Lajwanti in Hindi | लाजवंती (छुई मुई) के फायदे और दुष्प्रभाव

लाजवन्ती या छुई मुई का पौधा क्या है? : What is Lajwanti in Hindi?

वैसे तो सभी वनौषधियों में चेतना विद्यमान रहती है किन्तु जिस वनौषधि में यह चेतनता स्पष्ट परिलक्षित होती है उस वनौषधि को लाजवन्ती के नाम से जाना जाता है। इस वनौषधि के पत्तों को छूने मात्र से ये पत्र संकुचित होने लगते हैं। मानो ये लाज के कारण सकुचा रही है।

हमारे हाथ का स्पर्श पाते ही 2-3 सेंकिंण्ड में इसके ये पत्र संकुचित होने लगते हैं। ये पत्र लगभग 10 मिनट की समयावधि में अपनी पूर्वावस्था में आ जाते हैं। इसके सकुचाने का कारण एक प्रकार का उद्दीपन होता है। जैसे ही इसकी पत्तियां को उद्दीपन या स्पर्श प्राप्त होता है इसकी पत्तियां उद्दीप्त हो जाती है, परिणाम यह होता है कि पत्तियों के मूलाधारीय भाग में आक्सीन नामक तत्व पहुंच जाता है इसी तत्व के प्रभाव से पत्तियों की मुख्य सिरा नीचे की ओर झुकने लगती है। फिर दोनों तरफ की पत्तियां संकुचित होने लगती हैं जब आक्सीन नामक तत्व का प्रभाव कम हो जाता है तब पत्तियां अपनी पूर्वावस्था में आ जाती है।

लाजवंती के पौधे की विशेषताएँ (Lajwanti plant features)

इसका कंटकित प्रसरण पौधा 2-3 भाग फुट ऊंचा होता है। पत्र खेजड़ी के पत्रों जैसे होते हैं। अतः इसका नाम शमीपत्रा है। स्पर्श से पत्तियां संकुचित हो जाती है। तब ही इसके लज्जालु, लाजवन्ती, छुई-मुई, नमस्कारी आदि नाम है। पत्रकोणीय पुष्प दण्ड के अग्रभाग पर गोलाकार गुलाबी पुष्पदंण्डक रुई के समान कोमल होता है। इन पुष्पों में कतिपय कुछ नर पुष्प और कुछ स्त्री पुष्प होते हैं। फली आधा से पौन इंच लम्बी, चपटी, कुछ मुड़ी हुई होती है। प्रत्येक फली में 3-5 बीज होते हैं ये बीज बादामी रंग के तथा मूंग से कुछ छोटे होते हैं। इस पर वर्षा ऋतु में पुष्प तथा शीतकाल में फल लगते हैं।

कुल – शिम्बीकुल (लेग्युमिनोसी)

उप कुल – बबूल – उप कुल (माइमोसायडी)।

उत्पत्ति स्थान – यह भारत के उष्ण प्रदेशों में न्यूनाधिक परिमाण में नैसर्गिक रूप में उत्पन्न होती है। यह विशेषकर काली और पानी से तर रहने वाली चिकनी मिट्टी में होती है।

अन्य भाषाओं में लाजवन्ती के नाम : Name of Lajwanti Plant in Different Languages

Lajwanti Plant in –

संस्कृत (Sanskrit) – लज्जालु, शमीपत्रा, समंगा, रक्तपादी, नमस्कारी।
हिन्दी (Hindi) – लाजवन्ती, छुईमुई, लजौनी, शर्मानी।
गुजराती (Gujarati) – लज्जामणी, रीसामणी।
मराठी (Marathi) – लाजालु, लाजरी।
बंगाली (Bangali) – लज्जबती, लाजक,
तामिल (Tamil) – तोट्टलवाडी
तेलगु (Telugu) – अत्तापत्ती।
मलयालम (Malayalam) – तिन्तरमनी।
अंग्रेजी (English) – सेन्सिटिव प्लान्ट Sensitive Plant
लैटिन (Latin) – माइमोसा प्युडिका (Mimosa Pudica Linn.)

