Dronpushpi ke Fayde | द्रोणपुष्पी के फायदे ,गुण ,उपयोग और नुकसान

द्रोणपुष्पी क्या है ? : What is Dronpushpi in Hindi

प्याले को संस्कृत में द्रोण कहा गया है। आज भी ढाक के पत्तों से बने प्याले को लोक में दोना या डोना कहा जाता है। द्रोणपुष्पी के फल पर पुष्प इस प्रकार लगे रहते हैं कि जैसे इन पुष्पों का प्याला बना हो इसीलिए इस वनौषधि का नाम द्रोणपुष्पी है।

यह पुष्पों का प्याला पूर्णता का प्रतीक है। इस प्याले में जीवनरस भरा रहता है। इस प्याले में आरोग्यामृत भरा रहता है। यह पुष्पों का प्याला पूर्ण स्वास्थ्य प्रदान करता है।

भावप्रकाश निघण्टु में इसे गुडूच्यादि वर्ग की वनौषधियों के अन्तर्गत तथा द्रव्यगुण विज्ञान (आचार्य प्रियव्रत) में विषमज्वरघ्न द्रव्यों के अन्तर्गत लिया है। चरक संहिता एवं सुश्रुत संहिता में इसका शाकवर्ग में वर्णन किया

द्रोणपुष्पी का विभिन्न भाषाओं में नाम : Name of Dronpushpi in Different Languages

Dronpushpi in –

  • संस्कृत – द्रोणपुष्पी, फलेपुष्पा, कुतुम्बकः (चरक), कुम्भयोनि
  • हिन्दी – गूमा
  • गुजराती – कूबी
  • मराठी – तुबा, कुमा
  • बंगला – हलकसा, घलघसे
  • तामिल – तुम्बारी
  • तेलगु – पेछातुमनी
  • राजस्थानी – दड़गल
  • लैटिन – ल्युकस किफेलोटस (Leucas Caphalota Spreng)

द्रोणपुष्पी का पौधा कहां पाया या उगाया जाता है ? : Where is Dronpushpi Plant Found or Grown?

द्रोणपुष्पी का पौधा कश्मीर, पंजाब, राजस्थान, गुजरात, बंगाल, आसाम और तमिलनाडु में पाया जाता है। हिमाचलप्रदेश में चार हजार फीट की ऊँचाई तक इसका पौध उगा हुआ मिलता है। बरसात में प्रायः भारत में सभी जगह उग आता है।

द्रोणपुष्पी का पौधा कैसा होता है ? :

  1. द्रोणपुष्पी का पौधा – इसका वर्षायुक्षुप वर्षाऋतु में उत्पन्न होता है। जिसकी ऊँचाई 1 से 3 फुट तक होती है। इसका काण्ड चतुष्कोण और रोमश होता है।
  2. द्रोणपुष्पी का पत्ता – पत्र 2 से 3 इंच व्यास के शीर्षस्थ सघन गोल चक्रों में होते हैं। बड़े भालाकार या अण्डाकार रोमश कोणपुष्पकों से घिरे होते हैं।
  3. द्रोणपुष्पी का फूल – पुष्प आकृति में द्रोण प्याला के समान होते हैं।
  4. द्रोणपुष्पी का फल – उक्त पुष्प गुच्छ में ही इसका बीजकोष या फल होता है। पुष्प के विकसित होने पर शीघ्र ही पंखड़ियां झडकर पुष्पाभ्यंतर कोष के निम्न भाग में एक सूक्ष्म 4 विभागों वाला हरा चमकीला फल आता है पकने पर इसके ये चार विभाग ही चार बीजों में परिवर्तित हो जाते हैं। ये बीज छोटे चिकने भूरे रंग के होते हैं।
    पुष्प शरद् ऋतु में तथा फल हेमन्त में लगते हैं। गरमी में क्षुप सूख जाते हैं।

द्रोणपुष्पी का उपयोगी भाग : Beneficial Part of Dronpushpi Plant in Hindi

पंचांग (विशेषतः पत्र)

द्रोणपुष्पी का संग्रह एवं संरक्षण :

