Nirbhaya Naad
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यह पुस्तक निर्भया नाद नाम से प्रकाशित हुई है और आवरण-पृष्ठ पर इसे श्रीमद्भागवत महापुराणान्तर्गत बताया गया है। आमुख में लिखा है कि कुछ ऐसे महापुरुष होते हैं जिनके पास बैठने से उनके दर्शन से अलख के आनन्द की झलकें मिल जाती हैं, और यह बात कहा गई है कि यह एक महापुरुष की वाणी का छोटा-सा संचय है। प्रकाशन-संस्था अध्यात्म योग वेदान्त सेवा समिति, अमदावाद आगम है। पैमाना लगभग 21 पृष्ठ का है।
पाठ में एक श्लोक भी दिया गया है — विश्वं पूज्य तद्देवं तरंगा इव सागरे, तत् एव सन्देहि मानुषो भव, तस्माद्ध्रुवं तात्तात्तात्तो मोहं कुर्वी भव — और उसकी व्याख्या में समझाया गया है कि जहाँ से यह संसार सागर में तरंगों की तरह उत्पन्न होता है वही तू है, इसमें सन्देह नहीं।पृष्ठ पर यह भी बताया गया है कि उपनिषद-रूपी आध्यात्मिक खजाने का अमृत इस पुस्तक के एक-एक शब्द से टपकता है, और अन्त में पाठकों से यह भी कहा गया है कि वे इस विश्वास के साथ अपनी पावन करकमला में इसे अपना कर सकते हैं।
यह पुस्तक निर्भय-नाद-विषयक साधना-पाठकों के लिए उपयोगी है, और निर्भया नाम का श्लोक के साथ उसके भाव का सार दिया गया है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
कैसे पढ़ें — फ़ाइल पूरी PDF में है, जिसे मोबाइल, कंप्यूटर या किसी भी PDF ऐप में बिना इंटरनेट के पढ़ा जा सकता है। नीचे दिए बटन से इसे तुरंत और मुफ़्त डाउनलोड करें — कोई साइन-अप, सदस्यता या शुल्क नहीं।
- नाद (ध्वनि) तथा साधना
- भय से मुक्ति तथा आत्म-विश्वास
- आध्यात्मिक अनुभव
- प्रेरक प्रसंग
पुस्तक की मुख्य बातें
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