लाजवंती की रासायनिक संरचना : Lajwanti chemical composition

  • इसके मूल में 10 प्रतिशत टैनिन तथा 55 प्रतिशत भस्म होती है।
  • इसमें माइमोसिन नामक विषाक्त क्षाराभ भी होता है।
  • बीजों में म्युसिलेज होता है तथा इनसे 17 प्रतिशत हरितपीत तैल निकलता है।

लाजवंती के प्रकार : Types of Lajwanti Plant in Hindi

आचार्य प्रियव्रत जी ने उक्त लाजवन्ती अतिरिक्त इसके तीन भेदों का उल्लेख किया है। श्री उदयलाल जी महात्मा ने उक्त प्रकार के अतिरिक्त जिन दो भेदों का वर्णन किया है वह इस प्रकार है।

  1. यह प्रायः खेतों में वर्षा के मौसम में उत्पन्न होती है इसका पौधा जमीन पर बिछा हुआ या कुछ उठा हुआ होता है। इस पर पीले रंग के छोटे फूल आते हैं फली लम्बी होती है जिससे लाल रंग के बीज निकलते हैं। इस छोटी लाजवन्ती का कुल चांगेरिर्यादि है और लैटिन नाम बायोफिटम सेसिटिवम Bioplytum Sentivum है।
  2. यह पूर्ण वर्णित लाजवन्ती के समान ही होती है किन्तु कंटक रहित होती है इसे जल लज्जालु कहा जाता है जिसको लैटिन में नेप्यु नेप्टचुनिया ओलिरेसिया (Neptumia Oleraccae कहते हैं।

लाजवंती के औषधीय गुण :

रस – कषाय, तिक्त,
गुण – लघु, रुक्ष,
वीर्य – शीत
विपाक – कटु,

लाजवंती के उपयोगी भाग : Useful Parts of Lajwanti Plant

पंचांग – जड़, छाल, पत्ती, फूल और फल
(विशेषतः मूल)

लाजवंती सेवन की मात्रा :

स्वरस – 10 – 20 मिली.।
चूर्ण – 3 – 4 ग्राम।

लाजवंती के उपयोग : Lajwanti Plant Uses in Hindi

  1. सन्धानीय -चरकसंहिता में सन्धानीय एवं पुरीष-संग्रहणीय दशेमानी के अन्तर्गत इसकी गणना की है। श्री प्रियव्रत जी ने सन्धानीय में एक मात्र इसका वर्णन किया है। ‘संधानक’ शरीरे अन्तसंहतिकरं भावानाम् (इन्दु) के अनुसार शरीर में टूटे हुये या अलग हुये अस्थि, त्वचा, रक्तवाहिनी आदि को जोड़ने वाले द्रव्य को संधानीय या संधानक कहते है। प्रियनिघण्टु में समंगा (लाजवन्ती) का उदाहरण देते हुये संन्धानीय की परिभाषा दी गयी है-
    छिन्नान् भिन्नांश्च संधते संवृणोति मुखानि यत्।
    स्रोतसां, तत्समङ्गैव सन्धानीयं प्रचक्षते।।
  2. क्षत, व्रण, भगन्दर, भग्न, धातुओं के क्षत में इसका बाह्यभ्यन्तर प्रयोग किया जाता है।
  3. यह छोटी रक्तवाहिनियों को संकुचित कर रक्तरोधन का कार्य करती है। इसीलिये श्रेष्ठ संधानीय कहलाती है।
  4. रक्तरोधक होने के साथ ही यह रक्तशोधक और शोथहर भी है। अत: रक्तपित्त, उर:क्षत, रक्तार्श, कुष्ठऔर शोथ (सूजन) आदि में इसे प्रयुक्त किया जाता है।
  5. स्तम्भन होने से अतिसार, प्रवाहिका में विशेषत: रक्तातिसार में लाभदायक है।
  6. प्रमेहघ्न होने से प्रमेह में विशेषतः सिकतामेह में यह उपयोगी है।
  7. विषघ्न होने से इसे सर्पविष में लाभकारी कहा गया है।
  8. स्त्रियों के सभी प्रकार के प्रदर में इसे उपयोग में लाकर लाभ पहुचाया जाता है।
  9. इसके बीज तुलसी के बीजों की तरह वृष्य (वीर्य और बल बढ़ाने वाला , पुरुषत्व बढ़ाने वाला) हैं। अत: शुक्रदौर्बल्य में उपयोगी हैं।

