Trayamana ke Fayde | त्रायमाण के फायदे ,गुण ,उपयोग और नुकसान

त्रायमाण (त्रायन्ती) क्या है ? : What is Trayamana (Gentiana kurroo) in Hindi

रास्ना, मूर्वा, लक्ष्मणा आदि की भांति त्रायमाण भी एक संदिग्ध वनौषधि है किन्तु बहुत से वनौषधि वेत्ताओं ने इसकी संदिग्धता को दूर करने का प्रयास किया और वास्तविक त्रायमाण का निर्णय किया गया। इन वनौषधिवेत्ताओं में से ठा. श्री बलवन्त सिंह, यादवजी विक्रम जी आचार्य, डा. श्री वामन गणेश देसााई, आचार्य श्री प्रियव्रत शर्मा, प्रो. श्री रामसुशील सिंह के अभिमतों में एक रूपता है अत: इन्होंने जिस वनौषधि को त्रायमाण (त्रायमाणा) माना है, उसके सम्बन्ध में ही यहां संक्षिप्त जानकारी दी जा रही है।

वृहत्त्रयी में त्रायमाणा एवं त्रायन्ती के नाम से इस वनौषधि का वर्णन मिलता है किन्तु अथर्ववेद में इसका त्रायमाण के नाम से उल्लेख मिलता है-.

एहि जीवं त्रायमाण, पर्वतस्यास्य यक्ष्मम्।
विश्वेभिदेवैर्दतं परिधि वनाम कम्।।
– (अथर्व 4-9)

आचार्य चरक ने इसे तिक्तस्कन्ध की वनौषधि कहा है। आचार्य सुश्रुत ने इसका लाक्षदिगण में उल्लेख किया है। इसका वानस्पतिक कुल भूनिम्बकुल (जेन्शिएनेसी Gentianaceae) है।

त्रायमाण का पौधा कहां पाया या उगाया जाता है ? : Where is Trayamana Found or Grown?

पश्चिमोत्तर हिमालय तथा कश्मीर में 5000 से 10,000 फुट की ऊँचाई पर इस वनौषधि के क्षुप पाये जाते हैं। शिमला जिले के सोलन नामक स्थान में यह खनोग नामक पहाड़ी की चोटी पर तथा वैष्णवी देवी के पहाड़ की चोटियों पर यह पायी जाती है।

त्रायमाण (त्रायन्ती) का विभिन्न भाषाओं में नाम : Name of Trayamana (Gentiana kurroo) in Different Languages

Trayamana in

  • संस्कृत (Sanskrit) – त्रायमाणा, त्रायन्ती, गिरिसानुजा
  • हिन्दी (Hindi) – सोलन ,कडू, नीलकंठ, तीता, त्रायमाण
  • अंग्रेजी (English) – इण्डियन जेन्शन (Indian Gentian)
  • लैटिन (Latin) – जेन्शियाना कुरो (Gentiana Kurro Royle)

त्रायमाण (त्रायन्ती) का पौधा कैसा होता है ? :

  • त्रायमाण का पौधा – इसके कोमल काण्डीय बहुवर्षायु छोटे क्षुप एक फुट तक ऊँचे होते हैं, जो पहाड़ की चट्टानों के बीच-बीच गढ़ों में निकलते हैं। काण्ड शाखारहित होता है।
  • त्रायमाण के पत्ते – पत्र मूल से निकले हुये या मूलीय कोषमय आधार वाले 3-4 इंच लम्बे, रेखाकार, कम चौड़े होते हैं। मूल के समीप के पत्र काण्डपत्रों की अपेक्षा बड़े होते हैं।
  • त्रायमाण के फूल – पुष्प मध्यभाग से निकले हुये लगभग 6 इंच लम्बे पुष्पदण्ड पर नीले रंग की सफेद चित्तियों या बिन्दुओं से युक्त, सुन्दर-सुन्दर 2-3 पुष्प लगते हैं। पुष्पागम सितम्बर में होता है।
  • त्रायमाण का फल – फल पोन इंच लम्बे तथा चौथाई इंच चौड़े होते हैं।
  • त्रायमाण के बीज – बीज छोटे होते हैं इनकी लम्बाई, चौड़ाईसे दुगनी होती है।
  • त्रायमाण की जड़ – त्रायमाण का मूल जमीन के अन्दर फैलता है। ये मूल दृढ़, वेलनाकार, भूरे रंग के, 1-3 इंच लम्बे लगभग आधा इंच व्यास के टुकड़ों में मिलते हैं, जिन पर लम्बाई में झुर्रियां होती हैं।

