रास्ना के फायदे: जोड़ों के दर्द, अकड़न और वात रोग में उपयोग

Last Updated on नवम्बर 4, 2026 by admin
आचार्य चरक के सामने वात को शांत करने वाली सैकड़ों वनस्पतियाँ थीं: बला, एरण्ड, अश्वगंधा, देवदारु, निर्गुण्डी। फिर भी जब उन्होंने हर कर्म के लिए सबसे श्रेष्ठ द्रव्य गिनाए, तो वातहर द्रव्यों में पहला नाम एक कम चर्चित जड़ी का लिखा: रास्ना। अब ज़रा सर्दियों की किसी सुबह को याद कीजिए, जब बिस्तर से उठते ही घुटने जंग लगे कब्ज़े की तरह चरमराते हैं और पहले दस कदम किसी परीक्षा जैसे लगते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि उस जकड़न का उत्तर आयुर्वेद ने हज़ारों साल पहले एक जड़ी में ढूँढ लिया था?
अच्छी खबर यह है कि रास्ना के फायदे केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं हैं; आज भी वैद्यों के सबसे भरोसेमंद वातहर योगों में यह मुख्य घटक है। रास्ना के फायदे मुख्य रूप से वात और कफ के रोगों में दिखते हैं। तिक्त-कटु रस और उष्ण वीर्य वाली यह जड़ी-बूटी आम (अधपचा विष) को पचाती है, जोड़ों के दर्द, सूजन और अकड़न को घटाती है, और आमवात, घुटनों के दर्द, कमर दर्द व सायटिका में शास्त्रीय योगों के रूप में दी जाती है। आगे देखेंगे कि रास्ना असल में कौन-सा पौधा है और इसे लेने का सही तरीका क्या है।
रास्ना क्या है और पंसारी वाली रास्ना असली है या नहीं?
एक बात अक्सर लोग नहीं जानते: अगर आप उत्तर प्रदेश, केरल और बंगाल के तीन पंसारियों से “रास्ना” माँगें, तो बहुत संभव है कि आपको तीन अलग-अलग पौधे मिलें। रास्ना आयुर्वेद के उन द्रव्यों में है जिनकी पहचान को लेकर क्षेत्रीय परंपराएँ अलग-अलग रही हैं।
रास्ना के नाम और वानस्पतिक पहचान
उत्तर भारत में और Ayurvedic Pharmacopoeia of India में जिस पौधे को रास्ना माना गया है, उसका वानस्पतिक नाम Pluchea lanceolata है, जो Asteraceae कुल का पौधा है। हिंदी में इसे रास्ना या रायसन, संस्कृत में रास्ना, युक्तरसा, एलापर्णी और सुवहा जैसे नामों से जाना जाता है। अंग्रेज़ी और औषधि-उद्योग में भी इसे Rasna ही कहा जाता है। यह राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पंजाब और गुजरात के सूखे, क्षारीय और रेतीले खेतों में अपने आप उगने वाला झाड़ीनुमा पौधा है, जिसकी पत्तियाँ भाले जैसी लंबी और हल्की धूसर होती हैं।
एक नाम, कई पौधे
केरल की परंपरा में रास्ना के रूप में Alpinia galanga (कुलंजन या बड़ी पान की जड़) का प्रकंद प्रयोग होता है, जो अदरक के कुल का है। बंगाल और पूर्वी उत्तर प्रदेश में Vanda roxburghii नाम का एक आर्किड रास्ना के रूप में लिया जाता रहा है, और मध्य प्रदेश में Blepharispermum subsessile। ये तीनों अलग-अलग कुलों के पौधे हैं।
इसे मिलावट मत समझिए। हर क्षेत्र के आचार्यों ने वह वनस्पति चुनी जो उनके यहाँ सुलभ थी और रास्ना के गुण-कर्म से मेल खाती थी। प्रतिनिधि द्रव्य में ज्ञान है, मिलावट में लालच। व्यावहारिक बात इतनी है कि रास्ना वाला योग खरीदते समय किसी प्रतिष्ठित निर्माता का उत्पाद लें, और कच्ची जड़ी-बूटी लेनी हो तो किसी जानकार वैद्य या विश्वसनीय पंसारी से ही लें।
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रास्ना के औषधीय गुण: इसे “वातहरों में श्रेष्ठ” क्यों कहा गया?
