Manomaya Kosha in Hindi मनोमय कोश क्या है इसके कार्य और महत्व

Last Updated on January 1, 2020 by admin

मनोमय कोश क्या है ?

हमारे शरीर के तीन खण्ड हैं जिसे शरीर-त्रयी कहा जाता है। पहला खण्ड हमारा स्थूल शरीर (Physical body) है, दूसरा खण्ड सूक्ष्म शरीर (Astral body) और तीसरा खण्ड कारण शरीर (Causal body) है। स्थूल शरीर के दो भाग हैं (१) अन्नमय कोश और (२) प्राणमय कोश

सूक्ष्म शरीर के भी दो भाग हैं। पहला भाग ‘क्रिया-प्रधान’ है जिसे ‘मनोमय कोश’ कहते हैं
और दूसरा भाग ‘ज्ञान-प्रधान’ है जिसे ‘विज्ञानमय कोश’ कहते हैं। सूक्ष्म शरीर, सूक्ष्म होने से दिखाई नहीं देता लेकिन होता अवश्य है और इसी की प्रेरणा और शक्ति से स्थूल शरीर की प्रत्येक क्रिया होती है। सूक्ष्म शरीर से भी अत्यन्त सूक्ष्म शरीर को ‘कारण-शरीर’ कहते हैं जिसे अव्यक्त-शरीर या लिंग शरीर भी कहा जाता है। इस अव्यक्त शरीर को ‘आनन्दमय कोश’ भी कहते हैं। प्रस्तुत लेख में हम ‘सूक्ष्म शरीर’ के क्रिया-प्रधान भाग ‘मनोमय कोश’ के विषय में चर्चा करेंगे।

हमारे मुख्य रूप से दो भाग हैं शरीर और – शरीरी याने हम दो तत्वों से बने हुए हैं। ये दो तत्व हैं जड़ और चेतन । शरीर जड़ है और शरीरी याने इस शरीर को धारण करने वाला जीवात्मा चेतन हैऔर इतना सूक्ष्म है कि आंखों से देखा नहीं जा सकता। ‘हम’ इस जीवात्मा के लिए ही प्रयोग किये जाने वाला शब्द है। जब हम कहते हैं- ‘हम’ या ‘मैं’- तो हमारा मतलब आत्मा से ही होता है।

चूंकि आत्मा अदृश्य और सूक्ष्मातिसूक्ष्म है अतः यह जिन साधनों अर्थात् ‘करणों’ से कार्य करता है वे ‘करण’ भी अद्दश्य अर्थात दिखाई न देने वाले होते हैं। इन ‘करणों’ को ‘अन्तः करण’ कहते हैं। ये करण चार होने से इन्हें ‘अन्तःकरण-चतुष्टय’ कहा जाता है। ये अन्तःकरण-चतुष्टय हैं- मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त् । इनका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है।’

अन्तःकरण चतुष्टय :

मन : मन क्या है ? और इसके कार्य

आयुर्वेद मन का लक्षण इस प्रकार बताता है

लक्षणं मनसो ज्ञानस्याभावो भाव एव च।
सति ह्यात्मेन्द्रियार्थानां सन्निकर्षे न वर्तते।।
वैवृत्त्यान्मनसो ज्ञानं सान्निध्यात्तच्च वर्तते।
– चरक संहिता

अर्थात आत्मा, इन्द्रिय और विषयों का संयोग होने पर जब मन का सान्निध्य (संयोग) होता है तब ज्ञान होता है। आत्मा, इन्द्रिय व विषयों का संयोग होने पर भी मन का साथ न हो तो ज्ञान नहीं होता। इस तरह ज्ञान का होना या न होना मन का लक्षण है।
न्यायदर्शन में कहा है –

युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिंगम्

अर्थात -एक समय में इकट्ठे दो ज्ञानों को न होने देने वाला तत्व यह ‘मन’ है। न्यायदर्शन ने – यथोक्तत्वाच्चाणु
के अनुसार मन को अणु माना है। यही बात चरक संहिता ने भी कही है-

अणुत्वमथ चैकत्वं द्वौ गुणौ मनसः स्मृतौ

अर्थात -अणु होना और एक होना ये दो गुण मन के होते हैं।

यद्यपि मन एक साथ कई काम करता हुआ प्रतीत होता है तथापि वह एक बार में एक ही काम करता है। चूंकि इसकी गति अति तीव्र होती है अतः यह एक साथ कई कार्य करता हुआ प्रतीत होता है। जैसे एक सूजा (सुआ याने बड़ी सुई) अनेक काग़ज़ों या कपड़ों को एक-एक करके ही बींधता है पर अत्यन्त तेज़ गति से बींधता है अतः ऐसा लगता है कि जैसे एकदम ही बींध देता है।

