गुणकारी औषधि धातकी के फायदे और नुकसान – Deodar in Hindi

धातकी क्या है ? (What is Dhataki in Hindi)

भावप्रकाश निघन्टु के हरीतक्यादि प्रथम वर्ग में धातकी का वर्णन मिलता है। प्राकृतिक वर्गीकरण के अनुसार यह मदयन्तिका कुल (लिथरेसी) की वनौषधि हैं। सुश्रुत संहिता में वर्णित प्रयंग्वादि और अम्बष्ठादि गण की इस धातकी को भगवान् चरक से संधानीय, पुरीष संग्रहणीय और मूत्रविरजनीय कहा है।

जो द्रव्य दोषदूषित मूत्र के दोष को दूर कर उसे स्वाभाविक वर्ण दे दे “मूत्रविरजनीय” कहलाता है। धातकी उत्तम मूत्रविराजनीय द्रव्य है।
जो द्रव्य पतले तथा बार-बार मात्रा में सरने वाले पुरीठा-मल को बाँध देते हैं। पुरीष संग्रहणीय कहे जाते हैं।

धातकी का विभिन्न भाषाओं में नाम (Name of Dhataki Tree in Different Languages)

Dhataki Tree in –

  • संस्कृत (Sanskrit) – धातकी, वन्हिज्वाला, मदिर, धातुपुपा
  • हिन्दी (Hindi) – धाय
  • गुजराती (Gujarati) – धावडी
  • मराठी (Marathi) – धालस
  • पंजाबी (Punjabi) – धाबी
  • बंगाली (Bangali) – धाई
  • तामिल (Tamil) – धाघरीजर्गी
  • तेलगु (Telugu) – सिरीजी
  • फ़ारसी (Farsi) – धावा
  • अंग्रेजी (English) – फायर फ्लेम बुश (Fire Flame Buss)
  • लैटिन (Latin) – बुडफोर्डि या फुटिको जा (Wood for Furticosa)

धातकी का पेड़ कहां पाया या उगाया जाता है ? :

भारत के अनेक प्रान्तों में 5 हजार फीट की ऊँचाई तक धातकी के वृक्ष पाये जाते हैं।

धातकी का पेड़ कैसा होता है ? :

  • धातकी का पेड़ – धातकी वृक्ष की ऊंचाई 5 से 12 फीट होती है। ये वृक्ष शाखा प्रशाओं युक्त ऊँचे कुछ झुके हुए होते है। नवीन शाखाओं और पत्तियों पर काले काले बिन्दु होते हैं। छाल रक्ताभ भूरे रंग की पतले टुकड़ों में छूटती रहती है।
  • धातकी के पत्ते – धातकी के पत्र प्रायः विरीत दो कतारों में कभी-कभी तीन चक्रों में भालाकार या लट्वाकार-भालाकार, 2-4 इंच लम्बे होते हैं।
  • धातकी के फूल – धातकी के पुष्प चमकीले लाल रंग के, 1/2 से 3/4 इंच लम्बे, अक्षीय गुच्छबद्ध मंजरियों में होते हैं। जिनसे प्रायः समस्त शाखायें भरी रहती हैं।
  • धातकी के फल – धातकी के फल अण्डाकार, पतला होता है जिसमें भूरे रंग के छोटे, चिकने बीज होते हैं।

जनवरी-अप्रैल तक इस में पुष्प आते हैं, फल अप्रैल मई में लगते हैं। फरवरी-मार्च में जब इसका वृक्ष फूलों से लद जाता है तो पत्र झड़ने लगते हैं और फिर नव पल्लव आते हैं।

धातकी पेड़ का उपयोगी भाग (Beneficial Part of Dhataki Tree in Hindi)

प्रयोज्य अंग – पुष्प, पत्र (पत्ते)

धातकी के औषधीय गुण (Dhataki ke Gun in Hindi)

  • रस – कषाय
  • गुण – लघु, रूक्ष
  • वीर्य – शीत
  • विपाक – कटु
  • दोषकर्म – कफपित्त शामक
  • वीर्यकालावधि – एकवर्ष

सेवन की मात्रा :

मात्रा – 3 से 5 ग्राम।

रासायनिक संघटन :

  • इसके पुष्पों में एक लाल रंग निकलता है। जो रेशम रंगने के काम आता है।
  • पुष्पों में टेनिन 24 तथा शर्करा 11.8 प्रतिशत होती है।
  • पत्तियों में 12-20 प्रतिशत टैनिन तथा मेंहदी का रंजक पदार्थ मोन होता है।
  • छाल में 20-27 प्रतिशत टैनिन होता है। इसके काण्ड (तने) में एक गोंद भी निकलता है।

