लेमनग्रास के फायदे: गवती चाय के गुण, उपयोग और विधि

जिस हरी पत्ती को आप बरसात की शाम चाय के भगोने में डालते हैं, वह असल में घास है। उसी कुल की घास, जिससे गेहूँ, चावल, गन्ना और बाँस आते हैं। फर्क बस इतना है कि इसकी पत्ती को ज़रा-सा मसलते ही हवा में नींबू जैसी ताज़ी खुशबू फैल जाती है, जबकि इसमें नींबू का एक अंश भी नहीं होता। कोंकण के कई घरों में यह आँगन के कोने में चुपचाप उगती रहती है और लोग इसे बस चाय का स्वाद मानकर तोड़ते रहते हैं। क्या आपने कभी सोचा कि आयुर्वेद इस साधारण-सी दिखने वाली घास को किस नज़र से देखता है?
अच्छी खबर यह है कि उत्तर बहुत व्यावहारिक है। लेमनग्रास के फायदे मुख्य रूप से पाचन, सर्दी-जुकाम और मन की थकान से जुड़े हैं। आयुर्वेद में यह कटु-तिक्त रस, उष्ण वीर्य और लघु-रूक्ष गुण वाली वनस्पति है, जो कफ और वात को शांत करती है, जठराग्नि जगाती है, पसीना लाकर ज्वर में हल्कापन देती है और मूत्र को खुलकर लाती है। पहचान से लेकर शास्त्रीय विधि से चाय बनाने और सावधानियों तक, सब आगे खुलता जाएगा।
लेमनग्रास या गवती चाय क्या है और इसे कैसे पहचानें?
महाराष्ट्र में किसी से लेमनग्रास माँगिए, तो वह शायद ठिठक जाए। पर “गवती चहा” कहते ही वह आपको गमले की ओर ले जाएगा। मराठी में “गवत” का अर्थ घास है, इसलिए गवती चहा यानी घास वाली चाय।
नाम अनेक, पौधा एक
- संस्कृत: भूतृण, भूस्तृण, गंधतृण
- हिंदी: लेमनग्रास, नींबू घास, हरी चाय
- मराठी: गवती चहा
- गुजराती: लीली चा
- अंग्रेज़ी: Lemongrass, West Indian Lemongrass
- वानस्पतिक नाम: Cymbopogon citratus (DC.) Stapf, कुल Poaceae (घास कुल)
इसकी एक और प्रजाति Cymbopogon flexuosus (East Indian Lemongrass) की खेती मुख्यतः तेल निकालने के लिए होती है।
पत्ती को मसलकर देखिए, पहचान अपने आप हो जाएगी
लेमनग्रास घने गुच्छों में उगती है। पत्तियाँ लंबी, पतली, धारदार और हल्की हरी होती हैं। नीचे का भाग मोटा, सफ़ेद-हरा और कुछ-कुछ हरे प्याज़ के डंठल जैसा होता है। सबसे पक्की पहचान उसकी गंध है: पत्ती को उँगलियों में मसलते ही नींबू जैसी तेज़, साफ़ सुगंध आती है।
एक बात अक्सर लोग नहीं जानते। मच्छर भगाने वाला सिट्रोनेला (Cymbopogon nardus) लेमनग्रास का निकट संबंधी है, पर दोनों एक नहीं हैं। नर्सरी में कई बार एक के नाम पर दूसरा दे दिया जाता है, इसलिए चाय के लिए पौधा लें तो पत्ती मसलकर नींबू वाली गंध अवश्य परखें।
घर के गमले में उगाना सबसे आसान
बाज़ार से लाए ताज़े डंठल, जिनके नीचे थोड़ी जड़ बची हो, पानी के गिलास में रख दें। एक-दो सप्ताह में जड़ें निकलते ही उन्हें गमले में लगा दें। भरपूर धूप और नियमित पानी चाहिए, पर गमले में पानी रुकना नहीं चाहिए।
आयुर्वेद में लेमनग्रास के औषधीय गुण क्या हैं?
