सोम लता के फायदे औषधीय गुण उपयोग और दुष्प्रभाव | Somlata Benefits & Side Effects in Hindi

सोम लता क्या है ? : Somlata in Hindi

वैदिक मानव का प्रकृति से जितना सामंजस्य या साहचर्य था, उससे ऐसा लगता है कि तत्कालीन लोकजीवन वनौषधिमय ही था, मानवीय दैनिक आवश्यकतायें वनौषधियों से ही पूरी होती थीं। उस समय यज्ञ भी वनौषधियों से पूर्ण होते थे। इनमें सोम तो यज्ञों का एक मुख्य द्रव्य ही था। यह औषधिराज कहा गया। इसका प्राप्ति स्थान मुज्जवान पर्वत था और वहां के निवासी गन्धर्व लोग इसे लाते थे। इसे उनसे खरीद कर यज्ञों में काम लिया जाता था। ऋग्वेद का नवां मण्डल सोम के वर्णनों से भरा पड़ा है।

ऋग्वेद की ऋचाओं में ‘श्री’ का वर्णन समृद्धि और सौन्दर्य के रूपों में अनेक बार हुआ है। दिव्य औषधियों से तैयार किया गया सोमरस एक रसायन था, जिसे सभी पीने को लालायित रहते थे। इसके सेवन से सुख, समृद्धि और सौन्दर्य की प्राप्ति होती थी। श्री सूक्त में इस सोमपान की याचना की गई –

वैनतेय सोमं पिब सोमं पिबतु वृत्रहा।
सोमं धनस्य सोमिनो मह्यं ददातु सोमिनः।।
(सोमपान हे गरुण कर करो इन्द्र यह पान।
मैं भी इच्छुक सोम का करो सोम का दान।।)

-स्वर्ग में ब्रह्मा, इन्द्र आदि ने सोम नामक जिस अमृत का निर्माण किया था उसका उद्देश्य जरा,मृत्यु का निवारण था। मैं उसका ही विधान तुम्हें बताता हूँ ।

अत: वैदिक साहित्य में सोम नाम से जो वर्णन मिलता है उससे कहीं सोम लता नामक औषधि का तो कहीं तैयार की गई औषधि सोमरस का अभिप्राय समझना चाहिये।

सुश्रुत संहिता में सोम के 25 प्रकारों का उल्लेख है- डा. श्री त्रयम्बकनाथ शर्मा अपने एक लेख में लिखते हैं कि सोम के अनेक भेद होने से उनके पर्यायों में संदिग्धता है। सोम शब्द चन्द्रमा, अमृत, किरण, कपूर, जल, वायु आदि अर्थों में पुल्लिंग हैं रक्तचन्दन, काज्जी अर्थों में नपुंसक लिंग है और ब्राह्मी सोमराजी आदि में यह स्त्रीलिंग है। वैदिक सम्पत्ति, नामक ग्रन्थ में पं. श्री रघुनन्दन शर्मा ने कहा है कि सोम समस्त वनस्पतियों की जीवनीशक्ति का नाम है। वनस्पति की जीवनी शक्ति चन्द्रमा के आधीन, उसका ही नाम सोम है जिसे औषधि नाथ कहा गया है।

सोम लता का पौधा कहाँ पाया जाता है ? / उत्पत्ति स्थान :

सोम लता का पौधा हिमालय में कश्मीर सिकिक्म तक 7 से 16 हजार फीट की ऊंचाई पर पाया जाता है। चकरौते के आसपास मिलने वाले इस सोम लता में उपयोगी सत्व अधिक निकलता है। चीन इसका प्रमुख स्रोत रहा है। इसे वहां माहुअंग के नाम से जाना जाता है। तिब्बत, ईरान आदि देशों में भी यह पाया जाता है।

सोम लता का पौधा कैसा होता है ? :

इसके छोटे 6 इंच से 4 फुट तक के सर्पणशील पौधे होते हैं। इसका काण्ड (तना) गांठदार और शाखा में गहरे हरे रंग की होती है।

सोम लता के पत्ते :

आपाततः देखने में इसकी शाखायें पत्ररहित सी मालूम होती हैं। केवल ग्रन्थियों पर शल्क समान पत्र होते हैं। इन शल्क पत्रों के मिलने से एक पीताभ या भूरा द्विविभिक्त कोष बना रहता है।

सोम लता के फूल (पुष्प) :

पुष्पमंजरी चक्रोत्पन्न होती है जिस पर एक लिंगी पुष्प होते हैं।

सोम लता के फल :

