Nari Tu Narayani
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यह पुस्तक नारी तू नारायणी नाम से प्रकाशित हुई है। पैमाना लगभग 83 पृष्ठ का है।
आरम्भ में उपसंवाद शीर्षक के नीचे एक श्लोक दिया गया है — यद् नयन्ति पूजयन्ते रमन्ते ते देवता — और उसकी व्याख्या में कहा गया है कि जिस कुल में पित्रों का आदर है वहाँ देवता प्रसन्न रहते हैं, तथा शास्त्रों में इस प्रकार नारी की महिमा बतायी गयी है।अनुक्रम में आर्त भक्ति त्रौपदी तथा दैवी शक्तियों से सम्पन्न गुणमंजरी देवी जैसे प्रकरण भी पृष्ठ-संख्याओं के साथ दिए गए हैं, जिससे पाठक इन प्रकरणों के माध्यम से नारी के कर्तव्य और अधिकारों पर विचार पा सकता है।
पृष्ठ पर यह भी कहा गया है कि भारतीय समाज में नारी का एक विशिष्ट और गौरवपूर्ण स्थान है, वह केवल भोजन नहीं बल्कि पुरुष को भी शिक्षा देने योग्य चरित्र बन सकती है, और यदि वह अपने चरित्र तथा साधना में दृढ़ और उत्साही बन जाय तो अपने माता, पिता, पति, सास और ससुर की भी उत्कर्षकारी हो सकती है, तथा धर्म की स्थापना आचार्यों ने की होने के बावजूद उसे सँभाले रखना और संस्कारों में पालने का काम नारी ही करती है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
कैसे पढ़ें — फ़ाइल पूरी PDF में है, जिसे मोबाइल, कंप्यूटर या किसी भी PDF ऐप में बिना इंटरनेट के पढ़ा जा सकता है। नीचे दिए बटन से इसे तुरंत और मुफ़्त डाउनलोड करें — कोई साइन-अप, सदस्यता या शुल्क नहीं।
- नारी की महिमा तथा शक्ति
- आदर्श तथा कर्तव्य
- संस्कार तथा परिवार
- प्रेरक प्रसंग
पुस्तक की मुख्य बातें
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