कोई द्रव्य शरीर में जाकर क्या करेगा, यह आयुर्वेद पाँच कसौटियों से पहले ही बता देता है: रस, गुण, वीर्य, विपाक और प्रभाव। लेमनग्रास के औषधीय गुण इस प्रकार हैं:
| कसौटी | लेमनग्रास में |
|---|---|
| रस (स्वाद) | कटु (तीखा), तिक्त (कड़वा); कुछ ग्रंथों में कषाय भी |
| गुण | लघु (हल्का), रूक्ष (सूखा), तीक्ष्ण |
| वीर्य (शक्ति) | उष्ण (गर्म) |
| विपाक (पचने के बाद का प्रभाव) | कटु |
| दोष पर असर | कफ और वात शामक, अधिक मात्रा में पित्त बढ़ाने वाला |
| प्रमुख कर्म | दीपन, वातानुलोमन, स्वेदजनन, मूत्रल, कफघ्न, सुगंधि |
लघु, रूक्ष और उष्ण गुण कफ के भारीपन, चिपचिपाहट और ठंडक के ठीक उलटे हैं, इसलिए यह कफ को काटती है। उष्ण वीर्य और सुगंध वात की रुकावट दूर करते हैं। यही गर्मी पित्त प्रकृति वालों के लिए सावधानी का कारण भी है।
चरक संहिता का एक सूत्र यहाँ बहुत सटीक बैठता है:
अनेनोपदेशेन नानौषधिभूतं जगति किञ्चिद् द्रव्यमुपलभ्यते तां तां युक्तिमर्थं च तं तमभिप्रेत्य॥ (चरक संहिता, सूत्रस्थान 26)
अर्थ: इस उपदेश के अनुसार संसार में ऐसा कोई द्रव्य नहीं, जो औषधि न हो, बशर्ते उसे सही युक्ति और सही उद्देश्य से प्रयोग किया जाए।
आँगन की घास भी औषधि बन जाती है, अगर उसे गुण जानकर सही मात्रा में सही व्यक्ति को दिया जाए।
इसकी सुगंध का रहस्य इसके उड़नशील तेल में है, जिसका मुख्य घटक सिट्रल (citral) है। आचार्यों ने जिसे “सुगंधि” और “दीपन” कहा, आज उसी तेल पर प्रयोगशालाओं में शोध होता है।
लेमनग्रास के फायदे: शरीर में यह कहाँ-कहाँ काम करती है?
भारी भोजन के बाद पेट फूला लगे और मन सुस्त हो, तो दादी-नानी अदरक या अजवाइन की ओर हाथ बढ़ाती थीं। कोंकण के घरों में उसी जगह गवती चाय आती थी।
जठराग्नि को जगाने वाली सुगंध
आयुर्वेद के अनुसार अधिकतर रोगों की जड़ मंद अग्नि है, जिससे आम (अधपचा, चिपचिपा पदार्थ) बनने लगता है। लेमनग्रास दीपन है, यानी भूख और पाचन-शक्ति जगाती है। अजीर्ण, भोजन के बाद भारीपन, अरुचि और आध्मान (पेट फूलना) में भोजन के बाद ली गई एक कप गुनगुनी गवती चाय राहत देती है। यह वातानुलोमन भी है, यानी पेट में फँसी वायु को नीचे की ओर चलाती है। सोंठ की एक चुटकी साथ हो, तो यह असर और गहरा होता है।
इसे भी पढ़ें: बुज़ुर्गों में अग्निबल बढ़ाने के उपाय: आयुर्वेदिक मार्गदर्शन
सर्दी, जुकाम और कफ में भाप जैसी राहत
प्रतिश्याय (सर्दी-जुकाम) मूल रूप से कफ और वात का रोग है। नाक बंद हो और सिर भारी लगे, तो तुलसी, अदरक और लेमनग्रास की गर्म चाय कफ को पतला करती है, और इसकी पत्तियों की भाप बंद नाक खोलती है।
ज्वर में पसीना लाकर हल्कापन
स्वेदजनन गुण के कारण लेमनग्रास पसीना लाती है। कफज और वातज ज्वर, विशेषकर मौसम बदलने पर होने वाले हल्के बुखार में, गर्म गवती चाय शरीर को पसीने के रास्ते हल्का करती है। कई देशों में इसे लोक-परंपरा में “fever grass” कहा जाता है। ध्यान रहे, तेज़ बुखार, लगातार कई दिन चलने वाला बुखार या बहुत कमज़ोरी हो, तो घरेलू चाय पर निर्भर न रहें, तुरंत चिकित्सक से मिलें।
मूत्र को खुलकर लाने वाली