फल मधुर, लट्वाकार(लट्टू के आकार के), मांसल और लालरंग के होते हैं। इन फलों से एक या दो उन्नोतर काले बीज निकलते हैं। स्थानीय लोग इन फलों को खाते हैं।
इसके भौमिक कांड में गेंद के आकार की गांठें होती हैं जिन्हें तिब्बतवासी ईधन के काम लेते हैं।

सोम लता का विभिन्न भाषाओं में नाम : Name of Somlata in Different Languages

Somlata in –

  • हिन्दी (Hindi) – सोमकल्पलता, टूटगंठा
  • बंगाली (Bangali) – सोमकल्पलता
  • संस्कृत (Sanskrit) – सोमकल्पलता
  • पंजाबी (Punjabi) – बुतशर, चेवा,
  • राजस्थानी (Rajasthani) – फोंग
  • मराठी (Marathi) – हुमा
  • फ़ारसी (Farsi) – हुमा
  • इंगलिश (English) – एफेड्रा, माहुवांग (Ephedra, Ma-Huang)
  • लैटिन (Latin) – एफेड्रा, सिनिका (Ephedra Scinica)

सोमरस क्या है ?

सोमसुरा पुरखे पीते थे, हम कहते उसको हाला (मधुशाला) कहकर जो सोम को सुरा (मद्य) के रूप में व्यक्त करते हैं यह भ्रमात्मक है। सोमरस के निर्माण के प्रकार से यह सिद्ध होता है कि यह सुरा (शराब) नहीं है। मनुस्मृति में सुरापन करने वाला पापी समझा जाता था। सोम और सुरा में भिन्नता करने के लिये सोम को पुरुष और सुरा को स्त्री कहा गया है- “पुमान् वै सोमः स्त्री सुरा’ (तैत्तरीय ब्राह्मण) सोमरस के पीने से स्फूर्ति आती थी। प्रातः काल इसका सेवन गुणकारी समझा जाता था। सुरा से मादकता बढ़ती है अतः सोम के साथ में सुरा का कोई औचित्य नहीं है। यह विदेशियों के द्वारा किया गया भ्रमात्मक प्रचार है।

सोम लता का संग्रह एवं संरक्षण :

  • पौधे की हरी शाखाओ का औषधीय प्रयोग होता है। क्योंकि इनमें सर्वाधिक एफेड्रीन पाया जाता है। शीतकाल में यह एफेड्रीन अधिक पाया जाता है। अत: शीतकाल में चार वर्ष की आयु वाले पौधे से उसकी पुष्पित अवस्था में इसका संग्रह किया जाता है।
  • इन शाखाओं को धूप में सुखाकर सूखे पात्रों में रखना चाहिये।
  • आर्द्रता के संसर्ग से इसके क्षाराभ नष्ट हो जाते हैं अतः मुख बन्द पात्रों को आनार्द्र शीतल स्थान में रखना चाहिये।

सोम लता का रासायनिक विश्लेषण : Somlata Chemical Constituents

  1. इसमें प्रमुख क्रियाशील तत्व एफेड्रीन होता है। एफेड्रीन की दृष्टि से भारतीय जातियां अधिक उत्कृष्ट होती है। पहले इस एफेड्रीन हेतु अंग्रेजी औषधि निर्माणशालाओं में इसकी खूब मांग होती थी अब इस एफेड्रोन का निर्माण रासायनिक संश्लेषण प्रक्रिया द्वारा किया जाने लगा है। अतः अब एफेड्रा की खपत देशी चिकित्सा में ही होती है।
  2. कश्मीर से प्राप्त इफेड़ा जिराडियाना में कुल क्षाराभ 1.22 प्रतिशत होते हैं जिसका 55.7 प्रतिशत इफेड्रीन होता है।

सोम लता के औषधीय गुण : Somlata ke Gun in Hindi

सोमो रुक्षः कटु पाके लघुरुष्णः कषायकः।
कफवातहरो हृद्यः परं श्वासापहो मतः।।

इस पद्य के अनुसार सोम का –
रस – कषाय,
गुण – लघु रुक्ष,
वीर्य – उष्ण और
दोषकर्म – कफवात शामक है।