किसी जड़ी को समझने के लिए आयुर्वेद उसकी “कुंडली” देखता है: रस, गुण, वीर्य, विपाक और प्रभाव। रास्ना की कुंडली पढ़ते ही समझ आता है कि यह जोड़ों तक इतनी गहराई से क्यों पहुँचती है।
शास्त्र क्या कहते हैं
चरक संहिता के सूत्रस्थान (अध्याय 25) में अग्र्य द्रव्यों की सूची है, यानी हर कर्म के लिए सबसे उत्तम द्रव्य। वहाँ लिखा है:
रास्ना वातहराणाम्।
अर्थ: वात को हरने वाले द्रव्यों में रास्ना श्रेष्ठ है।
भावप्रकाश निघंटु इसके गुणों को और खोलकर कहता है:
रास्नाऽऽमपाचनी तिक्ता गुरूष्णा कफवातजित्।
शोथश्वाससमीरास्रवातशूलोदरापहा॥
अर्थ: रास्ना आम को पचाने वाली, तिक्त रस वाली, गुरु और उष्ण है, तथा कफ और वात को जीतती है। यह सूजन, श्वास, वातरक्त, वातशूल और उदर रोगों को दूर करती है।
रस-गुण-वीर्य-विपाक की तालिका
| गुण | रास्ना में | शरीर पर असर |
|---|---|---|
| रस | तिक्त (कड़वा), कटु (तीखा) | आम और कफ को सुखाता है, स्रोतस् खोलता है |
| गुण | गुरु | जोड़ों में स्थिरता और गहराई तक पहुँच |
| वीर्य | उष्ण | ठंडक और जकड़न वाले वात को शांत करता है |
| विपाक | कटु | पाचन के बाद भी कफ और आम को बढ़ने नहीं देता |
| दोष-कर्म | कफ-वात शामक | वात की पीड़ा और कफ की सूजन, दोनों पर काम |
| प्रमुख कर्म | आमपाचन, शोथहर, वेदनास्थापन | सूजन घटाना, दर्द शांत करना |
यहाँ एक सूक्ष्म बात समझने लायक है। अधिकतर वातहर द्रव्य स्निग्ध होते हैं, जैसे बला या अश्वगंधा। वे शुद्ध वात में तो बहुत अच्छे हैं, पर जहाँ वात के साथ आम और कफ भी चिपके हों, वहाँ उनकी चिकनाई उल्टा बोझ बन सकती है। रास्ना की विशेषता यही है कि वह उष्ण होकर वात को शांत करती है और तिक्त होकर आम को भी पचाती है। इसीलिए यह उस अवस्था की दवा बन जाती है जिसे आयुर्वेद “साम वात” कहता है।
आधुनिक शोध भी इसी दिशा की पुष्टि करता है: 1991 में Fitoterapia पत्रिका में Pluchea lanceolata के रासायनिक घटकों और उसकी सूजन-रोधी क्रिया पर अध्ययन प्रकाशित हुआ था। जिस गुण को आचार्य “शोथहर” कहते थे, उसे अब प्रयोगशाला में मापा जा रहा है।
वात रोग के लक्षण और उपचार में रास्ना की भूमिका
सुबह उठते ही कमर अकड़ी लगे या उंगलियों के जोड़ चटकें, तो ज़्यादातर लोग इसे “उम्र का असर” कहकर टाल देते हैं। आयुर्वेद इसे वात के बढ़ने का संकेत मानता है, और वात रोग के लक्षण समय पर पहचान लिए जाएँ तो उपचार आसान हो जाता है।
वात बढ़ने के आम लक्षण
- जोड़ों में दर्द: जो चलने-फिरने से बदलता है और कभी एक जोड़ में, कभी दूसरे में होता है।
- जकड़न: विशेषकर सुबह या लंबी देर बैठने के बाद।
- चटकने की आवाज़: जोड़ों का सूखापन, जिसे शास्त्र में संधियों का रूक्ष होना कहा गया है।
- सुन्नपन और झनझनाहट: नसों के मार्ग में वात के रुकने का संकेत।
वात बढ़ता क्यों है
रूखा, ठंडा और बासी भोजन, देर रात जागना, अनियमित भोजन, अधिक उपवास, चिंता और बढ़ती उम्र वात को बढ़ाते हैं। आयुर्वेद के अनुसार वात रूक्ष, शीत, लघु और चल गुणों वाला है, इसलिए जो भी चीज़ इन गुणों को बढ़ाए, वह वात को भी बढ़ाती है।
उपचार का सिद्धांत और रास्ना का स्थान
वात का उपचार उसके विपरीत गुणों से होता है: उष्णता, स्निग्धता और नियमितता। रास्ना उष्ण वीर्य से ठंडक काटती है और आम या कफ से रुके स्रोतस् खोलती है। इसीलिए वैद्य सर्वांग वात, पक्षाघात के बाद की कमज़ोरी, गर्दन-कंधे की जकड़न और गृध्रसी (सायटिका) जैसे वात रोगों में रास्ना वाले योग देते हैं।
जोड़ों के दर्द का आयुर्वेदिक उपचार: रास्ना के फायदे कहाँ-कहाँ?
