जाता है और बीज तेल की वातव्यादि में मालिश की जाती है ।
  • दन्ती बीज तेल कृमि, कुष्ठहर एवं दुष्ट व्रणशोधक भी कहा गया है ।

यूनानी मतानुसार दन्ती के गुण और उपयोग –

  • दन्ती अत्यन्त गर्म कही गई है। कफ और वायु के रागों को दूर करने में यह श्रेष्ठ है। सेवन से आमाशय में उष्णता महसूस होती है।
  • दन्ती सूजन, जलोदर, कुष्ठ, गठिया और खून के विकारों को दूर करती है।
  • दन्ती के इन अन्तः प्रयोगों के अतिरिक्त यूनानी मतानुसार मूल का धूम्रपान भी लाभप्रद है, इससे कफ का निःसरण होकर खांसी मिटती है ।
  • इसके पत्तों का लेप जखम भर देता है।

रोगोपचार में दन्ती के फायदे (Benefits of Danti in Hindi)

1). सद्यो व्रण (ताजा घाव) में दन्ती के इस्तेमाल से लाभ

सद्योव्रण के रक्तस्राव को बन्द करने के लिये दन्ती के कोमल पत्तों का रस लगाकर इसके पत्तों को बांधना चाहिए।

2). विद्रधि (पेट का फोड़ा) ठीक करे दन्ती का प्रयोग

दन्ती मूल का कल्क कर उपनाह बांधने से पक्व विद्रधि फूट जाती है।
दन्ती मूल, चित्रकमूल, भिलावा, हीराकसीस, सैन्धव, गुड़ और थूहर व आक के दूध का मिश्रित लेप करने से भी विद्रधि फूटकर साफ हो जाती है। यह लेप गण्डमाला, ग्रन्थि अपची आदि में भी प्रलेप हेतु प्रशस्त है। कोई इन रोगों में सैंधव का प्रयोग नहीं करता है।

3). व्रण (फोड़ा या घाव) के उपचार में दन्ती के इस्तेमाल से लाभ

  • दारण के अतिरिक्त व्रण शोधन रोपण हेतु भी दन्ती मूल का उपयोग होता है। दन्ती एवं निम्ब पत्र का कल्क (चटनी) बांधना इस हेतु लाभप्रद है।
  • दन्ती पत्रों का प्रलेप भी व्रण रोपणार्थ (घाव भरने हेतु) किया जाता है।
  • दन्ती, निशोथ, सैन्धव, निम्ब पत्र के कल्क में तेल व मधु मिलाकर लेप करने से भी व्रण का सम्यक शोधन-रोपण होता है।

4). बवासीर (अर्श) में लाभकारी है दन्ती का लेप

  • दन्ती मूल को तक्र (छाछ) में पीसकर अर्शाकुरों पर लेप करना उपयुक्त है।
  • दन्ती, निशोथ, अमृता, कपोत की बीट और गुड़ का लेप भी अर्श पर प्रशस्त है।

( और पढ़े – खूनी बवासीर का रामबाण इलाज )

5). मस्से (मषक) मिटाए दन्ती का उपयोग

देह पर कहीं भी हुये मस्सों को नष्ट करने के लिये भी दन्ती मूल को जल में घिसकर लगाया जा सकता है।

6). भगन्दर में दन्ती के प्रयोग से लाभ

दन्ती मूल, हल्दी और आंवले को पानी के साथ पीसकर लेप करने से भगन्दर में लाभदायक होता है।

( और पढ़े – क्षारसूत्र चिकित्सा से भगन्दर का इलाज )

7). कुष्ठ रोग में दन्ती से फायदा

दन्ती मूल, वाकुची, चित्रक और हरिद्रा को बिजौरे नीबू के रस में मिलाकर कुष्ठों पर लगाना चाहिये।

8). गले का गिल्‍टी में दन्ती का उपयोग फायदेमंद

दन्ती मूल, गुड़, चित्रक, कूठ पुष्कर मूल हीरा कसीस को आक के दूध में पीसकर लेप करने से कर्ण कसन्निपात में उत्पन्न कर्णमूल शोथ (गले का गिल्‍टी) का शमन होता है।

9). विषम ज्वर में लाभकारी है दन्ती का सेवन

दन्ती मूल, कुटकी, मुस्तक, पटोल पत्र और कृष्ण सारिवा का क्वाथ सन्तत विषम ज्वर को नष्ट करता है।

