सर्व रोग नाशक महामृत्युन्जय मंत्र की अद्भुत महिमा और महत्व

Last Updated on July 30, 2019 by admin

महामृत्युंजय मंत्र के विधि विधान के साथ में जाप करने से अकाल मृत्यु तो टलती ही हैं, रोग, शोक, भय इत्यादि का नाश होकर व्यक्ति को स्वस्थ आरोग्यता की प्राप्ति होती हैं।
यदि स्नान करते समय शरीर पर पानी डालते समय महामृत्युन्जय मंत्र का जप करने से त्वचा सम्बन्धित समस्याएं दूर होकर स्वास्थ्य लाभ होता हैं।

यदि किसी भी प्रकार के अरिष्ट की आशंका हो, तो उसके निवारण एवं शान्ति के लिये शास्त्रों में सम्पूर्ण विधि-विधान से महामृत्युंजय मंत्र के जप करने का उल्लेख किया गया हैं। जिससे व्यक्ति मृत्यु पर विजय प्राप्ति का वरदान देने वाले देवो के देव महादेव प्रसन्न होकर अपने भक्त के समस्त रोगो का हरण कर व्यक्ति को रोगमुक्त कर उसे दीर्घायु प्रदान करते हैं।

मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के कारण ही इस मंत्र को मृत्युंजय कहा जाता है। महामृत्यंजय मंत्र की महिमा का वर्णन शिव पुराण, काशीखंड और महापुराण में किया गया हैं। आयुर्वेद के ग्रंथों में भी मृत्युंजय मंत्र का उल्लेख है। मृत्यु को जीत लेने के कारण ही इस मंत्र को मृत्युंजय कहा जाता है।

महामृत्युन्जय मंत्र का महत्व :

मृत्युर्विनिर्जितो यस्मात् तस्मान्मृत्युंजयः स्मृतः या मृत्युंजयति इति मृत्युंजय

अर्थात – जो मृत्यु को जीत ले, उसे ही मृत्युंजय कहा जाता हैं।

मानव शरीर में जो भी रोग उत्पन्न होते हैं उसके बारे में शास्त्रों में जो उल्लेख हैं वह इस प्रकार हैं।
शरीरं व्याधिमंदिरम्
ब्रह्मांड के पंच तत्वों से उत्पन्न शरीर में समय के अंतराल पर नाना प्रकार की आधि-व्यघि उपाधियां उत्पन्न होती रहती हैं। इस लिए हमें अपने शरीर को स्वस्थ्य रखने के लिए आहार-विहार, खान-पान और नियमित दिनचर्या निश्चित समय पर करना पड़ता हैं। यदि इन सब को निश्चित समय अवधि पर करते रहने के बाद भी यदि कोई रोग या व्याधि हो जाए एवं वह रोग इलाज कराने के बाद भी यदि ठीक नहीं हो एवं सभी जगह से निराशा हाथ लगरही हो तो एसे अरिष्ट की निवृत्ति या शांति के लिए महामृत्युज्य मंत्र जप का प्रयोग अवश्य करें।

शास्त्रों में मृत्यु भय को विपत्ति या संकट माना गया हैं, एवं शास्रो के अनुशार विपत्ति या मृत्यु के निवारण के देवता शिव हैं। एवं ज्योतिषशास्त्र के अनुशार दुख, विपत्ति या मृत्यु के प्रदाता एवं निवारण के देवता शनिदेव हैं, क्योकि शनि व्यक्ति के कर्मों के अनुरुप व्यक्ति को फल प्रदान करते हैं। शास्त्रों के अनुशार मार्कण्डेय ऋषि का जीवन अत्यल्प था, परंतु महामृत्युंजय मंत्र जप से शिव कृपा प्राप्त कर उन्हें चिरंजीवी होने का वरदान प्राप्त हुवा।

महामृत्युंजय का वेदोक्त मंत्र :

महामृत्युंजय का वेदोक्त मंत्र निम्नलिखित है –

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥

मंत्र उच्चारण विचार :

इस मंत्र में आए प्रत्येक शब्द का उच्चारण स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि स्पष्ट शब्द उच्चारण में ही मंत्र कि समग्र शक्ति समाहित होती हैं। इस मंत्र में उल्लेखित प्रत्येक शब्द अपने आप में एक संपूर्ण बीज मंत्र का अर्थ लिए हुए है।

महामृत्युंजय मंत्र के प्रकार :

महामृत्युंजय मंत्र का जप आवश्यकता के अनुरूप होते हैं। अलग-अलग उद्देश्य के लिये अलग-अलग मंत्रों का प्रयोग होता है। मंत्र में दिए अक्षरों एवं उसकी संख्या के अनुरुप से उसके प्रभाग में बदलाव आते है। यह मंत्र निम्न प्रकार से है-

एकाक्षरी मंत्र – हौं । (एक अक्षर का मंत्र)
त्र्यक्षरी मंत्र – ॐ जूं सः । (तीन अक्षर का मंत्र)
चतुरक्षरी मंत्र – ॐ वं जूं सः । (चार अक्षर का मंत्र)
नवाक्षरी मंत्र – ॐ जूं सः पालय पालय। (नव अक्षर का मंत्र)
दशाक्षरी मंत्र – ॐ जूं सः मां पालय पालय। (दश अक्षर का मंत्र)

(स्वयं के लिए इस मंत्र का जप इसी तरह होगा। यदि किसी अन्य व्यक्ति के लिए यह जप किया जा रहा हो तो ‘मां’ के स्थान पर उस व्यक्ति का नाम लेना होगा)।

महामृत्युंजय का वेदोक्त मंत्र निम्नलिखित है

त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥

इस मंत्र में द्वात्रिंशाक्षरी (32 अक्षर का मंत्र ) का प्रयोग हुआ है और इसी मंत्र में ॐ लगा देने से 33 शब्द हो जाते हैं। इसे ‘त्र्यत्रिंशाक्षरी या तैंतीस अक्षरी मंत्र कहते हैं।
श्री वशिष्ठजी ने इन 33 शब्दों के 33 देवता समाहित है अर्थात् शक्तियाँ निश्चित की हैं जो कि निम्नलिखित हैं। इस मंत्र में

8 वसु,
11 रुद्र,
12 आदित्य
1 प्रजापति तथा
1 वषट को माना है।

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