लाजवंती पौधे के फायदे : Lajwanti Plant Benefits in Hindi

लाजवंती रक्तप्रदर में लाभदायक (Lajwanti Plant Benefits for Metrorrhagia)

(क) लाजवन्ती, आंवला, तेन्दुक (गामफल)और अशोक छाल का क्वाथ बनाकर सेवन करने से रक्तप्रदर, श्वेतप्रदर में लाभ मिलता है।
मिथिलांचल में यह जनश्रुति है कि जब रावण की पत्नी मन्दोदरी रक्तप्रदर से पीड़ित हो गई थी तो सुषेण वैद्य ने उसे उक्त क्वाथ से ठीक किया था।

(ख) लाजवन्ती के बीज, बबूल की कच्ची फली, नागौरीअसगंध, मोचरस, कमरकस और सालममिश्री सभी समान मात्रा में लेकर चूर्ण तैयार कर लें, इसमें से 4-5 ग्राम चूर्ण मक्खन या तण्डुलोदक या अशोक छाल के क्वाथ के साथ सेवन करना हितकारी है। यह श्वेतप्रदर और प्रमेह में तालमखाना, इमली के बीज समान मात्रा में लेकर सबको सुखाकर 250 मिग्रा. की गोलियां बनाकर सुखाकर रख लें, इनमें से 2-3 गोली सुबह-शाम गोदुग्ध के साथ सेवन करने से रक्तप्रदर, श्वेतप्रदर, स्वप्नमेह आदि रोगों का शमन होता है।

स्तन शैथिल्य में फायदेमंद छुईमुई का पौधा (Lajwanti Beneficial in Loose Breast Problems in Hindi)

लाजवन्ती की जड़ तथा असगंध समान मात्रा में लेकर इन्हें जल के साथ पीसकर स्तनों पर दिन में दो बार लेप करने से स्त्रियों के स्तनों का ढीलापन दूर होकर वे कठोर होते हैं। इस लेप से स्तनों की अन्य विकृतियां भी दूर होती हैं।

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खूनी बवासीर में फायदेमंद लाजवंती का प्रयोग (Lajwanti for Bleeding Hemorrhoids
in Hindi)

(क) लाजवन्ती पंचांग 10 ग्राम को 250 मिली. दूध और दूध से दुगना पानी मिलाकर पकावें। जब दूध मात्र शेष रह जाय तब छानकर ठण्डा हो जाने पर पान करावें।

(ख) लाजवन्ती की जड़, नीलकमल, मोचरस, लोध्र और लालचन्दन और तिल सभी 2-2 ग्राम लेकर इनका कल्क (चूर्ण, बुकनी) बनाकर इसी प्रकार दुग्ध पाक कर पिलाने से भी लाभ होता है।

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नपुंसकता के उपचार में लाभकारी लाजवंती का पौधा

लाजवन्ती के बीज, वट की जटा, इमली के बीज, सफेद मूसली, ईसबगोल की भूसी, सालममिश्री और सिंघाड़े का आटा प्रत्येक समान मात्रा में लेकर सबके बराबर मिश्री मिलाकर रख लें। प्रातः सायं 5-5 ग्राम चूर्ण गाय के दूध के साथ सेवन करने से नपुंसकता, शीघ्रपतन आदि दूर होते हैं।

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रक्तातिसार को करे ठीक लाजवंती का पौधा (Lajwanti to Treat Haematochezia Problem in Hindi)

(क) 10 ग्राम लाजवन्ती मूल को जल से धोकर फिर सिल पर पीसकर उसमें 50-60 ग्राम मिश्री और 125 मिली जल मिलाकर अच्छी तरह घोलकर रोगी को पिलाने से अतिसार, प्रवाहिका विशेषतया रक्तातिसार दूर होता है। यह योग रक्तपित्त, रक्तप्रदर आदि रक्तस्रावी रोगों में भी लाभप्रद है।