द्रोणपुष्पी ताजा ही काम में लाई जाती है। वर्षा ऋतु के पश्चात् ताजा द्रोणपुष्पी तालाबों के किनारे पाई जाती हैं क्वचित् इसे अन्य ऋतु में भी उगाकर रखा जाता है । शुष्क रूप में उपयोग में लाने पर हेमन्त ऋतु में पंचांग का संग्रह कर सुखाकर मुखबंद पात्रों में रखकर अनार्द्र एवं शीतल स्थान पर रखा जाता है और समय पर उपयोग में लाया जाता है।
सूखी वनौषधि को क्वाथ रूप में उपयोग में लाया जाता हैं ।

वीर्य कालावधि :

तीन महीनों से छः महीनों तक इसे उपयोग में लाया जा सकता है।

द्रोणपुष्पी का रासायनिक विश्लेषण : Dronpushpi Chemical Constituents

द्रोणपुष्पी के पुष्पों में उड़नशील सुगन्धि तेल तथा क्षाराभ होता है, बीजों में स्थिर तेल निकलता है।

द्रोणपुष्पी के औषधीय गुण : Dronpushpi ke Gun in Hindi

  • रस – कटु
  • गुण – गुरू, रूक्ष, तीक्ष्ण
  • वीर्य – उष्ण
  • विपाक – कटु
  • दोषकर्म – यह वातकफ शामक एवं पित्तशोधन है
  • प्रतिनिधि – भृगराज

सेवन की मात्रा :

स्वरस – 10 से 20 मि0लि0

द्रोणपुष्पी का उपयोग : Uses of Dronpushpi in Hindi

  • द्रोणपुष्पी ज्वरघ्न विशेषतः विषमज्वरघ्न है।
  • वातश्लेष्मिक ज्वरों में तथा विषम ज्वर में इसे काम में लाया जाता है।
  • आमयुक्त नवज्वरों में द्रोणपुष्पी कालीमिर्च के साथ दिया जाता हैं
  • शीतज्वर में द्रोणपुष्पी, काली मिर्च और गुड के क्वाथ को उपयोग में लाया जाता है।
  • द्रोणपुष्पी दीपन पाचन अनुलोमन, पित्तसारक, रेचन और कृमिघ्न होने से आध्मान, शूल, विबन्ध, कामला, कृमिरोग आदि पाचन संस्थान के विकारों में उपयोगी है।
  • पीलिया में द्रोणपुष्पी के स्वरस का अंजन नेत्रों में किया जाता है।
  • यह रक्तशोधक एवं शोथहर (सूजन दूर करे) होने से रक्तविकारों में तथा शोथ में उपयोगी है।
  • द्रोणपुष्पी सर्दी-जुखाम , कास (खाँसी) ,श्वास आदि श्वसन संस्थानगत व्याधियों को कफघ्न होने से दूर करती है।
  • प्रतिश्याय (सर्दी-जुखाम) तथा शिरःशूल (सरदर्द) में इसके स्वरस का नस्य भी उपयोगी कहा जाता है।
  • यह जन्तुघ्न होने से व्रणों में भी उपयोगी है। व्रणों को इसके क्वाथ से धोना श्रेयष्कर है।
  • आर्तव जनन होने से कष्टार्तव (माहवारी के दौरान गर्भाशय में असहनीय पीड़ा) रजोरोध में उपयोगी है।
  • यूनानी मतानुसार यह गरम और खुश्क है। दस्त को साफ करता है। वायु और कफ को मिटाता है, पीलिया में लाभदायक है पेट के कृमियों को नष्ट कर देता है।
  • कफ का ज्वर इससे मिटता है।
  • सांप के विष का प्रभाव इसका रस पिलाने और नाक में टपकाने से कम हो जाता हैं।

सर्प विष की चमत्कारी औषधि द्रोणपुष्पी :

यह विषघ्न है अतः इसे सर्पविष के रोगी को बाह्याभ्यन्तर रूपेण दिया जाता है। इस विषय के अनुभवों का उल्लेख इस प्रकार है-

■ मेरा यह स्वयं का अनुभव है कि द्रोणपुष्पी जो राजस्थान केसजल भागों में तथा वर्षा ऋतु में प्रायः सर्वत्र मिलती है, सर्प विष नष्ट करने के लिए एक बहुत लाभकारी वनस्पति है। सर्प के काटै हुए व्यक्ति को इस क्षुप के पंचाङ्ग के स्वरस को 6 ग्राम से 12 ग्राम तक देने से अवश्य लाभ होकर मृत्यु के मुख से बच जाता है। यदि रोगी बेहोश हो तो नाक में द्रोणपुष्पी का स्वरस डालने से भी होश में आकर स्वस्थ हो जावेगा। -श्री भूरालाल पांडे (राजस्थान आयुर्वेद दर्शन)

