परिभाषेन्दुशेखर (सुबोधिनी हिन्दी व्याख्या) – Paribhashendu Shekhar
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यह ग्रन्थ चौखम्बा सुरभारती ग्रन्थमाला का ८०वाँ ग्रन्थ है, जिसका नाम श्रीमन्नागेशभट्टविरचितः परिभाषेन्दुशेखरः है और साथ में 'सुबोधिनी' हिन्दीव्याख्योपेत लिखा है। व्याख्याकार श्री विश्वनाथ मिश्र, प्राचार्य, राजकीय संस्कृत महाविद्यालय, बीकानेर हैं और भूमिका श्री दयामाचरण त्रिपाठी ने लिखी। प्रकाशक चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी है। द्वितीय संस्करण १९९० का है, मूल्य ८० रुपये; मुद्रक श्रीजी मुद्रणालय, वाराणसी।
विषयानुक्रमणिका के अनुसार परिभाषाएँ तीन प्रकरणों में बाँटी गई हैं — शास्त्रत्वसम्पादकोद्देश नाम प्रथम प्रकरणम् में मंगलाचरण तथा परिभाषा १ से ३७ तक, बाधबीजं नाम द्वितीयम् प्रकरणम् में ३८ से ७१ तक और शास्त्रशेषं नाम तृतीयम् प्रकरणम् में ७२ से १३३ तक। हर परिभाषा का संस्कृत पाठ छपा है और उसके नीचे सुबोधिनी व्याख्या में शब्द-अर्थ, उदाहरण तथा पूर्वाचार्यों के मत खोले गए हैं। पीछे शब्दिपत्र भी है।
पुरोवाक् में व्याख्याकार ने लिखा है कि मूल पाठ उसी परिभाषेन्दुशेखर से लिया गया है जो टीका के साथ छपा है, और व्याख्या करते समय भूति तथा विजया टीकाएँ उनके सामने रहीं। यह पुस्तक संस्कृत व्याकरण के विद्यार्थियों और परिभाषा-साहित्य के अध्येताओं के लिए है। पुस्तक बड़ी है, इसलिए इसे प्रकरण के हिसाब से पढ़ें; उदाहरणों के लिए अष्टाध्यायी और महाभाष्य देखने पड़ते हैं।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- इस विषय की उपयोगी तथा ज्ञानवर्धक सामग्री
- सरल हिंदी भाषा में लिखा गया पाठ
- साधक तथा सामान्य पाठक — दोनों के लिए उपयोगी
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