Shri Guru Gita
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यह पुस्तक श्री गुरुगीता नाम से प्रकाशित हुई है और उपशीर्षक में अनुवाद बताया गया है। आरंभ में अनुक्रमणिका है, जिसमें पहला अध्याय पृष्ठ 2 पर, दूसरा अध्याय पृष्ठ 13 पर और तीसरा अध्याय पृष्ठ 31 पर शुरू होता है। पहले अध्याय का आरंभ ॥ अथ प्रथमोऽध्यायम् ॥ मन्त्र से होता है, जिसके बाद ॐ अखिलव्यक्तजीकृत्वेन निर्णीयं गुणानाम्, समस्त जगतामार्येण ब्रह्मो नामः ॥ मन्त्र और ब्रह्म ऊर्जय का सूरत सूत्र महामन्त्र दिया गया है। पृष्ठ पर ॐ श्रीमते वसिष्ठाय नमः भी अंकित है।
पहले अध्याय में अवधानम् नामक निषेध पंक्ति आती है, जिसमें कहा गया है कि वहाँ पुनः सद्-देह, अधिकांशतः सात दिवसायां पंचत्वम् न अभिव्यक्तम्। आगे ब्रह्म-सूत्र के श्लोक और उनकी दीपव्याख्या दी गई है, जिसमें सूरत सूत्र और सहस्रान्तक आदि का उल्लेख है। तीसरे अध्याय का समापन इस पंक्ति पर होता है — ॥ इति श्री स्कन्दोत्तरखण्डे उभाङ्गवेदव्यासोवादे श्री गुरुगीतायां तृतीयोऽध्यायः ॥ — अर्थात यह अध्याय बृहदारण्यक के उपनिषद्-वाद पर आधारित है।
आवरण-पृष्ठ पर स्कन्दपुराण के अन्तर्गत शिवपभवती-संवाद का चित्र दिया गया है। स्कैन में पहले तीनों अध्यायों के 214 श्लोक तक का भाग मौजूद है और पैमाना लगभग 45 पृष्ठ का है। वेदान्त और उपनिषद्-ज्योतिष में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह पुस्तक संदर्भ-ग्रन्थ की तरह उपयोगी है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
कैसे पढ़ें — फ़ाइल पूरी PDF में है, जिसे मोबाइल, कंप्यूटर या किसी भी PDF ऐप में बिना इंटरनेट के पढ़ा जा सकता है। नीचे दिए बटन से इसे तुरंत और मुफ़्त डाउनलोड करें — कोई साइन-अप, सदस्यता या शुल्क नहीं।
- गुरु गीता का मूल पाठ
- गुरु-महिमा तथा शिष्य-कर्तव्य
- सरल अर्थ तथा भावार्थ
- पाठ करने की विधि
पुस्तक की मुख्य बातें
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