■ “सर्पदंश पर अभूतपूर्व सिद्ध बूटी जिसे मैं सर्वसंजीवनी बूटी” भी कहता हूँ। वह है गुम्मा (द्रोणपुष्पी)। किसी प्रकार के कितने ही विषधर ने काटा हो, रोगी को चाहेजितनी भी गम्भीर दशा हो सिर्फ गुम्मा के पत्ते का रस आंख में कुछ बूंद डालते ही रोगी छटपटाने लगता है और 5-5 मिनट पर आंखों में कूछ बूंद डालते ही दो-तीन बार में रोगी बैठ जाता है और उसके जबड़े आदि खुल जाते हैं। पुनः द्रोणपुष्पी के पत्तों का स्वरस 20-20 ग्राम 15-15 मिनट पर पिला देते हैं और काली मिर्च, नीमपत्र खिलाकर निर्विष होने की परीक्षा करते रहते हैं। कुल 25 मिनट में रोगी स्वस्थ होकर चला जाता है।

■ मैं सर्पविष चिकित्सक विद्यार्थी जीवन से ही रहा हूं। इस औषधि के बारे में पुस्तकों में मैने पढ़ा था पर प्रयोग करने की हिम्मत नहीं होती थी। कुछ समय पूर्व मेरे यहाँ एक आदिवासी लड़का नौकर था, जब भी केस आता था वह बड़े दिलचस्पी से देखता था और मुस्कराता था। चार पाँच केस के बाद अचानक एक दिन एक केस के चले जाने के बाद उसने कहा – बाबूजी आप लोग इतना परेशान होते हैं, मैं तो अपने गांव में सांप का बड़ा भारी डॉक्टर कहा जाता हूं और 10-15 मिनट में ठीक कर देता हूँ। मैंने कहा बेटा यह दवा मुझे भी बता दो। उसने कहा बाबू जी यह गुम्मा (द्रोणपुष्पी) तो है। मैंने गुम्मा की तलास करवाई 4-5 दिनों बाद एक केस पर उसी के हाथों प्रयोग करवाया। 15-20 मिनट में ही आश्चर्य जनक से रोगी ठीक हो गया। तभी से मैं इसका अभ्यस्त हो चुका हूँ। वर्षा ऋतु के पश्चात् पौधा सूख जाने पर इसे पुनः उगा देता हूं। लेख लिखते समय मेरे गार्डन में तीस-चालीस गुम्मा के पौधे लहलहा रहे हैं। – श्याम नारायण वैद्य

■ “सर्पविष पर यह गुम्मा बहुत कामयाब सिद्ध हुई है। पायोनियर नामक सुप्रसिद्ध इंगलिश पत्र में कुछ वर्षों पूर्व एक डॉक्टर का इस वनस्पति के सम्बन्ध में एक लेख प्रकाशित हुआ था। जिसमें लिखा था द्रोणपुष्पी एक भारतीय वनस्पति है, जिसके साथ किसी भी अंग्रेजी वनस्पति की तुलना करने में मैं कृतनिश्चय नहीं हूँ।

एक दिन रात के समय एक चौदह वर्ष की लड़की बहुत खराब हालत में मेरे पास लाई गई। उसके सम्बन्धियों ने मुझे बताया कि करीब 15 महीने पहले इसको सांप ने काटा था। बातचीत चलते चलते मैंने देखा कि वह लड़की रह रह कर मूर्च्छित हो जाती थी। उस समय मेरे पास कोई भी दूसरी औषधि मौजूद नहीं थी। इसलिये मैने द्रोणपुष्पी (गूमा) का एक पौधा उखाड़कर उसके पत्तों को मसलकर उसका रस निकाल उसके नाक के दोनों तरफ टपकाया। इस रस का असर इतना जल्दी हुआ कि वह लड़की तुरन्त उठकर बैठ गई और उसके बाद फिर कभी बेहोश नहीं हुई। इस औषधि में सर्पविष नाशक गुण हैं। यह बात कुछ वर्षों पूर्व मुझे एक फकीर ने बतलाई थी।