सोम लता के उपयोग : Uses of Somlata in Hindi

  • सोम लता भारत की बहुमूल्य वनौषधि है। इसका सत्व एवं अर्क श्वासरोग, हृदय रोग, जलोदर, डिपथेरिया, निमोनिया आदि पर चमत्कारिक असर दिखाता है।
  • सचित्र आयुर्वेद के मई 1966 के अंक में डा. श्री भृगुनाथसिंह ने लिखा है कि सोम लता का श्वास के अतिरिक्त प्रयोग अनवधानिक स्तब्धता (Anaphylactic Shock), शीतपित्त, तृणज्वर (Hay fever) तथा वाहिनी शोथ (Agioneuroticodema) आदि व्याधियों में किया जाता है।
  • आचार्य श्री प्रियव्रत शर्मा ने इसका श्वासहर द्रव्यों के अन्तर्गत वर्णन किया है। उनके अनुसार यह श्वास रोग की उत्तम औषधि होने के अतिरिक्त मानसिक अवसाद तथा वातिक मनोविकारों में भी उपयोगी हैं।
  • सोम लता हृदय को उत्तेजित करता है और रक्तभार को बढ़ाता है, मूत्रल होने से मूत्रकृच्छ् में लाभप्रद है तथा गर्भाशय संकोचक होने से इसका कष्टप्रसव में प्रयोग किया जा सकता है।
  • प्रतिश्याय तथा प्रतिश्याय से उत्पन्न ज्वर में सोम लता लाभदायक है।
  • शोथ(सूजन) – वेदना युक्त शरीर के अंगों पर सोम लता का लेप किया जाना चाहिये। क्योंकि यह उत्तम शोथहर तथा वेदनाशामक है।
  • आमवात की प्रारम्भिक अवस्था में भी इस सोम के क्वाथ को कई चिकित्सकों ने लाभप्रद पाया है।
  • दस ग्राम सोमचूर्ण को 500 मिली. जल में मन्दाग्नि पर पकावें। जब चतुर्थाश जल शेष रहे तो छानकर रोगी को 2-3 बार पिलावें। यह श्वास ,कास (खाँसी) में तो लाभप्रद है ही।
  • इसके अतिरिक्त इसका क्वाथ एवं अर्क भी तैयार कर उपयोग में लाया जा सकता है। इनके सेवन से श्वास, कास, श्वसनक ज्वर, प्रतिश्याय, आमवात, हृदयरोग आदि में लाभ मिलता है।

सोम लता के फायदे : Benefits of Somlata in Hindi

श्वास रोग में सोम लता का उपयोग लाभदायक

सोम की मुख्य चार जातियां पाई जाती हैं इनमें एफेड्रा सिनिका और एफेड्रा एक्विसेटिना भारत में प्रायः नहीं होती। इन दोनों को चीन में अधिक होने से चीनी एफेड्रा (Chinese ephedra)भी कहते हैं।अन्य दो जातियां भारत में होने से इन्हें भारतीय एफेड्रा ” (Indian Epherda) कहते हैं।
जिनमें प्रथम एफेड्रा जिरेर्डिआना मुख्य रुप से प्रयुक्त होती है। इसमें प्रबल श्वासनलिका विस्फारक कर्म (Broncho dilator) होने से तमक श्वास (Bronchoial Asthma) की यह उतम औषधि सिद्ध हुई है। श्वास के दौरे पर पड़ने पर इसका एक दो ग्राम चूर्ण रोगी को ताजा जल के साथ सेवन कराने से श्वास नलिका का विस्फार (फैलाव) होता है और जमा हुआ कफ बाहर निकल जाता है। जिससे रोगी को आराम मिल जाता है।

इसे तालीस पत्र के साथ देने से अधिक लाभ होता हैं कई चिकित्सक इसके साथ मुलहठी का चूर्ण मिलाकर भी प्रयुक्त करते हैं। यह मुलहठी युक्त सोम चूर्ण बालकों की कूकर खांसी में भी देना चाहिये। पित्त प्रकृति के जिन व्यक्तियों को इसके सेवन से उष्णता महसूस हो उन्हें दूध के साथ देना चाहिये।

सोम चूर्ण में रससिन्दूर मिलाकर देने से यह अधिक प्रभावी हो जाता है। आचार्य यादव जी विक्रम ने सिद्ध योग संग्रह में सोमयोग के नाम से जो योग दिया है। उसमें रससिन्दूर एक भाग में सोमचूर्ण 20 भाग मिश्रित कर 500 मिग्रा से एक ग्राम देने का उल्लेख किया गया है।

इस सोमयोग के साथ अभ्रक भस्म या चन्द्रामृत रस देने से अधिक लाभ होता है।

चिकित्सादर्श के लेखक श्री राजेश्वरदत्त शास्त्री ने इसमें श्वासकुठार मिलाकर देना अधिक उचित समझा है। लिखा गया है- सोमचूर्ण 20 ग्राम, रससिन्दूर एक ग्राम और श्वासकुठार एक भाग लेकर पहले रससिन्दूर को खरल में खूब घोटकर फिर उसी के साथ श्वासकुठार घोटकर फिर कपड़छन सोमचूर्ण उसी में मिलाकर खूब घोटकर रखें। इसे गर्मजल या मधु के साथ एक ग्राम की मात्रा में आवश्यकतानुसार दिन में 4-5 बार देना चाहिये।