“यूनानी निघण्टुओं में ‘गाफिस’ के लिये ही त्रायमाण नाम का उल्लेख मिलता है। किन्तु गाफिस वास्तव में इसी की विदेशीय जाति है, जो इससे पृथक वनौषधि है, और फारस में होती है। इसका वैज्ञानिक नाम जेंटिआना डाहूरिका Gentiana Dahurica Fisch (पर्याय-जेंटिआना ओलीविएरी-Gentiana Olivieri Griseb) है। त्रायमाण को देशी गाफिस’ कह सकते हैं। किन्तु इसे ही गाफिस या गाफिस को ही त्रायमाण कहना उचित नहीं है।”
-प्रो. श्री रामसुशील सिंह

त्रायमाण (त्रायन्ती) का रासायनिक विश्लेषण : Trayamana (Gentiana kurroo) Chemical Constituents

इसमें जेन्शियोपिक्रिन नामक तिक्त द्रव्य, जेन्शियनिक एसिड, पेक्टिन, अस्फटिकीय शर्करा होते हैं।

त्रायमाण के पौधे का उपयोगी भाग : Beneficial Part of Trayamana plant in Hindi

मूल (जड़)

सेवन की मात्रा :

  • चूर्ण – 1 से 3 ग्राम,
  • क्वाथ – 50 से 60 मि.लि.

प्रतिनिधि द्रव्य एवं अपमिश्रण (मिलावट) :

त्रायमाण (जेन्शियाना कुरो) में कुटकी (पीक्रोहीजा कुर्रोआ) तथा जेंटिआना की अन्य जातियों यथा जेंटिआना डेकुस्वेन्स तथा जेंटिआना टेनेल्ला आदि की जड़ें मिला दी जाती हैं। आपातेत: देखने में तथा स्वाद में उक्त जड़ें त्रायमाण की जड़ों से कुछ कुछ मिलती हैं और इनका उद्भव क्षेत्र भी प्रायः वही है। अतः त्रायमाण के प्रतिनिधिस्वरूप इन्हें ग्रहण किया जा सकता है। किन्तु भारतीय बाजारों में अन्य अनेक जड़ें जो त्रायमाण के नाम से बेची जा रही हैं इनका ग्रहण नहीं होना चाहिए –

  1. ममीरा (Coptis Teeta)
  2. मरीरी (Thalictrum Foliolosum) आदि वत्सनाभकुलीय
  3. बंगीय त्रायमाणा (Ficus HeterophyllaLinn) के शुष्कफल (बलाडुमर) को बंगीय वैद्य त्रायमाणा के नाम से ग्रहण करते हैं।
  4. बनफसा (Viola Oddrata Linn)

आचार्य श्री विश्वनाथ द्विवेदी के कथनानुसार उक्त वनौषधियां त्रायमाण के रस-गुण-वीर्य-विपाकादि से पृथक् हैं, अतः इनका ग्रहण अनुचित है।