10). पेट के रोगों में फायदेमंद दन्ती के औषधीय गुण

  • दन्ती मूल, बच इन्द्रायण की जड़, अपराजिता (शंखिनी), लोध्र और निशोथ समान भाग लेकर गोमूत्र के साथ पीसकर कल्क (चटनी) बनाकर गोमूत्र के साथ ही पिलाने से उदर रोगों में लाभ होता है।
  • दन्ती मूल, बच, इन्द्रायण मूल, नीली चूर्ण को गोमूत्र के साथ सेवन करना भी उदररोगों में हितकारी है।
  • दन्ती मूल, बच, यवक्षार, पिप्पली और चित्रक चूर्ण को दही के साथ सेवन करने से प्लीहोदर में लाभ होता है।
  • दन्ती मूल, सोंठ, मिर्च, पिप्पली, निशोथ, चित्रक और पीपलामूल के समभाग चूर्ण में गुड़ मिलाकर रख लें। 3 से 6 ग्राम गरम जल से सेवन करने से प्लीहोदर नष्ट होता है। इससे शोथ, उदावर्त (बड़ी आँत का एक रोग), शूल, पाण्डु (पीलिया), मेदोरोग (मोटापा) आदि का भी नाश होता है और बल वर्ण, अग्नि की बृद्धि होती है।
  • दन्ती मूल को छाछ में पीसकर छानकर पिलाने से यकृदाल्युदर में लाभ होता है।
  • दन्ती मूल और सोंफ का क्वाथ भी उदर रोगों में विरेचनार्थ (दस्त लाने हेतु) लाभप्रद है। इस विरेचन से समस्त उदररोग, रक्तविकार, एवं कामला आदि में भी लाभ होता है।

( और पढ़े – पेट के रोगों को दूर करने के घरेलू नुस्खे और उपाय )

11). सूजन मिटाता है दन्ती

  • दन्ती मूल और निशोथ के चूर्ण से सिद्ध दूध को पीने से शोथ मिटता है।
  • दन्ती मूल, सोंठ, निशोथ, चित्रक, पिप्पली और मरिच क्वाथ के साथ पकाये दूध का सेवन भी शोथ में हितकारक है।

12). वायु का गोला (गुल्म) में लाभकारी है दन्ती का प्रयोग

  • दन्ती मूल और हरड़ के चूर्ण को गुड़ के साथ खाने से कफज गुल्म मिटता है।
  • दन्ती मूल कल्क को ठंडे पानी से सेवन करने से गुल्म में लाभ होता है। इससे पांडु कामला एवं अन्य उदररोग भी नष्ट होते हैं।

13). हैजा (विसूचिका) में दन्ती के इस्तेमाल से लाभ

दन्ती मूल, चित्रक मूल और पिप्पली को समभाग लेकर पानी के साथ पीसकर कल्क बनाकर मन्दोष्ण पानी के साथ पिलाना विसूचिका में लाभप्रद हैं।

14). सान्निपातिक ज्वर में दन्ती का उपयोग लाभदायक

दन्ती, द्रवन्ती, बड़ी कटेरी, एरण्ड की जड़, बिजौरे नीबू की जड़, काली निशोथ और छोटी कटेरी का क्वाथ बनाकर सान्निपातिक ज्वर में विरेचन के लिये पिलाना चाहिए। विरेचन की उपायदेयता ज्वरान्त में अधिक होती है। यदि अधिक कोष्ठबद्धता हो तो चिकित्सक के परामर्शानुसार मध्य में भी विरेचन योग के लिए जा सकते हैं। नये ज्वर में भी कई प्रयोग ज्वर हर होते हैं।

15). उरु स्तम्भ (जांघ का सुन्न हो जाना) रोग मिटाएं दन्ती का प्रयोग

दन्ती, द्रवन्ती, तुलसी, सरसों, अरणी, संहजना, बच, कुटज, और नीम के पत्र, मूल और फलों का स्वरस या कषाय बनाकर कवोष्ण पीने से उरुस्तम्भ में लाभ होता है।

16). पीलिया (कामला) में आराम दिलाए दन्ती का सेवन

दन्ती मूल 10 ग्राम, गुड़ 20 ग्राम को 100 मिली. जल में मिलाकर पिलाने से कामला मिट जाता है। ( और पढ़े – पीलिया के 16 रामबाण घरेलू उपचार )

17). खांसी ठीक करे दन्ती का प्रयोग

दन्ती मूल से चतुर्गुण मुनक्का लेकर क्वाथ बनाकर सेवन करने से शोधन होकर पित्तज कास और पाण्डु आदि रोग मिटते हैं।

18). श्वास रोग में फायदेमंद दन्ती का काढा

श्वासरोगी को दन्ती के पत्तों का क्वाथ बनाकर पिलाना चाहिए।

दन्ती से निर्मित आयुर्वेदिक दवा (कल्प) :