(ख) जड़ का चूर्ण 4 ग्राम लेकर उसे दही के साथ सेवन करने से रक्तातिसार में उत्तम लाभ होता है।

(ग) लाजवन्ती की जड़, सेमल का फूल, लालचन्दन, अर्जुन की छाल और नीलकमल मिश्रित 10 ग्राम लेकर बकरी के दूध में पीसकर पीने से भी आराम मिलता है।

(घ) लाजवन्ती की जड़, धाय के फूल, बेलगिरी, आम की गुठली, मोचरस और कुडे की छाल को चावलों के धोवन (तण्डुलोदक) में पकाकर या पीसकर कल्क (चूर्ण) बना कर सेवन करने से रक्तातिसार एवं पित्तातिसार का शमन होता है।

(ड) लाजवन्ती की जड़, धाय के फूल, बेलगिरी और अनारदाना समान मात्रा में लेकर चूर्ण बनालें। इस चूर्ण में से 4-5 ग्राम चूर्ण तण्डुलोदक (चावल का मांड) या धान्यचतुष्क क्वाथ के साथ सेवन करने से रक्तातिसार के रोगी को बहुत लाभ होता है।

प्रमेह से दिलाये राहत लाजवंती का पौधा (Lajwanti to Get relief from Gonorrhoea in Hindi)

लाजवन्ती के बीज, तालमखाने के बीज, ढाक का गोंद, सालममिश्री और सफेद मूसली सभी समान मात्रा में लेकर चूर्ण तैयार कर लें, इस चूर्ण से आधी मात्रा में मिश्री मिलाकर रख लें, मिश्री कुंजे की होना अधिक उपयोगी है इसमें से 3-3 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम गाय के दूध के साथ सेवन करना सभी प्रमहों में हितकर कहा गया है।

गण्डमाला के इलाज में सहायक है लाजवंती (Lajwanti Benefits for Goiter in Hindi)

(क) लाजवन्ती के पंचांग का स्वरस 15 मिली (एक मात्रा) दिन में दो बार 2-3 महीने तक पिलावें।

(ख) लाजवन्ती पंचांग चूर्ण 6 ग्राम को 8-10 कालीमिर्च को पानी के साथ घोटकर छानकर पीने से गण्डमाला में लाभ होता है। इसे 40 दिनों तक सेवन करें। यह फिरंग में भी लाभप्रद है।

घाव को करे ठीक लाजवंती का पौधा (Lajwanti Beneficial in Injury in Hindi)

चोट लग जाने पर इसके पत्तों की पुल्टिस बनाकर बांधने से घाव जल्दी भर जाता है।

योनिभ्रंश को ठीक करने में लाभप्रद है लाजवंती का पौधा (Lajwanti Beneficial in Elytroptosis Problems in Hindi)

लाजवन्ती पत्र स्वरस या मूल को या मूल को घिसकर लेप करना चाहिये। यथा स्थान लगाकर लेप कर लंगोट बांधना चाहिये।

टूटी हड्डियों को जोड़ने में फायदेमंद छुईमुई का पौधा (Lajwanti Benefits in Broken Bones in Hindi)

लाजवन्ती के पत्र ओर मूल को जल के साथ पीसकर टूटी हड्डियों को खीचकर यथास्थान करके उसके बाहर त्वचा पर अथवा लाजवन्ती और पाढ की छाल को समभाग में पीसकर लगाने से हड्डियों का संधान हो जाता है। साथ में ही आन्तरिक प्रयोग के लिये लाक्षादि गुग्गुल को लाजवन्ती स्वरस के साथ सेवन भी कराते रहना चाहिये।

रक्तपित्त से दिलाये राहत लाजवंती का पौधा (Benefits of Lajwanti for Epistaxis in Hindi)

