पीयूष ग्रंथि क्या है इसके कार्य और फायदे – Pituitary Gland in Hindi

हमारे शरीर में अंतस्रावी ग्रंथियाँ ऐसी अद्भुत संरचनाएँ हैं, जिनके अभाव में हमें कई गंभीर रोग होने की संभावना रहती है। इन ग्रंथियों का स्राव सीधे हमारे रक्त संचार संस्थान में चला जाता है। यानी इसमें ग्रंथि को नलियाँ (ducts) नहीं होती इसलिए उन्हें Ductless glands भी कहा जाता है। इन ग्रंथियों से निकलनेवाले स्राव को हार्मोन्स कहते हैं। हार्मोन्स को रासायनिक यौगिक कहते हैं। कुछ हार्मोन्स नर्वस सिस्टम के साथ मिलकर अधिकांश क्रियाओं का नियमन करते हैं। इस तरह के नियमन को neuroendocrine regulation भी कहते हैं।

हार्मोन्स की विशेषताएँ :

  • ये हमेशा अल्प मात्रा में स्रावित होते हैं।
  • हार्मोन शारीरिक प्रक्रियाओं के नियमन में योगदान देते हैं।
  • हार्मोन का संश्लेषण व संग्रहन ग्रंथियों में होता है और रक्त में उनकी मात्रा की आवश्यकता के अनुसार स्रावित होते हैं।
  • अंतःस्रावी ग्रंथियों का स्राव शरीर के मानसिक और शारीरीक विकास व संतुलन के लिए अनिवार्य है।

अंतःस्रावी ग्रंथियों के प्रकार :

अंतःस्रावी ग्रंथियों के प्रकार मुख्यतः ये हैं पीयूष ग्रंथि, थाइरॉइड, पीनियल ग्रंथि, पॅराथाइरॉइड, थायमस ग्रंथियाँ, ॲडरिनल ग्रंथियाँ, ओव्हरी और टेस्टीस।

( और पढ़े – अंत: स्रावी ग्रंथियां उनके प्रकार महत्व और कार्य )

पीयूष ग्रंथि कहां पाई जाती है ? (Piyush Granthi in Human Body in Hindi)

पीयूष ग्रंथि (pituitary gland) base of the skull में स्थित होती है, इसका आकार सेम के बीज जैसा होता है, इसकी लंबाई लगभग 12 मिलीमीटर, चौड़ाई 10 मिलीमीटर और मोटाई 6 मिलीमीटर होती है, इसका वज़न लगभग 570 मिलीग्राम होता है।

चूँकि यह अन्य अंर्तस्रावी ग्रंथियों की सक्रियता का नियमन करती है इसे queen of orchestra भी कहा जाता है।

पीयूष ग्रंथि से निकलने वाले हार्मोन्स और उनके कार्य (Pituitary Gland Hormones and their Functions in Hindi)

पीयूष ग्रंथि को 3 भागों में विभाजित किया जाता है।

A) अग्र भाग
B) मध्य भाग
C) पृष्ठ भाग

A) अग्र भाग से निकलने वाले हार्मोन्स और कार्य –

इस भाग से विभिन्न प्रकार के हार्मोन्स निकलते हैं। इस भाग में मुख्यतः 3 प्रकार की कोशिकाएँ होती हैं।

  • एसिडोफिलिक कोशिकाएँ : इस भाग के द्वारा सोमेटोट्रोफिक हार्मोन (STH) तथा प्रोलॅक्टिन हार्मोन का स्राव होता है।
  • बेसोफिलिक कोशिकाएँ : इन कोशिकाओं के GRT THS (Thyroid stimulating hormone), ल्यूटीनाइजिंग हार्मोन, फॉलिकल स्टिम्युलेटिंग हार्मोन का स्राव होता है।
  • न्यूट्रोफिल कोशिकाएँ : ये कोशिकाएँ मंद क्रियाशील होती है। Adrenocorticotropic (ACPH) हार्मोन का स्राव करती है। उपरोक्त हार्मोन्स की चर्चा करेंगे।

1) ग्रोथ/सोमॅटोट्रोपिक हार्मोन : यह हार्मोन अस्थियाँ, मांसपेशियाँ तथा अन्य अंगों की वृद्धि में सहायक होता है। किसी भी तरह का असंतुलन शारीरिक विकास में अवरोध उत्पन्न करता है।
इस हार्मोन की अधिकता से व्यक्ति भीमकाय और कमी की वजह से बौना हो सकता है। भीमकाय व्यक्ति का शरीर 7-8 फीट तक लंबा हो जाता है, अस्थियाँ मोटी व कमज़ोर हो जाती है। ऐसे व्यक्ति का BMR (Basal MetabolicRate) बढ़ जाता है। इससे रक्त में शक्कर की मात्रा बढ़ जाती है और मरीज़ को पेशाब में शुगर बढ़ना और रक्त में शुगर लेवल बढ़ना जैसी बीमारी हो सकती है। कभी-कभी इस हार्मोन की अति सक्रियता से जबड़ों के बढ़ने और कपाल के बड़े होने को Acromegaly कहते हैं।