हर जोड़ का दर्द एक जैसा नहीं होता, और यही बात जोड़ों के दर्द का आयुर्वेदिक उपचार समझने की पहली कुंजी है। सूखे, चटकते घुटने और सूजे, गरम, भारी लगने वाले घुटने में अंतर है, और रास्ना दोनों में अलग ढंग से काम आती है।
घुटनों के दर्द में रास्ना
उम्र के साथ घुटनों में होने वाला दर्द, जिसे आयुर्वेद संधिगत वात कहता है, धातुओं के क्षय और संधियों के सूखने से होता है। इस अवस्था में वैद्य रास्ना को अश्वगंधा, बला और गुग्गुलु जैसे पोषक व वातहर द्रव्यों के साथ योग में देते हैं। बाहर से महानारायण तैल या क्षीरबला तैल जैसे शास्त्रीय तेलों से अभ्यंग और उसके बाद हल्का सेक इस अवस्था में बहुत सहायक होता है।
आमवात में रास्ना का उपयोग
आमवात वह अवस्था है जिसमें कमज़ोर अग्नि से बना आम वात के साथ जोड़ों में जाकर जम जाता है। जोड़ों में सूजन, भारीपन, बुखार जैसा लगना, भूख न लगना और सुबह देर तक रहने वाली जकड़न इसके मुख्य लक्षण हैं। यहीं रास्ना अपना असली रूप दिखाती है, क्योंकि आमपाचन इसका प्रमुख कर्म है।
चक्रदत्त में आमवात के उपचार का सूत्र दिया गया है:
लङ्घनं स्वेदनं तिक्तं दीपनानि कटूनि च।
विरेचनं स्नेहपानं बस्तयश्चाममारुते॥
अर्थ: आमवात में लंघन (हल्का भोजन या उपवास), स्वेदन, तिक्त और कटु दीपन द्रव्य, विरेचन, स्नेहपान और बस्ति का प्रयोग करना चाहिए।
ध्यान दीजिए, सूत्र में “तिक्त” और “कटु दीपन” दोनों माँगे गए हैं, और रास्ना में ये दोनों रस एक साथ हैं। इसी कारण चक्रदत्त जैसे ग्रंथों में आमवात के लिए रास्ना सप्तक क्वाथ और रास्ना पंचक क्वाथ जैसे योग मिलते हैं।
एक बात अक्सर लोग नहीं जानते: आमवात में सूजे और गरम जोड़ पर शुरुआत में ही तेल मलना उल्टा पड़ सकता है, क्योंकि चिकनाई आम को और बढ़ाती है। इस अवस्था में पहले रूक्ष स्वेद (जैसे गरम बालू की पोटली से सेक) और आमपाचन किया जाता है, तेल का प्रयोग आम पचने के बाद वैद्य की सलाह से होता है।
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कमर दर्द और सायटिका
कमर से पैर तक उतरने वाले दर्द (गृध्रसी) में रास्ना वाले क्वाथ के साथ एरण्ड तैल देने की परंपरा पुरानी है; एरण्ड वात का अनुलोमन करता है और रास्ना दर्द व जकड़न को शांत करती है।
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सर्दियों में जोड़ों की अकड़न क्यों बढ़ती है और रास्ना कैसे साथ देती है?