त्रायमाण के औषधीय गुण : Trayamana ke Gun in Hindi

  • रस – तिक्त
  • गुण – लघु, रूक्ष
  • वीर्य – उष्ण
  • प्रभाव – कटु
  • दोषकर्म – कफवात शामक, पित्तसंशोधन ‘
  • यह दीपन-पाचन, पित्तसारक, अनुलोमन, रेचन, कृमिघ्न, रक्तशोधक, शोथहर, मूत्र-स्वेदजनन, आर्त्तव जनन, स्तन्यशोधन, कुष्ठघ्न है।
  • बाह्य प्रयोग से व्रणशोधन (घाव की सफाई करनेवाला), रोपण (घाव भरनेवाला) एवं केश्य (बाल बढ़ानेवाला) है।
  • आचार्य श्री कृष्णराम भट्ट लिखते हैं कि त्रायन्ती (त्रायमाण) तिक्त, सारक, कफ तथा गरविष विनाशक,
    चर तथा पित्त की छेदक, भ्रमहारक एवं उग्ररक्त विकृति की विघातक है।
  • त्रायमाणा तिक्त, उष्णवीर्य, सारक तथा पित्त-कफ, रक्तविकार गुल्म, ज्वर, मक्कलशूल, रक्तपित्त, भ्रम, वमन और हृदयरोग को दूर करने वाली है।- (आचार्य यादव जी विक्रम जी)
  • त्रायमाण का स्वाद तिक्त होता है, यह दीपन है। इससे पित्त का स्राव होता है और दस्त साफ होता है। इससे मूत्र का प्रमाण बढ़ता है और स्रंसन (वह औषध जो कोठे के वात आदि दोष तथा मल को नियत समय के पहले ही बलात् गुदा मार्ग से निकाल दे) होने से जीर्णज्वर और पित्तज्वर में इसका प्रयोग करते हैं। – (डा. वामन गणेश देसाई)
  • आचार्य चरक ने ज्वर, रक्तपित्त, गुल्म, कुष्ठ, उन्माद, राजयक्ष्मा, पाण्डु, ग्रहणी, कास(खाँसी), विसर्प और स्तन्यविकार आदि में इसे उपयोगी कहा है। उक्तरोगाधिकार में वर्णित कई योगों में इसकी योजना की गई है । इसका सर्वाधिक प्रयोग घृतकल्पों के रूप में किया गया है। यथा-
    पिपल्यादिघृत , वासादि घृत , तिक्तघट्पलघृत , महातिक्तक घृत , कटुकादि घृत, त्रायमाणादि घृत ,महापैशाचिक घृत आदि।
  • सुश्रुत संहिता, अष्टांगहृदय,शार्ङ्गधर संहिता आदि के बहुत से योगों का भी यह मुख्य घटक द्रव्य है।

त्रायमाण (त्रायन्ती) के फायदे और उपयोग : Benefits of Trayamana (Gentiana kurroo) in Hindi

बुखार (ज्वर) से आराम दिलाए त्रायमाण का सेवन (Benefits of Trayamana in fever in Hindi)

(क) त्रायमाण, कुटकी, लालचन्दन, खस, सारिवा, पटोलपत्र, मुलेठी और महुवे के फूल लेकर इनका क्वाथ बनाकर, ठंडाकर उसमें शहद मिलाकर पिलाने से कफपित्त ज्वर में लाभ होता है।

(ख) त्रायमाण, पित्त पापड़ा, खस, कुटकी,नीम की छाल और धमासा का क्वाथ बनाकर उसमें शहद मिलाकर देने से पित्त ज्वर का शमन होता है। योग चिन्तामणिकार ने इसमें नीम के स्थान पर चिरायता का प्रयोग किया है। सततज्वर में इसे अनन्तमूल के साथ प्रयोग करना चाहिये।

(ग) त्रायमाण, मुलेठी, पिपरामूल, चिरायता, नागरमोथा, महुबे के फूल और बहेड़ा का क्वाथ भी कफज्वर एवं पित्तज्वर हर कहा गया है। कफज्वर में शहद मिलाकर तथा पित्तज्वर में शक्कर मिलाकर क्वाथ का सेवन करना चाहिये।