लेमनग्रास मूत्रल है। मूत्रकृच्छ्र (पेशाब में रुकावट या जलन का अनुभव) की हल्की अवस्था में आयुर्वेदिक परंपरा में इसका प्रयोग होता रहा है। आधुनिक शोध की एक समीक्षा (Biology पत्रिका, 2022) ने भी लेमनग्रास के रक्तचाप घटाने वाले संभावित असर के पीछे मूत्र-वृद्धि और रक्त-वाहिनियों के शिथिल होने को कारण माना है, हालाँकि वहाँ मनुष्यों पर अध्ययन अभी कम और छोटे हैं।
मन की थकान और बोझिलता में सुगंध का स्पर्श
आयुर्वेद में सुगंध का सीधा संबंध मन की प्रसन्नता से है। दिन भर के काम के बाद सिर भारी हो, तो लेमनग्रास की हल्की चाय या सुगंध मन को हल्का करती है। सुगंध पर हुए एक छोटे मानव अध्ययन में भी चिंता में कमी देखी गई, यद्यपि चाय पीने पर ऐसा असर हर अध्ययन में एक-सा नहीं मिला। इसलिए इसे मन को हल्का करने वाला सहारा मानें, नींद या चिंता की दवा नहीं।
मुख की दुर्गंध और मसूड़े
सुगंध और कटु-तिक्त रस मुख को साफ़ करते हैं, इसलिए भोजन के बाद की गवती चाय मुँह की गंध घटाती है। इसके तेल के रोगाणुरोधी गुण पर प्रयोगशाला-अध्ययन हुए हैं, और मसूड़ों की पुरानी समस्या पर कुछ छोटे मानव अध्ययन आशा जगाते हैं।
गवती चाय के फायदे: महाराष्ट्र की रसोई का पुराना ज्ञान
बारिश के दिनों में मुंबई की किसी पुरानी चाल में जाइए, रसोई से चाय-पत्ती, अदरक और गवती चहा की मिली-जुली महक आएगी। यह आदत पीढ़ियों पुरानी है, और इसके पीछे ऋतुचर्या की गहरी समझ छिपी है।
वर्षा ऋतु में आयुर्वेद के अनुसार अग्नि स्वाभाविक रूप से मंद होती है और वात का प्रकोप होता है। ठंडी नमी कफ को भी बढ़ाती है। ऐसे में उष्ण, लघु और दीपन गुण वाली गवती चाय तीनों मोर्चों पर साथ देती है: अग्नि जगाती है, वात को शांत करती है और कफ को जमने नहीं देती।
गवती चाय के फायदे घर-घर में इन रूपों में देखे जाते हैं:
- दूध वाली चाय में: चाय उबलते समय दो-तीन पत्तियाँ मोड़कर डाल दी जाती हैं, जिससे भारी दूध की चाय भी कुछ हल्की पचती है।
- बिना दूध के काढ़े के रूप में: सर्दी-खाँसी के दिनों में अदरक, तुलसी और काली मिर्च के साथ।
- भाप में: बंद नाक और सिर के भारीपन के लिए।
एक सूक्ष्म बात और। गर्मी में, जब पित्त बढ़ा रहता है, यही लोग गवती चाय अपने-आप घटा देते हैं या उसमें धनिया-सौंफ जोड़ देते हैं। यह बिना ग्रंथ पढ़े ऋतुचर्या का पालन है।
इसे भी पढ़ें: स्वादिष्ट हर्बल चाय बनाने की विधि व उसके स्वास्थ्य लाभ
लेमनग्रास की चाय बनाने की विधि: फांट का शास्त्रीय तरीका
ज़्यादातर लोग लेमनग्रास को दस-पंद्रह मिनट खौलाते हैं और फिर शिकायत करते हैं कि खुशबू नहीं आई। जिस द्रव्य की शक्ति उसकी सुगंध में बसती है, उसे खुले बर्तन में देर तक उबालने से वही सुगंध भाप बनकर उड़ जाती है।
आयुर्वेद ने ऐसे सुगंधित और कोमल द्रव्यों के लिए “फांट” कल्पना बताई है। शार्ङ्गधर संहिता में फांट की विधि इस प्रकार है:
क्षुण्णे द्रव्यपले सम्यग् जलमुष्णं विनिक्षिपेत्। मृत्पात्रे कुडवोन्मानं ततस्तु स्रावयेत् पटात्॥ (शार्ङ्गधर संहिता, मध्यम खंड)
अर्थ: कुटे हुए द्रव्य पर उसके चार गुना गर्म पानी डालें, मिट्टी के बर्तन में कुछ देर रहने दें, फिर कपड़े से छान लें। यही फांट है।
यानी द्रव्य को गर्म पानी में भिगोकर ढक देना है। आज की भाषा में यही “infusion” है, और लेमनग्रास की चाय बनाने की विधि इसी सिद्धांत पर टिकी है।
सामग्री (दो कप के लिए)
- ताज़ी लेमनग्रास: 2-3 पत्तियाँ, या नीचे के मोटे डंठल का 3-4 इंच का टुकड़ा