क्या आपने देखा है कि जो घुटना गर्मियों में चुपचाप साथ देता है, वही दिसंबर में हर सीढ़ी पर शिकायत करने लगता है? सर्दियों में जोड़ों की अकड़न का कारण आयुर्वेद बहुत सीधे ढंग से समझाता है।
ऋतु और दोष का खेल
हेमंत और शिशिर ऋतु में हवा शीत और रूक्ष होती है। शीत गुण वात को बढ़ाता है और संधियों के स्नेह को जमा-सा देता है, इसलिए सुबह की जकड़न बढ़ जाती है। शिशिर के अंत और वसंत की ओर बढ़ते हुए जमा हुआ कफ पिघलने लगता है, तो जिन लोगों में आम और कफ पहले से है, उनके जोड़ों में भारीपन और सूजन भी बढ़ सकती है।
रास्ना इन दोनों स्थितियों के लिए बनी हुई-सी लगती है: उष्ण वीर्य वात की ठंडक को काटता है और तिक्त-कटु रस कफ व आम को सुखाता है।
सर्दियों के लिए छोटी दिनचर्या
- सुबह का गुनगुना जल: खाली पेट गुनगुना पानी, जिसमें चाहें तो चुटकी भर सोंठ डाली जा सकती है।
- अभ्यंग: जिनमें आम और सूजन नहीं है, वे स्नान से पहले तिल तैल या किसी शास्त्रीय वातहर तैल से हल्की मालिश करें।
- धूप: सुबह की हल्की धूप में बैठना वात और कफ, दोनों के लिए हितकर है।
- हल्की गतिविधि: सूक्ष्म व्यायाम, यानी जोड़ों को धीरे-धीरे घुमाने वाले आसन, जकड़न तोड़ने का सबसे सरल उपाय हैं। तेज़ दर्द और सूजन में ज़ोर न लगाएँ।
रास्ना के उपयोग और रास्ना का सेवन कैसे करें?
बहुत-से लोग रास्ना का चूर्ण घर ले आते हैं और फिर पूछते हैं कि इसे लें कैसे। सच यह है कि रास्ना के उपयोग का सबसे प्रचलित और परखा हुआ तरीका योग के रूप में है, अकेले चूर्ण के रूप में कम।
क्वाथ (काढ़ा)
रास्ना का सबसे पुराना और प्रभावी रूप क्वाथ है। रास्ना सप्तक, रास्ना पंचक और महारास्नादि क्वाथ जैसे योगों में रास्ना की जड़ या पत्ती को दूसरी जड़ी-बूटियों के साथ उबालकर दिया जाता है। आमवात में क्वाथ के साथ सोंठ का चूर्ण प्रक्षेप के रूप में मिलाने का विधान है, और गृध्रसी में एरण्ड तैल के साथ।
चूर्ण
रास्ना चूर्ण के फायदे वहाँ अधिक मिलते हैं जहाँ इसे गुनगुने जल या वैद्य के बताए अनुपान के साथ लिया जाए। आम की अवस्था में गुनगुना जल, शुद्ध वात में घी या दूध जैसे अनुपान बताए जाते हैं, पर यह प्रकृति और अवस्था देखकर ही तय होता है।
गुग्गुलु और वटी
रास्नादि गुग्गुलु और महारास्नादि गुग्गुलु जैसे योगों में रास्ना को गुग्गुलु के साथ मिलाया जाता है। गुग्गुलु स्वयं वात और आम का शोधक है, इसलिए यह जोड़ी पुराने दर्द में विशेष उपयोगी मानी जाती है।
बाहरी प्रयोग
केरल की परंपरा में रास्नादि चूर्ण को स्नान के बाद गीले सिर पर हल्का मला जाता है, ताकि सिर में ठंडक न बैठे और बार-बार जुकाम न हो।