पेटदर्द (उदरशूल) में त्रायमाण का उपयोग फायदेमंद (Trayamana Uses to Cure Stomach pain in Hindi)

त्रायमाण, सोंठ, निशोथ,पिप्पलीमूल, अमलतास, मुनक्का और हरड़ का क्वाथ पित्तजन्य शूल का शमन करता है।

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स्तन्यविकृति मिटाए त्रायमाण का उपयोग

त्रायमाण, गिलोय, नीम की छाल, पटोल एवं त्रिफला का क्वाथ सिद्ध कर पिलाने से माता का अशुद्ध दूध, शुद्ध होता है।

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विसर्प (खुजली नामक चर्म रोग) में त्रायमाण के इस्तेमाल से फायदा

(क) त्रायमाण, त्रिफला, नीम छाल, कुटकी, मुलेठी और पटोल का क्वाथ कर उसमें घृत मिलाकर सेवन करने से विसर्प, दाह, गुल्म, तृष्णा, जीर्णज्वर आदि दूर होते हैं।

(ख) त्रायमाण, पित्तपापड़ा, धमासा और कुटकी के क्वाथ में गूगल मिलाकर सेवन करने से सभी प्रकार के विसर्प में लाभ होता है।

गुल्म (पेट में वायु का गोला) रोग मिटाए त्रायमाण का उपयोग

पहले रोगी की विरेचनादि द्वारा शरीर शुद्धि करें फिर 100 ग्राम त्रायमाण को डेढ लीटर पानी में औटाकर 250 मि.लि. रहने पर छानकर उसमें दूध मिलाकर सुखोष्ण ही पी जावें। कुछ देर बाद जितना पी सके उष्ण दूध और पीवें। इससे पित्तजन्य गुल्म की निवृत्ति होती है।

अपच (अजीर्ण) में त्रायमाण के इस्तेमाल से फायदा

त्रायमाण, नागरमोथा, कुटकी, पित्तपापड़ा और पटोलपत्र का क्वाथ बनाकर पीने से अजीर्ण, अग्निमांद्य आदि आदि का शमन होता है।

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हृदयशूल में त्रायमाण का उपयोग लाभदायक

त्रायमाण, कुटकी, त्रिफला, सोंठ और पटोलमूल का क्वाथ हृदयशूल, अर्श (बवासीर), ग्रहणी (अतिसार का एक रूप जिसमें भोजन बिना पचे ही मलरूप में बाहर आता है) आदि रोगों में लाभप्रद है।

कब्ज रोग में लाभकारी है त्रायमाण का प्रयोग

त्रिफला या निशोथ चूर्ण के साथ त्रायमाण चूर्ण को दुग्धानुपान से दें।

पीलिया (पाण्डुरोग) मिटाता है त्रायमाण ( Trayamana Beneficial to Treat Jaundice in Hindi)

त्रायमाण, गिलोय,दारूहल्दी, पुनर्नवा और हरड़ के क्वाथ में गौमूत्र मिलाकर पीने से पाण्डु, उदररोग तथा शोथ आदि रोगों में लाभ होता है। .

खून की खराबी (रक्त विकार) ठीक करे त्रायमाण का प्रयोग

त्रायमाण, गिलोय, वासा, मंजीठ और त्रिफला के क्वाथ के सेवन से रक्तविकार दूर होते हैं। महातिक्तघृत या त्रायमाणादि घृत भी रक्तविकारों में लाभप्रद है। साथ में त्रायमाण चूर्ण को तुवरक तैल या नीम तैल में मिलाकर बाह्य प्रयोग भी करना चाहिये।

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त्रायमाण (त्रायन्ती) के दुष्प्रभाव : Trayamana (Gentiana kurroo) ke Nuksan in Hindi

  • त्रायमाण लेने से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श करें ।
  • त्रायमाण की अधिक मात्रा प्लीहा (तिल्ली) के लिये हानिकारक है।

दोषों को दूर करने के लिए : तगर को उपयोग में लाना चाहिए।

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