धातकी का औषधीय उपयोग (Medicinal Uses of Dhataki in Hindi)

आयुर्वेदिक मतानुसार धातकी के गुण और उपयोग –

  • धातकी स्तम्भक औषधि होने से अतिसार प्रवाहिका में उपयोगी है।
  • ज्वरघ्न होने से यह ज्वर को भी शान्त करती है। पित्त ज्वर में यह विशेष उपयोगी है। आचार्य प्रियव्रत शर्मा लिखते हैं कि “कोंकण देशीय लोग पित्तज्वर के रोगी के मुख में तिल तेल देकर सिर पर धातकी के पत्तों का रस देते हैं। इससे मुखस्थ तेल पीतवर्ण हो जाता है तब उसे फेंक देते हैं और दूसरा तेल लेते हैं। इस प्रकार 2-3 बार करने से पित्त निकल जाता हैं और फिर तेल पीले रंग का नहीं होता। इससे ज्वर भी शान्त हो जाता है।”
  • यह स्तम्भन तथा ज्वरघ्न होने से ज्वरातिसार में भी उपयोगी है।
  • निर्दिष्ट उशीरादि क्वाथ का धातकी भी घटक द्रव्य है।
  • विषम ज्वर में भी इसकी उपयोगिता प्रदिष्ट की गई है।
  • यह संधानीय तथा रक्तपित्त शामक होने से रक्तपित्त, रक्तप्रदर आदि रक्तस्रावों में बाह्याभ्यन्तररूपेण प्रयुक्त होती है।
  • धातकी स्त्री रोगों में ही नहीं पुरूषों के प्रमेह की भी यह प्रशस्त औषधि है।
  • पित्तज प्रमेह का यह कफपित्त शामक होने से तथा मूत्र विरजनीय होने से शमन करती है।
  • पित्त प्रकोप से मूत्र पीत या उसमे रक्त आने लगता है धातकी उन वर्णो को दूर कर मूत्र को स्वाभाविक वर्ण प्रदान करती है ।
  • इसी प्रकार सुश्रुत संहिता में भी धातकी की प्रमेह में उपादेयता प्रकट की गई है।
  • धातकी कुष्ठघ्न, रक्तशोधक, जन्तुघ्न एवं दाहशामक होने से यह विसर्प, कुष्ठ आदि चर्मरोगों में उपयोगी है। बालकों के दांत आते समय होते वाले रोगों में इसे पिप्पली एवं आमलकी रस के साथ बालक के मसूड़ों पर मले जाने का निर्देश है।
  • दाह में धातकी के पुष्पों का लेप उपयोगी है उसी प्रकार यह व्रणरोपण होने से व्रणों पर भी इसके पुष्पों का अवचूर्णन किया जाता है।
  • अग्निदग्ध व्रणों में पुष्प चूर्ण को तिल तेल में मिलाकर लगाया जाना चाहिए। इससे व्रण का दाह, स्राव मिटकर वह शीघ्र भरने लगता है।
  • प्रायः 90 प्रतिशत आसवारिष्टों में धातकी पुष्प मिलाया जाता है। धातकी पुष्प मिलाने से आसवारिष्ट खट्टे नहीं होते और इससे आसवोत्पत्ति में सहायता मिलती है। आसवारिष्टों में खमीर उठाने के लिए धातकी पुष्पों का उपयोग किया जाता है। जब ही तो इसे मादिनी कहा गया है ।

यूनानी मतानुसार धातकी के गुण और उपयोग –

  • धातकी समशीतोष्ण होती है।
  • धातकी के फूल व पचांग काबिज (कब्जा करने वाला) है।
  • अतिसार और प्रवाहिका में धातकी के सूखे फूल 7.5 ग्राम मट्ठे के साथ पिलाने से लाभ होता है।
  • धातकी के फूलों के चूर्ण को जखम पर छिड़क कर बांधने से जख्म भर जाता है।
  • धातकी के फूलों का शरबत बनाकर पिलाने से खूनी बवासीर में लाभ होता है।
  • स्त्रियों के श्वेत प्रदर में धातकी बहुत लाभदायक है।
  • इसे पीसकर अलसी के तेल में मिलाकर जले हुए स्थान पर लगाना चाहिए। नासूर में भी इससे फायदा होता है।
  • तालीफ शरीरफ के मत से धातकी पेट के कीड़ों को मारने का भी काम करती है।
  • इसके सूखे फूल संकोचन और पोष्टिक द्रव्य हैं। श्लेष्मिक झिल्लियों की खराबी, खूनी बवासीर और यकृत की खराबी में यह लाभदायक है।
  • प्रसूति समय में धातकी के फूल एक बहुत उपयोगी औषधि के रूप में व्यवहृत होते हैं।

