Hiranpadi in Hindi | हिरनपदी के फायदे ,गुण ,उपयोग और दुष्प्रभाव

हिरनपदी क्या है ? : What is Convolvulus Arvensis Linn in Hindi

हिरनपदी एक बहुत ही गुणकारी औषधि पौधा है । हिरन के पैर (खुर) जैसे इस वनौषधि के पत्र होते है। अत: यह हिरनपदी के नाम से जानी जाती है। यह वनौषधि प्रायः सर्वत्र पाई जाती है। खेतों में यह नैसर्गिक रूप से उग जाती है। यह हिमालय पर भी दस हजार फुट की ऊंचाई पर मिल जाती हैं।
कुल-त्रिवृतादि कुल (Convolvulaceae)

हिरनपदी का पौधा कैसा होता है ? :

हिरनपदी की लता का मूल एवं शाखायें सूतली (रस्सी) जैसी पतली होती है। मूल कुछ मोटा भी होती है। काण्ड (बेल) सामान्यतया एक से दस फुट लम्बा, जमीन पर फैलने वाला, उलझा हुआ या लिपट कर किसी आश्रय पर चढ़ने वाला होता है। यह काण्ड चिकना या रोयेदार होता है। शाखाओं पर बहुधा खड़ी धारियां होती हैं।

हिरनपदी के पत्ते – इसके पत्ते एकान्तर, अखण्ड, एक इंच से तीन इंच लम्बे, चौड़ाई में विभिन्न प्रकार के या लम्ब गोल होते हैं। इनका आकार प्रायः हिरण के पैर जैसा होता है। पत्र वृन्त छोटा होता है।

हिरनपदी के फूल – पुष्पदण्ड एक से दो इंच लम्बा होता है। पुष्पान्तर कोष लगभग पौन इंच लम्बा, गुलाबी या सफेद या बैंगनी रंग का होता है। पुंकेसर 5 और स्त्रीकेसर एक होता है।

हिरनपदी के बीज – बीज गहरा, रक्ताभ, पिंगल, चिकना या रोयेदार,लगभग तीन कोण युक्त होता है। इस पर पुष्प जुलाई से नवम्बर तक आते हैं। यह बेल कार्तिक से जेष्ट माह तक अधिक मिलती है। वर्षाऋतु में प्रायः कम मिलती है।

हिरनपदी का विभिन्न भाषाओं में नाम : Name of Hiranpadi in Different Languages

Hiranpadi in –

  • संस्कृत (Sanskrit) – हरिण पादी
  • हिन्दी (Hindi) – हिरनपदी
  • गुजराती (Gujarati) – हिरणबेल
  • मराठी (Marathi) – हिरणबेल
  • बंगाली (Bangali) – गोण्डाल
  • राजस्थानी (Rajasthani) – हिरणखुरी
  • तामिल (Tamil) – नाराजी
  • इंगलिश (English) – डीयर्स फुट
  • लैटिन (Latin) – कोन्वोलव्युलस आरवेसिस (Convolvulus Arvensis Linn)

हिरनपदी का रासायनिक विश्लेषण : Hiranpadi Chemical Constituents

  1. मूल में विरेचन द्रव्य अवस्थित होता है।
  2. काण्ड के सुरा प्रधान अर्क में 1.5 से 4 प्रतिशत रालमय द्रव्य मिलता है। यह उग्र एवं प्रदाहक होता है।
  3. सूखे भूमिगत काण्ड में 4.9 प्रतिशत राल मिलता है।

हिरनपदी का उपयोगी भाग : Useful Parts of Hiranpadi in Hindi

समग्रलता

सेवन की मात्रा :

स्वरस – 5 से 10 मिली।

हिरनपदी के औषधीय गुण : Hiranpadi ke Gun in Hindi

  • इसका रस तिक्त होता है तथा वीर्य उष्ण होता है।
  • समग्रलता में विरेचन कर्म पाया जाता है। किन्तु इसका मूल विशेष विरेचक होता है, पत्तों में विरेचन कर्म अत्यल्प होता है। इस लता को अकेली या दूसरी औषधियों के साथ प्रयोग में लाया जाता है।
  • प्रमेह, मधुमेह, गुर्दे की शिथिलता आदि में इसको घोटकर पीना लाभप्रद कहा गया है।
  • वनौषधि-चन्द्रोदय के लेखक लिखते हैं कि – इसकी जड़ विरेचक होती है। पत्र सारक और व्रण शोधक हैं।
  • इसके पत्रों की तरकारी बनाई जाती है और ये पौष्टिक माने जाते हैं।
  • इन पत्तों को पीसकर फोड़ेफुन्सियों पर बांधते हैं।
  • पंजाब और सिंध प्रदेश में विरेचन के लिये अंग्रेजी दवा जेलप के बदले में इसकी जड़ का उपयोग किया जाता है।
  • यूनानी मतानुसार इसकी प्रकृति तर गरम है
  • यह लता खून को साफ करने वाली और चर्मरोगों के वास्ते लाभकारी है।
  • यह आमाशय और आंतों को बल प्रदान करती है।
  • यह संग्रहणी और खूनी दस्तों को मिटाती है।
  • गुर्दे के रोग, मूत्र के रोग और वीर्य विकारों में भी यह लाभकारी है।