दन्त्यादि चूर्ण –

  • दन्ती, वचा, इन्द्रायण मूल, सातला (सिकाकाई), तिल्वक, निशोथ चूर्ण को गोमूत्र से उदर रोगों में दें। – भै. र.
  • दन्ती, द्रवन्ती, मरिच, अजवाइन, उपकुंजिका, सोंठ, स्वर्णक्षीरी तथा चित्रक इनके चूर्ण को गोमूत्र की सात भावना दें। इस चूर्ण को घी के साथ प्रयोग करें। यह विरेचन योग है। चूर्ण की मात्रा 3 से 6 ग्राम है। यह अजीर्ण पार्श्वशूल, गुल्म, गण्डमाला, वायुरोग और पाण्डुरोग में लाभप्रद है। इसे सर्वरोग नाशक चूर्ण कहते हैं। – च.सं.
  • दन्ती, सत्यानाशी की जड़, कसीस, बायविडंग और इन्द्रजौ समान भाग लेकर चूर्ण बनावें। इस चूर्ण को या आक और स्नुही (सेंहुड) के दूध को कृमि युक्त दांत में भरने से दांत के कृमि नष्ट हो जाते हैं। – बं. से.
  • दन्ती, निसोत, काली निसोत, सेवती के फूल, कुटकी, नील का पंचाग और सोंठ। इनके चूर्ण को अरण्ड के तेल में मिलाकर देने से विरेचन होकर परिणाम शूल (भोजन करने के उपरांत पेट में पीड़ा) तुरन्त नष्ट हो जाता है। मात्रा – बलवान पुरुष के लिए तेल 48 ग्राम, चूर्ण 6 ग्राम। – बं. से.

दन्त्यादि गुग्गुल –

दन्ती, द्रवन्ती, निशोथ, सैन्धव, वच और शुद्ध गूगल समभाग लेकर चूर्ण कर कुछ घी डालकर 1-1 ग्राम के वटक बना लें। दोष बलानुसार1-2 वटक, गोमूत्र, दूध, द्राक्षारस में से किसी के साथ सेवन करने से गुल्म रोग मिटता है। – बं० से.

दन्तीघृतम् –

दन्ती मूल 48 ग्राम, निसोत 60 ग्राम तथा हरड, बहेड़ा, आमला, अतीस, चीता और बायविडंग 30-30 ग्राम लेकर सबको पानी के साथ पीस लें। फिर 192 ग्राम घी में यह कल्क और 1 किलो 920 ग्राम सेंहुड का दूध मिलाकर पकावें । जब दूध जल जाय तो घृत को छान लें । इस घी में से केवल एक बूंद रोगी को पिलाने से विरेचन होकर दुस्साध्य श्लीपद रोग (हाथी पाँव) भी नष्ट हो जाता है। घी पकाते समय उसमें 2 किलो पानी भी डालना चाहिए। – ब. से.

दन्त्यरिष्ट –

दन्ती मूल का क्वाथ बनाकर इसमें अमलतास का गूदा और पुराना गुड़ डालकर एक हाण्डी में संधान विधि से संधान करें। 15 या 30 दिन बाद छानकर उपयोग में लायें। यह अरिष्ट रेचनार्थ उपयोगी है।

दन्त्यादि तेल –

दन्ती मूल, कनेर की जड़, कसीस, बायविडंग, इलायची, चीता और सेंधानमक समान भाग मिलाकर 240 ग्राम लें। पत्थर पर पानी के साथ पीसकर कल्क बना लें। फिर यह कल्क और 2 किलो आक का दूध और 8 किलो पानी को 2 किलो सरसों के तेल में मिलाकर पकावें। जब सब पानी जल जाय तो तेल को छान लें। इस तेल की मालिश से गुदा के मस्से नष्ट हो जाते हैं।

दन्त्यादि लेप –

दन्ती मूल, चीता, गौ का दन्त, करंज बीज और कनेर की जड़ की छाल समान भाग लेकर पानी के साथ पीस लें । पक्व और शोथयुक्त अन्त विद्रधि (पेट में होने वाला एक फोड़ा) में इसका लेप करना हितकारक है।

दन्तीधूम –

दंती मूल या निर्गुण्डी (सम्भालु) का धूम्रपान करने से कफज खांसी अवश्य तुरन्त नष्ट हो जाती है। – वृ. नि. र.

दन्त्यादि नस्य –

दन्ती मूल, मुलैठी, सेंधा नमक, तुलसी, पीपल, बायविडंग और करंज फल इनका समान भाग चूर्ण लेकर एकत्र मिलावें । इसका नस्य लेने से कृमि कुष्ठ और कफ-विकार नष्ट होते हैं। -च. सं.

दन्ती के दुष्प्रभाव (Danti ke Nuksan in Hindi)

  • अधिक मात्रा में दन्ती सेवन करने से मिचली (हृल्लास), व्याकुलता (क्षोभ), उद्वेष्टन (पीठ की ओर होनेवाला दर्द), अतिसार आदि क्षोभक व मादक लक्षण प्रकट होते हैं।
  • दन्ती के सेवन से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श करें ।
  • दन्ती को डॉक्टर की सलाह अनुसार ,सटीक खुराक के रूप में समय की सीमित अवधि के लिए लें।

दोषों को दूर करने के लिए : इसके दोषों को दूर करने के लिए मधुर – स्निग्ध द्रव्य, पानक (आम आदि को भूनकर बनाया गया खट–मीठा पेय पदार्थ), दूध आदि का प्रयोग करना चाहिए।

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