रोगोपचार में धातकी के फायदे (Benefits of Dhataki in Hindi)

1). गुदभ्रंश में धातकी के प्रयोग से लाभ

  • गुदभ्रंश के रोगी को धातकी पुष्पों का क्वाथ बनाकर उसमें कुछ देर बैठाया जाता है।
  • धातकी पुष्प चूर्ण को गुद स्थान पर बुरक कर लंगोट कस देते हैं। यह दोनों विधियां रक्तार्श (खूनी बवासीर) या रक्त प्रदर की स्थिति में भी अपनानी चाहिए।

2). घाव (व्रण) मिटाए धातकी का उपयोग

सभी प्रकार के व्रणों में धातकी पुष्पों के क्वाथ से धोकर पुष्पों के सूक्ष्मचूर्ण का अवधूलन (बुरकना) करते हैं। इससे व्रणगत स्राव कम होता हे तथा व्रण भरने लगता है। यह विधि अन्य रक्तस्रावों में भी की जानी चाहिए।

3). दाह (जलन) कम करने में धातकी करता है मदद

धातकी पुष्पों को गुलाबजल में पीसकर या चन्दन के साथ शीतल जल में पीसकर पतला लेप करने से शरीर के किसी भी अङ्ग की जनल मिटती है।

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4). आग से जले घाव (अग्निदग्ध व्रण) ठीक करे धातकी

पुष्प चूर्ण को तिल तेल अलसी तेल या नारियल तेल में मिलाकर लगाने से व्रण का दाह मिटता है तथा वह शीघ्र ही भरने लगता है। यह प्रयोग विसर्प, लूता व्रण (मकड़ी के काटने से हुआ व्रण) एवं अन्य कीटदंश व्रणों से भी लाभप्रद हे ।

5). नाड़ी व्रण मिटाता है धातकी

नासूर में पुष्प चूर्ण को अलसी के तेल में अच्छी तरह घोटकर उसमें थोड़ा शहद मिलाकर भरना चाहिए।

7). दन्तरोग में लाभकारी है धातकी का प्रयोग

दन्तरोगों में धातकी के क्वाथ के कुल्ले करने चाहिए।

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8). योनिभ्रंश में धातकी का उपयोग लाभदायक

धातकी पुष्प, लोध्र, अशोक की छाल तथा गूलर पत्र का क्वाथ बनाकर योनि को बार-बार धोने से योनिभ्रंश में लाभ होता है। इससे रक्त प्रदर, श्वेत प्रदर आदि में भी लाभ होता है । क्वाथ से धोने के बाद पुष्पों के सूक्ष्म चूर्ण का अवधूलन (बुरकना) करना चाहिए अथवा आगे निर्दिष्ट धात्यक्यादि तेल की उत्तरबस्ति देनी चाहिए या इस तेल का पिचु धारण करना चाहिए।

9). अतिसार में धातकी के सेवन से लाभ

  • धातकी पुष्प चूर्ण को शहद या तक्र (छाछ) के साथ देने से अतिसार-प्रवाहिका में लाभ होता है।
  • धातकी पुष्प चूर्ण को अतीस चूर्ण के साथ मधु में मिलाकर भी दिया जा सकता है। यह बालकों के लिए उपर्युक्त है।
  • धातकी पुष्प, सुगन्धबाला और नागरमोथा का क्वाथ अतिसार में लाभप्रद है।
  • धातकी पुष्प, राल 1-1 भाग तथा शक्कर 2 भाग सबका बारीक चूर्ण कर 2 से 3 ग्राम की मात्रा में 2 से 3 बार जल से देने से भी लाभ होता है।
  • अफीम खाने वालों के अतिसार में सामान्य स्तम्भक औषधि लाभ नहीं करती है वहां पर धातकी पुष्प और राल के महीन चूर्ण को 5-10 ग्राम तक सेवन करना चाहिए। गरम किये लोहे से बुझाई हुई छाछ के अनुपान से यह योग सेवन करना चाहिए।