हिरनपदी के उपयोग : : Uses of Hiranpadi in Hindi

अलीगढ़ के आयुर्वेद मार्तण्ड पण्डित श्री रामचन्द्र वैद्य शास्त्री ने बूंटीरहस्य में नवरत्न फकीरी बूटियों के अन्तर्गत इस बूटी का सर्व प्रथम वर्णन किया है। आपने इसमें अपने अनुभवों को वों व्यक्त किया है –

एक तोला (10-12 ग्राम) बूटी ठण्डाई की तरह पीने से सब प्रकार के प्रमेह रोगियों को आराम मिलता है। इसका चूर्ण मक्खन मिश्री में मिलाकर खाने से नेत्रों की ज्योति बढ़ती है। जल के साथ फंकी लेने से दस्त और पेशाब साफ होकर शरीर शुद्ध हो जाता है। बच्चों को 2 ग्राम घुट्टी की तरह पिलाने से बालक नीरोग होता है ।

हिरनपदी के फायदे : Benefits of Hiranpadi in Hindi

प्रमेह में हिरनपदी का उपयोग फायदेमंद

हिरनपदी चार ग्राम और कालीमिर्च सात नग लेकर इन्हें पीसकर ठण्डाई की तरह तैयार कर पीने से प्रमेह में लाभ होता है। यह मधुमेही के लिये भी हितकर है। इसके सेवन से बल-वीर्य की वृद्धि होती है।

( और पढ़े – शिला प्रमेह वटी के फायदे )

मधुमेह मिटाए हिरनपदी का उपयोग

हिरनपदी पंचांग चूर्ण 4 ग्राम,तालमखाना चूर्ण 2 ग्राम और जामुन की गुठली की गिरी का चूर्ण 2 ग्राम सुबह शाम अर्क गिलोय 50 मिली के अनुपान के साथ सेवन करना चाहिये।

रक्तविकार जन्य रोग मिटाता है हिरनपदी का प्रयोग

हिरनपदी के पत्तों को बारीक पोसकर उसमें मिश्री मिलाकर सेवन करने से रक्त विकृतिजन्य रोग मिटते हैं और रक्त की वृद्धि होती है।

( और पढ़े – खून की खराबी दूर करने के उपाय )

खूनी दस्त में हिरनपदी के सेवन से लाभ

धनिये के हरे पत्तों के साथ इसके पत्तों को पीसकर दही में मिलाकर सेवन करने से रक्तातिसार ग्रहणी आदि में लाभ मिलता है।

धातुक्षय रोकने में लाभकारी है हिरनपदी का प्रयोग

हिरनपदी पंचांग चूर्ण 3 ग्राम को 250 मिली. मीठे दूध के साथ दिन में दो बार सेवन करना चाहिये।

( और पढ़े – धातु रोगियों के लिए लाभदायक फल उनके गुण व उपयोग )

हिरनपदी के विशिष्ट प्रयोग :

सत हिरनपदी –

हिरनपदी के पंचांग का स्वरस 2 लीटर और कालीमिर्च 50 ग्राम को मिट्टी के हांडी में मन्द आंच पर पकावें। जब पकते पकते वह गाढ़ा होकर खुश्क हो जाय तब उसे पीस छानकर सुरक्षित रखें। इस सत को एक ग्राम की मात्रा में रक्त विकार, कुष्ठ, उपदंश (Syphilis फिरंग), पीलिया, प्रमेह आदि रोगों में देना चाहिये। इसके सेवन करने से आंखों की रोशनी बढ़ती है।

चूर्ण हिरनपदी –

हिरनपदी के पत्तों को बारीक पीसकर बराबर मिश्री मिलाकर सेवन करने से प्रमेह, धातुस्राव में लाभ होता है। इसके साथ धनिये का भी सेवन किया जावे तो रक्तातिसार में लाभ होता है। धातुक्षय में हिरनमदी चूर्ण 3 ग्राम की मात्रा में मिश्री मिले दूध के साथ सेवन करने से विशेष लाभ होता है।

हिरनपदी के दुष्प्रभाव : Hiranpadi ke Nuksan in Hindi

  • हिरनपदी के सभी प्रयोग केवल चिकित्सक की देखरेख में ही करें ।
  • हिरनपदी को डॉक्टर की सलाह अनुसार ,सटीक खुराक के रूप में समय की सीमित अवधि के लिए लें।

(दवा व नुस्खों को वैद्यकीय सलाहनुसार सेवन करें)

Leave a Comment