द्रोणपुष्पी के प्रकार :

इसकी कई प्रजातियाँ पाई जाती हैं।वनस्पति विशेषज्ञों ने सात प्रकार की द्रोणपुष्पी का वर्णन किया है ।
पं0 श्री कृष्णप्रसाद जी त्रिवेदी ने अभिनव बूटी दर्पण के आधार पर द्रोण पुष्षी के चार भेदों का सगुण वर्णन किया है। इसके पश्चात् बड़ी द्रोणपुष्पी (महाद्रोणा) का वर्णन किया है। वर्णन यहां भी जानकारी हेतु किया जा रहा है।

1. द्रोणपुष्पी (ल्यूकास लिनिन्फोलिया) – यह हलकुसा गुमा है जिसे गुजराती में झीना पाननो कुवो तथा बंगला में हलकसा, घलघसे कहा जाता है।

इसके पत्र 2-4 इंच लम्बे बी जैसे एवं पतले होते हैं। यह भी खेतों में बंगाल, आसाम, सिलहट, सिंगापुर तथा दक्षिण में कोंकण से ट्रावन कोर तक प्रचुरता से पाई जाती है।
यह कफ निःसारक, कृमि नाशक, कामोद्दीपक, शांतिदायक, मृदुरेचक, दीपन, पौष्टिक होती हैं यह अर्श एवं नेत्रव्रण में लाभदायक है शेष गुण वर्णित द्रोणपुष्पी के समान

2. द्रोणपुष्पी (ल्यूकास अस्पेरा) – यह छोटा हलकुसा है। जिसे मराठी में ताम्बा और बंगला में हुलकुश कहते हैं।इसकी शाखाएं प्रायः मूलप्रदेश से ही निकलती है। जिनमें कई सीधी प्रशाखायें होती हैं। डंठल सीधा व दृढ़ होता है। पत्र 1 इंच से 3 इंच लम्बे कुछ गोल एवं अणीदार शाखा के चारों ओर होते हैं।

इसके पुष्प गुच्छ कुम्भाकार एक इंच व्यास के लगते हैं। शेष आकार प्रकार उक्त द्रोणपुष्पी जैसा ही होता है। यह भी प्रायः सर्वत्र खेतों में होती है। बिहार से पंजाब तथा दक्षिण में यह पाई जाती है।
यह कृमिघ्न, शीतनिवारक, रक्त शोधक है, खुजली फोडे फुँसी आदि चर्म रोगों में इसका रस लगाना हितकारी है। संधि वात में भी पत्तों को पीसकर लेप किया जाता है।

3. द्रोणपुष्पी (ल्यूकास झेलानिका) – यह भी आकार प्रकार में उक्त द्रोणपुष्पी जैसी है। गुणों में भी प्रायः साम्यता है। दक्षिण प्रदेशों में, बंगाल में, आसाम से लेकर सीलोन तक अधिक पाई जाती है। यह विशेष उत्तेजक है। इसकी कड़वी जड़, तीक्ष्ण पत्र ,पुष्प त्वचा रोग में लेप के रूप में उपयोगी है।

4. द्रोणपुष्पी (लियोनुरस सिव्रिकस) – जो वक्रगूमा के नाम से जानी जाती है। इसका क्षुप 4 से 6 फुट ऊँचा होता है। शीतकाल में यह जलाशयों के किनारे तथा धान के खेतों में बंगाल, सिलहट से लेकर कुर्ग तक अधिक पाई जाती है।
इसकी शाखा प्रशाखाएं टेढ़ी मेढ़ी एवं चतुष्कोणयुक्त होती है ।
पत्ते कंगूरेदार 1/11 से 4 इंच लम्बे, प्रायः तीन पत्र एक साथ लगे हुए होते हैं।
पुष्प-उक्त गूमापुष्प जैसे ही चारों ओर गुच्छों में आध इंच लम्बे कुछ नीलाभ लालिमायुक्त होते हैं। इसका भी पंचांग कडुवा होता है। इसमें ज्वर नाशक शक्ति । विशेष होती है। ज्वर में इसका फांट या क्वाथ 10 से 50 मिलि0 तक दिया जाता है।