- पानी: 2 कप
- अदरक: अंगूठे के पोर जितना टुकड़ा, कुटा हुआ (वैकल्पिक)
- तुलसी: 4-5 पत्तियाँ (वैकल्पिक)
- गुड़ या शहद: स्वाद अनुसार (वैकल्पिक)
बनाने का तरीका
- पत्तियों को अच्छी तरह धोकर 1-2 इंच के टुकड़ों में काट लें। डंठल हो, तो उसे बेलन या मूसल से हल्का कुचल दें, ताकि उसका तेल बाहर आए।
- पानी को उबाल आने तक गर्म करें और आँच बंद कर दें।
- कटी पत्तियाँ, अदरक और तुलसी गर्म पानी में डालें और बर्तन को तुरंत ढक दें।
- 5-7 मिनट ढका रहने दें। ढक्कन बंद रहने से सुगंध पानी में ही रहती है।
- छानकर कप में डालें। मीठा चाहिए तो गुड़ मिलाएँ, या चाय गुनगुनी होने पर ही शहद डालें।
सर्दी-खाँसी में अधिक तीक्ष्णता चाहिए, तो अदरक के साथ केवल 2-3 मिनट धीमी आँच पर ढककर पकाएँ।
ये तीन गलतियाँ स्वाद और गुण दोनों बिगाड़ती हैं
- शहद को खौलती चाय में डालना: आयुर्वेद में गर्म किया हुआ शहद अहितकर माना गया है। चाय गुनगुनी होने पर ही शहद मिलाएँ।
- दूध वाली चाय में नींबू निचोड़ना: दूध और खट्टे का मेल विरुद्ध आहार है। नींबू डालना हो, तो बिना दूध वाली चाय में ही डालें।
- बहुत सारी पत्तियाँ ठूँस देना: अधिक मात्रा से चाय कड़वी होती है और इसका उष्ण गुण पित्त को भड़का सकता है।
सूखी पत्ती से बनानी हो, तो एक कप के लिए लगभग एक छोटा चम्मच पर्याप्त है। पत्तियाँ छाया में सुखाएँ, धूप में सुखाने से तेल उड़ जाता है।
लेमनग्रास का सेवन कैसे करें और चाय पीने का सही समय क्या है?
वही चाय एक व्यक्ति को सुबह ताज़गी देती है और दूसरे को रात में बार-बार उठने पर मजबूर करती है। फर्क समय और प्रकृति का है।
लेमनग्रास की चाय पीने का सही समय
- भोजन के बाद: पाचन, गैस और भारीपन के लिए सबसे उपयुक्त समय। दोपहर के भोजन के आधा घंटा बाद एक कप।
- सुबह नाश्ते के बाद: कफ प्रकृति वालों और सर्दी के मौसम में दिन की शुरुआत के लिए।
- शाम को: दिन भर की थकान और मानसिक बोझिलता के लिए, हल्की बनी चाय।
- रात को देर से नहीं: मूत्रल होने के कारण सोने से ठीक पहले पीने पर रात में नींद टूट सकती है।
- खाली पेट नहीं: विशेषकर पित्त प्रकृति वाले या जिन्हें अम्लपित्त (एसिडिटी) रहता है।
घरेलू उपयोग में दिन में एक से दो कप पर्याप्त मानी जाती है। किसी रोग में औषधि के रूप में इसका स्वरस या चूर्ण लेना हो, तो मात्रा वैद्य के मार्गदर्शन में ही तय करें।
प्रकृति के अनुसार भेद
- कफ प्रकृति: सबसे अधिक अनुकूल। अदरक, काली मिर्च और तुलसी के साथ ले सकते हैं।
- वात प्रकृति: गुनगुनी, थोड़े गुड़ के साथ, भोजन के बाद। रूक्ष गुण संतुलित करने के लिए बहुत लंबे समय तक रोज़ न लें।
- पित्त प्रकृति: कम मात्रा, हल्की बनी हुई, धनिया या सौंफ के साथ, और गर्मी के मौसम में बहुत सीमित।
चाय के अलावा लेमनग्रास के दूसरे उपयोग
- भाप: बंद नाक और सिर के भारीपन में मुट्ठी भर पत्तियाँ उबलते पानी में डालकर, सिर ढककर भाप लें।
- बाहरी लेप और तेल: लेमनग्रास तेल की कुछ बूँदें तिल या नारियल तेल में मिलाकर वात-जन्य जोड़ों और मांसपेशियों के दर्द पर मालिश के लिए प्रयोग होती हैं। शुद्ध तेल सीधे त्वचा पर न लगाएँ।
इसे भी पढ़ें: सोंठ (सूखी अदरक) पाउडर के फायदे
लेमनग्रास के नुकसान: किसे सावधानी रखनी चाहिए?