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10). पेचिश (प्रवाहिका) में लाभकारी है धातकी का सेवन

धातकी पुष्प, बेर के पत्र और लोध्र के कल्क को कैथ के स्वरस और मधु में मिलाकर दही के अनुपान के साथ सेवन करने से सुखदाई प्रवाहिका का शमन होता है।

11). गर्भवती के अतिसार में लाभकारी है धातकी का सेवन

  • गर्भवती के सामान्य अतिसार में धातकी पुष्प चूर्ण को शक्कर और शहद के साथ खिलाकर ऊपर चावलों का धोवन पिलाना चाहिए।
  • धातकी पुष्प, मोचरस और इन्द्र जौ का समभाग चूर्ण 2-3 ग्राम जल के साथ सेवन करना भी हितकारी है।
  • यदि गर्भवती को रक्तातिसार हो तो धातकी पुष्प 12 ग्राम और खस 6 ग्राम का क्वाथ बनाकर उसमें शक्कर तथा ठन्डा हो जाने पर शहद मिलाकर देना चाहिए। ये गर्भिणी के प्रयोग प्रसूता के लिए भी हितकारी होते हैं।

12). बुखार में धातकी के प्रयोग से लाभ

  • पित्त ज्वर – पित्त ज्वर में धातकी पुष्प चूर्ण जल से या गुलकंद के साथ देना चाहिए। पित्तज्वर के रोगी के दाह को शान्त करने के लिए धातकी पत्रों का रस निकालकर लेप करना चाहिए। इसी प्रकार जब पैत्तिक शिरःशूल में दर्द साथ जलन होती है तो पत्ररस का लेप ललाट पर करना चाहिए। इससे रोगी को लाभ मिलता है।
  • वातपित्त ज्वर – धातकी पत्र और सोंठ के क्वाथ में शक्कर मिलाकर सेवन करें।
  • विषमज्वर – धातकी पुष्प, गिलोय और आंवलों के क्वाथ में थोड़ा शहद मिलाकर सेवन करना चाहिए।

13). ज्वारातिसार के उपचार में धातकी करता है मदद

  • धातकी पुष्प, बेलगिरि, धनियां, लोध, इन्द्र जौ, सुगन्धबाला के समभाग मिश्रित चूर्ण में शहद मिलाकर चटावें। इससे बालकों का भी ज्वरातिसार और छर्दि (उल्टी) मिटती हैं।
  • शूलयुक्त ज्वरातिसार में धातकी पुष्पों के क्वाथ में सोंठ के कल्क से बनी हुई पेय में अनार का रस मिलाकर पिलाना चाहिए।

14). प्रदर रोग में धातकी से फायदा

  • धातकी पुष्प और सुपारी के फूलों का क्वाथ प्रदर में 3-4 दिन पिलाने से लाभ होता है।
  • धातकी पुष्प चूर्ण में बराबर शक्कर मिलाकर सेवन करने से भी लाभ होता है। किन्तु चूर्ण 17 दिनों तक सेवन करें और चूर्ण की मात्रा 5-7 ग्राम तक सेवन करें।
  • धातकी पुष्प चूर्ण को मधु के साथ या चावलों के धोवन से भी दिया जा सकता हैं इससे श्वेत प्रदर में लाभ होता है।
  • धातकी पुष्प, मोचरस, सुपारी पुष्प एवं मोलश्री का गोंद प्रत्येक 6-6 ग्राम, शक्कर 25 ग्राम मिलाकर 5-6 ग्राम चूर्ण जल से लेना भी हितकारी है।
  • धातकी पुष्प, लोध्र व अशोक की छाल के चूर्ण को मधु के साथ सेवन करना लाभप्रद है।

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15). गर्भ धारणार्थ धातकी के प्रयोग से लाभ

धातकी पुष्प, नीलकमल के समभाग चूर्ण को ऋतुकाल में शहद के साथ सेवन करने से स्त्री शीघ्र ही गर्भ धारण कर लेती है।

16). रक्तपित्त में आराम दिलाए धातकी का सेवन

धातकी पुष्प चूर्ण को शीतल जल से या दूर्वा स्वरस के साथ देना हितकारी है।

17). विसर्प रोग ठीक करे धातकी का प्रयोग

विसर्प तथा अन्य चर्म विकारों में धातकी पुष्प चूर्ण को नीमपत्र स्वरस के साथ देना हितावह है।

