Gyani Ki Gat Gyani Jane
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यह पुस्तक ज्ञानी की गत ज्ञानी जाने शीर्षक से प्रकाशित हुई है। पैमाना लगभग 14 पृष्ठ का है और आवरण पर परशुराम, व्यासदेव तथा अन्य संत-महात्माओं के चित्र बने हैं।
शीर्षक के नीचे प्रथम पृष्ठ पर श्री सूखमनी साहिब में ज्ञानी की महिमा का वर्णन करते हुए चार पंक्तियाँ दी गई हैं — ब्रह्म जिज्ञासा का कथित न जाए अधाख्यम्, ब्रह्म जिज्ञासा सख का लहुए, ब्रह्म जिज्ञासा के मिले कछु खानै और ब्रह्म जिज्ञानी की गति ब्रह्म जिज्ञानी जानै।
अगले पृष्ठ पर श्री योग वाशिष्ठ महारामायण से उद्धरण दिया गया है, जिसमें ज्ञानवान आत्मपद को पाकर आनन्दित होता है और ज्ञानी अनेक प्रकार के व्यवहारों के बावजूद सदा अपने स्वरूप में स्थित रहता है। यह भी बताया गया है कि शुकदेव, श्रीकृष्ण, जनक और श्रीराम जैसे भिन्न-भिन्न व्यवहार वालों का अनुभव समान है, और ज्ञानी की पहचान का सूत्र भी दिया गया है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
कैसे पढ़ें — फ़ाइल पूरी PDF में है, जिसे मोबाइल, कंप्यूटर या किसी भी PDF ऐप में बिना इंटरनेट के पढ़ा जा सकता है। नीचे दिए बटन से इसे तुरंत और मुफ़्त डाउनलोड करें — कोई साइन-अप, सदस्यता या शुल्क नहीं।
- ज्ञानी की अवस्था तथा आत्म-ज्ञान
- साधना तथा अनुभव
- गूढ़ तत्व
- प्रेरक उपदेश
पुस्तक की मुख्य बातें
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