“हर्बल है, तो जितना चाहे पी लो”, यह सोच सबसे बड़ी भूल है। उष्ण, तीक्ष्ण और रूक्ष गुण वाली लेमनग्रास के लिए मात्रा का नियम और भी महत्त्वपूर्ण है।
अधिक मात्रा में लेने पर लेमनग्रास के नुकसान इस प्रकार दिख सकते हैं:
- पित्त का बढ़ना: पेट या छाती में जलन, मुँह में छाले, खट्टी डकार।
- बार-बार पेशाब और मुँह सूखना: मूत्रल और रूक्ष गुण के कारण।
- त्वचा पर चकत्ते: तेल लगाने से या संवेदनशील लोगों में चाय पीने से भी।
आचार्य जिसे “मात्रा” कहकर समझाते थे, आधुनिक शोध भी उसकी पुष्टि करता है: तीस दिन तक रोज़ लेमनग्रास चाय वाले एक मानव अध्ययन में सबसे अधिक मात्रा लेने वालों के गुर्दे से जुड़े कुछ मानकों में बदलाव देखा गया।
किसे यह औषधि नहीं लेनी चाहिए, या वैद्य से पूछकर ही लेनी चाहिए:
- गर्भवती महिला: पशु-अध्ययनों में इसके कुछ घटकों के अधिक मात्रा पर गर्भ पर बुरे असर के संकेत मिले हैं। गर्भावस्था में इसकी चाय या तेल का प्रयोग न करें।
- स्तनपान कराने वाली माताएँ, शिशु और छोटे बच्चे: वैद्य की सलाह के बिना न दें।
- गुर्दे के रोगी: मूत्रल प्रभाव के कारण चिकित्सक से पूछे बिना न लें।
- रक्तचाप या मधुमेह की दवा लेने वाले: लेमनग्रास रक्तचाप पर असर डाल सकती है, इसलिए नियमित सेवन से पहले अपने चिकित्सक को बताएँ। चल रही दवा स्वयं बंद न करें।
- अम्लपित्त और पित्त-प्रधान रोग वाले: मुँह के छाले, जलन, नकसीर की प्रवृत्ति हो तो कम मात्रा में या न लें।
- सर्जरी से पहले और एलर्जी वाले: सर्जरी से दो सप्ताह पहले नियमित सेवन रोकें; तेल पहली बार लगाएँ तो कलाई पर परख लें।
लेमनग्रास के essential oil को मुँह से लेना जोखिम भरा है। अधिक मात्रा में यह यकृत और आमाशय की परत को हानि पहुँचा सकता है। तेल को केवल बाहरी उपयोग, भाप और सुगंध तक रखें।
बाज़ार में लेमनग्रास किन रूपों में मिलता है?
