धातुरूपकौमुदी – Dhatu Rupa Kaumudi
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यह पुस्तक धातुरूपकौमुदी है और इसे विक्रम विश्वविद्यालय के प्राध्यापक राजेश्वर शास्त्री मुसलगाँवकर ने सम्पादित किया है। पुस्तक चौखम्भा संस्कृत संस्थान, वाराणसी से छपी है, उसका यह पुनर्मुद्रण वि.सं. 2066 (2009) का है और मूल्य रु. 695.00 अंकित है; मुद्रण चारू प्रिन्टर्स, वाराणसी में हुआ।
अनुक्रमणिका के अनुसार पुस्तक में दसों गणों के धातु क्रम से आए हैं — भ्वादि, अदादि, जुहोत्यादि, दिवादि, स्वादि, तुदादि, रुधादि, तनादि, क्र्यादि और चुरादि; हर धातु के आगे उसका अर्थ, विकरण, सकर्मक या अकर्मक होना, सेट् या अनिट् होना और परस्मैपदी-आत्मनेपदी होना लिखा है। इसके बाद उस धातु के रूप लट्, लिट्, लुट्, लृट्, लोट्, लङ्, विधिलिङ्, लुङ् और लृङ् में तीनों पुरुष तथा तीनों वचनों में सारणी के रूप में दिए गए हैं। अन्त में ण्यन्त, सन्नन्त, यङन्त, यङ्लुगन्त और नामधातु प्रक्रियाएँ भी जोड़ी गई हैं।
पुस्तक संस्कृत व्याकरण के विद्यार्थियों के लिए रूप-सिद्धि का अभ्यास-ग्रन्थ है, क्योंकि एक ही धातु के सभी लकारों के रूप एक जगह मिलते हैं और हर रूप के साथ उसका हिन्दी अर्थ भी दिया गया है। व्याख्या हिन्दी में है और रूप संस्कृत में हैं, इसलिए जिन्हें देवनागरी पढ़नी आती है, वे इसे सीधे वर्ग या स्वाध्याय में काम ले सकते हैं।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
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- इस विषय की उपयोगी तथा ज्ञानवर्धक सामग्री
- सरल हिंदी भाषा में लिखा गया पाठ
- साधक तथा सामान्य पाठक — दोनों के लिए उपयोगी
- मोबाइल व कंप्यूटर पर पढ़ने योग्य PDF
पुस्तक की मुख्य बातें
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