सोम लता से निर्मित विशिष्ट योग और उनके लाभ :

तालीसासोमादि चूर्ण – बनाने की विधि और फायदे

शास्त्रीय तालीसादि चूर्ण के अतिरिक्त जो यादव जी ने तालीसादि चूर्ण लिखा है उसमें सोमचूर्ण भी डाला गया है। रसतन्त्रसार (कालेड़ा) के लेखक ने इसे तालीसासोमादि चूर्ण नाम दिया है। इसके निर्माण की विधि इस प्रकार है-

सोमचूर्ण ,तालीसपत्र, मुलहठी, अडूसे के फूल ओर पुष्करमूल, इन पांच औषधियों को समान मात्रा में लेकर कूटकर कपड़छन चूर्ण तैयार कर लें ।

सेवन की मात्रा – इसे एक ग्राम की मात्रा में दिन में 3-4 बार शहद के साथ सेवन करावें।

तालीसासोमादि चूर्ण के लाभ – इस चूर्ण से श्वास, कास (खाँसी) और प्रतिश्याय (सर्दी-जुकाम) में लाभ होता है।

सोमकल्पासव – बनाने की विधि और फायदे

आचार्य श्री रघुवीर प्रसाद त्रिवेदी ने राजकीय औषधि योग संग्रह में सोमकल्पासव का भी वर्णन किया है, जिसमें सोम लता के अतिरिक्त वासा, कटेरी, ब्राह्मी, मुलहठी, पुष्करमूल,तालीसपत्र, धाय के फूल आदि डालकर आसव तैयार करने की विधि लिखी गई है। यह सोमकल्पासव श्वास रोग की प्रशस्त औषधि है।

श्री ज्ञानेन्द्र पाण्डेय के विशिष्ट सम्पादकत्व में अनुभूत योगमाला (बारालोकपुर) का सन् 1961 में एक वनस्पति अंक प्रकाशित हुआ था। इसमें इस पत्रिका के प्रधान सम्पादक श्री पं. विश्वेश्वरदयाल का एकसोम विषयक लेख है। इसमें सुश्रुतोक्त एवं वेदोक्तं दिव्य सोम का वर्णन करने के पश्चात उक्त सोम की कार्मुकता (कर्मशीलता) का भी विवेचन किया गया है।

सेवन की मात्रा – अर्क की मात्रा 2 मिली. है । इसे दिन में 3 – 4 बार दिया जा सकता है।

सोमकल्पासव के लाभ –

  • जलोदर में हृदयरोग के कारण पैदा हुई पेट की सूजन पर हृदय की धड़कन पर जहां डीजीटेलिस भी फैल हो गया था वहां पर सोम का चमत्कारिके प्रभाव होता है।
  • बायें हृदय भाग की गतिरोध में भी इसके अर्क से लाभ हुआ।
  • न्यूमोनिया के काण जो हृदय पर विषैला प्रभाव पड़ता है वहीं पर और रोहिणी (डिफ्थेरिया) पर भी अर्क का उपयोग सद्यः लाभप्रद रहा है।

वासासोम पानक – बनाने की विधि और फायदे

अन्त में पं. श्री विश्वनाथ द्विवेदी के “वासासोम पानक” का उल्लेख करना उचित होगा जिसका वर्णन आपने वैद्यंसहचर ग्रन्थ में किया है –

वासा और सोम लता को अलग-अलग 250 – 250 ग्राम लेकर मिट्टी के बर्तन में 2-2 लीटर पानी में क्वाथ करें। अष्टमांश शेष रह जाने पर मोटे कपड़े से तीन बार छानकर आधा किलो मिश्री को दोनों क्वाथ में मिलाकर एक साथ ही एक चाशनी कर लें। एक तार की चाशनी बनने पर उतार कर केशर की गन्ध देकर छानकर रख लें।

सेवन की मात्रा – 10 से 30 मिली पानक को पानी या उष्ण दूध में मिलाकर दें

वासासोम पानक के लाभ – इससे श्वास , कास, कूकरकास आदि में उत्तम लाभ मिलता है।

सोम लता के नुकसान : Somlata Side Effects in Hindi

  • सोम लता लेने से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श करें ।
  • सोम लता एक बहुमूल्य वनौषधि है लेकिन इसका अधिक प्रयोग और आदत डालना हानिकर हो सकता है।

सोम लता का मूल्य : Somlata Price

  • Jioo Organics Somlata | Soma | Ephedra Gerardiana | 100g – Rs 199
  • ShubhBhakti™ Somlata (50 Grams) – Rs 250

कहां से खरीदें :

अमेज़न (Amazon)

(दवा व नुस्खों को वैद्यकीय सलाहनुसार सेवन करें)

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