सब्ज़ी मंडी से लेकर ऑनलाइन बाज़ार तक, लेमनग्रास कई रूपों में मिलता है और हर रूप का काम अलग है। नीचे की तालिका बताती है कि किस काम के लिए कौन-सा रूप चुनें।
| रूप | उसमें लेमनग्रास की भूमिका | किसमें सहायक | विशेष सावधानी |
|---|---|---|---|
| ताज़ी पत्तियाँ और डंठल | पूरी सुगंध और उड़नशील तेल सुरक्षित | चाय, फांट, भाप, रसोई | पत्ती मसलकर नींबू जैसी गंध परखें |
| छाया में सूखी पत्ती (चाय-पत्ती) | सुगंध कुछ कम, पर सालभर उपलब्ध | चाय, काढ़ा | बंद डिब्बे में रखें; गंध न आए तो पुरानी है |
| हर्बल चाय मिश्रण | तुलसी, अदरक आदि के साथ सहायक सुगंधित द्रव्य | पाचन, सर्दी-जुकाम | लेबल पर सभी घटक और बनाने की तिथि देखें |
| लेमनग्रास तेल (essential oil) | सिट्रल-प्रधान सांद्र तेल | बाहरी मालिश, भाप, सुगंध | मुँह से न लें; त्वचा पर वाहक तेल में मिलाकर ही |
| मालिश तेल और बाम | दूसरे तैलों के साथ सुगंधित घटक | वात-जन्य दर्द, सिरदर्द में बाहरी प्रयोग | खुले घाव और आँखों के पास न लगाएँ |
तेल खरीदते समय वानस्पतिक नाम (Cymbopogon citratus या C. flexuosus) लेबल पर अवश्य देखें। बहुत सस्ता, बहुत तेज़ बनावटी गंध वाला तेल मिलावटी हो सकता है।
ये रूप प्रकृति, रोग की अवस्था और वैद्य की सलाह के अनुसार ही औषधि के रूप में लिए जाएँ, स्वयं चुनकर नहीं।
इसे भी पढ़ें: Basil (Tulsi) 144 Incredible Uses, Benefits, Dosage and Side Effects
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Q1. क्या लेमनग्रास की चाय रोज़ पी सकते हैं?
A: स्वस्थ व्यक्ति घरेलू मात्रा में, यानी दिन में एक से दो कप हल्की बनी चाय, ले सकता है। पित्त प्रकृति वाले और लंबे समय तक रोज़ लेने वाले बीच-बीच में कुछ दिन का अंतर रखें। किसी रोग में नियमित सेवन से पहले वैद्य से परामर्श करें।
Q2. गवती चाय और लेमनग्रास में क्या अंतर है?
A: दोनों एक ही पौधा हैं। गवती चाय (मराठी में गवती चहा) लेमनग्रास का मराठी नाम है, जिसका अर्थ है घास वाली चाय। संस्कृत में इसे भूतृण या गंधतृण कहा जाता है।
Q3. क्या लेमनग्रास वज़न घटाने में मदद करती है?
A: इसका लघु, रूक्ष और दीपन गुण अग्नि सुधारकर कफ और मेद (चर्बी) के भारीपन को घटाने में सहायक हो सकता है। पर यह अकेले वज़न घटाने का उपाय नहीं है; सही आहार, समय पर भोजन और व्यायाम के साथ ही लाभ दिखता है।
Q4. लेमनग्रास की तासीर गर्म है या ठंडी?
A: आयुर्वेद में लेमनग्रास का वीर्य उष्ण यानी गर्म है। इसकी ताज़ी खुशबू ठंडक का भ्रम देती है, इसलिए पित्त प्रकृति वाले और गर्मी के मौसम में इसे कम मात्रा में लें।
Q5. क्या लेमनग्रास का तेल पी सकते हैं?
A: नहीं, लेमनग्रास का essential oil बहुत सांद्र होता है और मुँह से लेने पर यकृत और आमाशय को हानि पहुँचा सकता है। इसका उपयोग केवल वाहक तेल में मिलाकर मालिश, भाप और सुगंध के लिए करें।
अगली बार जब आप चाय के भगोने में गवती चहा की पत्ती डालें, तो उसे केवल स्वाद की चीज़ न समझें। अब आप जानते हैं कि यह कफ-वात को शांत करने वाली, अग्नि जगाने वाली भूतृण है, जिसे उबालना नहीं, ढककर भिगोना है। आज ही बालकनी के एक गमले में इसका एक डंठल लगा दीजिए, और अगली बरसात से पहले आपके पास अपनी घरेलू औषधि तैयार होगी। किसी रोग में इसे औषधि के रूप में लेने से पहले योग्य वैद्य से परामर्श अवश्य करें।