लाजवन्ती के पत्र और मूल, रीठा भस्म तथा उत्तम कत्था प्रत्येक समभाग लेकर बारीक चूर्ण तैयार कर लें, इस चूर्ण में से 3-4 ग्राम चूर्ण दिन में 2-3 बार सेवन करने से रक्तपित्त एवं अन्य रक्तस्रावी रोगों में उत्तम लाभ की प्राप्ति होती है।

प्लेग में लाभकारी लाजवंती का पौधा (Lajwanti Benefits in Plague in Hindi)

लाजवन्ती के पत्र 60 ग्राम को अर्कवेदमुश्क 150 मिली. अर्क गावजवां 400 मिली. में पीस छानकर रख लें। इसे 2-2 घंटों के अन्तर से जब भी प्यास लगे रोगी को पिलाते रहें यह प्लेह में बहुत गुणकारी है।

भगन्दर से दिलाये राहत लाजवंती का पौधा (Lajwanti for Fistula in Hindi)

लाजवंती के पत्र और मूल का चूर्ण दूध के साथ पिलावें तथा इसका स्वरस बाह्य प्रयोगार्थ भी उपयोग में लावें।

मूत्रावरोध दूर करे लाजवंती का पौधा (Lajwanti to Get relief from Diuresis in Hindi)

मूत्र मार्ग में किसी वजह से आई रुकावट के लिए लाजवंती के पंचांग का क्वाथ बनाकर सेवन कराना चाहिये।

लाजवंती से निर्मित आयुर्वेदिक दवा (योग) एवं विशिष्ट अनुभव :

पहला योग –

संखिया सफेद 12 ग्राम को लेकर लाजवन्ती पत्र 60 ग्राम को कूटकर बनाये कल्क में रख और इस गोले को दो मिट्टी के प्यालों के सम्पुट में रख कपड़ मिट्टी करें। सूख जाने पर एक किलो उपलों की आंच दें। इस प्रकार सात बार करें, प्रत्येक बार कल्क और कपड़मिट्टी नयी हो।

लाभ :

कमजोर और नपुंसक को 30 मिग्रा. दवा को 6 ग्राम मक्खन में रखकर सेवन करावें तथा पथ्य में घी-दूध का अधिक सेवन करावें।

दूसरा योग –

  1. मेरी पुत्रवधू को 6 महीने का गर्भ था जिससे एकाएक खून जारी हो गया। मैंने लाजवन्ती के पत्तो के साथ 5 कालीमिर्च और 12 ग्राम मिश्री मिलाकर पानी में घोलकर थोड़ी-थोड़ी देर में पिलाया, इससे उसे लाभ हो गया।
  2. श्रीकृष्ण ठाकुर की मां को पित्तवृद्धि के कारण सिर घूमना, पेशाब में जलन, देह में दर्द, हाथ पैरों में ज्वाला आदि लक्षण थे। वह इस योग को केवल एक सप्ताह तक पीने से ठीक हो गयी।
  3. मेरी चाची 80 वर्ष की है उसे भी सिर में चक्कर, कान में सनसनाहट, पेडू पर भारीपन, देह घूमना आदि लक्षण थे। उसे भी पीने के लिये यही योग दिया गया। जिससे एक सप्ताह में उसे पूरा लाभ हुआ।
  4. मेरी पत्नी को हाथ-पैर, मुंह, तथा अपत्यपथ (योनि) में जलन थी। जिन्हें एक सप्ताह तक गोलमिर्च, मिश्री के साथ लाजवन्ती घोटकर पिलाने से लाभ हो गया।
  5. मेरा मानना है कि ज्वर में पिपासा, दाह आदि को शान्त करने को जो षडंग पानीय दिया जाता है, उसके स्थान पर लाजवन्ती का पानक बनाकर दिया जाय, तो अधिक लाभ होगा।

लाजवंती के नुकसान : Side Effects of Lajwanti Plant in Hindi

  • लाजवंती के औषधीय प्रयोग या उपयोग से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श करें ।
  • अधिक मात्रा में इसके सेवन से वृक्क और प्लीहा को नुकसान पहुंच सकता है ।
  • लाजवंती के दुष्प्रभाव को दूर करने के लिए कालीमिर्च व मधु का सेवन करें ।

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