मात्रा
रास्ना की मात्रा व्यक्ति की प्रकृति, अग्नि, रोग की अवस्था और योग के प्रकार पर निर्भर करती है। इसलिए वैद्य के मार्गदर्शन में ही मात्रा तय करें।
रास्ना लेते समय पथ्य और अपथ्य
| पथ्य (क्या लें) | क्यों | अपथ्य (क्या न लें) | क्यों |
|---|---|---|---|
| गुनगुना जल | आम को पचाता है, वात को शांत करता है | ठंडा पानी और फ्रिज का भोजन | शीत गुण वात और कफ बढ़ाता है |
| मूँग की दाल, पुराना चावल, गेहूँ | हल्के और सुपाच्य, अग्नि पर बोझ नहीं | उड़द, राजमा, छोले जैसे भारी अन्न | देर से पचते हैं, आम बनाते हैं |
| सोंठ, अजवाइन, मेथी | कटु-उष्ण, दीपन और आमपाचन | रात में दही | अभिष्यंदी है, स्रोतस् रोकता है |
| परवल, लौकी, सहजन की फली | हल्की सब्ज़ियाँ, वात-कफ में हितकर | बासी और तला भोजन | अग्नि को मंद करता है |
| शुद्ध वात में गाय का घी | स्निग्धता देता है, संधियों का पोषण | दूध के साथ खट्टे फल या नमक | विरुद्ध आहार, आम का कारण |
आहार का एक नियम ध्यान रखें: भूख लगने पर ही खाएँ, पिछला भोजन पचने से पहले दोबारा न खाएँ, और रात का भोजन हल्का व जल्दी लें। दिन में सोना और रात में देर तक जागना, दोनों जोड़ों के रोगी के लिए हानिकारक हैं।
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रास्ना किसे नहीं लेनी चाहिए? सावधानियाँ
जो जड़ी उष्ण और तीखी है, वह सबके लिए एक जैसी नहीं हो सकती। रास्ना के फायदे पूरे तभी मिलते हैं, जब यह सही व्यक्ति को सही अवस्था में दी जाए।
- पित्त प्रकृति वाले: उष्ण वीर्य होने से अधिक मात्रा या लंबे समय तक लेने पर जलन, मुँह में छाले या शरीर में गर्मी बढ़ सकती है।
- अम्लपित्त के रोगी: पेट और छाती में जलन, खट्टी डकार वालों को वैद्य की सलाह के बिना रास्ना वाले योग नहीं लेने चाहिए।
- गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाएँ: इस अवस्था में किसी भी जड़ी-बूटी का सेवन केवल वैद्य के निर्देश पर करें।
- बच्चे और बहुत वृद्ध: मात्रा का निर्णय वैद्य ही करें; बच्चों को स्वयं न दें।
- मधुमेह, रक्तचाप या रक्त पतला करने वाली दवा लेने वाले: रास्ना वाले योग शुरू करने से पहले अपने चिकित्सक को बताएँ। चल रही दवा स्वयं बंद न करें।
- सर्जरी से पहले: कोई भी हर्बल योग लेते हों तो सर्जरी से पहले डॉक्टर को अवश्य बताएँ।
यदि जोड़ अचानक बहुत लाल, गरम और सूज जाए, साथ में तेज़ बुखार हो, या चोट के बाद जोड़ हिलाना कठिन हो जाए, तो तुरंत डॉक्टर से मिलें। ऐसी स्थिति में केवल घरेलू नुस्खे पर निर्भर न रहें।
रास्ना से बनी कौन सी आयुर्वेदिक औषधियाँ बाज़ार में मिलती हैं?