इस हार्मोन की कमी से बौनापन हो जाता है। इससे मांसपेशी और अस्थियों का विकास रुक जाता है। ऐसे व्यक्तियों में यौन संबंधी उत्तेजना का अभाव रहता है और प्रजनन अंगों का विकास नहीं हो पाता है।

2) थाइरॉइड स्टिम्युलेटिंग हार्मोन : इस हार्मोन का संश्लेषण (synthesis) adenohypophysis के द्वारा होता है। इस हार्मोन के द्वारा थाइरॉइड ग्रंथी का विकास व क्रिया प्रभावित होते हैं। थाइरॉइड ग्रंथि से थायरॉक्सिन और ट्राय आयडोथायरोनिन का स्राव होता है, जिससे पोषण में मदद मिलती है।

3) एड्रोनोकॉर्टिकोट्रॉपिक हार्मोन (ACTH) : यह हार्मोन पीयूष ग्रंथि के क्रोमोफोब कोशिकाओं के द्वारा होता है। यह स्टिरॉइड की श्रेणी में आता है और एड्रिनल ग्रंथि के कॉर्टेक्स को उत्तेजित करता है, जिससे रक्त में कोलेस्ट्रोल व स्टिरॉइड की घनता बढ़ जाती है।

4) गोनैडोट्रोपिक हार्मोन (GTH) : पिट्यूटरी ग्रंथि से निकलनेवाले हार्मोन ज्ञानेंद्रिय के विकास के लिए आवश्यक है, ये दो प्रकार के होते हैं तथा स्त्री व पुरुष के अलग रूप में पाए जाते हैं। जैसे –

  • फॉलिकल स्टिम्युलेटिंग हार्मोन : इस हार्मोन के द्वारा ही स्त्रियों में अंडाशय में अंडजनन व नियमन होता है। इसमें एस्ट्रोजन हार्मोन उत्पन्न होने से प्रजनन अंगों व लैंगिक लक्षणों का विकास होता है। पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन उत्पन्न होता है और पुरुषों के लैंगिक विकास को कंट्रोल करता है।
  • ल्यूटीनाइज़िंग हार्मोन : यह हार्मोन जनन क्रिया का नियमन करता है। पुरुष के टेस्टिज को प्रभावित करता है और साथ लैंगिक विकास व कंट्रोल को रेग्युलेट करता है।

5) लैक्टोट्रोफिक हार्मोन : यह हार्मोन स्त्रियों में शिशु के जन्म के बाद स्तन में दूध का निर्माण करता है और शिशु को पोषण मिलता है।

B) मध्य भाग से निकलने वाले हार्मोन्स और कार्य –

यह पीयूष ग्रंथि के मध्य में अत्यंत छोटी साइज की संरचना होती है जिससे मेलानोफोर स्टिम्युलेटिंग हार्मोन बनता है, जो हमारे शरीर की त्वचा के रंग को नियंत्रित करता है।

C) पृष्ठ भाग से निकलने वाले हार्मोन्स और कार्य –

पीयूष ग्रंथि के इस रचना का निर्माण तंत्रकीय उत्तकों द्वारा होता है। इसमें पिट्यूटरी कोशिकाएँ और न्यूरो सिक्रेटरी सेंटर के न्यूरॉन्स के एक्सॉन स्थित होते हैं। पीयूष ग्रंथि का यह भाग किसी भी प्रकार के हार्मोन का निर्माण नहीं करता है। परंतु इसमें हाइपोथेलेमस से आए हुए हार्मोन्स इकट्ठा होकर रिलीज होते हैं। इस भाग में हाइपोफिसियल पोर्टल प्रणाली द्वारा हार्मोन लाए जाते हैं। जो दो प्रकार के होते हैं – वैसोप्रेसिन और ऑक्सीटोसिन।

  • वैसोप्रेसिन : इसे एंटिडाययूरेटिक हार्मोन भी कहा जाता है। उच्च रक्तचाप बढ़ता है व सोडियम आयर्न को रोकता है जिसमें पेशाब बनना कम हो जाता है।
  • ऑक्सीटोसिन : गर्भाशय की मांसपेशियों में संतुलन पैदा करता है। इसके द्वारा प्रसवोत्तर रक्तस्राव को कम करने में मदद मिलती है। यह माता के स्तनों से दूध को बाहर निकालने में भी सहायक होता है।

पीयूष ग्रंथि के कारण होने वाले रोग (Pituitary Gland Disorders in Hindi)

  1. पीयूष ग्रंथि का ट्यूमर
  2. कुशिंग सिंड्रोम
  3. डायबिटीज़ इंसीपीड्स
  4. acromegaly
  5. Hypopituitarism
  6. हाइपर प्रोलैक्टीनिमिया

पीयूष का सबसे सामान्य पाया जानेवाला रोग पिट्यूटरी ग्रंथि ट्यूमर कहलाता है, जो बड़ी उम्र के लोगों में अक्सर पाया जाता है। ज़्यादातर ये ट्यूमर सादे होते हैं। आज-कल इन ट्यूमर को सर्जरी के द्वारा ठीक किया जाता है।

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