5. महाद्रोणपुष्पी (बड़ी गूमा) – इसका क्षुप इन सभी द्रोणपुष्पियों के क्षुपों से बड़ा होता है। किन्तु इसके पत्र इनके तुल्य ही होते हैं। गुणधर्म में भी प्रायः समानता ही है। इसे देवकुंवा, देवतुम्बे, दणहला आदि प्रान्तीय भाषाओं में कहते हैं।
यह विशेषतः वातव्याधि में उपयोगी है। यह भूतबाध नाशक भी है।
इसे पारदशोधक माना जाता है।

इन भेदों के वर्णन के पश्चात् मुख्य वर्णित द्रोणपुष्पी (ल्युकस किफेलोटस) के गुणधर्म का यहां विस्तार से वर्णन – किया जा रहा है। इन सभी द्रोणपुष्पी भेदों के गुणधर्म में प्रायः समानता ही दृष्टिगोचर होती है।

द्रोणपुष्पी के फायदे : Benefits of Dronpushpi in Hindi

1). शीतज्वर – बिस्तर पर द्रोणपुष्पी पत्रों को बिखेर कर सोने से शीतज्वर के रोगी को आराम मिलता हैं।

2). खुजली (कंडू) – द्रोणपुष्पी का ताजा स्वरस शरीर पर मलने से खुजली मिटती है।

3). घाव (व्रण) – जन्तुघ्न होने से द्रोणपुष्पी के क्वाथ से घाव को धोना लाभप्रद है।

4). चातुर्थिक ज्वर – द्रोणपुष्पी के पत्र रस का आँखों में अंजन करते हैं।तथा पत्रों को पीसकर लेप करने से पसीना आकर ज्वर उतर जाता है।

5). जुएँ – सिर में जुएँ पड़ जाने पर 250 ग्राम द्रोणपुष्पी पत्रों पर मालकांगनी का तेल लगाकर आंच पर थोड़ा सेककर सिर पर बाँधे। इस प्रकार 5 से 7 दिनों तक करने से जुएँ आदि कृमि नष्ट हो जाते हैं।

6). सर्पविष-

  • द्रोणपुष्पी स्वरस में 2-3 काली मिरच घोटकर पिलावें।
  • द्रोणपुष्पी स्वरस या चूर्ण को नस्य उपयोगी है।
  • पंचांग को जलाने से सर्प पास नहीं आते।
  • जहाँ द्रोणपुष्पी के पौधे (क्षुप) लगे हो वहां सर्प नहीं आते हैं।
  • द्रोणपुष्पी के पंचांग चूर्ण को पानी में घोलकर सर्प पर छिड़क से वह मंद पड़ जाता है।

7). बुखार (ज्वर) –

  • द्रोणपुष्पी क्वाथ में लवंग चूर्ण मिलाकर देने से कफज्वर में लाभ होता है।
  • द्रोणपुष्पी स्वरस 12 मिलि0 में 5 कालीमिर्च चूर्ण मिला प्रातः पीने से ज्वर उतर जाता है।
  • द्रोणपुष्पी के हरे पत्तों के साथ कालीमिर्च मिलाकर 3-3 ग्राम गोली बनाकर देने से ज्वर उतरता है।
  • द्रोणपुष्पी के फल को 125 मिली पानी में पीस उसमें 20 ग्राम मिश्री मिलाकर पिलाने से शीत ज्वर में लाभ होता हैं
  • द्रोणपुष्पी पत्रस्वरस 300 मिलि0 में पित्तपापड़ा व नागरमोथा चूर्ण 10-10 ग्राम तथा चिरायता चूर्ण 20 ग्राम मिलाकर एक-एक ग्राम की गोलियाँ बनालें। इन गोलियों के सेवन से सब प्रकार के ज्वरों में लाभ होता है।

8). विषमज्वर-

  • द्रोणपुष्पी पंचांग, मरिच और गुड़ का क्वाथ बनाकर सेवन करना विषमज्वर में हितकारी है।
  • द्रोणपुष्पी पत्र स्वरस में फिटकरी का फूला 5 ग्राम व काली मिर्च 10 ग्राम खरल कर चने जैसी गोलियाँ बना 1-3 गोली गरम जल से दें।

