व्याकरण शास्त्रीय परिभाषाएँ एक अनुशीलन – Vyakarana Shastriya Paribhashaein Ek Anusheelan
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व्याकरण शास्त्रीय परिभाषाएँ एक अनुशीलन संस्कृत व्याकरण की परिभाषाओं पर केन्द्रित पुस्तक है। शीर्ष पृष्ठ पर इसे परिभाषा-वृत्त-शैली के आधार पर अंकित किया गया है। लेखक डॉ० पर्णदत्त सिंह हैं। पुस्तक लगभग पाँच सौ छियालीस पृष्ठ की है, जो बताता है कि इसमें बड़ी संख्या में परिभाषाएँ संकलित हैं।
पुस्तक का मुख्य उद्देश्य व्याकरण-शास्त्र के मूल पदों को परिभाषा और उदाहरण सहित व्यवस्थित रूप से समझाना है। इसमें ऐसी सामग्री दी गई है जो अन्य अध्यापकों द्वारा तैयार की गई परिभाषाओं पर आधारित है, जिससे पाठक को यह पता रहता है कि परिभाषा कहाँ से आई। व्याकरण के प्रमुख अध्यायों — व्युत्पत्ति, शब्द-विभक्ति, समास, सन्धि और अलंकार — से जुड़ी परिभाषाएँ इसमें मिलती हैं। वृत्त-शैली के कारण व्याख्या सरल और उदाहरण-सहित बनी हुई है, इसलिए पढ़ने में कठिनाई नहीं होती।
यह पुस्तक संस्कृत-व्याकरण के विद्यार्थियों, शिक्षकों और प्रतियोगी-परीक्षा की तैयारी करने वालों के लिए अत्यंत उपयोगी है। व्याकरण की परिभाषाएँ कंठस्थ करना कठिन होता है, और यह पुस्तक उन्हें क्रमबद्ध रूप से सुलभ कराता है। परिभाषा-वृत्त-शैली के कारण पाठक अपनी सूची भी बना सकता है। भारतीय भाषा-शास्त्र और व्याकरण-इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए यह एक विस्तृत संदर्भ ग्रंथ है। व्याकरण-विशेषज्ञता प्राप्त करने के लिए इसे अन्य प्रामाणिक ग्रन्थों के साथ पढ़ना उचित होगा।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- व्याकरण की शास्त्रीय परिभाषाएँ
- संस्कृत व्याकरण के नियम
- विद्वानों के मत
- शोध तथा अनुशीलन
पुस्तक की मुख्य बातें
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