18). प्रमेह में धातकी का उपयोग लाभदायक

धातकी पुष्प, सुगन्धबाला, चन्दन और पठानी लोधका के क्वाथ में शहद मिलाकर सेवन करने से पैत्तिक प्रमेहों में लाभ होता है।

19). बालरोग रोग में लाभकारी है धातकी

धातकी पुष्प और पिप्पली के चूर्ण को आंवले के रस में मिलाकर दांतों के स्थान पर छोटे बच्चों के रगड़ने से उनके दाँत सरलता से निकलते हैं तथा दांत निकलने के कारण हुये रोग भी शान्त होते हैं।

( और पढ़े – बच्चों के रोग और उनके घरेलू नुस्खे )

धातकी से निर्मित आयुर्वेदिक दवा (कल्प) :

धातक्यादि कषाय –

धातकी पुष्प, सोंठ, बेलगिरी, मोचरस, नागरमोथा, अतीस 10-10 ग्राम। सब द्रव्यों को जौकुट कर उसमें से 20 ग्राम को 320 मिली0 जल में पकावें। अष्टमांश शेष रहने पर छानकर पिला देवें। यह एक मात्रा है। ऐसी दो मात्रा नित्य 5-7 दिनों तक देने से अतिसार का वेग धीरे-धीरे रूकता है। मल गाढ़ा आने लगता है और बन्द हो जाता है। -सिद्ध भेषजमणिमाला

धातक्यादि चूर्ण –

धाय पुष्प, बेलगिरी, मोचरस, नागरमोथा,लोध्र, इन्द्र जौ और सोंठ समभाग ले महीन चूर्ण कर लें। इसे 2-3 ग्राम तक की मात्रा में गुड़ मिश्रित तक के साथ सेवन करने से प्रबल अतिसार नष्ट होता है। -वृ0नि0र0

धातक्यासव –

धातकी पुष्प 1 किलो कूट 32 लीटर पानी में चतुर्थांश शेष क्वाथ को छान सन्धान पात्र में भर दें। ठन्डा होने पर उसमें शहद 3 किलो, दानचीनी, छोटी इलायची और तेजपात का चूर्ण 50-50 ग्राम, हल्दी चूर्ण 120 ग्राम तथा शिलाजीत 200 ग्राम मिला, पात्र का मुख संधान कर 15 दिन सुरक्षित रखें। पश्चात् छानकर शीशियों में भर लें। यह प्रमेह (सब प्रकार के) दूर करने वाला आसव है। – वृ0 आसवारिष्ट संग्रह

धातक्यादि तेल –

धातकी के फूल, आंवला, जलवेत, मुलेठी, कमल के फूल, जामुन व आम की गुठली की गिरी, हीराकसीस, लोध्र, कायफल, तेंदू की छाल, कच्ची फिटकरी, अनार की छाल, गूलर की छाल, और बेलगिरी 15-15 ग्राम लेकर सबको बकरी के मूत्र में पीस कल्क बना लें। पश्चात् कड़ाही में 2 लीटर तिल का तेल 4-4 लीटर बकरी का मूत्र और बकरी का दूध मिलाकर मंद अग्नि पर यथाविधि पाक करें। तेल मात्र शेष रह जाने पर छानकर रख लें।

इस तेल का फोहा योनि में रखने से या इसकी उत्तरबस्ति (पिचकारी) देने से विप्लुता, परिप्लुता, वातला आदि वातज योनिरोग, योनि के भीतर का शोथ, योनि का बाहर उभर आना, या योनिशूल योनि में घाव होना योनि से पीप आना एवं योनिकन्द आदि योनिरोग मिटते हैं। योनिशूल में पेडू, कमर, पीठ आदि पर मालिश भी करनी चाहिए। – चरक संहिता

धातकी के दुष्प्रभाव (Dhataki ke Nuksan in Hindi)

  • धातकी का अतिमात्रा में सेवन से कृमि जनक कहा गया है।
  • धातकी के सेवन से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श करें ।
  • धातकी को डॉक्टर की सलाह अनुसार ,सटीक खुराक के रूप में समय की सीमित अवधि के लिए लें।

दोषों को दूर करने के लिए : इसके दोषों को दूर करने के लिए दाडिम (अनार) स्वरस का उपयोग हितकर है ।

(अस्वीकरण : दवा, उपाय व नुस्खों को वैद्यकीय सलाहनुसार उपयोग करें)

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