9). मल्लविष – संखिये के कारण यदि रोगी विषाक्रान्त हो तो द्रोणपुष्पी स्वरस में कालीमिर्च मिलाकर पिलावें।

10). अफीम विष – अफीम के अतियोग से विषलक्षण दिखलाई दें तो द्रोणपुष्पी का स्वरस पिलाने से विष प्रभाव कम होता है।

11). खाँसी (कास) – द्रोणपुष्पी स्वरस में बहेड़ा चूर्ण मिलाकर सेवन करने से खाँसी का विकार रूक जाता है।

12). श्वास –

  • द्रोणपुष्पी के पुष्प और काले धत्तूरे के पुष्पों को चिलम में रख धूम्रपान करने से श्वास वेग शान्त होता है।
  • द्रोणपुष्पी स्वरस में अदरक स्वरस एवं मधु मिलाकर सेवन में भी श्वास में लाभ होता हैं
  • द्रोणपुष्पी के पत्तों का आधा भाग सैन्धव लवण मिलाकर सम्पुट कर गजपुट में फूंक दें। उस राख का चूर्ण बनाकर 3-3 ग्राम लेकर उसमें मधु व अदरक स्वरस मिलाकर सेवन करने से भी तमक श्वास में लाभ होता हैं ।

13). पीलिया (कामला) –

  • द्रोणपुष्पी स्वरस 10 मिली0 में काली मिर्च 6 दाने और सेंधानमक 2 ग्राम मिलाकर देवें। दिन में तीन बार देने से पीलिया में लाभ होता है।
  • द्रोणपुष्पी के पत्र स्वरस को आँखों में एक सप्ताह तक डालें।

14). सर्दी-जुकाम (प्रतिश्याय) –

  • द्रोणपुष्पी के शुष्क पत्रों के साथ समभाग बनफशा व मुलेठी का क्वाथ बनाकर उसमें मिश्री मिलाकर सेवन करने से सर्दी-जुकाम ठीक होता है।
  • द्रोणपुष्पी के पुष्पों का शर्बत बनाकर सेवन करना भी हितकर है।
  • द्रोणपुष्पी स्वरस में मधु और शुद्ध टंकण डालकर सेवन से सर्दी-जुकाम मिटता हैं यह बालकों के लिए भी हितकारी है। इस प्रयोग में बालकों की जुकाम व खाँसी मिटती है।
  • द्रोणपुष्पी स्वरस का नस्य उपयोगी है।

15). सन्धिवात – द्रोणपुष्पी स्वरस में पीपल चूर्ण मिलाकर देवें।

16). वातव्याधि – द्रोणपुष्पी पचांग का चूर्ण 6 ग्राम प्रातः सायं 20 ग्राम मधु मिलाकर उर्ध्ववात तथा किसी प्रकार के अर्धाङ्ग वातव्याधि वाले रोगी को तीन सप्ताह तक सेवन करावें। अवश्य लाभ होगा।

17). यकृत (लिवर) प्लीहा (तिल्ली) वृद्धि – द्रोणपुषीमूल के चूर्ण में चतुर्थांश पीपल का चूर्ण मिला 250 मि0ग्रा0 से 1 ग्राम तक की मात्रा में जल के साथ दिन में 2 से 3 बार देते रहते से 10-15 दिनों में लाभ होता है। इससे शीतज्वर, विषमज्वर में भी लाभ होता है।

18). ग्रंथिक सन्निपात – द्रोणपुष्पी के फूल, कुटकी, चिरायता, सैन्धव, त्रिकटु चूर्ण को सहदेवी के रस की भावना देकर 250 मि0ग्रा0 की गोलियां बनाकर दिन में 5-7 बार दें।

19). प्रमेह – द्रोणपुष्पी स्वरस 20 ग्राम में शहद 10 ग्राम मिला पीने से वात कफज प्रमेह नष्ट होता है।

20). सूजन (शोथ) –

  • द्रोणपुष्पी पंचाङ्ग 25 ग्राम का क्वाथ बनाकर शहद मिलाकर सेवन करने से सूजन मिटती है ।
  • द्रोणपुष्पी पत्र तथा नीमपत्र दोनों को पानी में उबालकर बफारा (भाप से शरीर को सेंकना) देने से शोथ का शमन होता है।