दवा की दुकान पर “रास्ना” वाली दवा माँगें, तो कई नाम सामने आते हैं। नीचे वे प्रमुख शास्त्रीय योग हैं जिनमें रास्ना मुख्य द्रव्य है और जो Dabur, Baidyanath, Kottakkal जैसे निर्माताओं के उत्पाद के रूप में बाज़ार में मिलते हैं।
| औषधि | रूप | उसमें रास्ना की भूमिका | किसमें सहायक |
|---|---|---|---|
| रास्ना सप्तक क्वाथ | क्वाथ | प्रधान द्रव्य; गुडूची, आरग्वध, देवदारु, गोक्षुर, एरण्ड, पुनर्नवा के साथ आमपाचन और वेदनाहर | आमवात, जाँघ, कमर और पीठ का दर्द |
| रास्ना पंचक क्वाथ | क्वाथ | रास्ना, गुडूची, एरण्ड, देवदारु और सोंठ के साथ आम और वात दोनों पर | आमवात की आरंभिक अवस्था, जोड़ों की सूजन |
| महारास्नादि क्वाथ | क्वाथ / कषाय | लगभग 25 द्रव्यों में रास्ना प्रधान, बला, एरण्ड, देवदारु, अश्वगंधा आदि के साथ | सर्वांग वात, पक्षाघात के बाद की कमज़ोरी, सायटिका |
| रास्नादि गुग्गुलु | वटी (गुग्गुलु) | रास्ना, गुडूची, एरण्डमूल, देवदारु, सोंठ के साथ गुग्गुलु में | पुराने जोड़ों का दर्द, कमर दर्द, वात रोग |
| महारास्नादि गुग्गुलु | वटी (गुग्गुलु) | महारास्नादि योग के द्रव्य गुग्गुलु के साथ | गठिया, जोड़ों की जकड़न, पुराना वात |
| रास्नादि चूर्ण | बाह्य प्रयोग का चूर्ण | रास्ना और सुगंधित द्रव्यों के साथ सिर पर लगाने हेतु | बार-बार जुकाम, सिर में ठंडक बैठना |
ये औषधियाँ प्रकृति, रोग की अवस्था और वैद्य की सलाह के अनुसार ही ली जाएँ, स्वयं चुनकर नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Q1. क्या रास्ना रोज़ ली जा सकती है?
A: रास्ना उष्ण वीर्य वाली जड़ी है, इसलिए इसे बिना ज़रूरत रोज़ लेने की आदत ठीक नहीं। वात या आम के रोग में वैद्य जितने समय के लिए बताएँ, उतना ही लें।
Q2. Rasna ke fayde किन रोगों में सबसे अधिक मिलते हैं?
A: रास्ना सबसे अधिक वात-कफ प्रधान रोगों में काम आती है, जैसे आमवात, घुटनों और कमर का दर्द, सायटिका, गर्दन की जकड़न और सूजन। श्वास और कफज कास में भी शास्त्र इसे हितकर बताते हैं।
Q3. रास्ना और रास्नादि गुग्गुलु में क्या अंतर है?
A: रास्ना एक अकेली जड़ी-बूटी है, जबकि रास्नादि गुग्गुलु एक शास्त्रीय योग है जिसमें रास्ना के साथ गुडूची, एरण्डमूल, देवदारु, सोंठ और गुग्गुलु मिलाए जाते हैं। योग में द्रव्य एक-दूसरे के गुण बढ़ाते हैं, इसलिए पुराने जोड़ों के दर्द में वैद्य प्रायः योग ही देते हैं।
Q4. क्या रास्ना से कोई नुकसान भी है?
A: सही मात्रा और सही अवस्था में रास्ना सामान्यतः सुरक्षित मानी जाती है। अधिक मात्रा में या पित्त प्रकृति वालों में यह पेट में जलन, गर्मी और मुँह के छाले पैदा कर सकती है। गर्भावस्था में और दूसरी दवाओं के साथ इसे वैद्य की सलाह से ही लें।
Q5. सर्दियों में जोड़ों की अकड़न के लिए रास्ना कैसे लें?
A: सर्दियों की अकड़न में रास्ना प्रायः रास्नादि गुग्गुलु या रास्ना वाले क्वाथ के रूप में, गुनगुने जल के साथ दी जाती है। साथ में धूप और हल्का व्यायाम रखें। सूजन और भारीपन हो तो तेल मालिश से पहले वैद्य से पूछ लें।
रास्ना की कहानी हमें एक बड़ी बात सिखाती है: आयुर्वेद दर्द को दबाता नहीं, उसकी जड़ में बैठे वात, कफ और आम को देखता है। अब जब अगली बार सर्दियों की सुबह घुटने अकड़ें, तो उसे केवल उम्र का असर मानकर मत छोड़िए। आज ही अपने भोजन से ठंडी और भारी चीज़ें कम कीजिए, सुबह गुनगुना जल शुरू कीजिए, और किसी योग्य वैद्य से अपनी प्रकृति के अनुसार रास्ना वाले योग के बारे में परामर्श लीजिए।