मन का काम विचार करना, मनन करना होता है और विचार को इन्द्रियों के माध्यम से कार्यरूप में परिणत करना मन का ही काम है। “चंचलत्वं मनो धर्मों” के अनुसार चंचलता याने अस्थिरता इसका स्वभाव है और यह संसार के सभी गतिमान् पदार्थों में सर्वाधिक तीव्र गति वाला होता है याने हमारा मन पलक झपकते संसार के किसी भी कोने में, जहां का हमें पूर्व ज्ञान हो, पहुंच सकता है। संसार का तेज़ से तेज़ गति का राकेट भी मन की गति से नहीं चल सकता। यह प्रकृति के तीन गुण- सत, रज, तम में से जिससे ज्यादा प्रभावित होता है वैसे ही गुण वाला होता है।

चिन्त्यं विचार्यमूह्यं च ध्येयं संकल्प मेव च।
यत्किंचिन्मनसो ज्ञेयं तत् सर्वंह्यर्थसंज्ञकम्।।
(चरक)

के अनुसार चिन्तन करना, तर्क करना, किसी कार्य की योजना करना, ध्येय बनाना और संकल्प करना आदि मन के काम हैं। इन्द्रियों में व्याप्त होकर उनसे काम लेना याने उन्हें अपने आदेश के अनुसार सक्रिय करना मन का काम है। मन इन्द्रियों का स्वामी, संचालक और बल होता है।

( और पढ़े – मन को शांत व नियंत्रित करने के उपाय )

बुद्धि : बुद्धि क्या है ? और इसके कार्य

आयुर्वेद ने विभिन्न संयोगों के आधार पर अनेक प्रकार की बुद्धि मानी है लेकिन मोटे रूप से प्राकृतिक गुणों के अनुसार बुद्धि भी-सात्विक, राजसिक और तामसिक-तीन प्रकार की होती है।

किसी भी पदार्थ का बोध (ज्ञान) कराना बद्धि का काम है। इसके अनेक नाम हैं जैसे धीः, प्रज्ञा, मति, मेघा, मनीषा, स्मृति आदि। यह मन के विचारों और कार्यों के विषय में निर्णय करती है, उनके शुभ या अशुभ, हितकारी या अहितकारी होने के विषय में निश्चय करती है। वस्तुतः जीवात्मा के लिए यह बद्धितत्व वैसा ही कार्य करती है जैसा किसी राजा के लिए उसका महामंत्री करता है, किसी रथ के चालक के लिए लगाम करती है और अन्धकार में चलने वाले के लिए प्रकाश करता है। बुद्धि भ्रष्ट हो जाने पर ही मनुष्य अशुभ कर्म करने लगता है और मानसिक तथा शारीरिक विकारों से ग्रस्त हो जाता है। कहा भी है- विनाश काले विपरीत बुद्धि- अर्थात जब विनाश का समय आता है तब बुद्धि उल्टे काम करने लगती है। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि जब बुद्धि उल्टी चलती है तो विनाश को प्राप्त होती है।

अहंकार : अहंकार क्या है ? और इसके कार्य

अहम् का मतलब ‘मैं’ होता है और ‘मैं’ के होने का भाव ‘अहंकार’ होता है। यह भाव जितना बढ़ता है उतना ही ‘अहंकार’ भी बढ़ता है। दर्प, अभिमान, गर्व, मद, मान, घमण्ड, ममत्व और खुदी आदि इसके पर्यायवाची शब्द हैं। यह भी सत, रज, तम गुणों से युक्त होता है। यह आसक्ति और स्वार्थ को जन्म देता है और अपने को दूसरों से बड़ा, श्रेष्ठ और अधिक योग्य समझने की वृत्ति उत्पन्न करता है। यह चित्त के साथ मिलकर कार्य करता है। अहंकार के कारण ही क्रोध, राग-द्वेष, ईर्ष्या, घृणा आदि दोष उत्पन्न होते हैं। इसके प्रभाव से सद्बुद्धि क्षीण और लुप्तप्राय रहती है अतः अहंकारी व्यक्ति उचित आचार-विचार को धारण नहीं कर पाता लिहाज़ा उसकी मानसिकता विकारग्रस्त और व्यावहारिकता दूषित होती जाती है।