21). पेट फूलना (आध्मान) – द्रोणपुष्पी के पत्तों की शाक खाने से एक-दो दस्त होकर आध्मान दूर होता है।

22). अजीर्ण – द्रोणपुष्पी के कोमल पत्तों को केला के पत्ते में लपेट कर पुटपाक विधि से भूजल में पकाकर नमक के साथ खिलाने से अजीर्ण मिटता है तथा मन्दाग्नि भी मिटती है। यह बुखार मे मरीज को पथ्य के रूप में भी दे सकते हैं। द्रोणपुष्पी के पत्रों का शाक भी अजीर्णहर एवं अग्निवर्धक है।

23). पेट दर्द (उदरशूल) – द्रोणपुष्पी स्वरस के साथ छुहारे का चूर्ण खावें तथा स्वरस में मधु मिलाकर सेवन करें।

24). सर दर्द (शिरःशूल) –

  • द्रोणपुष्पी के ताजे पत्तों का स्वरस पिलावें।
  • सर्दी के सिरदर्द में द्रोणपुष्पी के पत्तों के रस की दो बूंद नाक में डालें।
  • द्रोणपुष्पी के रस में एक कालीमिर्च पीस माथें पर लेप करें।

25). कृमिरोग – द्रोणपुष्पी स्वरस में आखुपर्णी स्वरस मिलाकर पिलावें।

26). मासिक धर्म के दर्द (कष्टार्तव) – द्रोणपुष्पी पंचांग एवं गुड़ का क्वाथ बनाकर पिलाने से कष्टार्तव मिटता है।

द्रोणपुष्पी के अनुभूत प्रयोग :

1). मन्दाग्नि हर प्रयोग-
द्रोणपुष्पी 2 ग्राम तथा काली मिर्च 11 दाने लेकर पीस लें और सुबह सौंफ अर्क में ताजा पानी मिलाकर उससे फांक लें। 2-3 सप्ताह में दुगनी-तिगुनी भूख लगेगी तथा मन्दाग्नि नष्ट होकर आश्चर्य जनक लाभ होगा। -पं0 श्री शिवदत्त वैद्य (धन्व0 अनु० चिकि0)

2). दन्तकृमि हर प्रयोग-
द्रोणपुष्पी के पत्तों का रस, समुद्रझाग, शहद और तैल चारों समभाग लें। समुद्रझाग को बारीक पीस लें, फिर चारों वस्तुओं को मिला लें। इसे 2-3 बूंद कान में टपकाने से दाढ़ दाँत के कीड़े मर जाते हैं। है न आयुर्वेद की चमत्कारी दवा। दवा कान में डाली जाती है और कीड़े दाढ़ के मरते हैं। -स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती (चमत्कारी औषधियां)

3). विषमज्वर हर प्रयोग-
द्रोणपुष्पी, नीम की अन्तरछाल, करंज मूल छाल, तुलसी (पंचांग) गुडूची छोटी कटेरी और छोटी हरड़े प्रत्येक 100-100 ग्राम। सभी द्रव्यों को कूटकर अष्टगुण जल में क्वाथ करें। चतुर्थांश अवशेष रहने पर उतार लें। छानकर बोतल में रख लें। ज्वर आने से पूर्व 2-2 घंटा पर 3 मात्रा दें। दो दिनों के प्रयोग से विषमज्वर दूर होता है। -वैद्य धीरेन्द्र मोहन भट्ट

4). मलेरिया में उपयोगी प्रयोग-
द्रोणपुष्पी स्वरस, सहदेवी स्वरस, देवमंजरी स्वरस तथा नायबूटी स्वरस 20-20 ग्राम। सबको काच के पात्र में मिलावें, फिर उसमें फिटकरी का लावा 25 ग्राम मिलाकर दो दिनों पश्चात् ऊपर का साफ निथरा अर्क शीशियों में भरकर रख लिया जाय तथा ज्वर आने से पहले 10 ग्राम अर्क, 20 ग्राम ताजा पानी मिलाकर पीने को दिया जाय तो मलेरिया दूर हो जाता है। -पं0 खूबचन्द मिश्र

