Swami Rama Tirtha Granthavali – 01
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यह पुस्तक श्री स्वामी रामतीर्थ नाम से प्रकाशित हुई है और शीर्षक-पृष्ठ पर स्वयं प्रकाशित तथा स्वहः प्रथम अंक अंकित है। लेखक शंकराचार्य श्री स्वामी रामतीर्थ महराज हैं, जो लखनऊ के रहने वाले बताए गए हैं। प्रकाशन-पृष्ठ पर The Hanu Tirtha Pragation League, Lucknow का नाम और 1918 ई० का वर्ष अंकित है। पैमाना लगभग 131 पृष्ठ का है।
पृष्ठ पर यह भी बताया गया है कि इसमें वेद-विज्ञान के ब्रह्म-वेदान्त के पक्ष में एक प्रबन्ध दिया गया है, जिसमें कहा गया है कि मन की चंचलता के कारण मनुष्य जन्म-मरण के चक्र में पड़ा रहता है, और जो कर्मफल का भोग करते हुए सकर्म ठीक होता है उसी के निर्माण में प्रवृत्त होता है, इसलिए सकर्मों का कारण जान लेना चाहिए। साथ ही गीता, उपनिषद् और वेदान्त के अनेक श्लोकों का संदर्भ भी मिलता है।
विषय-सूची में निवेदन के बाद छह खण्ड दिए गए हैं — ब्रह्म-वेदान्त के पक्ष में एक प्रबन्ध, गीता के उपदेश, श्री राम का अन्तर्जगत, गीता-ज्ञान का विशेष प्रभाव, गीता-पाठ का महत्व, और अन्त में कवित्त-पाठ। यह पुस्तक वेदान्त-अध्ययन में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए उपयोगी है।
यह पुस्तक किसके लिए उपयोगी है — विद्यार्थियों, जिज्ञासुओं, साधकों तथा सामान्य पाठकों — सभी के लिए। चाहे इसे अध्ययन के लिए पढ़ें या जानकारी एवं आत्म-विकास हेतु, यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी। विषय की गहराई में जाने से पहले इससे मूल आधार मजबूत होता है।
कैसे पढ़ें — फ़ाइल पूरी PDF में है, जिसे मोबाइल, कंप्यूटर या किसी भी PDF ऐप में बिना इंटरनेट के पढ़ा जा सकता है। नीचे दिए बटन से इसे तुरंत और मुफ़्त डाउनलोड करें — कोई साइन-अप, सदस्यता या शुल्क नहीं।
- स्वामी रामतीर्थ की रचनाएँ (भाग 1)
- प्रवचन तथा कविता
- अद्वैत तथा भक्ति
- प्रेरक विचार
पुस्तक की मुख्य बातें
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