चित्त : चित्त क्या है ? और इसके कार्य

यह अन्तःकरण का चौथा अंग है। यह ज्ञान प्राप्ति का साधन होता है और जीवात्मा से सम्बन्ध रखने वाला होता है। यह सोते-जागते सदैव सक्रिय बना रहता है। इस की वृत्ति को रोकना- “योगश्चितवृत्तिनिरोधः” के अनुसार योग का अभ्यास है। चित्त के व्यवहार को बन्द करना योग को उपलब्ध होना है। यह व्यवहार स्थूल और सूक्ष्म दो प्रकार का होता है। इस व्यवहार के अभ्यास से ही ‘वृत्ति’ का जन्म होता है जिसे चितवृत्ति कहते हैं। हम भला या बुरा जैसा व्यवहार करेंगे, विचार
और आचरण करेंगे वैसी ही हमारी चित्तवृत्ति बनती जाएगी और इस चित्तवृत्ति का जैसा सूक्ष्म प्रभाव हमारे चित्त पर पड़ता रहेगा वैसे ही हमारे संस्कार बनते जाएंगे। ये संस्कार हमारे आचार-विचार को प्रभावित भी करते हैं और किसी हद तक संचालित भी करते हैं। जिनके संस्कार दूषित होते हैं उनके आचार-विचार भी दूषित रहते हैं जिससे वे पहले मानसिक रूप से और बाद में शारीरिक रूप से विकार ग्रस्त होकर रोगी हो जाते हैं।

इस प्रकार ‘अन्तःकरण-चतुष्टय‘ मनोमय कोश के चार प्रमुख करण (साधन) के रूप में कार्यरत रहता है। हमारे शरीर की दसों इन्द्रियां, मन और पांच तन्मात्राएं- ये १६ तत्व मिलकर हमारे मनोमय कोश का निर्माण करते हैं।
यह कोश क्रिया-प्रधान होता है- याने शरीर की सभी क्रियाओं का संचालक होता है।

‘कर्मेन्द्रियबुद्धीन्द्रियैरान्तर मेकादशकम’ (सांख्य) के अनुसार मन को ११ वीं इन्द्रिय माना है लेकिन अन्य इन्द्रीयों की तरह मन का अपना कोई अधिष्ठान (स्थूल इन्द्रिय) नहीं होता जैसे देखने (चक्षु इन्द्रिय) के लिए नेत्र या सुनने (श्रोत्र इन्द्रिय) के लिए कान होते हैं। मन अपने सारे मनोरथ इन्द्रियों से पूरे करता है और जब जिस इन्द्रिय से काम लेता है तब उसी इन्द्रिय के अधिष्ठान के साथ हो जाता है।

इस प्रकार हमें यह जानकारी प्राप्त होती है कि मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त- ये चारों अलग-अलग हैं और चारों को मिलाकर अन्तःकरण कहा जाता है। हमारा अन्तःकरण शुद्ध, अच्छे विचारों वाला और अच्छी चित्तवृत्ति वाला हो यह मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त आवश्यक है ।

अन्तःकरण के लिए हम मोटे रूप में मन शब्द का प्रयोग किया करते हैं लेकिन मन अकेला ही नहीं है बल्कि इसके कर्म व्यापार में बुद्धि, अहंकार और चित्त भी भागीदार होते हैं।

निरोग रखने में मनोनय कोश का कार्य :

हमें स्वस्थ और निरोग रखने में मनोनय कोश का क्या कार्य है इसे संक्षेप में समझ लेना ज़रूरी है।
यह बात ठीक से समझ लेना चाहिए कि मन विचार तो करता है पर भले या बुरे का निर्णय या विवेचना करना मन का काम नहीं होता। यह काम बुद्धि का होता है। मन और बुद्धि सत, रज और तम में से जिस गुण से ज्यादा प्रभावित होंगे वैसे निर्णय लिये जाएंगे। इन दोनों पर यदि विवेक का नियन्त्रण रहे तो ये दोनों कभी भी ग़लत निर्णय नहीं ले सकते जैसा कि कहा है- ‘विवेक भ्रष्टानां भवति विनिपातः शतमुखः’- याने विवेक भ्रष्ट व्यक्ति ही कुकर्म करता है और लज्जित होता है। ऐसा ही चरक ने भी कहा है –

घी धृतिस्मृति विभ्रष्टः कर्मयत् कुरुतेऽशुभम्।
प्रज्ञापराधं तं विद्यात् सर्वदोष प्रकोपणम्।।

_चरक संहिता शारीर. १/१०२

अर्थ – धी (बुद्धि), धृति (धैर्य) और स्मृति के भ्रष्ट हो जाने पर मनुष्य जब अशुभ कर्म करता है तब सभी शारीरिक एवं मानसिक दोषों को कुपित करने वाले इस कारण को प्रज्ञापराध कहा जाता है।

अतः सारांश में यह निष्कर्ष प्राप्त होता है कि हमें अपने मन पर बुद्धि का और बुद्धि पर विवेक का नियन्त्रण रखकर ऐसा ही आचार-विचार करना चाहिए जो हमारे मन मस्तिष्क एवं मनोमय कोश को शुद्ध, निर्विकार और स्वस्थ बनाये रखे ताकि हम मानसिक रोगों के शिकार होने से बचे रह सकें। स्वस्थ या अस्वस्थ रहना हमारे मन के विचार और तन के आचार याने आचरण पर ही निर्भर होता है यह सिद्धान्त हमें हमेशा ख्याल में रखना होगा ताकि हम गलत आचार-विचार से बचे रह सकें।

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