5). मुधमेह हर प्रयोग-
द्रोणपुष्पी पत्र 10 ग्राम, काली मिर्च 1 दाना दोनों को पानी में पीस नित्य प्रातः 21 दिनों तक पिलाने से मधुमेह रोग में लाभ होता है। -पं0 शिवचन्द राजवैद्य

6). स्नायुक रोग हर प्रयोग-
स्नायुक रोग अवरोध के लिए द्रोणपुष्पी पत्र या पंचांग का स्वरस 100 मिलि0 माघ की अष्टमी को पिलाते हैं तथा उस दिन केवल चावल घृत व शक्कर का पथ्य देते हैं। इस प्रयोग से फिर जन्म भर यह रोग नहीं हाता है। यह प्रतिरोधक है। जिन्हें यह रोग हो रहा हो उन्हें भी 10-20 मिलि0 स्वरस प्रतिदिन पिलाने से आराम होता है। -कवि० प्रतापसिंह वैद्यरत्न

7). प्लीहा (तिल्ली) वृद्धि हर प्रयोग-
विषम ज्वर, जीर्णज्वर से हुई पुरानी प्लीहावृद्धि पर द्रोणपुष्पी के पुराने पौधे की जड़ रविवार के दिन उखाड़ लावे तथा उसे 5-6 ग्राम पित्तपापड़ा के साथ ताजे जल में पीस 100 मिलि0 पानी में मिला आग पर सामान्यतया उष्ण कर 5 ग्राम देशी चीनी मिलाकर पीवें। पीने के लगभग 6 घन्टों बाद एक भारी वमन या दस्त होगा। दूसरे या तीसरे दिन आधी प्लीहा या पूर्णतया वृद्धि दूर होगी। पुनः दूसरे रविवार को इसी तरह पीवें। इस प्रकार 2 या 3 रविवार को पीने से बढ़ी प्लीहा में पूर्ण लाभ होता है।

8). श्वासहर प्रयोग-
द्रोणपुष्पी के पौधे अच्छी तरह पक जाने पर (जब पुष्प गुच्छ पीले पड़ जाय) उखाड़कर शुष्क कर भस्म कर लें। एक किलो इस भस्म को चार लीटर पानी में डालकर खूब मलें और स्वच्छ निर्मल जल (खार विधि से) साफ बनाकर बोतलों में भर लें। दमें के रोगी को 15-15 मिनट में 20-20 मि0लि0 पिलावें। दो-तीन बार में रोगी को आराम मिलेगा। भयंकर श्वास का दौरा नष्ट होगा। कुछ काल तक इस जल को पिलाने से दमा व कास निर्मूल होता है। – श्री शिवचन्द्र राजवैद्य

9). नेत्ररोगहर प्रयोग- द्रोणपुष्पी स्वरस मधु में मिलाकर नित्य आँख में डाले तो मोतियाबिन्द उतरता हुआ रूक जाता है तथा आँखों के दृष्टिदोष मिट जाते हैं। – डॉ0 आर0 जी0 साहू

10). विषखपरा विषहर प्रयोग-
द्रोणपुष्पी की पत्ती के स्वरस 10-10 मि0लि0 आधा-आधा घन्टे पर अनेक बार पिलाते रहने से विषखपरा विष शान्त होता है। परीक्षित है। -वैद्य राजेश्वरदत्त शास्त्री

11). मन्दाग्निनाशक प्रयोग-
द्रोणपुष्पी पत्र 2 ग्राम, कालीमिर्च 10 दाने पीसकर सुबह ही सौंफ के अर्क से फंकी लिया करें। दो-तीन सप्ताह में दुगनी भूख लगेगी। -श्री शिवचन्द्र वैद्यराज

द्रोणपुष्पी के दुष्प्रभाव : Dronpushpi ke Nuksan in Hindi

  • द्रोणपुष्पी लेने से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श करें ।
  • द्रोणपुष्पी को डॉक्टर की सलाह अनुसार ,सटीक खुराक के रूप में समय की सीमित अवधि के लिए लें।
  • द्रोणपुष्पी पित्त प्रकृति वालों के लिए अहितकर है।

दोषों को दूर करने के लिए : इसके दोषों को दूर करने के लिए अनार, कालीमिर्च, अदरक व मधु का उपयोग करना चाहिये ।

(दवा ,उपाय व नुस्खों को वैद्यकीय सलाहनुसार उपयोग करें)

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